शुक्रवार, फ़रवरी 16, 2007

॥ॐ नम शिवाय॥

॥ॐ नम शिवाय॥

चिट्ठाचर्चा कैसे की जाये?
क्या सभी चिट्ठों की चर्चा की जाए?
क्या चिट्ठाचर्चा नारद का पूरक है?
क्या चर्चा में एकरूपता होनी चाहिये?
क्या चर्चाकार प्रत्येक चिट्ठे की चर्चा करने को बाध्य है?
ऐसे बहुत से प्रश्न है जो पिछले दिनों उभरकर सामने आ रहें है, फिर चाहे पाठक प्रश्न खड़े करें या फिर चर्चाकार। एक बात जिससे सभी सहमत दिखे वो यह कि इन सभी प्रश्नों के उत्तर उस दिन का चर्चाकार तय करे, सब-कुछ उस दिन के चर्चाकार पर छोड़ दिया जाये कि चर्चा कैसी हो?

इसी उधेड़बुन में चर्चाकार चर्चा छोड़कर सफाई देने, इनका प्रतियूत्तर खोजने में जुट गये। मुख्य कार्य गौण सा होता जा रहा है, पाँच-सात चिट्ठों की चर्चा कर बाकि चिट्ठों के लिंक दिये जा रहे हैं। मैं एक बात अपने सभी चर्चाकार साथियों से कहना चाहुँगा कि पाठक/चिट्ठाकार चर्चा पढ़ने चिट्ठाचर्चा पर आते हैं ना कि चिट्ठों तक पहुँचने के लिए। यह तो चर्चा के साथ लिंक होनें के कारण पाठक/चिट्ठाकार की पहुँच चर्चा से चिट्ठों तक बनी है। चर्चाकार का पहला कार्य है चर्चा करना, इसलिए पसंदीदा चिट्ठों के अलावा भी सभी चिट्ठों की चर्चा की जानी चाहिए, पाठकों/चिट्ठाकारों सभी चिट्ठों के बारे में बताने का प्रयास होना चाहिए, और यही चर्चा का मुख्य उद्देश्य भी है कि समस्त चिट्ठों की चर्चा की जा सके।

अब आज की चर्चा की शुरूआत करते हैं, कविता/गीत/ग़ज़ल से -

सबसे पहले गीतकार की कलम से निकली इन पंक्तियों की गुढ़ता को समझने का प्रयत्न करें –


था बदलता रहा करवटें रात भर
लेटे लेटे मैं बिस्तर पे उल्टा पड़ा
एक जलकाक आवाज़ करता रहा
खिड़कियों के परे झाड़ियों में खड़ा
रोशनी कोई छन छन के आती हुई
मेरी पलकों पे दस्तक लगाती रही
और टपटप की आवाज़ थी इस तरह
जैसे जल का लुढ़कता हो मटकी भरी

और जब समझ में आ जाये तो हिन्द-युग्म पर जाकर अनुपमा जी खूबसूरत गजल का आनन्द लिजियेगा, जहाँ उनका चेहरा हाथों की चादर ओढ़ शर्मसार हो गया है –


उसका नाम जुबाँ पर आता नहीं महफिल में,
चेहरा हाथों की चादर ओढ शर्मसार हो गया..

तो वहीं प्रमेन्द्रजी कह रहे हैं उन्हें यह मालूम ही न था -

मौजूद था मै,
तेरी मौजूदगी में।
शिकायत न करना
कि मालूम न था।।


शैलेशजी को यह परिस्थितियाँ बहुत मुश्किल लगती है, तभी तो वो पूछ रहें हैं (?, शायद बता रहें है) कि कितना मुश्किल होता है -


कितना मुश्किल होता है
पिताजी को यह समझाना
कि
बाबूजी
पढ़ते-पढ़ते अब
जी ऊब गया है।
सब ढकोसले हैं।
बड़ी मुश्किल से
तो मुझे

यह बात समझ में
आयी है

मगर आप नहीं समझ
पावोगे।।

एक ही दिन में पोस्टों का शतक ठोकने का लक्ष्य लेकर उतरे हरिराम जी इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए शक्ति-अर्चना करते नज़र आये –


हे भाई‍‍! इन महामाया जी की बातें, तो मैं सुन चकराया।
पूर्णब्रह्म परमात्मा को भी, जिसने पग-पग नाच नचाया॥

साहित्यकारों की चाटुकारिता, जग को विभ्रम में यूँ डाला।
संग्राम समर में पूर्ण निपुण, नारी का नाम दिया क्यूँ अबला??

