गुरुवार, जून 18, 2009

सुन बे गुलाब ...सरकार की भाषाई अक्षमता

क्रिकेट विश्वकप में भारतीय टीम हार गई. अब हार गई तो हार गई. खेलने गए हैं तो कोई ज़रूरी तो नहीं कि जीतेंगे ही. दो खेलेंगे तो एक हारेगा ही. ट्वेंटी-ट्वेंटी के खेल में मैच ड्रा नहीं हो पाता. ड्रा हो पाता तो हम इस बात पर संतोष कर डालते कि ड्रा कर देते तो भी बढ़िया होता.

लगभग एक महीने पहले तक धोनी को महान कप्तान बताने वाले अब कह रहे हैं कि उनका भाग्य अब नहीं चल रहा. बताईये, धोनी अगर भाग्य के सहारे ही महान कप्तान बने थे तो ये महानता तो एक दिन जानी ही थी. चली गई. लेकिन हारने के बाद जिस तरह से मीडिया समाचार और उसपर विचार दाग रही है, मुझे लगा कि एक-दो दिन में ही भाई लोग धोनी को अरेस्ट न करवा दें.

खैर, ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट में मैच ड्रा होने की संभावना भले ही न हो, भारत-पाकिस्तान की बातचीत में केवल और केवल ड्रा का ही प्रावधान है. लिहाजा एक और ऐतिहासिक ड्रा के लिए दोनों देशों के हुक्मरान तत्पर हो उठे. हमारे प्रधानमंत्री पकिस्तान के राष्ट्रपति (?) से मिल आये. मतलब एक और बातचीत ड्रा कर आये.

वैसे मृगेंद्र पाण्डेय की मानें तो वे पकिस्तान से बातचीत को यूपीए सरकार की भाषाई अक्षमता मानते हैं. मृगेंद्र लिखते हैं;

"आम चुनाव में अप्रत्याशित रूप से मजबूत जनादेश पाकर आत्ममुग्ध हो चुकी कांग्रेस नीत यूपीए सरकार आने वाले पांच सालों में देश को कैसी सरकार देने जा रही है। इस पर लोग अपने अपने-अपने तरीके से विचार प्रकट कर रहे हैं। लेकिन विदेश नीति के मोर्चे पर यूपीए सरकार अपनी भाषाई अक्षमता स्पष्ट कर चुकी है। हाल में पाकिस्तान की अदालत ने मुंबई हमले के सूत्रधार हाफिज सईद को यह कहते हुए रिहा कर दिया कि सरकार आरोपी के खिलाफ कोई ऐसा सबूत या दस्तावेज पेश करने में विफल रही है जिससे मुंबई हमले में उसकी संलिप्तता का पता चलता हो।"

अब भाषाई अक्षमता की बात उन्होंने क्यों की है, इसपर तमाम तरह के कयास लगाये जा सकते हैं. अलग-अलग तरह से इस बात का विश्लेषण हो सकता है. उनके लाहने का तात्पर्य कहीं इस बात से तो नहीं है जिसके तहत पकिस्तान के एक मंत्री ने बताया था कि मुंबई हमले को लेकर भारत द्बारा दिए गए डॉक्यूमेंट्स वगैरह हिंदी में थे? आपलोग कयास लगाने का काम जारी रखिये और देखिये कि मृगेंद्र आगे क्या लिखते हैं?

जनाब हाफिज़ सईद की रिहाई के बारे में मृगेंद्र लिखते हैं;

"हमारे विदेश मंत्री ने यह कहकर रस्म अदायगी कर दी कि हाफिज सईद की रिहाई दुर्भाग्यपूर्ण है। सही है। हम इससे ज्यादा कर भी क्या सकते हैं। पाकिस्तान के पास परमाणु बम है।"

पकिस्तान के पास परमाणु बम है? क्या इसी कारण से हमारे मंत्री जी और कुछ नहीं कह पाए? लेकिन एक बात समझ में नहीं आती. पकिस्तान के पास परमाणु बम हैं तो हमारे वैज्ञानिकों ने क्या लड़ी बम और आलू बम बनाया है?

पता नहीं? इसके लिए एक कमीशन बैठाया जा सकता है.

आप मृगेंद्र का यह लेख पढें. अपने विचार भी व्यक्त करें.

पश्चिम बंगाल में एक जगह है. नाम है लालगढ़. यहाँ पिछले कई दिनों से बवाल हो गया है. कई दिनों से? शायद नहीं. बात केवल दिनों की नहीं है.

खैर, माओवादियों ने लालगढ़ को अपने कब्जे में ले लिया है. कह रहे हैं कि सरकार से लड़ लेंगे. सरकार लड़ना नहीं चाहती. वह चाहती है कि केंद्र सरकार लड़े. मतलब अपनी बटालियन वगैरह भेजे. पश्चिम बंगाल को उबारे. लेकिन केंद्र सरकार का कहना है कि कानून-व्यवस्था की समस्या राज्य सरकार की समस्या है.

