February 28, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Udan Tashtari
एक बड़ा उमदा शेर पढ़ता था, अब यह भी याद नहीं किसका है, मगर जिसका भी है, उनको साधुवाद कि मौके पर याद आये. आप भी सुनें: लहरों को शांत देखकर यह मत समझना, कि समंदर में रवानी नहीं है, जब भी उठेंगे तूफान बन कर उठेंगे, अभी उठने की ठानी नहीं है.
लेकिन आज उठ ही गये. जब प्रत्यक्षा जी ने अपने इरफान से मिलवाया था, तभी फुरसतिया जी कह आये आये थे कि अब हमें भी लिखना पड़ेगा और उठे आज. आये तो ऐसा आये कि आते ही चले गये और लिखते ही चले गये, वही बेहतरीन अंदाज, वही बहाव और वही लम्बाई :). लेख दीवाने हो भटक रहे हो मस्जिद मे बु्तखानों में आधी चिट्ठा चर्चा भी कर गये: यह देखें: ये भैये हमारे मोहल्ले वाले अविनाश जो न करायें! पहले बोले आओ इरफ़ान-इरफ़ान खेलें। फिर जब लोग खेलना शुरू किये तो बोले ऐसे नहीं खेला जाता। तुमको खेलना ही नहीं आता। लोग बोले हम तो ऐसे ही खेलेंगे। ये बोले-हम ऐसे तो नहीं खेलने देंगे चाहे खेल होय या न होये। इसके बाद बोले खेल खतम पैसा हजम! हम खुश कि चलो इरफ़ान को चैन मिला। कम से कम होली में तो चैन से बैठेगा। लेकिन फिर देखा कि भैया अपने इरफ़ान को फिर जोत दिहिन। जैसे शाम को ठेकेदार काम बंद करने के बाद फिर से लगा देता है कभी-कभी जरूरी काम होने पर। उधर से हमारे प्रियंकर भैया बमक गये- आप कैसे बहस स्थगित कर सकते हैं? उधर से धुरविरोधी चिल्लाये जा रहे हैं हम नफरत फैलाने नहीं देंगे, वाट लगाने नहीं देंगे। नफरत का गाना गाने नहीं देंगे। जहर फैलाने नहीं देंगे। हमें लगा कि आगे की कड़ियां हो सकती हैं खाट खड़ी कर देंगे/ खाट खड़ी नहीं करने देंगे, चाट खिला देंगे/ चाट खाने नहीं देंगे, परदा गिरा देंगे/परदा गिरने नहीं देंगे( यशपाल की कहानी परदा)। हमें तो एकबारगी यह भी लगा कि मोहल्ले वाले और धुरविरोधी कोई मैत्री मैच खेल रहे हैं। इधर से मोहल्ले वाले ने गेंद फेंकी नहीं उधर से धुरविरोधी ने गेंद के धुर्रे उड़ा दिये। अब स्ट्राइक बदलने के लिये इधर से अभिषेक भी जुट गये। इस चक्कर में प्रत्यक्षा के इरफ़ान को घरेलू टाइप बताकर किनारे कर दिया गया कि भाई जरा कुछ सनसनाता सामाजिक उदाहरण पेश करो। बेंगाणी बन्धु तो बेचारे मोदी गुजरात के हैं, उनकी कौन सुनता है। यह है फुरसतिया जी का सहायता करने का तरीका. हमें पता चलने भी नहीं दिया और चर्चा लिखने में मदद कर के चले गये. बहुत धन्यवाद, महाराज. तो एक मददगारी वाला पहलू तो आप जान गये, अब उनके व्यक्तित्व का संवेदनशीन पहलू देखें: चलते-चलते मैंने कहा कल इतवार को फैक्ट्री चलेगी आप आइयेगा थोड़ी देर के लिये। नवी