बुधवार, फ़रवरी 07, 2007

गाँव का व्यवहार क्या हो

वाह वाह, क्या जागरुक और गतिशील हो चला है हमारा हिन्दी चिट्ठाजगत. एक-दो दिन चर्चा नहीं हुई और पचास से ज्यादा पोस्ट आ गई. हम खुद ही दो दिन से ज्यादा ध्यान नहीं दे पाये तो कई पोस्टों को तो बस सरसरिया दिये, कुछ में पढ़े, कुछ में जहाँ हमारी ही मौज ले ली गई, उसे जरा ध्यान से पढ़े.


सबसे पहले सारी बात छोड़कर, यही रिवाज है, जो लोग नये नये आये हैं, उनका स्वागत करिये:

गुरनाम सिंग सोढी-कुछ मेरी कलम से: एक नहीं दो दो बढ़ियां कविता लेकर हाजिर.


घुघूति बासुति:
अगर आप लोग परिचर्चा पर भाग लेते हैं तो घुघूति जी से परिचित होंगे. यह एक कविता के साथ अनोखा आगमन है जो परिचर्चा वाले मार्ग से आया है अन्यथा तो लोग चिट्ठा पहले खोलते हैं फिर परिचर्चा पर जाते हैं. परिचर्चा मंच इस हेतु बधाई का पात्र है.

अभय तिवारी: निर्मल आनन्द: आप भी एक सुंदर भावपूर्ण कविता के साथ शुरुवात कर रहे हैं.

मैथली शरण गुप्त: थोड़ी सी जमीं थोड़ा आसमां: यह नाम तो आज हम सब चिट्ठाकरों के बीच परिचय का मोहताज नहीं. आपने भी बहुत जागती पोस्ट के साथ अपनी हिन्दी चिट्ठाकारी की शुरुवात की है.

आप सबका हिन्दी चिट्ठा परिवार में स्वागत है. बाजी तो कवियों ने ही मारी है, मगर सभी से उम्मीद है कि निरंतर लिखते रहेंगे. सब आपका प्रोत्साहन बढ़ायेंगे और आप भी सबका बढ़ायेगे, यही परंपरा है और इसे इस जगत में टिप्पणी के माध्यम से मूर्त रुप दिया जाता है. खुब करो, खुब पाओ और खुब लिखो, इस तरह का समीकरण हैं.

तो अब आप सबका स्वागत हो गया, अब सबके साथ चलो और आगे की चर्चा सुनो:

अगर कविता लिखते हो, तो न सिर्फ़ लिखो बल्कि उसे वाणी भी दो और न सिर्फ़ पढ़वाओ बल्कि सुनवाओ भी. ऐसा कहना है, हमारे गीत सम्राट राकेश खंडेलवाल जी का गीत कलश पर, जहाँ न केवल आप उनका गीत पढ़ पायेंगे बल्कि साथ साथ सुनते जायेंगे. वाह भाई, कवि और टेक्नालॉजी का सही घोल यहाँ देखें- गाँव का व्यवहार क्या हो हालँकि इस बीच उनकी एक और पेशकश आ गई है-सर्दी का मौसम मगर जैसा आपको शीर्षक से ज्ञात हो गया होगा, भयंकर सर्दी है और राकेश जी का गला खराब हो गया है तो रिकार्डिंग मे विघ्न हो गया है, आगे कभी सुना देंगे, तब तक हमेशा की तरह बस पढ़ लो :

ओढ़ मोटी रजाई को लेटे रही
धूप, लाये कोई चाय की प्यालियाँ
हाथ की उंगलियों को मिले उष्णता
इसलिये थी बजाती रही तालियाँ
भोर कोहरे का कंबल लपेटे हुए
आँख मलती हुई आई अलसाई सी
ठिठुरनों में सिमटती हुई रह गई
झांक पाई न पूरब से अरुणाई भी

और हिमवान के घर से आई हवा
ऐसा लगता नहीं अब कहीं जा रही....


