शुक्रवार, फ़रवरी 09, 2007

खुदा ने खून संग-संग उबाल कर रखा है।

लो जी चिट्ठा-चर्चा के आज के अंक की शुरूआत हास्य से ही करते हैं, कम से कम उन चहरों पर कुछ मुस्कान तो लायी जा सकेगी जो शनिवारी चर्चा नहीं आने, रविवारी देर से आने, रतलामी जी द्वारा राकेशजी के लिए चिट्ठे छोड़ देने और राकेशजी द्वारा समय की कमी का हवाला देकर ढ़ढ़ास बंधाने की प्रक्रिया में रक्त के समान लाल, हल्दी के समान पीले या फिर दोनों के मिश्रण की भांती लाल-पीले हो रखे हैं। उन सभी महानुभावों के धैर्य को मैं नमन करते हुए मैं आज की चर्चा की शुरूआत करता हूँ -

1. वादानुसार शुरूआत की जा रही है हास्य से, आशीष गुप्ताजी एक रासायनिक विश्लेषण लेकर आये हैं, जिसमें बताया गया है कि औरत का रासायनिक मापदण्ड क्या है। आशीषजी के साथ मेरी शुभकामनाएँ है जो शायद यह नहीं जानते कि उन्होनें हास्य के लिए ज्वाला/दुर्गा/चण्डिका/भवानी इत्यादि नामों से वि(कु)ख्यात प्राणी को केन्द्रित किया है।

2. सुखसागर में बर्बरीक का वध होने पर, हम जाँच-पड़ताल के लिए गये तो नोटिस बोर्ड पर एक सूचना चस्पा मिली। अवधियाजी ने "वाल्मीकि रामायण" नाम से एक नया ब्लॉग आरम्भ किया है जिसमें संक्षिप्त में आदिकवि वाल्मीकि रचित महाकाव्य "रामायण" का हिंदी रूपांतर दे रहे हैं और साथ में उन्होने आशा व्यक्त की है कि यह ब्लॉंग भी आप सभी को पसंद आयेगा।

3. अज़दक (थोडी संस्‍कृति, थोडा समाज) पर किताबों का शोकगीत सुनाया जा रहा है, हमने सुनाने वाले/वाली का नाम खोजना चाहा तो ‘इण्डिया रोड’ मिला। खेर मुख्य बात तो उनके पद्य में है, बहुत मजेदार लगा।

4. अंतर्नांद पर तन्हा कवि विश्व दीपक कंठफोड़वा के माध्यम से सुन्दर ग़ज़ल(?) प्रस्तुत कर रहें है -

हिंदू हूँ, मुसलमां से रश्क क्यों रखूँ,

खुदा ने खून संग-संग उबाल कर रखा है।



हाकिम से वक्त लेकर दुनिया में हूँ आया,

रकीबों ने मेरे वास्ते जाल कर रखा है।



5. अपने की-बोर्ड के सिपाही निरज दीवान साहब ग़ज़लों की दुनिया के बादशाह पद्मभूषण जगजीत सिंह जी के ६६वें जन्मदिवस पर ख़ास पेशकश लेकर आए हैं। “ग़ज़ल का साज़ उठाओ” आह्वान करते हुए दीवान साहब ग़ज़ल की दुनियाँ पर राज करने वाले जगजीत सिंह की निजी जिन्दगी पर रोशनी डाल रहें है।

6. इधर अपने सृजन-सिल्पी जी “नेताजी सुभाष : सत्य की अनवरत तलाश” शीर्षक से नेताजी की मृत्यु का रहस्य और उसमें सुलझे-अनसुलझे सवालों पर रोशनी डाल रहे हैं, इसकी अगली कड़ी भी प्रकाशित की जायेगी ऐसा वादा भी उन्होंने अपनी इस पोस्ट के अंत में किया है। अपने इस आलेख में उन्होनें कांग्रेस पार्टी पर तीखे प्रहार किये है।

7. लोकमंच पर लेखक अपूर्व कुलश्रेष्ठ ब्लागर्स या चिट्ठाकारों की दुनिया पर प्रकाश डालते हुए बता रहें है कि ब्लाग एक निजी डायरी, ताजे समाचार प्राप्त करने का जरिया एवं आपके निजी विचार हैं. सामान्य भाषा में ब्लाग एक बेवसाइट है जहां आप अपने विचारों को प्रेषित करते हैं. इस हेतु कोई नियम व कायदे नहीं हैं. कोई भी अपने विचारों को मनचाही भाषा में व्यक्त कर सकता है.