साहब चूंकि फोरमैन थे। उनको ओवरटाइम नहीं मिलता था इसलिये उनको आने की बाध्यता नहीं थी। लेकिन जब मैंने कहा आप आइये तो वे मुस्कराते हुये बोले अच्छा, आप कहते हैं तो आ जाउंगा आपके साथ चाय पीकर चला जाउंगा। अगले दिन सबेरे फोन की घंटी बजी। फोन नवी साहब के घर से था। उनको दिल का दौरा पड़ा था। मैंने तुरन्त उनको अस्पताल में लाने को कहा और वहां पहुंचकर उनका इंतजार करने लगा। मैं यह सोच भी रहा था कि नवी साहब को हड़काउंगा, ‘ये कौन तरीका है आने का भाई?‘ लेकिन हमको उन्होंने कोई मौका नहीं दिया। अस्पताल पहुंचते-पहुंचते उनकी सांसे थम गयीं थीं। उस दिन मैं जिंदगी में पहली बार किसी की मौत पर रोया। वह मेरे जीवन का ऐसा वाकया था कि जब याद करता हूं आंसू आ जाते हैं।
और उदगार: अपने देश में तमाम समस्यायें हैं। गरीबी, अशिक्षा, जनसंख्या, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सम्प्रदायवाद, जाति वाद,भाई भतीजा वाद। कौन किसके कारण है कहना मुश्किल है। मुझे तो लगता है कि सब एक दूसरे की बाइप्रोडक्ट हैं। इनका रोना रोते-रोते तो आंख फूट जायेगी। कोई फायदा भी नहीं रोने से। हो सके तो अपनी ताकत भर जहां हैं जैसे हैं वैसे इनसे निपटने की कोशिश करते रहें बस यही बहुत है।
खैर, मौहल्ला से लेकर फुरसतिया जी तक के सारे आलेख इत्मिनान से पढ़ियेगा मन लगाकर. कुछ धड़म धड़ाम की इच्छा जागे तो इस पर कुछ लिख भी डालिये, काल्पनिक भी चलेगा मगर लगे यथार्थ सा. फिर और लोग आयेंगे, फिर और बात बढ़ेगी, फिर से हम आयेंगे और चर्चा कर चले जायेंगे. :) अभी तो मौका है, होली है, थोड़ा ऐसा मसाला भी चलेगा जो अन्य मौकों पर शायद नहीं चल पाता. अरे हाँ, होली को बचे ही कितने दिन हैं. भांग तो घुटने भी लगी, लोग मस्तिया रहे हैं, यह देखो. गीत सम्राट राकेश खंडेलवाल जी को, फिर कहना कि होली के सिवा कभी देखे हो इनके इस रुपहले अंदाज को: होली और हो ली पर : पार्किंग में श्रीजी को पुलिस ने दबोच लिया ईव टीजिंग कर रहे हो शर्म नहीं आई है पढ़े लिखे इज़्ज़तदार देखने में लग रहे हो फिर बोलो कैसे ऐसी धूर्तता उठाई है श्रीजी ने हाथ जोड़ कहा, सुनें आफ़ीसर ईव जिसे कह रहे हो, धर्म पत्नी मेरी हैं शापिंग से ये लौटी, मुझे पहचान पाईं नहीं चेहरे पे मेरे क्योंकि दाढ़ी बढ़ आई है
बाकी तो वहीं जाकर पढ़ो, बहुते खूब है, इसी मौके पर हमारे मसिजिवी निलिमा के प्रश्नों का जवाब दिये हैं अपनी अलग होलिया अदा में: कह्ते हैं हमार का करिबै नीलिमा...जबाब फागु की पिचकारी से ... ये लो करलो बात होली की उमंग इनसे बरजास्त नहीं होती। हमारी पसंद इनके जबाब में: वह बहुत मामूली बात जो आपको बहुत परेशान किए देती है?