अब क्या किया जाय? माओवादियों द्बारा किये जाने वाले खून-खराबे को हमारे आका (आका शब्द सुनने से नहीं लगता कि किसी गुंडे का नाम है?) कानून-व्यवस्था की समस्या मानते ही कब हैं? उनके लिए तो यह एक सामजिक समस्या है. आर्थिक भी हो सकती है. इसे शिक्षा की वजह से उपजी समस्या भी करार दिया जा सकता है.

लेकिन यह समझ में नहीं आता कि जो लोग दो साल पहले तक दिल्ली में बैठे-बैठे नेपाल के माओवादियों से गुप्त बैठक करते रहे, उन्हें अचानक यह समस्या कानू-व्यवस्था की समस्या कैसे लगने लगी?

खैर, मुझे समझ में नहीं आता तो इसमें हमारे आका जी की क्या गलती हैं?

मान्धाता सिंह जी ने आज लालगढ़ में उपजी इस समस्या पर लिखा है. सिंह जी लिखते हैं;

"लालगढ़ की हालत बदतर है और पूरे इलाके पर सरकार से नाराज आदिवासियों की मदद से माओवादियों का कब्जा है. माकपा के लोग दिन-दहाड़े मारे जा रहे हैं. सरकार चाहकर भी कार्यवाई नहीं कर पा रही है."

कार्यवाई क्यों नहीं कर पा रही? इस प्रश्न और ऐसे ही कुछ और प्रश्नों का जवाब जानने के लिए आप डॉक्टर मान्धाता सिंह जी का यह लेख पढिये.

आप क्यों लिखते हैं? मैं तो टिप्पणियों के लिए लिखता हूँ. ब्लॉगर हूँ न.

लेकिन श्यामल सुमन जी क्यों लिखते हैं, यह भेद आज उन्होंने खोल दिया है. उनकी आज की कविता में उन्होंने बताया है;

कमी बहुत श्रोताओं की है वक्ताओं की नहीं कमी।
लिखने वाले भरे पड़े हैं फिर भी मैं क्यों लिखता हूँ?

प्यास है लेखक बन जाने की, लिप्सा है कवि कहलाने की।
किंचित् स्थापित कवियों संग, अवसर मिल जाये गाने की।
धीरे धीरे नाम बढ़ेगा, कवियों सा सम्मान मिलेगा।
पाठ्य पुस्तकों में रचना को, निश्चित ही स्थान मिलेगा।
हँसने वाले हँसा करें, पर बात यही दुहराऊँगा।
दिवा-स्वप्न साकार हुआ तो, राष्ट्रकवि बन जाऊँगा।
सार्थक इसी भाव को करने, रोज नया मैं सिखता हूँ।
इसीलिये मैं लिखता हूँ।।

पूरी कविता आप श्यामल जी के ब्लॉग पर पढें. मुझे बहुत पसंद आई.

हम किससे-किससे और किन-किन चीजों से जल लेते हैं? पड़ोसी से जल लेते हैं. अपने ब्लॉगर मित्र, जिन्हें ज्यादा टिप्पणियां मिलती हैं, उनसे जल लेते हैं. (सूचनार्थ: जल से मेरा मतलब पानी से नहीं है.)

लेकिन आलोक पुराणिक जी की मानें तो ऑटोरिक्शा से जलने का भी चांस रहता है. शायद इंसान की इस जलन वाली फितरत को ऑटोरिक्शा भांप गया होगा इसिलए उसने अपने पीछे लिखवा लिया है;

"बुरी नजर वाले जल मत, मैं किश्तों पर हूं।"

आलोक जी ऑटो रिक्शा की इस बात का भावार्थ समझाते हुए कहते हैं;

"बात में दम है, किश्तों के आइटम से किसी को जलना नहीं चाहिए। फुल फ्लैज्ड, सिंगल पेमेंट लेकर आये कोई आटो, तो किसी का जलना जायज है।"

आलोक जी इस तरह के डिस्क्लेमर कम सुझावों को विस्तार देते हुए आगे लिखते हैं;

"वैसे कुछ इसी टाइप की बातें अब की सरकारों को भी लिख कर टांग देनी चाहिए-बुरी नजर वाले, जल मत, गठबंधन से बनी हूं। सिंगल पार्टी सरकारों पर बुरी नजर लगाने का हक बनता था।"

आप अलोक जी का लेख पढिये. और टिप्पणी भी दीजिये. उनके ब्लॉग पर कमेन्ट माडरेशन नहीं है. ऐसे में टिप्पणियां तुंरत पब्लिश हो जायेंगी और आप अपनी दी हुई टिप्पणी देख सकेंगे.

