रविवार, फ़रवरी 18, 2007

रविवारीय चिट्ठा

साथियों,
हम भी आ गया हूँ, रविवारीय चिट्ठा लेकर, यानि कि शनिवार दिनांक १७ फरवरी, २००७ के चिट्ठों की। सबसे पहले तो आइए स्वागत करें नए चिट्ठाकारों अंतर्मन और गोरखपुर से टू फेसेस के हिन्दी ब्लॉग का।

आज के सारे चिट्ठे यहाँ पर देखे जा सकते है।

ई-पंडित जी अपनी ब्लॉगर के हैक वाली कक्षा मे सिखा रहे है पेज हैडर को संशोधित करना । वाल्मिकी रामायण मे गंगा जन्म की कथा पढिए, वहीं उधर महाभारत मे युद्द के प्रथम दिन की कहानी पढिए। देखा जो तुम्हे मैने, कुछ हो रहा है, बहुत दर्द होता है माँ, बेटिकट लालू बोले मै निर्दोष हूँ । मानते हो स्वयं को मेरा शिव, किसका घर जैसे एक से बढकर एक रचनाए आपके लिए प्रस्तुत है। मितुल विकीपीडिया वाले लेख को आगे बढा रहे है। लखनवी परेशान है, कभी ये डे, कभी वो डे, करें भी तो आखिर क्या करें। अनूप शुक्ला बता रहे है भुवनेश द्वारा लिखे हिन्दी ब्लॉगिंग से सम्बंधित एक लेख के बारे में। पूनम मिश्रा की एक कविता दो कप चाय :

मैँ सवेरे दो कप चय बनाती हूँ
और हर रोज़ तुम्हें नींद से उठाती हूं
जानती हूं तुम्हारा अभी जागने का मन नहीं
तुम कुनमुनाओगे, पेट के बल लेटोगे
पर फोन उठाओगे ज़रूर.
तुम "गुड मार्निंग" कहोगे
और मेरी चाय में चीनी घुल जायेगी.



रवि भाई जवाब दे रहे है व्यवसायिक चिट्ठाकारी से सम्बंधित सवालों का। एक सवाल और उसका जवाब मुलाहिज़ा फ़रमाइए:

प्रश्न - मेरे चिट्ठे को नित्य कम से कम कितने लोग पढ़ेंगे तब आय होगी?

उत्तर - एडसेंस दो तरह से भुगतान करता है - प्रतिहजार पेज लोड तथा प्रति क्लिक. यदि मात्र दस लोग भी आपके चिट्ठे को पढ़ते हैं और दसों उच्च भुगतान वाले विज्ञापनों को क्लिक करते हैं तो आपको हो सकता है दस डॉलर मिल जाएँ, और, यह भी हो सकता है कि हजार लोग पढ़ें और कोई क्लिक न करे तो एक भी डालर न मिले. परंतु औसतन यह बात भी सत्य है कि जितना अधिक आपका चिट्ठा पढ़ा जाएगा उतना ही पेज लोड व पेज क्लिक के जरिए अधिक आय होने की संभावना होगी. नित्य कम से कम एक हजार पेज लोड होने पर कुछ बोलने-बताने-लायक आय हो सकेगी. और, जब आपके चिट्ठे को एक लाख लोग प्रतिदिन पढ़ने लगेंगे तो आप यकीन मानिए, अमित अग्रवाल से बाजी मार ले जाएंगे.


अप्रवासियों के लिए बनी निजी जेल के बारे मे बता रहे है, अफ़लातून जी। अजदक आज बता रहे है टाइम की किल्लत के बारे में


खबरी चैनलों पर खामखा बमगोला होना फिजूल है, किसके पास टाईम है? किसी के पास नहीं है. सब टाईम को पैसा में बदलने के बडे सामाजिक उपक्रम में लगे हुए हैं. इस गलतफहमी में मत रहियेगा कि इस उच्‍चादर्शी अभियान में सिर्फ टाटा और अंबानी ही पहलकदमी ले रहे हैं. अहां, पूरा समाज ले रहा है. जो तत्‍काल और झमाझम पैसे बना नहीं पा रहे, उनका टाईम आह भरने और खुद पर शर्म करने में फंस रहा है.


चिट्ठों के नामो पर बता रही है नीलिमा, अपने शोध ब्लॉग लिंकित मन में। जनार्दन भैया की पाती देखिए। जगदीश बढती ब्लॉग पाठकों की संख्या पर पूछ रहे है कि क्या वो लोग आ गए, जिनकी हमे तलाश थी? साथ ही उन्होने अमिताभ बच्चन को चिट्ठी भी लिखी है। जितेन्द्र मुलायम सरकार के गिरने की अंतिम घडियां गिन रहे है वहीं फुरसतिया इन्डीब्लॉगीज अवार्ड के वोट देने की अपील कर रहे है। मनीष की गीतों के पायदान # 5 पर है मेरा भी मनपसन्द गीत "तेरे बिन मै यूं कैसे जिया..."

और अंत मे सूचना के अधिकार के बारे मे बात कर रहे है मसिजीवी जी, बहुत अच्छा लेख, जरुर पढिएगा।

आज का चित्र मनीषा के ब्लॉग से:


जिन मित्रों का चिट्ठा छूट गया है वे इसका दोषारोपण मेरी व्यस्तता को दें, आज दिन भर की व्यस्तता और श्रीमती जी की शापिंग लिस्ट के बीच मे से समय चुराकर चर्चा की है। आशा है आप सभी लोग मेरी परेशानी को समझेंगे।

अच्छा तो भई हम चलते है, श्रीमती जी को शापिंग मॉल मे छोड़कर आए है, वाप्स नही लाए, तो खाना नही मिलेगा। मिलेंगे अगले हफ़्ते, नयी चर्चा के साथ।

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4 टिप्‍पणियां:

  1. अनूप शुक्लाफ़रवरी 18, 2007 11:24 pm

    पत्नी को शापिंग में इंतजार करने के लिये बैठाकर चर्चा करना बड़ी बहादुरी का काम है। कहीं तुम झूठ तो नहीं बोल रहे।

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  2. सच। आप तो बहुत ही बहादुर हैं।

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  3. भाभीजी जब थी शापिंग में व्यस्त, तभी यह चर्चा की है
    वरना कम्प्यूटर की भी मजाल क्या उनके आगे बोले
    सौदेबाजी, बाँट छाँट मेम आप उन्हें उलझा कर आये
    तब आकर नारद पर मुनिवर, चिट्ठों की चर्चायें बोले

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  4. चर्चा के तेवर और स्पीड़ देखकर समझ आ रहा था कि कुछ न कुछ बात अटकी जरुर है जो कि चर्चा के अंत में आपने साफ कर दिया. अच्छा है कभी कभी ऐसा बहादुरी का कार्य करने की कोशिश में भी कोई बुराई नहीं है. :)

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