शुक्रवार, नवंबर 13, 2009

तनावग्रस्त पुरुषों की मदद कीजिए....

दो दिन पहले , बहुत दिन के गैप के बाद लॉगिन हुई तो सन्देशों व चैटों की बाढ आ गयी अच्छा लगा कि कम से अपनी अनुपस्थिति दर्ज हुई है :)
आज फिर लिखने से बच रही थी और बहाना था कि आज की चर्चा तो हो चुकी ।लवली ने उसमे घोषणा की है कि वे आज से विज्ञान सम्बन्धी चिट्ठों की चर्चा करेंगीं।
स्त्री विमर्श के संदर्भ मे अक्सर यह सुनने को ही मिलता है कि ये वे औरते हैं जिनके घर कभी बसे नही और मर्दों से इन्हें चिढ है ,इनका स्त्री विमर्श दर अस्ल इनकी भड़ास ही है।यूँ कहने को और भी बहुत कुछ कहा जाता है लेकिन बसंती की तर्ज़ पर यूँ कि देखने वाली बात ये है कि इन्हीं उत्तर औपनिवेशिक विमर्शों के ज़रिए इतिहास मे दफ्न हो गयीं , दमित अस्मिताओं ने सर उठाना सीखा है और अब उनके बारे मे बात होती है ...ब्लॉग पर भी।

देखने वाली बात यह भी है कि स्त्री की इस भड़ास को मज़ाक का विषय , मज़े का विषय भी बनाया जा चुका है , यूँ कि पुरुष स्त्री को मारे (आँख या कुछ भी) यह सामान्य बात है (हाथी चूहे को रौब दिखाए , कुछ अजीब नही ) पर चुटकुला तभी बनता है कि जब स्त्री पुरुष को मारे , जैसे चुटकुलों मे चूहा हाथी को कहे 'अबे सुन बे '- केवल एक बिम्ब है सच मे स्त्री चूहा है और पुरुष शेर है यह नही कहना चाहती ;सशक्त और दमित के सम्बन्ध दिखाना भर मकसद है ।"जब वी मेट" मे अकेली लड़की जब रात को स्टेशन पर छूट जाती है यही होता है।स्टेशन मास्टर भी ज्ञान देता है -अकेली लड़की खुली तिजोरी की तरह होती है !
ऑलरेडी सशक्त का किसी दमित से स्वेच्छा से पिटना खबर भी है और चुटकुला भी।और स्त्री से खुशी से पिटना भी मज़ा है (ईव टीज़िंग के दौरान लड़की थप्पड़ मारने की बात कहे तो शोहदे कहते हैं न 'मारो तो सही मैडम !') इसी को समझ कर चीन के इस व्यक्ति ने यह व्यवसाय ढूंढ निकाला।यह व्यक्ति सच मे भले न हो लेकिन यह चुट्कुला तो है ही जिसके पीछे की प्रवृत्ति पर अभी मैने बात की।
उत्तर-पूर्वी चीन के शेनयांग के जियाओ लिन नाम का यह शख्स एक जिम का कोच है। उसने तनावग्रस्त महिलाओं को अपनी भड़ास निकालने के लिए खुद को एक पंचबैग की तरह इस्तेमाल करने के लिए पेश किया है। लिन को आधे घंटे तक पीटने के लिए महिलाओं को करीब सात सौ रुपए खर्च करने पड़ते हैं। उनका कहना है कि ऐसा करके वह तनावग्रस्त महिलाओं की मदद कर रहे हैं।


उस पर से यह भी कि वे जल्दी थक भी गयीं और बातें करने लगीं (अशक्त होने का प्रमाण भी प्रस्तुत है )यूँ भी तनाव ग्रस्त महिलाओं की मदद को कुछ पुरुष कभी भी आतुर पाए जाते हैं :)
न ही छेड़ने वाले पुरुष कहीं पिटते हैं न ही पतियों का पिटना या मानसिक शोषण कोई सामान्य घटना है ।



महफूज़ अली said...

aap yeh punch bag wala job kar lijiye..... kam se kam maar khaane ke baad khoobsoorat ladkiyon ka saath bhi milega....to sara dard waise hi door ho jayega..... hahahahahaha....... aur paise to khair milenge hi milenge..... hahahaha......


डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

ksii ko bhi kar lijiye, dono men majaa hai.....paisaa hai.....aish hai........
badhaai agrim pesh hai.......

pankaj vyas said...

aap koi bhi job kare, mujhe helpar bana lijiyega, maja aayega...


अन्तर सोहिल said...

दोनों कार्य एक साथ भी किये जा सकते हैं।
आपका पहला प्रतिद्वंदी मैं हूं, अभी और भी आते ही होंगें।
Anonymous said...

नौकरी न कीजिये, घास खोद खाईये
हमारी राय में तो आप अपना व्यवसाय ही करे तो सही है :)

आप तनावग्रस्त महिलाओं की मदद करें तो भला है
(लेकिन ये सेवा तनावग्रस्त पुरुषों के लिये कभी भी भूल कर उपलब्ध नहीं कराईयेगा...)

RAJNISH PARIHAR said...

दुसरे वाला जॉब ठीक रहेगा....कल को काम ही आएगा साथ में ट्रेनिंग भी हो जायेगी....


dhiru singh {धीरू सिंह} said...

दूसरा वाला ठीक लग रहा है . वैसे भी पिट तो रहे है पिट्ने के लिये पैसा मिल जाये तो क्या बुरा है

(प्वाइंट टू बी नोटेड - पिटने के लिए पैसा किसी स्त्री को नही मिलेगा, वे तो यूँ ही मुफ्त मे पिट लेती हैं , बलत्कृत हो लेती हैं वगैरह वगैरह )

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

पंचबैग वाला पार्ट टाइम कर लीजिए।:)
बाकी शहरों की सैर तो वाकई मजेदार है।

Vivek Rastogi said...

हिट मी जाब बढ़िया है वह तो मैं भी करने की सोच सकता हूँ, अच्छी तरकीब है पर उसकी मार्केटिंग करना भी टेढ़ी खीर है। :)

वाणी गीत said...

हिट मी जॉब - ये जॉब या व्यवसाय ... सबसे बेहतर लगा ..!!

यूँ इस मुद्दे पर भेजा बन्द करके राय दी जाए तो मै भी शायद यही कहती कि दूसरे वाला व्यवसाय कीजिए क्योंकि उसमे वाकई कष्ट की जगह आनन्द है ।लेकिन ये सलाह देते हुए ध्यान रखें - आपके शब्द आपकी मानसिकता बयाँ कार्ते हैं और फिर धीरे धीरे आपकी कार्यशैली मे आ जाते हैं इस तरह कि उसमे कुछ अजीब नही लगता ।

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18 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे उस पोस्ट में साधारण हास्य से अधिक कुछ नही दिखा ..और हास्य पर प्रतिक्रिया भेजा बंद करके ही दी जा सकती है .

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  2. आप को "जगता " देख कर खुशी हुई । सबसे ज्यादा जिन लोगो को तकलीफ हैं { केवल इस ब्लॉग जगत की बात कर रही हूँ } और मद्दत की जरुरत हैं उन मे से बहुत से तलाक शुदा हैं या सो कॉल्ड पत्नी पीड़ित हैं । वो यहाँ आकार दुसरो के कपड़ो , कद काठी , विचार { इसी आर्डर मे } पर व्यक्तिगत कमेन्ट करते हैं । कई बार लोग मेल दे कर मुझे कहते हैं अब आप "उनको " जवाब ना दिया करे , बेचारे पहले ही घर से परेशान हैं ।

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  3. वाह जी! एक ही पंच में आउट हो गई!!!! :) यूं के सोचने वाली बात ये है कि लिन ने दो लडकियों को सहा...बात की.... और आप एक ही ब्लाग की चर्चा पर...आप भी ना...........

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  4. मेरा जवाब लवली जी दे ही चुकी हैं ...!!