आगे उनके ब्लाग पर पढ़ा और सुना जाये. आशा है इस प्रयास से प्रेरित हो बाकि कवि चिट्ठाकार अपनी आवाजों के दर्शन करवायेंगे और कविता चिट्ठाजगत में एक नई क्रांति आयेगी जिसे राकेश खंडेलवाल क्रांति का नाम दिया जायेगा.

अब अपनी प्रशंसा की आत्म निर्भरता के सिद्धांत को प्रमाणित करते हुये आज की सबसे बेहतरीन और चर्चित पोस्ट, अरे जब आत्म निर्भरता की बात है तो हमारी ही होगी न!!, बाल आरती के उड़न तश्तरी पर दर्शन प्राप्त किजिये :


मगर वहीं सफेद बालों की जगह टकलापन, परिपक्वता की चरमावस्था के बाद की स्तिथी को दर्शाता है, जैसे की पका फल अति पकने के बाद पिलपिला जाये. न खाया जाये और न किसी को खाते देखा जाये. ईश्वर से यही प्रार्थना रहती है कि अगर कोई नाराजगी हो ही गई हो, तो सारे बाल सफेद कर दो, एक वाईज़ मेन की उपाधी से कोई ऐतराज नहीं और अगर होगा भी, तो रंग रोगन से दुरस्त कर लेंगे मगर ४०-५० की बाली उमर में सठियाये से नवाजे जायें, यह बर्दाश्त करना बहुत ही मुश्किल होगा.



और आगे इससे बचने के लिये नियमित आरती की सलाह दी गई है:


हे प्रभु, हे बाल मेरे,
अपना गिरना रोकिये
इस तरह न बीच
भव सागर में
हमको झोंकिये.


आगे पूरी आरती के लिये उड़न तश्तरी की पावन स्थली पर माथा टिका आईये, लाभ मिलेगा.

दूसरी चर्चित पोस्ट, नास्तिकता की झांकी, जो कि माननीय पुरसतिया जी लेकर आये हैं, यह कहते हुये कि आखिर बाल गिरते क्यूँ हैं इस आरती को धता बता रही है और कह रही है कि:

समीरलाल जी को प्रार्थना की शक्ति पर बड़ा भरोसा है। वे गिरते हुये से प्रार्थना कर रहे हैं- आप मत गिरें। अरे भाई जिसमें खुद ठहरने का बूता नहीं वह प्रार्थना से कैसे रुकेगा? जो उखड़ रहा है वह प्रार्थना की ‘लेई’ से और अर्चना के ‘ फ़ेवीकोल ‘ से कैसे जमेगा?
अगर प्रार्थना करने से गिरने वाला ठहरने लगे, पतनशील का उत्थान होने लगे तो कहने ही क्या?


यही है पढ़ लिख जाने का नतीजा. ईश्वर से बिल्कुल विश्वास खतम. ऐसे ही लोगों ने गणेश जी का दूध पीना भी गलत ठहराया था जबकि आप सब जानते हैं कि सच में पी रहे थे. मैं तो भगवान से इनकी तरफ से भी प्रार्थना कर लेता हूँ कि हे प्रभु, ये नादान हैं, इन्हें क्षमा करना, यह नहीं जानते कि यह क्या कह रहे हैं. और सच में नहीं जानते और इसके सबूत में यह बाल की बात करते करते ब्लाग चोरी वगैरह पर पहुँच कवियों से मुकाबला करते हुये अपनी पेशकश ले आये :


ब्लाग में चोरी से हलकान ब्लागर लिखेगा:-
हे चोर देवता नमस्कार
लिखने-पढ़ने से नहीं किंतु
चोरी से तुमने किया प्यार!
तुम भी अच्छा लिख लेते यदि
थोड़ी से मेहनत कर लेते
खुद भी अच्छा लगता तुमको
हम भी वाह-वाह कर देते।....


फिर वापिस लौटे, नई वैज्ञानिक आरतियां स्वामी समीरानन्द जैसे पहुँचे महात्माओं की धार्मिक आरतियों की काट में लिखी, हास्य किया, व्यंग्य किया, हाईकु किया और न जाने क्या क्या. हमें क्या पाप तो इनको ही लगेगा. कहो सबसे ऐसा कह कर खुद आरती पढ़ने भी लग गये हों. बाल झरने की उम्र तो आ ही गई है.