इसी बात का फायदा उठाते हुए प्रवीण पाण्डेय जी ने टिप्पणी में घणी विचारणीय कविता लिख मारी है. वे लिखते हैं;

किश्तों की सही, रिश्तों की सही,
सपनों की कहानी, ढह ढह के बही,
औरों का जलना, न जलना, क्या जानू,
सासें तो अटकी चुकाने में रहीं ।


डॉक्टर अनुराग आर्य जी ने निराला की कविता "सुन बे गुलाब" का नया और सामयिक संस्करण लिखा है. वे लिखते हैं;

"जब रोज़ कमेटी में हमारा नाम शुमार हुआ ... जाट गंभीर से दिखे ..हम चिंतित हो गये .उनके गंभीर होने का मतलब किसी घटना के होने का आसार था..पिछली बार जब वे गंभीर हुये थे तब डॉ देसाई की लड़की को प्रपोज़ कर आये थे .वो तो शुक्र था की की उनकी ठेठ हरयाणवी उसकी समझ नहीं आयी थी .ओर वो उसे कोई लोक-गीत समझ सारु छे .... सारु छे ...करती रह गई थी.."

एक दम धाँसू पोस्ट है. आप ज़रूर पढें और अपने पुराने स्कूलीय और कालेजीय दिन याद कीजिये.

इसलिए कह रहा हूँ कि अभी तक पढने वालों को याद आये हैं तो आपको भी याद आयेंगे ही. टिप्पणी करते वक़्त खुद अभिषेक की आत्मा एक गणितज्ञ की आत्मा से एक कवि टाइप इंसान की आत्मा बन गई. वे लिखते भये;

"कल्चरल फेस्टिवल ! आह ! वो दिन भी क्या दिन थे !"



व्यंगकार को भी रियलटी शो में जाने की तमन्ना वगैरह होती है. नीरज बधवार जी की तमन्ना भी है. लिहाजा वे प्रश्न पूछते हैं कि;

"किस रिएलिटी शो में जाऊं मैं!"


अब आप यह मत कहियेगा कि चूंकि नीरज खुद को शिशु व्यंगकार कहते हैं तो वे लिटिल चैम्प वाले रियलटी शो में चले जाएँ. ऐसा कहना ठीक नहीं रहेगा. नीरज का यह कहना तो शिष्टाचार की निशानी है. हम्बल होना...यू नो.

खैर, अपनी तमन्ना का जिक्र करते हुए नीरज लिखते हैं;

"दौलत और शोहरत की मुझे बरसों से तमन्ना है। वैसे भी इंसान उसी चीज़ की तमन्ना करता है जो उसके पास नहीं होती। यूं तो अक्ल भी मेरे पास नहीं है, मगर वो आ जाए ऐसी कोई ख़्वाहिश भी नहीं। ख्वाहिश, पैसे और पॉपुलेरिटी की है मगर हासिल कैसे करूं, तय नहीं कर पा रहा। मौजूदा तनख्वाह में, आगामी दस सालों के लिए, सालाना दस फीसदी की बढ़ोतरी जोड़ूं, और उसमें से खर्च घटाऊं, तो कुल जमा कुछ हज़ार रूपये ही मेरे बचत खाते में बचेंगे और इसी अनुपात में लोकप्रियता बढ़ी तो इन दस सालों में तीस-चालीस नए लोग ही मुझे जान पाएंगे। मतलब ये कि मौजूदा पेस पर दस सालों में कुछ हज़ार रूपये और अपनी प्रतिभा से कायल या घायल हुए तीस-चालीस लोगों की कुल जमा-पूंजी ही मेरे पास होगी, जो मुझे कतई मंज़ूर नहीं है। मैं चाहता हूं कि जल्द ही मेरे पास लाखों रूपये हों, करोड़ों दीवाने हों, जिसमें भी दीवानियों की संख्या ज़्यादा हो, टीवी-अख़बार, हर जगह मेरा इंटरव्यू हो, देश का हर बच्चा-बूढ़ा मेरा ही नाम लेकर सोए, और हर जवां लड़की मेरी ही तस्वीर देख जागे।"

यह तो निबंध की भूमिका टाइप है. आप पूरा निबंध पढें. मज़ा नहीं आया तो मेरी की गई चर्चा पर टिप्पणी मत कीजियेगा. मैं संतोष कर लूँगा.

रचना जी ने बलात्कार पर कुछ ब्लॉग-पोस्ट नारी ब्लॉग पर संकलित किये हैं. आप वहां से लिंक लेकर इन पोस्ट को पढें. साथ ही पोस्ट और मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया भी दें. एक स्वस्थ बहस के लिए न सिर्फ पोस्ट का पढ़े जाना ज़रूरी है बल्कि प्रतिक्रिया देना भी उतना ही ज़रूरी है.