आठों अवगुण आठ पहर नित, इनके तन में बसा हुआ।
कामदेव धनुष सन्धाने, त्रिनेत्र भृकुटि पर सदा चढ़ा हुआ॥

हरि ने जब अवतार लिया तो, स्वयं राधिका बन आई।
कृष्ण के हाथ में दे बाँसुरी, प्रेम मदमाती धुन सुनवाई॥

तो प्रियंकरजी अपनी बहन नंदनी के लिए कविता-पाठ करते नज़र आये -


नंदिनी
मेरी बहन
कहती है
मैं लिखूं उस
पर एक कविता

उसे कैसे समझाऊं कि
कविता लिखने से
कहीं अधिक
मुश्किल है

कविता पर लिखना
यानी कितना कठिन है
शब्द में भाषा में
व्यक्तित्व का
वैसे का वैसा दिखना


वह मानेगी ही नहीं
यह सच कि
कविता को जीना

उसके द्वारा संभव है
पर जीवन की लय
को

कागज पर उतारना
मेरे लिये असंभव है
प्रियंकर जी इस कविता का शायद देवेश वशिष्ठजी को पूर्वाभास हो गया था तभी एक दिन पहले ही वे बहुत खुश हुए और उन्होंने इसी शीर्षक से एक कविता भी लिख डाली (निवेदन : नये चिट्ठाकार हैं, टिप्पणी अवश्य प्रदान करें) -


अब खुश हूँ ।
अब तक सब कुछ एकतरफा था॰॰॰
अब भी है॰॰॰
पर सुबह
तुम्हारा सपना आया,

सुबह-सुबह॰॰॰॰।
घर में मेरी मम्मी है॰॰॰
मैं हूँ॰॰॰
तुम भी हो ।
वैसी ही जैसी
तब थी।

गुरनाम सिंह जी पहले तो काव्य का गुलिस्ताँ बनानें में जुटे रहे और जब काव्य बन गया तो मुस्कुराने लगे -


चलो आज मिल कर एक गुलिस्तां बनाएँगें, जिसमे रंग बिरंगे फूल खिलाएँगे
हर आपसी रिश्ते को आपस मे मिलाएँगें, ख्वाबों का एक नया महल बनाएँगे



मै भी हँसना चाहता हूँ, मुझे एक मुस्कान दो,
खुशी की छोटी सी लहर, मुझे भी कहीं से ला दो,
इन बदिंशो की बेड़ियों सो मुझे अब आराम दो,
जी लूँ मै अपनी ज़िन्दगी के कुछ पल अपने लिए,मुझे ये वरदान दो

इसी मुस्कान के साथ आगे बढ़ते हुए आप बच्चनजी की कविता प्रतिक्षा का भी आनन्द लें -


मौन रात इस भाँति कि जैसे, को‌ई गत वीणा पर बज कर,
अभी-अभी सो‌ई खो‌ई-सी सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशा‌ओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारी तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता ?

और मिर्जा ग़ालिब के अल्फ़ाज उन्हीं के शेरों में पढ़ने का भी आनन्द प्राप्त करें -


हम भी मुहँ मे जबान रखते हैं
काश पूछो कि मुद्दा क्या है

जब की तुझ बिन नही कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ खुदा क्या है

क्या कहा? आपको यह सब अच्छा लगता है तो भय्या अपनी स्वर्णाजी भी यही कहती है, तभी तो उन्होंने अपने चिट्ठे का नामकरण करने के साथ-साथ अपनी पुस्तक का नाम भी यही रखा है – “अच्छा लगता है”, कल उन्होनें एक साथ दो-दो कविताएँ प्रकाशित की -

काश.....
राह पर खडे दऱख्त
कुछ बोल पाते
अपनी ज़बानी
अपनी गवाही
दे पाते
तो

कितने किस्से कह पाते
काश......
ये कुछ बोल पाते

जहाँ अपनी पहली कविता में वो राह पर खड़े दरख्त के न बोल पाने पर चिंतित दिखी तो वहीं दूसरी कविता में उन्होनें सभी को महाशिवरात्री पर शुभकामनाएँ भेंट की -