आज एक बेहतरीन कविता, अति भावपूर्ण और हृदय को छूती हुई भाई अभिनव शुक्ला निनाद गाथा पर हम भी वापिस जायेंगे लाये:


आबादी से दूर,
घने सन्नाटे में,
निर्जन वन के पीछे वाली,
ऊँची एक पहाड़ी पर,
एक सुनहरी सी गौरैया,
अपने पंखों को फैलाकर,
गुमसुम बैठी सोच रही थी,
कल फिर मैं उड़ जाऊँगी,...........


वाह, बहुत खुब. और भी सुंदर सुंदर कवितायें पेश की गई है, जैसे हिन्दी युग्म पर राजीव रंजन जी की तरक्की , रंजु जी का प्यार का बंधन और आईने, रीतेश गुप्ता की जलती है विश्वास की लौ और नीलिमा की विचार एक छाता.

आराम से पढ़िये, यह चर्चा यहीं रहेगी-कहीं नहीं भागेगी तो जल्दबाजी न करें. एक लेख एक कविता टाईप के कोम्बिनेशन भी बना कर पढ़ सकते हैं अगर झेलन क्षमता कम हो तो. बाकि हमारे कहने से थोड़े न कोई चलेगा, सब अपने मन के मालिक हैं, नहीं तो हम तो सबसे चिट्ठा चर्चा पर भी टिप्पणी करने को कहे थे. एक दिन सब भाग भाग के किये फिर वही ढाक के तीन पात. वो सिर्फ़ उस दिन के लिये नहीं कहा था, उसे आदत बनाईये.

अब बधाई दी जाये, हिन्दी युग्म पर आयोजित मासिक प्रतियोगता का जनवरी का परिणाम घोषित हो चुका है:

'हिन्द-युग्म यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता' के प्रथम अंक के परिणाम बहुत लुभावने हैं। यूनिकवि का सम्मान कवि आलोक शंकर को उनकी कविता 'एक कहानी' को जाता है और आश्चर्यजनक रूप से यूनिपाठक का सम्मान भी उन्हें ही दिया जाता है।
यह प्रतियोगिता जनवरी माह के १०वें से २०वें दिवस तक आयोजित की गई जिसमें कुल छः कवियों की रचनाएँ नामांकित हुईं।


आलोक शंकर जी को बहुत बहुत बधाई और हिन्दी युग्म को इस प्रतियोगिता के आयोजन के लिये साधुवाद. आप सभी कवि इस प्रतियोगिता मे बढ़चढ़ कर हिस्सा लें.

यही खबर भाई प्रमेन्द्र भी रिलिज कर रहे हैं और साथ ही बता रहे कि उनकी हिन्दी में न लिख पाने की समस्या का काफी हद तक निदान हो गया है. बाप रे, मतलब अब फिर से लिखेंगे.

आशीष जी की अंतरीक्ष यात्रा अनवरत जारी है, सुनिये, सफलता की पहली उडान. , अपोलो १ : एक दुर्घटना और एक नन्हा कदम.


आज जहाँ दिव्याभ भाई शान्ति के दूत महात्मा गाँधी और सत्याग्रह पर लेख कम कविता के माध्यम से तटस्थ रहते हुये सधी हुई बात कर रहे हैं तो वहीं ऐसे समय में पंकज बैंगाणी ला रहे हैं: पाताल भैरव- काली दुनिया का इंट्रोडक्शन और लाने का तरीका देखो, इस पोस्ट में सिर्फ़ पात्र परिचय दे रहे हैं और वो भी पंकज उर्फ़ शांति भाई की नई सिरिज के माध्यम से. मुझे तो बड़ी अशांति की आशंका दिख रही है, खैर, देखा जायेगा, जैसा भी हो.

फिर पंकज भाई बताये कि खुशी की पाड कास्ट मे क्या खिचड़ी पक रही है. खुशी का यह प्रयास बहुत सराहनीय है, आप भी देखें और उसका मनोबल बढ़ाये ताकि ऐसी ही पाडकास्ट भविष्य में और बेहतर सुनने को मिलती रहें.