लो कल्लो बात। ससुरी बड़ी बात की तो औकात नहीं कि हम परेशान हों। अब नीलिमा की सादी हुई ...हुए हम परेशान...। बाजा आदमी होता तो बजीराबाद के पुल से छलांग लगा देता परेशानी में। नहीं भाई लोग हम परेशान नहींए होते। (हम तो पहिले ही कहे थे मान जाओ होली पर पंगा मत लो नहीं मानी...अब पता नहीं क्या क्या राज खुलेंगे आज।
बहुत ही बढ़िया होली की उमंग में झूले भाई!! बाह, बाह कि वाह वाह!!ऐसे ही पाँच सितारा जवाब और लोग भी एक से एक दिये जा रहे हैं और कोई कोई तो दो से दो और तीन से तीन: जानिये सबको: डॉ भावना कुँवर का जबाब: चमत्कार हो गया ! भई चमत्कार... और हाज़िर हैं एक ब्रेक के बाद राकेश जी के लिये: दूसरा वाला काव्यात्मक है और हो भी क्यूँ न, गीत सम्राट को समर्पित जो है. हरिराम के क्म्प्यू से...जवाब : टैग-वार्ता के कहते हैं कि अब मेरे कुछ प्रश्न हैं जिनका उत्तर अपेक्षित सभी हिन्दी के विद्वानों से-- (अभी हिन्दी ब्लागिंग गुरुओं से सम्पर्क स्थापित कर रहा हूँ, जिन्हें टैग बाद में करूँगा।) तो हम बच गये, मगर फंसे कौन, यह तो जबाब देने वालों को देखकर बाद में समझ आयेगा. :) जवाब तो रंजू जी ने भी दिये है मगर हमारी पोस्ट पर ही टिप्पणी के द्वारा दे कर चलीं गईं. निवेदन है कि वो इसे अपने चिट्ठे पर पोस्ट के माध्यम से दें.अभी यह दौर जारी है, लोग अटकाये जा रहे हैं, लोग भटकाये जा रहे हैं और सच मानो तो कुछ लोग हड़काये जा रहे हैं. मगर जैसा कि होता है, दूसरे फंसे तो मजा तो बहुत आता है, तो सब मजा ले रहे हैं. अब, एक अति आवश्यक सूचना:बकौल जीतू भाई:काफी समय के अन्तराल के बाद अनुगूँज फिर से आपके सामने प्रस्तुत है। इस बार अनुगूँज का आयोजन कर रहे है, तरुण भाई, जो निठल्ला चिंतन करते है। इस बार का विषय है, हम काहे बताएं, आप खुद ही यहाँ जाकर देखो ना।

हमारे कई नए साथियों को पता नही होगा कि अनुगूँज क्या है। अक्सर हम अपने साथी चिट्ठाकारों से किसी विषय विशेष पर उनके विचार जानना चाहते है। हो सकता है किसी मुद्दे पर सभी लोग विचारों से सहमत हो अथवा नही, लेकिन आपको आपके विषय विभिन्न विचारधाराओं को जानने का मौका मिलता है। सभी लोगों के विचारों के सामने लाने के लिए अनुगूँज का मंच प्रदान किया गया है। पहले यह आयोजन पाक्षिक किया जाता था, काफी समय से आयोजन नही हुआ। सभी चिट्ठाकारों से उम्मीद की जा रही है कि वो इसमें सम्मलित हो अपने विचार रखेंगे. अनुगूँज की सफलता के लिये शुभकामनायें और इसे रुके हुये आयोजन को फिर से हवा देने के लिये तरुण भाई को साधुवाद और बधाई.जिस वक्त हमारे लखनऊ वासी अमेरीका मे रह रहे अतुल श्रीवास्तव जी एक आदमी और एक देश के दो दो तीन तीन नाम बता कर अमेरीकन को अचंभित कर रहे हैं कि भारत घर का नाम, इंडिया बाहर का और हिन्दुस्तान तीसरा. जैसे कि रिंकू या चिंकू का बाहर का नाम पुनीत और सुनीत...आदि आदि. ठीक उसी वक्त लोग दो दो ब्लागों के एक ही नाम से रिवर्स परेशानी का सामना करते पाये गये अंतर्मन, एक ब्लाग और जिसकी चर्चा नहीं हुई वो भी दो ब्लागों का नाम है जैसे रंजू जी का चिट्ठा कुछ मेरी कलम से. अब रेपिड फायर राऊंड कविता का:खूनी सागर स्वर्णा ज्योति जी की पेशकश. और सुनिये योगेश समदर्शी को: सबसे सुंदर और टिकाऊ पति को: दौर है बाजार का, हर हुनर एक माल है. आंकडौं का खेल है, सैंकडों की चाल है.