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  5. हम जब भी मुँह खोलते हैं तो अपने संस्कारों को उद्‍घाटित कर रहे होते हैं। अपनी सोच और बौद्धिक स्तर से बाहर जाकर कोई कुछ भी न लिख सकता है, न बोल सकता है और न ही समझ सकता है। बिल्कुल ठीक कहा आपने। शुक्रिया।

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  6. हा हा कुछ कहना बेकार है, नारी शक्ति अपनी दिशा खुद निर्धारित करती है...

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  7. मुझे आशीश जी असमंजस में लगे,बहुत वार इस प्रकार की सलाह माँगना हास्यस्पद हो जाता है,हो सकता है,वह विनोद कर रहे हों,परन्तु उनके उस लेख को देख कर मैने विना विनोद किये हुए उनको अपनी सलाह दी,परन्तु उनके उस लेख से स्पष्ट नहीं था,उनको वाकई में,मशवरे की आवशयक्ता है कि नहीं,या वोह केवल हास्य,परिहास था ।

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  8. आपने शीर्षक तो दिया तनावग्रत पुरषों की मदद किजीये,पर मुझे तो तनावग्रस्त पुरषों की मदद के बारे में,कुछ नहीं मिला ।

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  9. कल ही ठंड और बारिश मे पत्नि की जिद के कारण शाम को बाज़ार जाना पडा . अगर मां होती तो क्या मुझे बाज़ार भेजती . तनावग्रस्त तो पुरुष हो ही जाता है .

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  10. सुजाता जी !
    आपकी यह चिट्ठाचर्चा शायद (मैं अभी तक यकीन नहीं कर पा रहा हूँ ) तात्कालिक प्रतिक्रया से अधिक नहीं लगती है | बहरहाल यह काम केवल उस ब्लॉग विशेष पर टिपिया कर भी हो सकता था | खैर चर्चा के बहाने ही सही आपने अपने विचार व्यक्त कर दिए | वैसे सन्दर्भों से हटकर हर मुद्दे को नहीं देखा जाना चाहिए ...... चाहे वह स्त्री -विमर्श जैसा मुद्दा ही क्यों न हो?


    और एक ही ब्लाग की चर्चा?
    खैर....

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  11. तनावग्रस्‍त पुरुषों को कम से कम उस तरह मदद की जरूरत तो कतई नहीं है, जिस तरह जिक्रित पुरुष तनावग्रस्‍त महिलाओं की कर रहा है ।
    :)

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  12. प्रवीण जी ,
    सन्दर्भ से हटने की बात नही है यहाँ । मै खुद भी कह चुकी कि पहली नज़र मे मै भी शायद यही सलाह देती कि आप दूसरा वाला व्यवसाय चुन लीजिए।पर तुरंत मेरी दृष्टि उस प्रवृत्ति की ओर ले गयी जिसके कारण ऐसे मज़ाक जन्म लेते हैं और लोगों की सोच का अभिन्न अंग हो जाते हैं। कुछ बातें हमारे मानस का ऐसा हिस्सा हो जाती हैं कि हमें उनमे कुछ भी गलत नही लगता।ठीक वैसे जैसे हर बात मे साला, साली कहना।
    वर्ना क्यों उस चीनी पुरुष को ज़रूरत पड़ी थी कि वह ऐसा व्यवसाय खोजता या समीक्षित ब्लॉग लेखक को भी इसे व्यंग्य हेतु समक्ष रखने की क्या ज़रूरत थी।पाठ्क की नज़र सोच जहाँ जाकर रुक जाती है वहाँ से समीक्षक की सोच शुरु होती है। समीक्षा कर रही थी इसलिए मेरी सोच हँसी से आगे बढ गयी।विशुद्ध पाठक की तरह शायद मै भी इस मज़ाक का हिस्सा बन जाती।

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  13. भले आदमी जियाओ लिन, यहां भारत में तो पुरूषों को पूरी ज़िंदगी अपनी पत्नियों से पिटने में ही गुज़र जाती है पर, पाई भी नहीं मिलती...तुम बहुत खुशकि़स्मत इंसान हो कि कमाई भी कर रहे हो. यहां की बीवियां तो उन औरतों पर बस हँस ही सकती हैं...

