बुधवार, फ़रवरी 14, 2007

भौंरा-कली दिवस उर्फ़ वैलेन्टाईन डे

आप सबको भौंरा-कली दिवस उर्फ़ वैलेन्टाईन डे की हार्दिक बधाई. फुरसतिया जी को इस मौके पर सुनकर हमने भी इसी तर्ज पर " राजा दिल माँगे चवन्नी उछाल के" अपना दिल उछाला, उनकी सलाह मानते हुये कि अगर कैच हो गया तो ठीक वर्ना फिर नये सिरे से उछालते हैं। मगर हमारा तो पहली बार में ही उछलने के पहले ही वही पुरानी जगह झटक लिया गया. कोई बात नहीं, अगली बार फिर नये उत्साह से उछालेंगे.

फुरसतिया जी जब फुरसत में बतियाते हैं तो गजब ही बतियाते हैं. अब इस दिवस पर बिल्कुल खाली थे, कोई उछालने वगैरह का चक्कर तो उम्र के साथ रहा नहीं तो परिणाम स्वरुप आर्मी के रिटायर्ड कर्नल की तरह किस्सागोही में लग गये और बताने लगे कि वैलेन्टाईन डे के दिन क्या होता है:

चारों तरफ़ वातावरण वेलेंटाइन मय हो रहा है। हवाऒं में सरसराहट बढ़ गयी है। स्पेशल आर्डर देकर देश में इंद्र भगवान से

पानी का छिड़काव करवाया गया है। फसलें पानी में भीग-भीग कर इतनी इतनी खुश हो गयीं हैं कि खुशी के मारे जमीन में लोट-पोट हो रही हैं। वी आई पी इलाकों में ऒले भी छिड़कवाये गयें। चारों तरफ़ फूलों से हंसते रहने के लिये बोल दिया गया है। कलियां से मुस्कराने को कहा गया है। भौंरों से कहा गया है कि कलियों पर मंडरायें लेकिन जरा तमीज़ से! सारा तमाशा होगा लेकिन कायदे से। सारा काम प्रोटोकाल के हिसाब से होगा। आनंद पर अनुशासन की निगाह रहेगी। ये नहीं कि भौंरा किसी झरते हुये फूल पर अलसाया सा बैठा है और उधर कोई कली अपने सौंन्दर्य पर खुद ही रीझते हुये खीझ रही है। हर एक से उसके पद की गरिमा के अनुरूप आचरण होगा। हां,तितलियों को आजादी है कि वे जिसके ऊपर चाहें उसके ऊपर मंडरायें। फूल, कली, भौंरा किसी के भी चारों तरफ़ चक्कर लगायें। तितलियां बगीचे की ‘बार- बालायें’ होती हैं वे कहीं भी आ-जा सकती हैं।



और आगे आज का वृतांत दे रहे हैं:


उधर देखो अशिक्षा, बेरोजगारी के गले मिलकर उसे मुबारकबाद दे रही है, धार्मिक कट्टरता सांप्रदायिकता के गले मिल रही है, काहिली, क्षेत्र वाद से नैन लड़ा रही है, हरामखोरी, लालफीताशाही पर डोरे डाल रही है, घपले-घोटाले ,गोपनीयता से लस्टम-पस्टम हो रहे हैं, नैतिकता अवसरवाद की गोद में पड़ी अठखेलियां कर रही है और बेईमानी, भाई-भतीजावाद की आंखों में आंखें डाले गाना गा रही है -हम बने तुम बने एक दूजे के लिये। सब वेलेंटाइन डे मना रहे है। आपस में प्रेमप्रदर्शन कर रहे हैं। पूरा देश वेलेंटाइन-बुखार में जकड़ा है।


बाकि तो आप उनके चिट्ठे पर जा कर ही पढ़ें. मौके पर सटीक व्यंग्य लाना इनके लेखन की जबरदस्त खुबी है.