बहुत करारा और गहरा व्यंग्य, व्यवस्था पर चोट, बधाई. और सुनिये, टू फेसेस पर हरिवंश राय बच्चन जी को: अंधेरे का दीपकरुमी हिन्दी पर जादूगर: जादूगर तुम अनोखे हो निराले हो.। शिकारी, शिकार को बनाने वाले हो॥
और हमारे मोहिंदर भाई को सुनें हिन्द-युग्म पर: दोषी कौन हमें ही चिन्हित करना है कौन है दोषी यदि हर मानव के पेट में अन्न नही है हर पांव में नही है जूता क्यों कोई पटडी पर है लेटा क़्यों इतने हाथ पसर रहे हैं क्यों हैं इतने दुखियारे किसने है सारा सुख समेटा
पीडा, पीडा में अन्तर अगम है
वाह, वाह, बहुत खूब ( और यह पढ़कर किया है वाह, वाह, तो हल्के में मत लेना) :) देबाशिष भी सुन लें, हा हा!!आज जगदीश भाई का आईना निवेषकों को आईना दिखा रहा है कि सही गलत को पहचानों और कहीं एल आई सी ऐजेंटों द्वारा की जा रही गलत पेशकश का पर्दाफाश कर रहे हैं, जगदीश भाई का धन्यवाद ऐसे आँख खोलू लेख के लिये. भविष्य में भी वो इसी तरह चिट्ठे के माध्यम से ज्ञानवर्धन और आगाह करते रहेंगे, ऐसी उम्मीद की जा रही है. माँ बाप को समर्पित भगवान सलामत रहें माँ बाप हमारे ! नीरज की पोस्ट को साधुवाद. और हँसने हँसाने के लिये महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर जी लाये हैं कई सारी मसाले दार चटपटी पोस्टें. सभी पठनीय हैं.पढ़ो, खूब पढ़ो जैसे अगले एक महिने तरस जाओगे नितिन बागला जी को देखने क्योंकि उन्हे दस ठो एक से एक गजब की किताबें मात्र १०० रुपये में हैदराबाद में मिल गई हैं और वो अगले एक माह तक उन्हें पढ़ेंगे, उसके बाद ही अब आप उनको पढ़ेंगे. चलो किसी का तो कहीं और मन लगा. ताजा उत्प्रेरक प्रसंगो के लिये हमेशा पढ़िये, लोकमंच और हिन्दी चिट्ठाकारी के व्यवसायीकरण पर अमित द्वरा लिखे लेख की जानकारी लिजिये रवि रतलामी जी से. अरे कहाँ चले, बस काम की सुनी और चल दिये. यह गलत बात है, कहानी भी तो पढ़ते जाओ: कल्लो और कस्बा पर रविश की रिटेल साहू , बहुत बेहतरीन लगीं दोनों हमे तो. अब आप भी पढ़ो. सुनील दीपक जी जो कह न सके वो हम बताते हैं: जो हुआ वो क्यों हुआ? और अंत मे, स्वागत योग्य कदम के लिये हमारे भाई श्रीश को बहुत बधाई प्रथम हरियाणवीं चिट्ठे के लिये. यह हमारी होली के पहले आखिरी चर्चा है तो आप सबको होली की बहुत रंग बिरंगी शुभकामनायें और बधाई.बहुत सारे चिट्ठों में अधिक अधिक से कवर करने का प्रयास किया मगर फिर भी छूट ही गये होंगे, क्षमा चाहूँगा.Labels: चिट्ठा-चर्चा
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February 27, 2007 को प्रकाशित। लेखकः राकेश खंडेलवाल
