रविवार, फ़रवरी 04, 2007

रविवारीय चिट्ठा

लो जी, शनिवार दिनांक ३ फरवरी २००७ के चिट्ठों को लेकर हम हाजिर हैं।

मनीषा जी बता रही है कि विन्डोज लाइव राइटर से पोस्टिंग शुरु हो गयी है, मनीषा बता रही है:
जब से मैं अपने सभी चिठ्टों को नये ब्लॉगर पर ले गई थी, तभी एक परेशानी से मुझे दो-चार होना पड़ रहा था। मैं नये चिठ्टों को बनाने के लिये विंडोज लाइव राइटर का प्रयोग करती हूं। लेकिन जब से नये ब्लोगर पर शिफ्ट किया था, तब से ही विंडोज लाइव राइटर से पोस्ट तो हो रहा था लेकिन ब्लॉगर पर पोस्ट नजर नहीं आती थी। हार कर खुद ही कॉपी करके पोस्ट करनी पड़ रही थी। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये। हिंदी जगत के अन्य सक्रिय चिट्टाकारो से सहयोग मांगा गया। पंडितजी के ब्लॉग पर मिश्राजी ने बताया कि मुझे विंडोज लाइव राइटर को अपडेट करना चाहिये। इसलिये मैंने कल विंडोज लाइव राइटर को दुबारा डाउनलोड किया और पुराने संस्करण के उपर ही इंस्टाल कर दिया। इसके बाद अब विंडोज लाइव राइटर ठीक तरह से पोस्ट कर रहा है। सहयोग करने वालों को धन्यवाद।

अभी मनीषा के सवाल का जवाब मिला ही था कि मान्या ने तुम्हारा ख़्याल करते हुए अपना सवाल दाग दिया, आपसे हमसे नही, उस रचयिता से वे पूछती है:
सब कहते हैं वो व्याप्त ब्रह्मांड के कण-कण पर,
वो हर मनुज में बसता आत्मा बनकर,
फिर क्यों मनुज स्वयं से लङता शत्रु बनकर...
क्यों रौंद डालता वो हर जीवन को अपने लक्ष्य के पथ पर,
जानना चाहती हूं अपनी इस अग्यानता का अर्थ.....



नारायण फिर से सभी को आगाह कर रहे है, कि कंही कन्टेन्ट चोरी ना हो जाए। दूसरी तरफ़ उन्मुक्त सवाल उठा रहे है कि ये चोरी थी, डकैती, जोश या सिर्फ़ नादानी थी। रमा जी भी बहुत सुन्दर कविता के साथ हाजिर हैं :
उसने कहा क्यों प्यार का इज़हार नहीं करते?
हमने कहा चुप रह के क्या इक़रार नहीं करते?
तूफ़ां की तरह आके गुजर जाना भी अच्छा नहीं
हम प्यार की कश्ती को मझधार नहीं करते।


नए चिट्ठाकर शंभूनाथ गुप्ता हाजिर है अपने चिट्ठे वैचारिकता के साथ। लोकमंच मे पढिए, एक बहुत अच्छा लेख पाकिस्तान और लोकतंत्र

देबाशीष रेडियो जॉकी बनना चाहते थे, वे इन्डीकास्ट के बारे मे बताते हुए कहते है:

इंडीकास्ट एक लोकप्रिय पॉडकास्ट है और भारत के गिनेचुने पॉडकास्ट में से एक है। हाल ही में इस पॉडकास्ट में मुझे शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, मौका था इंडीब्लॉगीज़ में संप्रति जारी नामांकन प्रक्रिया के बारे में सूचना देने का। इधर घरेलू मैदान पर भी शशि सिंह और जीतेंद्र की टीम कुछ खिचड़ी पका रही है ब्लॉगनाद को पुनः शुरु करने के लिये। फिलहाल तो योजना परकाम चल रहा है पर आप ही की तरह मीठे फल का इंतज़ार मुझे भी है।