वहीं इनके बड़े भाई साहब, संजय बैंगाणी जी जोग लिखी पर शिव सैनिकों की करतूतों से परेशान हैं, लगता है गलत उम्मीद लगा बैठे थे. साथ ही याहू के एक बेहतरीन प्लग-इन की जानकारी दे रहे हैं ताकि आप याहू पर हिन्दी में चैट कर सकें. संजय भाई ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा भी बहुत बढ़िया तरीके से हुसैन की बेहूदा चित्रकारी के माध्यम से उठाया है.

आज मनोषी भी एक अंतराल के बाद दिखीं और बता रही हैं अपने सउदी के अनुभव . यह पोस्ट उन्होंने डोर सिनेमा से प्रेरित हो लिखी है. अब जब वो सउदी के अनुभव बता रहीं हैं, तब सुखसागर पर दुर्योधन का संदेश और कुन्ती-कर्ण संवाद को लेकर सुखसागर जी आये. इसी समय हमारे मनीष भाई भी अपनी गीतमाला को जारी रखते हुये पायदान # 8: गुरु गुलजार की बेसुवादी रतिया में रहमान चिन्मयी की बतिया ! गीत सुना रहे हैं.

मनीषा जी नया कार्यक्रम : फिल्मी डायलाग लेकर आईं.

जब मसिजीवी अपना चूहे के साथ का अनुभव चूहा चर्चा: ऐसे ही वक्‍त मेंबता रहे थे, तब
लोकमंच पर सुनिये: इंटरनेट के माउस से घुमो दूनिया . साथ ही यहाँ पर और भी सुनिये: अब तो शर्म करो :

दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा और जैश-ए-मोहम्मद के चार आतंकवादियों के बीच हुई मुठभेड़ से पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि भारत सरकार की कुछ तथाकथित नीतियों ने देश की सुरक्षा को गम्भीर संकट में डाल दिया है.


अभी कई जरुरी चर्चायें बाकी हैं मगर कुछ विशेष वजहों से मुझे चर्चा रोकनी पड़ रही है जो सरासर गैर जिम्मेदाराना हरकत है मेरी तरफ से. मैं आगे कभी इसकी भरपाई कर दूँगा. आशा है, आप सब मेरी मजबूरी समझेंगे और हो सके तो मध्यान चर्चाकार संजय भाई या कल के चिट्ठाचर्चक बाकी छूट गये चिट्ठों पर चर्चा कर लेंगे. अगर संभव हुआ तो मै अगला भाग २-३ घंटों में आकर लिख दूँगा, मगर अब रात हो चली है तो संभावनायें क्षीण हैं.

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7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत चिट्ठे थे। सबको समेटने का काम बहुत अच्छी तरह किया! बधाई !

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  2. चिट्ठों की संख्या बहुत ज्यादा होने के बावजूद बहुत ही सुन्दरता से चर्चा की है आपने।

    उम्मीद है एक साथ अवतरित हुए काव्यमय चिट्ठे, चिट्ठाजगत में पड़े काव्य-अकाल को दूर करेंगे।

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  3. सारे चिट्ठों को समेटना कोई आसान काम नहीं है,आपके धैर्य की मैं दाद देता हूँ…साधुवाद!!!

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  4. संजय बेंगाणीफ़रवरी 07, 2007 2:52 pm

    धृतराष्ट्र आपको साधूवाद दे रहे है.

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  5. स्थितियां समझने का सभी को धन्यवाद और आभार. :)

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  6. सबसे पहले यह बतला दूँ स्वर तो मेरा है चिट्ठे पर
    पर समीर भाई ने ही तो यह तकनीकी शिल्पित की है
    आगे भी कुछ नये प्रयोगों से श्रंगार करे चिट्ठों का
    हे समीर कह कत अब देखें हर रचना ने स्तुति की है

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  7. समीर जी इतने सारे चिट्ठे कवर कर लिये आपने क्या ये कम है, इतने चिट्ठों को पढना फिर लिखना अब समझ आया बाल महिमा का राज, जाहिर सी बात है झडेंगे ही हे हे हे। :) :)

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