होली का उड़ने लगा है गलियों में रंग रतलामी जी घोलते ठंडाई में भंग नंदगांव जीतू गये, बरसाने श्री शुक्ल चिट्ठा चर्चा कीजिये आप हमारे संग लोकमंच पर देखिये, जाकर नौ दस पोस्ट ये न समझिये पी रखी हमने भी है पोस्त कुछ जो मेरी कलम से गया लिखा है आज आधे जीवल की कथा है वह, मेरे दोस्त एक क्लिक तरकश हुआ, नारद भी बस एक चले आज दिव्याभ हैं रथ को ले सविवेक ई पंडित बतला रहे आडम्बर का धर्म ऐसे गुरुओं को उठा अब दरिया में फ़ेंक यक्ष प्रश्न को हल करें हिन्दी वाली बातक्यों ? मंथन करती रही बचपन की सौगात प्रभासाक्षी संकलन में करते गिरिराज दुनिया मेरी नजर में, है सरगम दिन रात मेरे पन्ने पर पढ़ें ज़ेड गुडी के भेद कैसे रेटिंग की हुई उनके साथ परेड लिखते चिट्ठा मैथिली आज यहां अविनाश महाशक्ति बोले कि अब मेरे उत्तर देख चिट्ठाकारी पर करें पुन: नीलिमा शोध और कहें उन्मुक्त जी, वर्षगांठ है सोच एक नजरिया और का भी है पूरा वर्ष वर्षगांठ शुभ आपको,बोले दिल के बोल देखें या सीतामढ़ी या कि सिनेमा आप जोगलिखी संजय मगर, देंगे नये जवाब धारावाहिक अमित का देश योद्धा वीर स्ट्रिन्ग्स को जानें यहाँ आकर आप जनाब जन्म दिवस भुवनेश का, नमन करें कविराजकथा सत्यनारायणी नहीं हो सकी आज पर होकर रामायणी अभिलाषित हम लोग शुभ दिन हो, शुभ वर्ष हो, पूरे हों सब काज कविवर श्री ज्ञानेन्द्र का करे पहल सम्मानगंगातट के वे कवि,किया शब्द संधान पढ़ें आप्संशयात्मा, औ, पढिये भिनसार शीश स्वयं झुक जायेगा करते हुए प्रणाम कल परसों कुछ रह गये चिट्ठे चर्चाहीन उड़न तश्तरी एक था, गिनता था दो-तीन बाकी खुद ही ढूँढ़िये नारद के संग आप इतने ज्यादा हो नहीं पाये वे प्राचीन और यहां पर बर्फ़ अभी भी गिरी कल तलक शाम को यही चित्र में लगा रहा हूँ. अब इस पूर्ण विराम को p>
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February 26, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Raviratlami
हिन्दी चिट्ठा जगत में टैग किए जाने का खेल चरमोत्कर्ष पर पहुँच चुका है है. इस बीच बचे खुचे चिट्ठाकार भी टैगियाए जा चुके हैं और जो इक्का दुक्का बचे हैं, वे टैगियाए जाने की कतार में हैं. कई अभागे तो दुबारा, तिबारा टैगियाए जा चुके हैं. श्रीश को तीन चिट्ठाकारों ने एक साथ टैग कर दिया तो बदले में उन्होंने पंद्रह चिट्ठाकारों को अपना कोप-भाजन बनाया. आज देखते हैं कि किसने किसे फांसा और फंसा हुआ कौन क्या उत्तर दे रहा है और आगे किसे फांस रहा है. लक्ष्मी गुप्त फंसे तो उनका कवित्व कुछ यूँ बाहर आ निकला- "...उड़नतश्तरी वाले हैं जो समीरलाल पूछे हैं उन्होंने कुछ अजीब सवाल पहले तो समीर जी पुरस्कार की बधाई हो ठेठ भारतीय परम्परा के अनुसार दावत कब देने वाले हो..." दावत तो भाई, समीर हमें भी चाहिए. अब कोई तिथि तय कर ही लें. टैगियाए गए ईस्वामी अपना पर्चा कुछ यूँ हल कर रहे हैं- प्रश्न १. आपकी दो प्रिय पुस्तकें और दो प्रिय चलचित्र कौन सी हैं? उत्तर १. रजनीश की "दी बुक ऑफ़ सीक्रेट्स" और खलील जिब्रान की "द प्राफ़ेट" दो सबसे अधिक प्रिय पुस्तकें हैं. "गीता" को मैं धर्मग्रंथ मानता हूं सो उसका स्थान ज़रा अलग है. जाहिर है, अब आपको पता चल गया होगा कि उनके चिट्ठे रजनीशी व ख़लीली विचारों से क्यों अटे पटे होते हैं. जगदीश को भी टैग दिखा दिया गया. वहां से उत्तरों का प्रतिबिम्ब