8. हिन्द-युग्म पर नैतिकता का पतन हो गया, निठारी कांड पर संवेदना व्यक्त करने के लिए दो-दो कवि एक साथ मंच पर उतरे। आग़ाज करने के बाद जब कविराज का गला बैठ गया तो कवि प्रमेन्द्र नें माइक थामकर उसका अंत किया। इसे एक अतिसंवेदनशील मुद्दे पर संवेदनशील कविता कहा जा सकता है।

9. गुरनाम सिंह सोढ़ी चिट्ठा-जगत में धोनी के रूप में उभर रहे हैं, एक के बाद एक काव्य-रस की बौछार ऐसे कर रहे हैं मानों बादल फटने के बाद बारीश हो रही हो। ऐसा नहीं की यूँही बकवास की जा रही है, उनके प्रत्येक काव्य में एक संदेश भी निहीत होता है और बहुत सारी भावनाएँ भी। कल उन्होने दो कविताएँ किसी से कुछ कह नहीं पाता हूँ और माँ प्रकाशित की, दोनों ही कविताएँ दिल को छूती है।

10. समाजवादी जनपरिषद पर अफ़लातून जी का “बातचीत के मुद्दे : किशन पटनायक” के बाद दूसरा अंक “वैश्वीकरण : देश रक्षा और शासक पार्टियाँ : किशन पटनायक” जारी हुआ है। अगला अंक “जगतीकरण क्या है?” भी जल्द ही जारी किया जायेगा इसका संदेश उन्होनें इस अंक के अंत में दे दिया है, इस अंक पर अपनी प्रतिक्रिया दें और अगले अंक का इंतजार करें।

11. महाशक्ति उर्फ प्रमेन्द्रजी सिविल लाइन्‍स से प्रयाग दर्शन कर रहें थे, कैमरा हाथ में था तो सोचा क्यों ना सभी चिट्ठाकारों/पाठकों को भी दर्शन करवा दिये जाये इसलिए तस्वीरे उतार लाये और अपने फोटो ब्लॉग अदिति पर चस्पा कर दिये। साथ ही प्रभू नारद पर उन्होनें शिकायती वाण चलाते हूए कहा है – “मैने कल ही एक पोष्‍ट की पुन: प्रसारण किया था किन्‍तु नारद जी की व्‍यस्‍त्‍ता के कारण वह आज तक नही आ सकी। अर्थात पुन: प्रसारण की भी वाट लग गई”। सुन रहें है ना प्रभू?

12. नारायण!!! नारायण!!!... प्रमेन्द्र जी तो मात्र शिकायत करके मन मारकर रह गये परंतु कविराज नहीं मानें, प्रभू नारद को केन्द्र में रखकर व्यंग्य बाण छोड़ने लगे। प्रभू के दो काल्पनिक (?) भक्तों का सहारा लेकर जो (कु)कृत्य उन्होनें किया है उसका परिणाम क्या होगा, यह तो वक्त के पास सुरक्षित है। व्यंग्य की बाण चलाते हुए भी वे कहते हैं “ऐसी निराशावादी बातें ना करें प्रभू, हम भक्तों को क्षमा करें और आपका किस प्रकार से सहयोग किया जा सकता है यह बतलायें, आप जल्द ही वात की सी गति से सभी घरों से पकवानों की सूचि बनाकर लाने लगेंगे, हमें पूर्ण विश्वास है..”

13. मनिषाजी बता रहीं है कि रेल रिजर्वेशन का समय बढ़ा दिया गया है, उन्होनें बताया कि एक समाचार के अनुसार रेल मंत्रालय ने अग्रिम आरक्षण की अवधि को परीक्षण के तौर पर 60 दिन से बढ़ाकर 90 दिन (यात्रा की दिनांक को छोड़कर) यानी तीन महीने करने का फैसला किया है। 90 दिन पहले आरक्षण कराने की यह सुविधा पहली मार्च, 2007 मे लागू होगी।

14. आगे बढ़े तो एक गुमनाम धुरविरोधी यह कहते हुए मिले कि वें ठेका लेके बैठा है विरोध का. हमनें पूछा भाई यह ठेका किसने दिया और कब छूटा तो बोले – “बकवास मत करो और पोस्ट पढ़ो, सब समझ जाओगे” पोस्ट देखा तो गुजरात के कुछ रिपोर्टरों से नाराज़ सुप्रीम कोर्ट (क्योंकि उन्होंने, एक बेईमान जज की कलइ खोल दी थी) पर अच्छा आलेख पढ़ने को मिला। आप भी देखिये - कुछ भी करियो, न्यायपालिका मत छेड़ियो!