इसी मौके पर जिजीविषा पर शुभ्रा गुप्ता जी ने भी आधुनिकता पर करारा व्यंग्य करते हुये काव्य के माध्यम से अपनी बात कही:


कोन सबसे हसीन व बिंदास साथी के साथ करेगा डेट
यह करेगा आपका वेलेन्टाईन बजट सेट
किसके दिल की कितनी सच्ची है धड़कन
महगें गिफ़्ट और ग्रीटिंग कार्ड से होगा यह आकलन
आज रात सभी क्लब और रेस्टोरेन्ट प्रेम की रोशनी से झिलमिलायेगें
और युवा प्रेमी अपनी नैतिकता का कुछ और स्तर गिरायेगें
हर साल नये कार्ड और तोहफ़ों की तरह साथी भी बदलते जायेगें
तभी तो हम आधुनिक कहलायेगें....


साथ ही इसी दिवस को आधार बनाकर एक लघुकथा प्यार का एक दिन भी जिजीविषा पर पेश की गई. पूरा चिट्ठा इन्होंने वैलेन्टाईन मय कर दिया है. मौका ही ऐसा है कि आदमी अपने होश हवास खो देता है और बस मगन हो जाता है तो अगले मगनी मिले हमारे डॉक्टर प्रभात टंडन जी, अपने केवल व्यस्कों के लिये-वैलेन्टाईन डे स्पेशल को लिये और व्यस्क चुनने की जिम्मेदारी के लिये हमें गेट पर दरबान की टोपी और एक डंडा थमा कर खड़ा कर दिया:


नोट - [यह चिट्ठा केवल व्यस्कों के लिये है। अब चिट्ठाकारों मे व्यस्क कौन हो चला है , इसका निर्णाय लेने का अधिकार तरकश सम्राट श्री श्री श्री समीरलालजी पर छोडे दे रहा हूँ।]


मै समझ नहीं पा रहा हूँ कि यह मेरी नौकरी सिर्फ़ इस पोस्ट के लिये लगी है कि परमानेन्ट टाईप है क्योंकि यह लिख रहे हैं... यह चिट्ठा न कि पोस्ट..मतलब हम तो अब हमेशा यहीं दरवाजे पर उँघते नजर आयेंगे. आज से यह चिट्ठा "अ' श्रेणी का घोषित किया जा रहा है. प्रथम एडल्ट चिट्ठे के लिये डॉ साहब को बधाई.

हमारे अनुराग भाई को तो त्योहारों से कोई मतलब रहता नहीं है, वो तो बस लगे हैं कि 'अम्बे-से-डर'. अरे काहे कोई डरे इतने सुंदर त्योहार के मौके पर. कहते हैं:


पहली बात तो यह ‘भारत मोटर्स’ अपनी कछुआ कार बंद कर ही नहीं सकती – भैये, अगर कछुआ कार बंद हो गयी तो हमारे तमाम नेता गण क्या पैदल चलेंगे? और तमाम सरकारी बाबू ऑफिस, उनकी घरवालियाँ शॉपिंग और बच्चे सरकारी गाड़ी के बिना स्कूल कैसे जायेंगे? दूसरी बात यह है कि ‘भारत मोटर्स’ जैसी कम्पनी कभी भी ‘नयी’ कार बनाने की सोच ही नहीं सकती – उनकी ऐसी मानसिकता ही नहीं है.


बहुत गुदगुदाती पोस्ट है, जरुर पढ़े. मस्ती की मस्ती दुगनी हो जायेगी यह तय है.