दीपक अपनी समझ का घूमता आईना चलाते हुए कहते है:
कैलेंडर से झाँकती स्त्री और निठारी में अपने बच्चों की फोटो हाथ में लिये खड़ी स्त्री, दोनों ही तो सच है । दोनो ही दर्दनाक सच । ये सब दिमाग मे चल ही रहा था कि कुंभ शुरु हो गया । लाखों लोग सिर पर सामान बांधे पहुच गये, गंगा के तट पर उस गंगाजी के पास जिसे नाले के स्तर तक दूषित किया जा चुका है । यह कचरा गंगाजी में उन लोगों के संसाधन जुटाने के लिये फेंका जा रहा है, जिनके घर की स्त्रियाँ अर्धनग्न अवस्था मे कैलेंडर से झाँक रहीं थीं ।


नए निवेश की जानकारी पाइए, लेकिन ध्यान रखिए, घायल की गति घायल ही जानता है, इसलिए निवेश के पहले पुराने निवेशकों की राय जरुर ले लीजिएगा। ना जाने क्यों आपकी शुद्द हिन्दी पढने मे नही आ रही, जिसमे आपने लिखा था कि "मेरी गर्लफ्रेन्ड सबसे बिन्दास" वह कौन है?
अविनाश ने टीवी पर खबरों के चैनलों की खबर ली है, पीछे का सच, आगे का झूठ लेख में उनके अन्दर का पत्रकार मन कहता है :
पत्रकारिता मिशन है या प्रोफेशन- ये बहस कब की बासी और अप्रासंगिक हो चुकी है, क्‍योंकि स्‍वतंत्रता प्राप्ति के पहले और बाद के हालातों में दिये गये तर्कों को उसी हिसाब से न्‍यायोचित ठहराने की कोशिश से ज़्यादा विमर्श इस पर नहीं हुआ। नतीजा- जवाब तय नहीं हो पाया। ज़रूरत के हिसाब से पेश आने की छूट ले ली गयी। टीवी के साथ हुआ ये कि जब ये पनप रहा था... उपभोक्‍तावादी संस्‍कृति भी पनप रही थी। दुनिया भर की कंपनियां नित नये माल लेकर आ रही थी और टीवी उसे घर घर तक पहुंचाने का ज़रिया बना। सो ज़बर्दस्‍त दख़ल पड़ा। टीवी को पालने और बढ़ाने का ज़रिया भी कहीं न कहीं वही बना। मनीष की गीतमाला आज पहुँची है नवीं पायदान पर, इस पायदान पर है अभिजीत दा का मशहूर गीत
आज की टिप्पणी :

तरुण द्वारा अजदक पर :
बहुत ही सही बात लिखी है शायद इसी फर्क ने अमेरिका को नंबर एक पर खडा किया है और भारत कहीं भी नही (जो फर्स्ट तीन में नही, वो कही नही)। रहा सवाल खबरों का तो जब न्यूज देखनी होती है तो बीबीसी देखता हूँ और जब मनोरंजन के लिये कुछ देखना होता है तो जी न्यूज ( थैंक गॉड, यहाँ अभी अपने यहाँ एक ही है)।


एक और टिप्पणी अनूप शुक्ला द्वारा मनीष के अभिजीत वाले गाने पर

ये कनपुरिया है। तभी कहें कि ये कैसे इतना अच्छा गाता है और बात-बात पर इंडियन आयडल में काहे बमक जाता था!


तो भई ये तो आज की चिट्ठा चर्चा, जो लोग स्थान पा गए है टिप्पणी करें और जो लोग स्थान नही पा सके है, वो भी टिप्पणी करें, ताकि मै अगली बार उनकी चर्चा करना ना भूल सकूं।

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5 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसे नहीं भुलने देंगे अगली बार चर्चा करना. लो अच्छी चर्चा के लिये बधाई.

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  2. अनूप शुक्लाफ़रवरी 05, 2007 8:07 am

    बढ़िया! चर्चा जल्दी-जल्दी किया करो न जी!

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  3. संजय बेंगाणीफ़रवरी 05, 2007 9:33 am

    आपको कोई बहाना हाथ लगने नहीं देंगे. कर दी है टिप्पणी.

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  4. बहुत इंतजार करवाते हो भाई!!!

    कहीं इसमें भी कोई राज तो नहीं?

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  5. जीतूजी ४(सोमवार) को हाजिर हुए तीन की प्रविष्टियों को ले कर।दो दिनों तक 'शुक्रवारी प्रश्नमाला' डटी रही ।

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