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  14. सहमति/असहमति की बात अलग है लेकिन एक पोस्ट से मुद्दे की बात के नजर से चर्चा देखकर अच्छा लगा। यहां की गयी टिप्पणियां भी साथियों की समझ और उनकी सोच का जायजा देती हैं।

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  15. नोटपैड जी/ सुजाता जी,

    यथेष्ठ अभिवादन!

    आपकी इस पोस्ट पर आज नज़र गई, इसलिए मेरी टिप्पणी देर से मिल रही है। आपके विचार पढ़े और उन्हें उसी नज़र से देखने की कोशिश भी की, जिससे आप दिखाना चाह रही हैं। अफ़सोस, मैं फ़िर भी इस पोस्ट को आपकी वाली नज़र से नहीं देख पाया।

    बचपन में एक बार मेरे भैया ने चाय का कप ज़मीन पर रख दिया। मेरी ठोकर लगी और कप टूट गया। मुझे डांट पड़ी कि देखकर नहीं चलते। उसके कुछ समय बाद मैंने उसी जगह पर कप रखा और भैया का पैर उस पर पड़ा। कप टूट गया। इस बार भी मुझे ही यह समझाते हुए डांट पड़ी कि इतना भी नहीं पता, कप कहां रखा जाता है?

    आपकी यह पोस्ट पढ़कर मुझे इस घटना का स्मरण हो आया।

    न तो मेरी यह पोस्ट किसी दूषित मानसिकता को लेकर लिखी गई थी औऱ न ही इसने ऐसा कोई छद्म आशय पाठकों तक पहुंचाया है। यहां हास्य का विषय नारी नहीं, बल्कि अजीबोगरीब नौकरी या व्यवसाय है। हां, इस विषय को परिपुष्ट करने के लिए सच्ची घटना के साथ पुरुष और नारी किरदारो का अवलम्बन ज़रूर लिया गया है।

    नारी आदर के विषय में मैं इतना कहूंगा कि वे प्रकृति की बेहतर कृति हैं। मैं अक्सर यह कहता हूं - women are the best schools in the world..... और यह मैं यूं ही नहीं कहता। इसके मायने हैं। शायद यह बात वे ब्लॉगर महिला साथी अच्छी तरह समझ रही होंगी, जिनसे किसी न किसी सिलसिले में कभी मेरा संपर्क हुआ है।

    आपने जो लिखा, उसमें मुझे ऐतराज सिर्फ एक वाक्यांश को लेकर है। आपने लिखा - स्त्री की इस भड़ास को मज़ाक का विषय , मज़े का विषय भी बनाया जा चुका है।

    स्त्री के साथ भड़ास शब्द को जोड़ने का अनुचित साहस आपने किया है। मुझे आपत्ति यह है कि आपने इस शब्द पर मेरी पोस्ट का लिंक क्यों चढ़ाया है। क्या आप किसी भी तरह से सिद्ध कर सकती हैं कि मेरी पोस्ट से इस तरह का आशय जा रहा है?

    आप इसे मेरी मानसिकता के साथ भी नहीं जोड़ सकतीं, क्योंकि यह मेरा मौलिक सृजन नहीं है। यह महज इस ख़बर का हिन्दी अनुवाद है।

    एक बार फ़िर स्पष्ट कर रहा हूं कि उस पोस्ट के जरिए मेरा आशय वह नहीं था जैसा आपने प्रदर्शित किया। मेरे इस स्पष्टीकरण के बाद भी अगर महिला शक्ति की कोई सदस्य यह महसूस करे कि मैंने उनकी भावनाओं को आहत किया है, तो कृपया मेरी पोस्ट पर अपने विरोधस्वरूप एक टिप्पणी छोड़ दें। मैं व्यक्तिगत रूप से उनसे अपने इस तथाकथित घृणित कार्य के लिए माफ़ी मांग लूंगा।

    हैपी ब्लॉगिंग

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