अच्छा, अब दो मिनट रुकिये, दो जरुरी सूचना दे लें, फिर आगे चलें:


पहली जरुरी सूचना है कि निरंतर का नया अंक आ गया है. क्या कहा, पहले से मालूम है और हम तो पढ़ भी चुके. तो हमेम कैसे मालूम चलेगा, जब तक वहाँ टिपोगे नहीं. अरे इतनी मेहनत से नया अंक निकाला गया है, कुछ तारीफ में दो शब्द लिख आओगे तो कलम नहीं टूट जायेगी और अगला अंक भी समय से आयेगा. चलो, वहाँ जाओ, टीप आओ, फिर आगे पढ़ना. चलो अच्छा, बाद में चले जाना, मगर जाना जरुर.!! :)


और दूसरी जरुरी क्या, महा जरुरी सूचना:


इंडिक ब्लॉग पुरस्कार वर्ष 2006 के लिए के अंतिम चरण में, आम इंटरनेट उपयोक्ता के लिये प्रत्येक श्रेणी के सर्वश्रेष्ठ चिट्ठों के चुनाव हेतु मतदान प्रारंभ हो चुका है. भारतीय भाषाओं के चिट्ठाकारों को इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कार प्रदान करने का यह लगातार चौथा गौरवशाली वर्ष है, जिसे पुणे स्थित सॉफ़्टवेयर सलाहकार देबाशीष चक्रवर्ती अंजाम दे रहे हैं. आप सबसे निवेदन है कि अपने मत का उचित प्रयोग करते हुये हिन्दी की श्रेणी में नामांकित आठ चिट्ठाकारों मे से अपनी पसंद को चुनने में सहयोग दें. आप इस लिंक पर जाकर वोट कर सकते हैं. ध्यान रहे कि मतदान का अंतिम दिवस २० फरवरी है.



इसे से प्रेरित पोस्ट करते हुये सृजन शिल्पी जी ने एक तो अपने चिट्ठे पर नया रंग रोगन कर लिया है और साथ ही निवेदन, " चुनाव कीजिये सर्वश्रेष्ठ हिन्दी चिट्ठे का" ... हम तो रंग रोगन और उनकी सज्जनता से लिखी गई इस प्रविष्ठी से इतने प्रभावित हुये कि खुद नंबरदार होते हुये भी, उनको ही वोट दे आये. उन्हें हमारी अग्रिम बधाई और शुभकामना. इसी समय ऊड़न तश्तरी, जो कि हमेशा सांय संय उड़ती है, वो कैसे चुप रहे. हमने समझाया भी कि भैय्या, बड़े लोगों की महफिल है और तुमको भूलवश बुला लिया गया है, तो ज्यादा टांय टांय सांय सांय न करो और चुप्पे ही बैठे रहो. मगर कौन हमारी बात सुनता है, कुछ न कुछ तो बोलना ही है तो बोल ऊठी:दाता से सुम भला, रो रो कर बयां की अपनी तकलीफ:


खादी का सफेद झकाझक कुर्ता पैजामा पहना, जो तरकश चुनाव के समय सिलवाये थे और फिर कलफ करवा कर धर दिये थे. जैसे ही मित्र का दरवाजा खटखटाये, उन्होंने तुरंत दरवाजा खोलते ही गले से लगा लिया. ढ़ेरों बधाईयां दी. हम समझे नामांकन की खबर लग गई दिखता है, फिर भी अनभिज्ञ बनते हुये पूछ बैठे कि भाई, आप बधाई काहे की दे रहे हैं. वो बोले, तरकश चुनाव जीतने की. हमने भी बहुत धन्यवाद किया और मारे शरम के कह ही न पाये कि यार, उसको तो महिना बीत गया, अब तो नया चुनाव आ गया है. बस बधाई लेकर निकल दिये. फिर दूसरे दोस्त के दरवाजे. उससे चुनाव के बाद दूसरी बार मिल रहा था तो पहले मित्र वाला खतरा नहीं था. जैसे ही वो मिला बोला क्या बात है, अब क्या कुर्ता पैजामे मे ही रहोगे कि वापस आदमी बनोगे. हमने कहा कि नहीं मित्र, फिर से चुनाव लड़ रहा हूँ, इस बार जरा बड़ा चुनाव है तो मदद मांगने आया था. वो भी छूटते ही बोला, यार तुम भी न!! एक बार तो ठीक है मगर यह रोज रोज की आदत न बनाओ. जब मिले बस शुरु: भईया, एक ठो वोट दे दो.


