रविवार, नवंबर 29, 2009

पुरुष, मेरा मन करता है कि तुम्हारा एक झाड़ू बनाऊँ और उससे अपने कमरे को बुहारूं…

बचपन

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सामने जो एक नाला है ना, गिर नहीं जाना उसमें, ठीक?

गिरने से क्या होगा?

अरे! गिरने से क्या होगा? एक हज़ार नौ सो छिपकलियाँ एक के बाद एक नाले के कीचड़ से निकलेंगी, फिर पानी में तैरकर तुम्हारे ऊपर चढ़कर आस्ते आस्ते तुम्हारे मुंह तक पहुंचकर अपने तेज़ नुकीले दाँतों से ... चीखो मत!

मुझे घर जाना है।

क्या? क्यूँ?

मुझे घर जाना है!

पर घर तो नाले के उस पार है।

---

पुरुष

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पुरुष मेरा मन करता है

तुम्हारा एक ब्रश बनाऊं

उससे अपने कमरे को बुहारूं,

अपने गंदे कपड़ों को साफ़ करूं,

दांत ब्रश करूं, कोटे साफ करूं,

बालों पर ब्रश करूं

और फिर उसे उठा कर अलमारी में रख दूं........

---.

(यदि आपको लगता है कि चर्चा में कमी-बेसी रही - बिना किसी भूमिका के रही, छोटी रही, अच्छी रही या न रही इत्यादि इत्यादि, तो स्पष्टीकरण प्राप्त करने हेतु यहाँ  जाएं :) )

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33 टिप्‍पणियां:

  1. पुरुष होने के नाते तो चर्चा बड़ी डरावनी निकली !! अब कैसे कहें हैप्पी ब्लॉग्गिंग??

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  2. ब्रश के भी भाग्य खुल गए :)

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  3. चलो अच्छा है ब्रश के काम तो आये,
    घर के नसीब जागे-आभार

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  4. उफ़ !!! इतने सारे उपयोग वर्णित हैं फिर भी अलमारी मे रखना चाहती हैं । बेकार का उपक्रम हैं किसी को आले या अलमारी मे रखना जब वस्तु इतनी उपयोगी हो । ख़ैर जिनकी वस्तु हैं वो जाने रखे या लोन पर दे दे !!!!!

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  5. पुरुष मेरा मन करता है

    तुम्हारा एक ब्रश बनाऊं

    उससे अपने कमरे को बुहारूं,

    अपने गंदे कपड़ों को साफ़ करूं,

    दांत ब्रश करूं, कोटे साफ करूं,

    बालों पर ब्रश करूं

    और फिर उसे उठा कर अलमारी में रख दूं........

    गनीमत है..आलमारी में ही रखा है, फेंका नहीं :) इस सुंदर कविता को पढ़वाने के लिए आभार।

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  6. अरे ठीक है न रचना जी, रखने दीजिये अलमारी में...इन पुरुषों ने तो बहुत दिनों तक ताले में रखा है महिलाओं को...बन्द किये जाने का अर्थ इन्हें भी तो समझ में आये...

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  7. `यहां’ देखने पर गूगल ऊऊऊप्स्स्स्स कहता है तो देखना छोड दिया। अब पुरुष की कामना तो होगी कि ब्रश से अच्छा है साबुन बन जाना.... बाकिया तो आप जाने:)

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  8. यह तो वैसा ही है जैसे पुरूष की कामना रहती है पायल, झुमका, लिपिस्टिक, लॉकेट बनने की!

    हाँ, उपमायों का प्रयोग नज़रिया ज़रूर बताता है।

    वैसे पुरूषों का उपयोग ऐसी ही वर्णित अल्पकालीन कार्यों के अलावा और क्या है!