कुछ यूँ बनता दिखाई दे रहा है- बहुत ही अनोखी दुनिया है हिंदी चिट्ठाकारिता की। दुनिया के अलग अलग कोने पर बैठे लोग एक दूसरे से इतना प्यार और सहयोग रखे हैं| बिना किसी स्वार्थ के. बिना किसी लालसा के संबध बन रहे हैं| एक दूसरे का विरोध करते हैं, सहमत होते हैं, फिर विरोध करते रहने के लिये सहमत हो जाते हैं| एक दिन जिस पर गुस्सा दिखाते हैं, दूसरे दिन उसी के ब्लाग पर जाकर प्यार भरी टिप्पणी कर आते हैं... अभिनव ने टैगियाए प्रश्नों को वस्तुनिष्ठ रूप में लिया, जो कुछ को जँचा और कुछ को नहीं. शाहरूख को तो उनका यह उत्तर कतई नहीं जंचेगा- प्र.५.यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे/चाहेंगी? उ.-- मैं के बी सी में शाहरुख़ की जगह दुबारा अमिताभ को देखना चाहूँगा। तो उन्मुक्त उनसे पूछते हैं - क्या शाहरुख़ इतना खराब प्रोग्राम करते हैं? वैसे तो इनके वस्तुनिष्ठ उत्तरों से प्रसन्न होकर संजय ने इन्हें पास कर दिया, मगर राकेश ने इन्हें पूरक दे दिया, और प्रश्न फिर से हल करने की मांग करने लगे- नंबर आधे अभी मिलेंगे, क्योंकि मिले हैं उत्तर आधे एक बार फिर पढ़ कर देखो, मैने क्या क्या प्रश्न उठाये दोहराता हूँ फिर से नीचे, मौका मिला और दोबारा छूट नकल करने की भी है, उतार सूझ अगर न पाये :-) प्रश्न पाँच यह- क्यों लिखते हो, क्या लिखने को प्रेरित करता कला पक्ष से भाव पक्ष का कितनी दूर रहा है रिश्ता कितना तुम्हें जरूरी लगता,लिखने से ज्यादा पढ़ पाना मनपसंद क्यों विधा तुम्हारी, और किताबों का गुलदस्ता. मुजरिम नीलिमा अपने आरोपों के जवाब खुलकर देती हैं- हां चिट्ठाकारी छपास पीडा को शांत करती है दैविक दैहिक भौतिक तापों में एक इस ताप को भी शामिल मान लेना चाहिए। अपन तो जबरिया लिखि है ......वाला दर्शन सही है अब अपन के लिखने से कोई दुखी हो तो हो... नीलिमा ने अपने एक उत्तर में अंतरंग सवाल के रूप में जानना चाहा है कि - - वैसे कभी अवसर मिला तो जानना चाहूंगी कि जीतू, अनूप, रवि रतलामी आदि को कैसा लगता है जब उन्हें एक दिन अपने ही खड़े किए चिट्ठाजगत में आप्रासंगिक हो जाने का खतरा दिखाई देता होगा। यह सवाल भले ही नीलिमा अंतरंग मानती हों, परंतु है यह उनका शोध विषयक सवाल ही. अनूप, जीतू, देबाशीष ने टिप्पणियों में जवाब दे दिए हैं. श्रीश ने भी मामला स्पष्ट किया है. इस बारे में मेरा जवाब है - शुद्ध लालू स्टाइल - प्रश्न पॉलिटिकली अनकरेक्ट, हाइपोथेटिकल है! हमहूँ कभी प्रासंगिक तो था ही नहीं फिर ये अप्रासंगिक बनाने का क्या चक्कर है? इ प्रश्नवा तो मुझे नॉनसेकुलर दिख्खे है! :) पुछल्लित प्रश्नोत्तरी का दौर जारी है, और अगले कुछ हफ़्तों तक चलने की संभावना है. उत्तरों के वेल्यूएशन-रीवेल्यूएशन के काम भी, जाहिर है लगातार जारी हैं. प्रश्नोत्तरी से इतर सरसरी निगाहें अन्य चिट्ठों की अलग तरह की प्रश्नोत्तरी पर डालते हैं- घुघूती किस चिड़िया का नाम है - यह अगर आपको नहीं पता तो उत्तर के लिए यहाँ देखें. अगर आप कामरेड नहीं हैं तो आप अपना दुःख इनके साथ बांट सकते हैं. सूफ़ी कहाँ से आया आप बता सकते हैं? यदि नहीं तो उत्तर यहाँ देखें. मीडिया ठसक क्यों बढ़ी और हनक क्यों चली गई? इसका विस्तृत उत्तर यहाँ है. चित्र - रूमी हिन्दी से Labels: chithha charcha, चिट्ठा चर्चा, चिट्ठा-चर्चा, हिन्दी