खैर यार, यह सब छोडो. यह तो डेली नुस्खे टाईप का हो गया है कि वोट दे दो.

आज इस वैलेन्टाईन दिवस के पावन और धार्मिक पर्व पर गीत सम्राट राकेश खंडेलवाल जी पूर्णिमा की छोटी बहन को याद करते देखे गये. उल्लेखनीय यह रहा है कि अब उनकी गीत कलश पर अगली पोस्ट शतकीय पोस्ट रहेगी, जिसे की धमाकेदार होना ही है और हम उनकी शतकीय पोस्ट का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, बधाई का थाल सजाये:


ज्योत्सना का पहन कर हिमानी वसन
आई है पूर्णिमा की ये छोटी बहन
ओढ़ मुस्कान की चम्पई चूनरी
मेरी अँगनाई को आज महका रही....



और बहन जी के चक्कर में ऐसा उलझे कि हमारे खास हितेषी होते हुये भी हमारे चुनावी पोस्ट पर समर्थन करना ही भूल गये. हमें लगता है कि हम तो सद्दी से कट गये, जीतना तो छोडो, जमानत बच जाये, तो काफी समझो. वैसे काबिलयत के हिसाब से बाकि नामांकित के सामने होना यही है. :)

चलो, खैर जो होगा देखा जायेगा, मगर ब्लेक फ्राई डे जरुर देखूँगा. मोहल्ले में और भी कई चर्चाओं के साथ इस सुकबुकाहट ने अग्रिम सीट का जुगाड़ कर लिया है, पूरा ब्लाग देखो यार, और जो जो न पढ़ा हो, पढ़ो. बहुत खुब मगर कुछ भाषा में संयमिता, जिससे मुझे कोई परहेज नहीं, मगर विगत विसंगतियां काफी हैं, के आधार पर मै जिक्र करने में असमर्थ हूँ. मगर मुद्दा और विचार उत्कृष्ट हैं.

अच्छा, चुनाव का मौका है तो अपने मित्र उन्मुक्त को कैसे भूलूँ...भाई, हमेशा मेरा ख्याल रखते हैं, तो आज हम उनका रखते है कि वो बता रहे हैं कि पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता, और क्या जीन का पेटेंट गलत है? भईया, दो दो तीन तीन वोट धरे हो, ध्यान रखना.

धुर विरोधी भाई नामानुसार फिर आये कि हिन्दी ब्लाग नोट छापने की मशीन नहीं है और वो भी बिना गहन अध्ययन के जीतू भाई का जिक्र और व्यवसाकिता सिद्धांत पर रवि जी नियम को किनारे रखते हुये अपनी बात रख गये. सही है, सब स्वतंत्र हैं, हो सकता है, आज जो आपने कहा वो कल सत्य हो, यही मेरी शुभकामना है.

आज रचना जी एक अपने ही अंदाज में रचना ले आई बिना दिवस की पावनता को मद्देनजर रखते हुये फर्क बता रही हैं:


खून तो सबका एक सा है,
फिर इतना फर्क है क्यूँ रहता?
तुम नीदों तक की दवा खाते,
वो छोटे मर्ज से मर जाता.
वो भी मानव, तुम भी मानव,
फिर तुमको क्यूँ न रहम आता?



जब यह सुना है तो धुघूती बासूती जी की कविता: वह मैं भी हो सकती थी और साथ ही हिन्दी युग्म पर ढ़ेरों कवितयें सुनिये, यहाँ का नया रंग रोगन भी आपको लुभायेगा.

आज जब अभिनव वापस आये और अपनी आलोक सिंह चौहान की पढ़ी एक कविता राष्ट्र भाषा हिन्दी सुनाये तो मजा ही आ गया. बहुत खुब.

अब जहाँ प्रमेन्द्र प्रयाग दर्शन करा रहे हैं तब लोकमंच भी ढ़रों मुद्दों को लेकर हाजिर है, और सभी मुद्दे उतने ही जरुरी. लोकमंच को साधुवाद.