    बी एस पाबला

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  9. लेकिन मेरा मोहतरमा से एक सपाट प्रश्न है,
    मैडम यू मे बी इन्डियन जी, आपके प्रोफ़ाइल में लिट्टी-चोखा प्रभावित तो करता है,
    यदि प्राउड टू बी बिहारी तो प्राउड टू बी अ मराठी माणूष ने क्या अपराध किया है ?
    यू ऑर प्राउड फ़ॉर बीइँग इन्डियन ऑनली क्यों नहीं, बिहारी ही क्यों ?
    हमारे सर्वोच्च गर्व का विषय भारतीय होना है,
    बाई द वे आई एम प्राउड टू बी उफ़रौलियन ?
    अब कोई अँदाज़ा है किसी को मेरे देश का ?
    यदि नहीं, तो मैं बता दूँ कि यह सीतामढ़ी से सटा हुआ मेरा गाँव है ।
    सीतामढ़ी.. वह भी इलाहाबाद यू.पी. वाला नहीं, ठेठ उत्तर बिहार वाला !
    आपकी कविता पाठकों से एक स्पष्ट प्रश्न कर रही है, वह यह कि
    कौन कहता है कि, पुरुष उपभोग्य नहीं हैं ?
    यदि यह प्रेम का आवेग है, तो अपने प्रेम प्रतीक से ’ गंदे कपड़ो ’ को नहीं रगड़ा जाता ।
    चर्चाकार भाई जी इतने वरिष्ठ और आदरणीय हैं, कि यह भी नहीं पूछते बन पा रहा है कि,
    यह गाड़ी रतलाम जँक्शन पर ही क्यों अटक कर रह गयी ?

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  10. रचनाजी, शुक्रिया। गलती ठीक कर ली गयी।

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  11. एक पुरुष से ..मतलब एक ब्रश से इतने काम सम्भव नही है इसके लिये अलग अलग साइज़ के ब्रश चाहिये .. तथ्यात्मक गलती - आलोचक ।

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  12. प्रस्तुति का अंदाज दुरुस्त लगा ..........
    ब्रश - धर्मी प्रस्तुति .............
    पाठक - पुरुष क्या करें ............

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  13. एक ब्रश बनाया,

    उससे अपने कमरे को बुहारा,

    अपने गंदे कपड़ों को साफ़ किया,

    दांत ब्रश किये, कोट साफ किया,

    बालों पर ब्रश किया,

    और फिर उसे उठा कर अलमारी में रख दिया.......

    ये कहिये कि गनीमत रही कि

    टॉयलेट साफ़ करूँ,

    जूते पोलिश करूँ,

    अलमारी में नहीं डस्टबिन के बगल में टिका दूं.

    यही तो बच रहा है.

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  14. महिला...........
    मेरा मन करता है
    तुम्हारा एक ब्रश बनाऊं
    उससे अपने कमरे को बुहारूं,
    अपने गंदे कपड़ों को साफ़ करूं,
    दांत ब्रश करूं, कोटे साफ करूं,
    बालों पर ब्रश करूं
    और फिर उसे उठा कर अलमारी में रख दूं........

    सामने जो एक नाला है ना, गिर नहीं जाना उसमें, ठीक?

    :-)

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  15. यह कविता शिल्प के स्तर पर अलग है। वस्तुतः स्त्री को एक वस्तु समझने के विरुद्ध फंतासी प्रतिक्रिया है। मोहतरमा ने अपने दांत में फंसा एक तिनका निकाल कर फैंका है।

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  16. आपने अपने मन की कह ली. बहुत बढ़िया किया. ऑउटलेट तो चाहिये ही.

    अब जरा हास्य के तौर पर इसे भी देख लें मगर मात्र हास्य के तौर पर-उसके आगे-नो विवाद. विवाद का दिल करे, तो अलमारी में ताला भी जड़ देना.


    पुरुष मेरा मन करता है
    (हे नारी, तेरे मन पर तो हम कभी खरे उतरे ही नहीं..तेरा मन तो करता है कि हम चाँद तारे तोड़ लाये, वो भला कैसे संभव करें)

    तुम्हारा एक ब्रश बनाऊं

    (जरा ध्यान से, कहीं हमारी दाढ़ी के कड़े बालों से अपनी उँगली न आहत कर लेना. फिर खाना कौन बनायेगा, बह्ह्ह्हू??)