जोगी है आया तेरे द्वारे
जटाजूट भस्म विभूत हैं धारे

प्रिय दरसन की आस है पर
भवति भिक्षांह देहि पुकारे

नील अंग है मृग छाला वसन
भूत पिशाच का देव करे भजन

वृषभ पर सवारी है करे
ताज बना शीश पर भागीरथी धरे


मान्याजी ने भी मौका देखकर एक पाती अपने सांवरे के नाम लिखकर भिजवा दी -

तुम पीताम्बर पहन जब बांसुरी बजाते...
मैं सोलह सिंगार किये भाव-विह्वल हो,
सुनती तुम में खोकर, पल-पल बजती निगौड़ी पायल
ऐसे ही बीतता हर पल जो तुम होते मेरे संग।


डिवाइन-इण्डिया भी सपनों के साथ अठखेलियाँ करता नज़र आया -


मैं प्रात: था इस जीवन में जब
त्रियमा नें अंधकार रचा...पर...कैसा था...
वो रूप सुहाना जिसके विभिन्न रस्मियों ने
अपना चैतन्य विस्तार किया


सिलेमा भी कल काव्य-रस में भीगा नज़र आया, शिल्पा के लिए रचा काव्य बहुत ही सुन्दर है -


जिंदगी भी क्‍या फ़रेब है शिल्‍पा
इसे तुमसे बेहतर कौन जानता है
और अब इसी फ़रेब को तुम
हक़ीकत और अपनी जिंदगी
बना रही हो. खुद नाच रही हो अपने पीछे
हम सबको नचा रही हो.


बढ़ती ठंड के कारण में चर्चा बीच में ही छोड़कर जा रहा था तभी रंजनीजी ने बुलाया और कहा कि गर्म हवाओं की तरह तुम्हारे आस-पास मेरा साया है -


एक सिरा नहीं, एक मंज़िल नहीं
जब से तुझे पाया है.
क्षितिज की स्वर्णिम रेखा कहाँ गई
यह प्रश्न तेरे से खिचीं रेखा में पाया है.
लहर का कौन सा किनारा है,
समुद्र की थाह को चुप सा पाया है.
गुम हो तुम गर्म हवा की तरह
आसपास शायद मेरा साया है.


और अब इस श्रेणी में सबसे अंत में मगर सबसे खास रामचंद्र मिश्रजी का शेर -


नींद तो मौत के बिस्तर पे भी आ जाती है,
उन के आगोश मे सर हो ये जरूरी तो नही।


यहाँ तक चर्चा का मेरा उद्देश्य मात्र यही था कि समस्त चिट्ठाकारों और पाठकों को अवगत करवा दूँ हिन्दी चिट्ठाजगत में कवियों की संख्या जिस रफ़्तार से बढ़ रही है उसे देखते हुए यह तो तय लग रहा है कि भविष्य काव्य का ही है। :)

अब संक्षिप्त चर्चा में बाकि बचे चिट्ठों को निपटाते है, इसी क्रम में सबसे पहले हरिराम जी कल की पोस्टों से शुरूआत करते हैं -


उन्होनें सबसे पहले तो अंतर्जाल पर हिन्दी की समस्याओं एवं संभावनाओं को व्यक्त करते हुए एक आलेख लिखा और फिर पुछने लगे कि क्या कम्प्यूटर क्रांति लायेगी हिन्दी क्रांति? इसके बाद उन्होंने श्रम विद्युत की बैटरी, शक़ का भुमण्डलीकरण, वाहन के प्रदूषण से बचाव, बूँद-बूँद से मिल सागर भरता, भगवान की भूल... जैसे आलेख लिख मारे, मगर बाद में उन्हें चिंता सताने लगी की लोग क्या कहेंगे? अरे भाई जब लिख मारा तो लिख मारा चिंता काहे कि।

ई-पंडितजी अपनी क्लास में ब्लॉगर टैम्पलेट का बैकअप लेना और उसे रिस्टोर करने का तरिका बतला रहें है और साथ में जगह-जगह सभी को धमका भी रहें है कि क्लास से बंक मारी तो अंजाम अच्छा न होगा। जुगाड़ी लिंक पर जितु भाई बता रहें है कि अपने चिट्ठे पर गाने कैसे बजायें और इसके अलावा भी बहुत से मस्त जुगाड़। लोकमंच पर पढ़े – हिन्दू दार्शनिक चिंतन के सोपान, नींद तो सिर्फ़ नींद है, लद गया जमाना रिमिक्स का और संसद में अपराधी या अपराधियों की संसद। ये चारों आलेख शुरू से अंत तक बांधे रखने के साथ-साथ सोचने को भी मजबूर करते हैं।