प्रसिद्द हास्य-कवि अल्हड बीकानेरी जी नहीं रहे. योगेन्द्र मौदगिल जी ने उन्हें श्रद्धाजलि के रूप में एक कविता लिखी है. वे लिखते हैं;

दुक्खों का खत बांट रहे हैं
दुख भरे दिन

पहले गये
आदित्य, नीरज और गुर्जर
ऒम-जानी
बच गये लेकिन हैं जर्जर
हर सुबह
लेकर खड़ी जहरीली पिन

रो पड़े
सब को हंसाने वाले सारे
फिर हवा ने
पीपलों के रज पखारे
और देखे फिर
मसानों ने भरे दिन

अल्हड़ जी को हमसब की और से श्रद्धांजलि.

आज की चर्चा में बस इतना ही.

नमस्कार

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15 टिप्‍पणियां:


  1. शिवभाई... शिवभाई... शिवभाई...
    जरा दो पल ठहर कर साँस तो ले लेने दो
    पूरे 30 घँटे नेटच्युत रहने के बाद अभी अभी तो नेटासीन हुआ हूँ !
    इतने दिये गये लिंक का नेटभार सँभलने के बाद चर्चा-टिप्पणी का लम्बर आयेगा !

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  2. नीरज जी की पोस्ट पढ़ के आये...टिप्पणी भी दी, अच्छा लगा इसलिए आपकी टिप्पणी भी दे रहे हैं :) चर्चा अच्छी है, बाकी लिंक फुर्सत में देखते हैं :)

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  3. "बुरी नजर वाले जल मत, मैं किश्तों पर हूं।"

    एक पुराना फिल्मी गीत याद आ गया-- जलने वाले जला करे, किस्मत हमारे साथ है...डरडां...डरडां...डरडां। हो सकता है सागर नाहरजी अपनी चर्चा में इसका ज़िक्र करें :-)

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  4. आपकी चर्चा से जला जा सकता है क्योंकी इसे कोई किश्तो मे नही पढेगा,सिंगल स्ट्रोक सिंगल सिटिंग मे ही पढ लेगा। नज़र ना लगे,आपकी चर्चा पर नीबू और मिरची की लट्कन्।

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  5. अनुराग जी की प्रविष्टि पढ़ आया हूँ । रचना जी के लिंक अभी नहीं देखे ।
    चर्चा अच्छी लगी ।

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. प्रसिद्द हास्य-कवि अल्हड बीकानेरी जी को श्रद्धांजलि.

    अच्छी चर्चा.

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  8. अच्छी चर्चा ! आज तो वृहस्पतिवार को भटकते हुए आ गए पर कोई टेक्नीकल आदमी बतायेगा कि चर्चा के फीड रीडर में क्यों अपडेट नहीं हो रहे ? अभी भी १० जून तक की ही पोस्ट दिख रही है वहां !

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  9. अल्हड़ जी को श्रद्धांजलि.

    वैसे नीरज को सलाह है कि वो शिशु व्यंग्यकार के बदले युवा व्यंग्यकार लिखना शुरु करें और फिर ग्राफ चैक करें..जागने वाली इच्छा कुछ हद तक चमक सकती है. बाकी तो पूरी चमकेगी ही.

    चर्चा मस्त रही.

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  10. बहुत ही सार्थक चर्चा. बधाई हो.

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  11. शिव जी की एक और बेमिसाल चर्चा....मगर इस चिट्ठा-चर्चा का फीड अपडेट क्यूं नहीं हो रहा?

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  12. नीरज जी का अपने आप को शिशु लिखना, बड़प्पन की निशानी है।

    चर्चा भली लगी।

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  13. @ पी एस पाबला जी

    पाबला जी आपका कहना बिलकुल ठीक है कि; "नीरज जी का अपने आप को शिशु लिखना, बड़प्पन की निशानी है।"
    कभी-कभी तुंरत शब्द नहीं मिलते. और अगर जल्दी में कुछ लिखा जाय तो समस्या और बड़ी हो जाती है.
    खुद के बारे में नीरज जी का यह कहना बड़प्पन की ही निशानी है. शिष्टाचार लिखने से सही अर्थ संप्रेषित नहीं होता.

    आपके कमेन्ट में एक ही लाइन है लिहाजा 'बिटविन द लाइंस' क्या पढ़ा-लिखा गया उसपर कुछ कहने से आप कहेंगे कि; "मेरा कमेन्ट तो एक ही लाइन का था. ऐसे में 'बिटविन द लाइंस' का सवाल ही नहीं उठता...:-)

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  14. इसमें पहली टिप्पणी अमर जी की देखकर बहुत लगा!

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