    उससे अपने कमरे को बुहारूं,

    (गंदगी पर दर गंदगी-भला इतने छोटे बालों के ब्रश से भी कोई कमरा बुहारता है, इतनी झुकोगी तो कमर लचक जायेगी, उसका तो कुछ ख्याल करो)

    अपने गंदे कपड़ों को साफ़ करूं,

    (फिर गंदगी पर दर गंदगी-हमारे बालों से..उफ्फ!!! कैसे पहनोगी फिर वो ही कपड़े?)

    दांत ब्रश करूं, कोटे साफ करूं,

    (मसूड़े छील जायेंगे और कुछ ही दिन में दाँत नजर नहीं आयेंगे फिर ब्रश अलमारी में धरा का धरा रह जायेगा जैसे कि हमारा अस्तित्व तुम्हारे लिए) (कोट में क्या लगा लाई, ड्राई क्लीन कराओ-कितनी बार भला ब्रश से काम चलेगा)

    बालों पर ब्रश करूं
    (बालों का बालों से घर्षण,
    जान न ले ले ये आकर्षण)

    और फिर उसे उठा कर अलमारी में रख दूं........

    (अलमारी खुली रखना और टीवी ऑन-वहीं से देख लेंगे-सोफे पर पड़े थे कभी, अब अलमारी में पड़े हैं)

    :)



    -जहाँ एक ओर माधवी जी की रचना का शिल्प बेहतरीन है और निश्चित ही एक आक्रोश के निस्तार का सहित्यिक मार्ग....... वहीं चिट्ठाचर्चा बढ़िया रही.


    पुनः मात्र हास्य का उद्देश्य है...कोई विवाद नहीं...उसका जबाब देने में असमर्थ ही रहूँगा.

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  17. हम सोचिए रहे थे ....चर्चा पर परिचर्चा का एंगलवा ..खाली सीरियस ही काहे है ....मुदा एलियन जी आपने इसका ....एलियोनेटिक व्याख्या करके...संदर्भ को ...सार्थक कर दिया है ...। हां एक गो बात नहीं समझ पाए..ई लाईनवा सब के बीच में घुसे कईसे जी ...साईज फ़्लेक्चुअल है आपका ..इलास्टीसिटि ...टाईप ....

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  18. @समीर भाई
    ...... तो हर विषय में हास्य खोज लेते हैं...इसमें कोई क्या बुरा मानेगा..कवियत्री भी बिना मुस्कराये न रह पायेंगी और अनूप जी तो खैर!!!..बाग़ बाग होगे ही .टी आर पी बढ़ती जा रही है आलतू फालतू बात पर !

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  19. वाकई, I like it, खुंदक निकालो तो पूरी तरह :)

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  20. गनिमत है कमरे से सीधे अल्मारी मे,वर्ना टायलेट……………………………।

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  21. हे राम! घोर और नितांत कलयु...........:)

    रामराम.

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  22. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  23. दोनो कविताओं में रोष है.
    दूसरी कविता में कुंठाग्रस्त मन का आक्रोश है जो उनकी अपनी व्यक्तिगत सोच है.

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  24. स्त्री को एक वस्तु समझने के विरुद्ध फंतासी प्रतिक्रिया है।
    हाँ यह ठीक है.. पुरुष की उपस्थिति को अपरिहार्य मानते हुये जुगुप्सित फ़ँतासी है यह !
    उसे आत्मसात करने की कशिश इतनी कि कल्पना हर अच्छे-बुरे उपयोग पर ठहर कर रह गयी है ।
    सवाल वही.. कौन कहता है कि, पुरुष उपभोग्य नहीं हैं ?
    ख़ैर जिनकी वस्तु हैं वो जाने रखे या लोन पर दे दे !!!!!
    पर.. लोन पर लेना क्या चाहती हैं, यह तो स्पष्ट करें, रचना में बहुत सारे विकल्प हैं
    पुरुष, उसके बालों का ब्रश, गँदे कपड़े, कोट, आलमारी या कवियित्री
    अरे ठीक है न रचना जी, रखने दीजिये अलमारी में...
    क्योंकि चार चैम्बर वाली यह आलमारी मॉयोकॉर्डियल टिश्यू से ख़ास तौर पर विधाता ने गढ़ी है, जिसे बेख़्याल शायर लोग दिल के नाम से पुकार डालते हैं ! इसमें भला कौन नहीं बन्द होना चाहेगा ?
    बन्द किये जाने का अर्थ इन्हें भी तो समझ में आये...
    ताकि पुनः कोई एक और महाकाव्य रच जाये और एम.ए. हिन्दी के छात्रों को झेलाये ।
    एक गो बात नहीं समझ पाए..ई लाईनवा सब के बीच में घुसे कईसे जी
    यह तो आसानी से एच.टी.एम.एल. टैग लगा कर किया जा सकता है
    बेशी जानकारी हेत ’ खण्डेलवालम शरणम गच्छामि ’
    गनिमत है कमरे से सीधे अल्मारी मे
    गनीमत तो हईये हैं, क्योंकि यूज़ एन्ड थ्रो की सोच नहीं आयी !
    अल्पना वर्मा on November 30, 2009 11:10 AM ने कहा…
    यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है