वाल्मिकी रामायण में धनुष यज्ञ के लिए प्रस्थान हो चुका है और सुखसागर में एक बार और धार्मिक कार्यक्रम छोड़ इघर-उधर की चर्चा की जा रही है। मंतव्य में पाताल भैरव की अगली किस्त हाज़िर है, जो कह ना सके मैं कान खींचे जा रहे हैं, अफ़लातूनजी बी.बी.सी हिन्दी से साभार बता रहें है कि ‘दो तिहाई आबादी को होगी पानी की किल्लत’, तो झा जी बतला रहें है बिहार का पहचान से विकास तक का सफ़र, सुरेशजी बतला रहें है कि काग़ज एक राष्ट्रीय सम्पति है, मिसीजीवीजी ने बादशाह को नंगा करने प्रयत्न किया तो शुएब चुटकुला सुनाने लगे। अज़दक पर दमदार आलेख छूटी सोच की सोहबत योगिता के संग पढ़ने को मिला तो रवि भाई विंडों विस्टा पर हिन्दीमयी नज़र डालते नज़र आये, अच्छी जानकारी है विस्टा के बारे में। इस अवसर पर जीतु भाई भी एक अनमोल उपहार दे रहे हैं तो उन्मुक्त प्रेम पर प्रश्न चिन्ह लगा रहें है। सागर भाई बतला रहें है कि उनके पसंदीदा धारावाहिक कौन-कौन से है, तो मोहल्ले में धीरूभाई अंबानी और सुब्रत राय सहारा वाया गुरुकांत देसाई का नक़ाब उतारने का प्रयास किया जा रहा है। अज़दक पर एक और उम्दा आलेख ऊँची इमारतों के अंधेरे प्रकाशित हुआ है और मिश्रजी बतला रहें है कि 14 फ़रवरी की सुबह क्या-क्या हुआ?


और अब अंत में समस्त चिट्ठाकारों एवं पाठकों को महाशिवरात्री पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए विदा लेता हूँ।

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11 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल मैं आपकी बातों से सहमत हूँ कि चिट्ठा लिंक देने से काम नहीं चलेगा लोग चिट्ठा चर्चा पढ़ने आते है…थोड़ी परेशानी तो है पर अनूप भाई का प्रयोग भी कल का शानदार था…और लोगों को भी अगर चर्चा में शामिल किया जाए तो परेशानी हल हो सकती है…धन्यवाद!!

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  2. सचमुच प्रशंसनीय है आपकी चर्चा.. और आपके सवालोन और तर्कॊं से सहमत भी हूं.. चिट्ठे चर्चाकारों कि पसंद के.. हो पर चर्चा सभी की हो.. नहीं तो प्रतिस्पर्धा के चक्कर में originality रहेगी और लोग निराश एवम हतोत्साहित भी हॊंगे..

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  3. "मैं एक बात अपने सभी चर्चाकार साथियों से कहना चाहुँगा कि पाठक/चिट्ठाकार चर्चा पढ़ने चिट्ठाचर्चा पर आते हैं ना कि चिट्ठों तक पहुँचने के लिए। यह तो चर्चा के साथ लिंक होनें के कारण पाठक/चिट्ठाकार की पहुँच चर्चा से चिट्ठों तक बनी है। चर्चाकार का पहला कार्य है चर्चा करना, इसलिए पसंदीदा चिट्ठों के अलावा भी सभी चिट्ठों की चर्चा की जानी चाहिए, पाठकों/चिट्ठाकारों सभी चिट्ठों के बारे में बताने का प्रयास होना चाहिए, और यही चर्चा का मुख्य उद्देश्य भी है कि समस्त चिट्ठों की चर्चा की जा सके।"

    बिल्कुल सही है जी लिंक देने के लिए नारद जी हैं न। अब देखिए कई बार चिट्ठाचर्चा से ही पता चलता है कि फलां आदमी नया आया है या फिर किसी खास पोस्ट जो छूट गई हो।

