मंगलवार, फ़रवरी 13, 2007

प्रियतम के आने का संकुल

चर्चा के संग करे समीक्षा, चुन कर चिट्ठे अच्छे खासे
बोले यह अनुराग खिला कर पानी के पच्चीस बतासे
चचा चौधरी, फ़ुरसतियाजी दोनों एक न मत हो पाये
क्या करना समीर से पूछूँ, सोच रहा मैं फोने लगा के

पाती जोगलिखी भेजी है, कुछ अपना मंतव्य बतायें
रचनाकार उठाकर मेरा पन्ना , देखें क्या समझायें
छायाचित्रकार दिखलाते कैसे रंग शिल्प में ढलता
दुनिया मेरी नजर से देखो खड़े बिहारी बाबू गायें

महाशक्ति दे दस्तक पूछे सॄजन शिल्पियों का पथ क्या है
सुखसागर के गूढ़ रहस्यों का अनुवाद बड़ा गहरा है
कहती हैं कठपुतली मेरी, एक शाम कर नाम मेरे दो
हिन्दी बातों का आईना है ? ई-पंडित का चेहरा है

जन परिषद ने अंतरिक्ष की ओर नजर अपनी दौड़ाई
जीवन की लय क्या है कोई हमको भी बतला दे भाई
यह केवल भ्रम है या फिर है प्रीतम के आने का संकुल
प्रश्न बड़ा है, उत्तर लेकिन अब तक नजरें बूझ न पाई

और यहाँ अब देखें सूची, आज लिखे सारे चिट्ठों की
बात समीक्षा की इतनी है, पिछले कुछ दिन जो पढ़ पाया
तथाकथित गज़लों, कविता को और टिप्पणी आपस बँटती
उन सबने यह छंद बाध्य होकर मुझसे भी है लिखवाया



आईना मुझसे कहने लगा, हमसुखन एक पल के लिये बात मेरी सुनो
भाव उमड़ें न दिल में तो चुप ही रहो, सिर्फ़ लिखने की खातिर न कुछ भी लिखो

शब्द का ढेर तुमने लगाया अगर, शब्दकोषों से विपरीत क्या वो रहा
अर्थ किसकी समझ में तनिक आयेगा, जो बिना अर्थ वक्तव्य तुमने कहा
जानता हूँ कि चाहत तुम्हारी रही, तुमको सब कवि कहें और शायर चुनें
और प्रशंसा के पुष्पों की मालायें भी बस तुम्हारी ही खातिस सभी जन बुनें

ये विदित है मुझे हर कला बिक रही, साथ लेकिन कला के स्वयं न बिको
भाव उमड़ें न दिल मेम तो चुप ही रहो, सिर्फ़ लिखने की खातिर न कुछ भी लिखो

ढेर तुकबन्दियाँ रात दिन कर रहे, क्या समझ में तुम्हारे कोई आ सकी
बन्दिशों में उलझ शब्द की रिक्तता शून्य से हो विलग कुछ न समझा सकी
भाव खुद ही उमड़ शब्द में जब ढलें काल के भाल पर भोर बन कर उगे
सत्य रचना वही, उसके अतिरिक्त तुम जो कहे आज तक व्यर्थ ही सब कहे

भावनाओं की रसगन्ध पहले भरो, अक्षरों के सुमन से तभी फिर खिलो
भाव उमड़ें न दिल में तो चुप ही रहो, सिर्फ़ लिखने की खातिर न कुछ भी लिखो

ज़ुल्फ़, भंवरा, कली, बाग, पुतबाईयाँ, खेत, पनघट या पायल या शहनाइयाँ
वस्ल की रात हो, जाम हो, मयकदा, या सुलगती हुई चन्द तन्हाईयाँ
सज रही डोलियाँ, लग रही बोलियाँ, कोई आता हुआ ,और जाता कोई
तुमने इतना है दोहराया ज्यों सूद से हो भरा एक बनिये का खाता कोई

बिम्ब हूँ मैं तुम्हारा मुझे जान लो, और भ्रम में न ज्यादा स्वयं को रखो
भाव उमड़ें न दिल मे तो चुप ही रहो, सिर्फ़ लिखने की खातिर न कुछ भी लिखो

कर रहे हैं प्रशंसायें जो व्यर्थ की , शत्रु हैं वे तुम्हारे, नही मित्र हैं
इन्द्रधनुषी उन्हें वे बताने लगे, जो तुम्हारे अँधेरे भरे चित्र हैं
है अपेक्षित उन्हें, तुम भी प्रतिदान दो शान में उनकी काढ़ो कशीदे नये
उनसे कहते रहो उनसा कोई नहीं, चाहे जितने सुखनवर यहाँ से गये

बात मेरी , तुम्हें तब समझ आयेगी, एक पल के लिये गौर जो कर सको
भाव उम्ड़ें न दिल में तो चुप ही रहो, सिर्फ़ लिखने की खातिर न कुछ भी
लिखो

और अब चित्र
सर्दी में केवल तुषारपात (snowfall ) ही नहीं होता, बर्फ़ भी गिरती है



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2 टिप्‍पणियां:

  1. राकेश जी, समां बाध दिया अच्छी चर्चा की है बंधों के माध्यम से…बधाई!!

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  2. बहुत खुब, राकेश भाई. खास तौर पर समझाईशी कविता ने तो जान डाल दी :)

    कर रहे हैं प्रशंसायें जो व्यर्थ की , शत्रु हैं वे तुम्हारे, नही मित्र हैं
    इन्द्रधनुषी उन्हें वे बताने लगे, जो तुम्हारे अँधेरे भरे चित्र हैं
    है अपेक्षित उन्हें, तुम भी प्रतिदान दो शान में उनकी काढ़ो कशीदे नये
    उनसे कहते रहो उनसा कोई नहीं, चाहे जितने सुखनवर यहाँ से गये


    --क्या बात है, बधाई.

    उत्तर देंहटाएं

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