    गूगुल बाबा बाँगाली कि, कौनो लिंग भेद नहीं ?
    रचनाजी, शुक्रिया। गलती ठीक कर ली गयी।
    सरे चर्चा-बाज़ार, ई का खुसुर पुसुर होय रहा है भाई ?

    हालाँकि लाख टके का यह डिस्क्लेमर यहाँ भी लागू है
    मात्र हास्य का उद्देश्य है...कोई विवाद नहीं...उसका जबाब देने में असमर्थ ही रहूँगा
    रचनाकर्मी की पहचान को लेकर मेरा सवाल कायम है,
    यू ऑर प्राउड फ़ॉर बीइँग इन्डियन ऑनली क्यों नहीं, बिहारी ही क्यों ?.

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  25. कवि यहां तसलीमा नसरीन से प्रेरित है ......उनकी एक कविता भी कुछ इस तरह की है .. ....
    कभी कभी मन करता है
    तुम्हारी पीठ झुकायुं
    ओर उस पर धौल जमा कर जोर से कहूं "साले"

    नेट पर पूरी सर्च कर रहा था .मिली नहीं शायद कथादेश या हंस के किसी पुराने अंक में मिले ....या इतना हल्ला मचा देख हैरानी हुई...वो तुलसी दास भी तो कह गए थे कई साल पहले .....ढोल पशु शुद्र नारी .ये सब ताडन के अधिकारी सा कुछ.......खैर वैसे मै तसलीमा का कोई फेन नहीं हूं....पर उनकी लिखी कुछ कविताएं ....कविता की परिभाषा में शायद फिट न बैठती हो ...पर हां एक औरत की सोच तो दिखाती ही है ..






    You Go Girl !


    They said—take it easy…
    Said—calm down…
    Said—stop talkin'…
    Said—shut up….
    They said—sit down….
    Said—bow your head…
    Said—keep on cryin', let the tears roll…

    What should you do in response?

    You should stand up now
    Should stand right up
    Hold your back straight
    Hold your head high…
    You should speak
    Speak your mind
    Speak it loudly
    Scream!

    You should scream so loud that they must run for cover.
    They will say—'You are shameless!'
    When you hear that, just laugh…

    They will say— 'You have a loose character!'
    When you hear that, just laugh louder…

    They will say—'You are rotten!'
    So just laugh, laugh even louder…

    Hearing you laugh, they will shout,
    'You are a whore!'

    When they say that,
    just put your hands on your hips,
    stand firm and say,
    "Yes, yes, I am a whore!"

    They will be shocked.
    They will stare in disbelief.
    They will wait for you to say more, much more…

    The men amongst them will turn red and sweat.
    The women amongst them will dream to be a whore like you.


    वैसे यहां उनकी ओर कविताएं पढ़ी जा सकती है .....

    उत्तर देंहटाएं
  26. कल्पना कीजीए की अगर यही काम कोई युवक किसी अभिनेत्री को उसी स्टेज पर कर देता तो उस का क्या हाल होता! wah to seedha jail mein hota..

    अल्पनाजी, शिल्पा शेट्टी और रिचर्ड गैरे का केस भूल गईं क्या? जेल-वेल तो नहीं अच्छी खासी पब्लिसिटी तो मिल ही गई:)

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