    इसके अतिरिक्त मेरा तो यही कहना है कि भैया पुराने चिट्ठाकारों की बेशक एकाध दिन चर्चा न हो, लेकिन नए चिट्ठाकारों का उत्साह बढ़ाने के लिए उनकी चर्चा अवश्य की जाए। इससे उनकी पाठक-संख्या भी बढ़ेगी और वे प्रोत्साहित भी होंगे।

    "यहाँ तक चर्चा का मेरा उद्देश्य मात्र यही था कि समस्त चिट्ठाकारों और पाठकों को अवगत करवा दूँ हिन्दी चिट्ठाजगत में कवियों की संख्या जिस रफ़्तार से बढ़ रही है उसे देखते हुए यह तो तय लग रहा है कि भविष्य काव्य का ही है। :)"

    भैया हम तो अल्पसंख्यक हो गए अब। हमारी मांग है कि हमारे लिए नारद, चिट्ठाचर्चा और परिचर्चा में ३३% आरक्षण लागू किया जाए। इसके अतिरिक्त ऐसे ही कवियों की बाढ़ आती रही तो हम जल्द ही अपने हितों की रक्षा के लिए अल्पसंख्यक (नॉन-कवि) आयोग बनाएंगे। :)

    कविताओं की वाकई अच्छी चर्चा की आपने।

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  4. और हाँ शिवरात्रि की शुभकामना। भोलेनाथ आप सब पर कृपा करें।

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  5. संजय बेंगाणीफ़रवरी 16, 2007 4:46 pm

    हर हर महादेव.......

    चर्चा मजेदार रही. कवियों की बढ़ती सख्यां चिंता का विषय है, सरकार को कोई कदम उठाना चाहिए.
    कहीं न कहीं यह अकवियो के लिए असुरक्षा की भावना जगाएगा ही. :)

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  6. मैं भी दोनो कुंभ राशि उर्फ श्रीश और संजय जी से सहमत हूँ, अब अकवियों के लिये आरक्षण की व्यवस्था हो, वरना हम अनशन करेंगे
    :) :)
    कवि अन्यथा ना लें

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  7. मेरा नम्बर कब आयेगा, जी आप सही समझे, मेरे चिठ्ठे की महक आप तक कब पहुचेगी यह बात बहुत से नये चिठ्ठाकारों के मन में होगी जिस तरह मेरे मन में है I कोई उपाय सुझायेंगे आप I

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  8. ॐ नमः शिवाय चिट्ठा चर्चा बहुत खूब रही आप की बात से सहमत हूँ कि आने वाला कल कविताओं का है। थोदे से शब्दों में बडी बात कहना कविता को ही आता है और हमें भी यही भाता है । चिट्ठा चर्चा को पढने के लिए विशेष समय निकालना पडता है फिर भी सभी नहीं पढ पाते हैं आप की चर्चा प्रशंसनीय है बधाई स्वीकारे और हमारे चिट्ठे की चर्चा पढकर और भी "अच्छा लगता है" उत्साह वर्धन के लिए धन्यवाद

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  9. अच्छी चर्चा है लेकिन कविताऒं पर कुछ ज्यादा ध्यान गया! बहरहाल, ठीक है!

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  10. इतने सारे ब्लॉग (चिट्ठों) को पढ़कर उनकी समीक्षा करने में इतना समय दान कर पाना इस बात का प्रतीक है कि आप काफी व्यस्त रहते हैं।

    क्योंकि एक विद्वान का कथन है "यदि आपको कोई काम अति कुशलता के साथ भली भाँति और अत्यन्त शीघ्र करवाना है तो उस व्यक्ति को सौंपो, जो वैसे कार्य में सबसे ज्यादा व्यस्त हो।" यह आश्चर्य की बात है। किन्तु उनका तर्क भी बिल्कुल सही है "वह व्यक्ति अति व्यस्त इसीलिए रहता है कि वह निरन्तर कार्यरत है, इसलिए उसमें कौशल, गुणवत्ता, तेजी स्वतः बढ़ते जाते हैं।"

    अतः महिलाएँ उसी गोलगप्पे विक्रेता के पास गोलगप्पे खाना पसन्द करती हैं, जिसके पास सबसे ज्यादा भीड़ लगी होती है। भीड़ इस बात का प्रमाण है कि उसके गोलगप्पे सबसे स्वादिष्ट होंगे।

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