अंतरीक्ष यात्रा जारी है और तरकश पर खुशी नई पॉडकास्ट को लेकर हाजिर है, इस बार मंजी हुइ कलाकार नजर आ रही है.

अब चलते चलते उपस्थित जी को सुनें, छपास दबा पाना मुश्किल है , कहते हैं:


गर ना समझे हो मियां तुम : यह कविता निठारी पर भी है और साथ ही नैसर्गिक, पवित्र, आदिम इच्छा के उन्मुक्त रथ के भटकते पथ पर अग्रसर होने पर भी ।


और साथ ही छूटी चर्चा में अतुल श्रीवास्तव 'लखनवी' जी का बेहतरीन आलेख पढ़ें: फ्रीडम के नगाड़े

अब चलते हैं, मुझे अंदाज है कि बहुत लोग छुट गये होंगे क्योंकि यह पोस्ट मैं ट्रेन में बैठकर अपने मोबाईल से चिट्ठे चैक कर लिख रहा हूँ, बाहर बर्फ गिर रही है. तापमान -२५ डिग्री सेन्टी पर सेंटिमेंटल हो रहा है, उम्मीद की जा रही है कि रात भर में ५० सेन्टीमीटर से ज्यादा बर्फ़ गिरेगी. तो अब बंद करें, बाकि सब क्षमा करें, कल पीर मुहम्मद फुरसतिया जी की बारी है, वो बचे कवर करेंगे. ऐसी हमारी उम्मीद है, न करें तो उनको वोट मत देना. :)

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7 टिप्‍पणियां:

  1. आखिरी लाइन गांठ बांध ली है. हम भी बड़ा सा मुंह बाये बैठे हैं, केवल आज वाली नहीं हमरी सभी पुरानी पोस्टों का भी जो जिक्र करेगा (तारीफ के साथ) हम उसी को वोट देंगे.
    हां नहीं तो!
    - एक लालची मतदाता

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  2. "फुरसतिया जी जब फुरसत में बतियाते हैं तो गजब ही बतियाते हैं. अब इस दिवस पर बिल्कुल खाली थे, कोई उछालने वगैरह का चक्कर तो उम्र के साथ रहा नही..."

    काहे गलत-सलत बोल रहे हो जी, c.u.cool जी की अमरीकन गर्लफ्रेंड के बारे में नहीं जानते क्या, नहीं पता तो जीतू भैया से पूछो। :)

    चर्चा मजेदार रही। बड़ी पोस्टें अब पढ़ते हैं।

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  3. प्रमेन्द्र प्रताप सिंहफ़रवरी 14, 2007 11:06 am

    अच्‍छा लिखा है

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  4. शिल्पाशर्माफ़रवरी 14, 2007 11:13 am

    समीर जी ने अत्यन्त रोचक शैली में यह लेख लिखा है। हम तो कायल हो गये हैं।

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  5. समीर भाई स्वयं बहुत रोच्क हैं तो शैली तो होनी ही है…अच्छा लिखा है …लगभग सभी को समेटना उपर से बांधे रखना क्या मजाक की बात है…बधाई हो एक बार फिर!!

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  6. संजय बेंगाणीफ़रवरी 14, 2007 1:25 pm

    हाईटेक प्रणाली से लिखी गई पोस्ट के लिए साधूवाद. बड़ा आनन्द आया. वैसे भी चंद दिनो से चिट्ठे पढ़ नहीं पा रहा, यहाँ मजेदार अंदाज में सार पढ़ लिया.

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  7. उडन तश्तरी अब उडते उडते भी लिखने लगी है क्या बात है, समीर जी मजा आ गया पढके, वैसे ओंटेरियो झील से सटे न्यूयार्क के कुछ शहरों में लगातार ९ दिन तक बर्फवारी हुई और टोटल जा पहुँचा १२ फीट

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