15. अब आपको एक खुशखबरी दी जा रही है, काफि जुझनें के बाद आखिरकार मिसीजीवी जी ने चुहा पकड़ लिया है और अब इसे उपहार स्वरूप महाशक्तिजी को भेंट किया जा रहा है, यह जानकारी हमें उनकी पोस्ट के शीर्षक “भाई महाशक्ति अपना उपहार ले जाओ” से मिली है।

16. अंतरिक्ष में आशीष श्रीवास्तव जी अपोलो ६ के बारे में जानकारी दे रहे हैं। उन्होंने इस उड़ान के बारे में लगभग सभी तकनीकी और गैर-तकनीकी जानकारियाँ समेटकर प्रस्तुत की है। साथ ही उन्होंने बतलाया है कि इसे असफलताओ के झटके क्यों लगें।

17. रचनाकार पर रामेश्वर काम्बोज की दो कविताएँ, एक लघु कविता और एक शेर प्रकाशित हुआ है, अच्छी रचनाएँ है मगर मांग अभी भी सूनी हैं, आपके पास मौका है कि जानकर इन सुन्दर शब्दों की मांग भरें। इसके लिए आपको टिप्पणी करें लिंक पर चटका लगाना होगा और यह बताना होगा कि यह शब्द-सागर आपको क्यों भाया?

18. आदम और हव्वा… के जरिये रतलामी जी नें एक समाचार पत्र में छपी ख़बर “साक्षरता बढ़ा रहें है मोबाईल फोन” पर व्यंग्यात्मक कार्टून प्रस्तुत किया है, देखते ही हँसी फूट पड़ती हैं।

19. मान्याजी की काव्यात्मक प्रस्तुती “एक कल्पना जीवित अब भी मेरे मन में...” बहुत ही उम्दा है, एक-एक शब्द भाव-सागर सा प्रतित होता है। अपनी इस कविता के अंत में उन्होंने एक शेर (?) भी प्रस्तुत किया है –


"कैसे भूलूं तेरा वो ख्वाबों में आना ...
और बिन कुछ कहे चुपचाप चले जाना..."
20. मोहल्ले में अविनाशजी लेकर आये हैं मुनव्‍वर राणा साहब के नाम अपनी पहली किस्त – “मुझको मत रोक मुझे लौट के घर जाना है..” इस कड़ी में वे बतला रहे हैं कि -


रायबरेली से मेरा ननिहाल सिर्फ़ बीस मील के फ़ासले पर था लेकिन ग़ुरबत फ़ासले बढ़ा
देती है, लिफ़ाफ़े और पोस्‍टकार्ड को छोटा कर देती है। ग़ुरबत में रिश्‍तेदार भ्‍ज्ञी दूर का चिराग़ मालूम होते हैं। ग़ुरबत में वह नशा है, जिसमें ख़ुदा भ्‍ज्ञी रिश्‍तेदार मालूम होता है। मुमकिन है ख़ुदा आसमान पर बहुत बड़े घर में रहता हो लेकिन ज़मीन पर व‍ह सिर्फ़ ग़रीब आदमी के दिल में रहता है। ग़ुरबत के करौंदे और बेर के कांटे उंगलियों से ख़ून निकाल कर उसकी जांच कर लेते हैं। ख़ून की बूंदों को जांचने और परखने के लिए लेबोरेट्री में भेजने की ज़रूरत नहीं पड़ती, ग़ुरबत के वह दिन भी क्‍या होते हैं जब शो केस में रक्‍खी हुई गुड़ि‍या को देखने के लिए ग़रीबी एहतियातन हाथ मुंह धो लेती है।

अगली कड़ी भी जल्द प्रस्तुत करने के वादे के साथ वो निवेदन कर रहें है कि आप अगली किस्त भी अवश्य पढ़ें।

21. छायाचित्रकार सुनिल दीपक जी कीटो, एक्वाडोरः बस अड्डे के पास ग्राहकों की प्रतीक्षा करते भोजनालय की सुन्दर तस्वीर खींच कर लायें हैं तो जीतु भाई इस बार जुगाड़ी लिंक में बतला रहें है कि गुगल कलेण्डर, वर्डप्रेस, ब्लॉगर का इस्तेमाल किसी भी आई एम क्लाईंट से कैसे किया जा सकता है और इसके लिए उन्होंने अमितजी के डिजिटल इस्पाइरेशन का आभार व्यक्त किया है।

22. और अंत में ख़बर इण्डिया रोड से, बेर्नार्दो बेर्तोलुची के बारे में जानकारी देते हुए बताया जा रहा है कि उनका किस्‍सा थोडा अलहदा है. पिछले एक दशक में उनका जलवा थोडा फीका भले पडा हो, मगर अपने गिर्द रंगीन खबरें खडी करने का उनके पास वैसा ही कौशल है जिस कौशल से वह अपने फिल्‍मों का विहंगम व एन्‍चैंटिंग कैनवास सजाते हैं। और भी कईं दिलचस्प जानकारियाँ मौजूद है।

आज का चित्र : छायाचित्रकार से, जिसका लिंक ऊपर पैरा 21 में दिया गया है।

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11 टिप्‍पणियां:

  1. संजय बेंगाणीफ़रवरी 09, 2007 12:29 pm

    बहुत ही विस्तृत चर्चा की है.
    बहुत खुब.

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  2. मेरे चर्चा एवं गिफट का लिंक देने के लिये धन्‍यवाद अन्‍यथा मै गिफ्ट लेना भूल जाता

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  3. बढ़ि‍या लिखा है भाई साहब। मोहल्‍ले के जिस पोस्‍ट का ज़‍िक्र है, उसमें मेरी तरफ से कुछ प्रूफ की अशुद्धियां रह गयी थीं। एक सुझाव है, चिट्ठों की समीक्षा होनी चाहिए। इस बात की परवाह किये बगैर कि कौन इस आलोचना को कैसे ले रहा है।

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  4. "कांग्रेस पार्टी पर तीखे प्रहार किए हैं!"

    भाई, मैंने तो पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि नेताजी पर केन्द्रित यह श्रृंखला तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित रहे। तथ्य और प्रमाण यदि कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते हों तो किया क्या जा सकता है! मैं किसी पार्टी के विरोध में अथवा किसी के समर्थन में न तो हूँ और न हो सकता हूँ।

    यदि आप इस साफगोई को प्रहार मानते हैं तो फिर प्रहार को क्या कहेंगे!

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  5. अविनाश जी की बात से हम भी इत्तफाक रखते हैं। इतनी लंबी चर्चा के लिये बधाई।

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  6. इत्ती लंबी चर्चा और हमरी कौनो पोसट नाहीं, कौनो खता हुई का हमसे ? :)

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  7. चर्चा अच्छी लगी! अविनाशजी का सुझाव काबिले गौर है! इस पर अमल होना चाहिये!

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  8. सही है, बढ़िया लिखे हो...वाकई अविनाश जी की बात में दम है मगर अलोचना/ समालोचना पूर्णतः चर्चाकार की सोच हो जायेगी. यह सब अभी भी कुछ मात्रा में तो होता ही रहता है. :)

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  9. धन्यवाद, आपने सबके बारे में जो लिखा । इससे यदि कोई लेख छूट गया तो एक बार फिर से जाकर उन्हें पढ़ सकते हैं । जानकारी के लिए धन्यवाद ।
    घुघूती बासूती
    ghughutibasuti.blogspot.com

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  10. आप सभी को टिप्पणी द्वारा मेरा हौसला बढ़ाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!!!

    अविनाशजी आपका सुझाव उत्तम है परंतु प्रत्येक चिट्ठाकार में अपनी आलोचना पचाकर उससे सीख लेने का माद्दा है, इस बात का प्रमाण मेरे पास नहीं है अत: चर्चा को आलोचनात्मक रूप देकर किसी का दिल दुखाये जाने से मैं फिलहाल सहमत नहीं हूँ। भविष्य मैं यदि ऐसा किया जाना संभव हुआ तो जरूर किया जायेगा।

    सृजन सिल्पीजी, मैने तथ्यों की चर्चा नहीं की है बल्कि आपकी प्रविष्टि की चर्चा की है। आपकी प्रविष्टि को पढ़कर जो मुझे लगा उसी की चर्चा मैने यहाँ पर की है। कृपया किसी भी कथन को दिल पर ना लें।

    श्रीशजी आपने भी गुरूवार को कोई पोस्ट लिखी थी, इसका आभास मुझे नहीं था, नारद पर मुझे आपकी कोई पोस्ट नहीं दिखी। आपकी प्रविष्टि की चर्चा नहीं कर पाने का खेद है।

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  11. चर्चाकारी में अब आफ का हाथ अच्छा जम गया है, नित्य नये नये तरीकों से की गयी चर्चा पढ़ने में अच्छा लगता है, जैसा आप कर रहे है।
    बधाई हो

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