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February 25, 2007 को प्रकाशित। लेखकः अनूप शुक्ल
ये लेव आज फिर इतवार आ गया। आज की चर्चा हमें करनी थी। हम गये थे कल बाहर। बाहर बोले तो लखीमपुर-खीरी। लौटे तब तक तीन बज गये थे। ये मुये इतवार का सबेरा जितना खुशनुमा लगता है, दोपहर के बाद का इतवार उतना ही दिलजला लगता है। रास्ते से आशीष को फोनियाया तो पता चला कि बच्चा चेन्नई से मुम्बई की उड़ान पकड़ने के लिये अपने को तैयार कर रहा था। बहरहाल,हम लखीमपुर से लखनऊ होते हुये वापस कम्पू आये और नहा-धोकर राजा-बाबू बनकर बैठ गये सारे चिट्ठे बांचने के लिये। अब बांच रहे हैं और लिख रहे हैं और आप भी मन लगा के बांचिये। कल हम रात को लखीमपुर में एक बारात का इंतजार इंतजार करते हुये समाज-चर्चा कर रहे थे तो हमारे कुछ दोस्त प्रदेश के बारे में हमारी जानकारी बढ़ा रहे थे। बता रहे थे फलां नेता की रखैल का नाम ये है, फलां का खाता उनके यहां खुला है। फलाने का एनकाउंटर ऐसे कराया ढिमाके को ऐसे टपका दिया गया। हम सन्न होते हुये पूछे कि भैये जब तुमको पता है तो नेता विरोधी दल ,पत्रकारों को भी पता होगा। लोग इसके बारे में हल्ला काहे नहीं नहीं मचाते! हमारे काबिल दोस्त में हमारे बचकाने सवाल पर मुस्कियाते हुये बताया- कौन हल्ला मचाये सबका तो यही हिसाब है। रही पत्रकार वाली बात तो भैये मरने से सब डरते हैं। बहरहाल, कितना सच है यह बात कह नहीं सकते लेकिन प्रेमेंन्द्र कुछ ऐसा ही लिखते हैं कि उ.प्र. की राजनीतिक हालत बहुत खराब है। इरफ़ान पर हुयी बहस आगे जारी रही। लोग अपना-अपना सच बयान कर रहे हैं। अपने परिवेश की सोच का जिक्र करते हुये मनीषा पांडेय ने लिखा- मौसी हम मुसल्लों की वाट लगा देंगे| इसके जवाब में धुरविरोधी जी ने लिखा - ये सब कैसे सुन लेती हो ? अगर हमारे घर या पास पडोस में अगर ये कोई बोले तो सुनने बाला उसके गाल पर चांटा जड देगा. मेरा बाप अगर मुझे एसा बोलते सुने तो मुझे गोला लाठी लगाकर रातभर को टट्टर पर डाल देगा. धुरविरोधी की यह पोस्ट सागर को बहुत पसंद आयी। धुरविरोधी अपनी पोस्ट के माध्यम से आवाहन करते हैं- इस मोहल्ले से बाहर निकलो और देखो दुनिया उतनी बुरी नहीं है जितना उस मोहल्ले से तुम्हें दिखायी देती है.हमारे साथ आओ, हम नफ़रत फ़ैलाने वालों की वाट लगा देंगे. रवीशकुमार ने सद्भावना होनी चाहिए। मगर उसके बनने के रास्ते में जो रुकावटें हैं, उसकी पहचान हो तो क्या गलत? कहते हुये अपने बचपन के दोस्त रोशन अफ़रोज की कहानी बतायी तो धुर विरोधी ने लिखा- अरे यार, कभी तो अच्छी बात करो, शादी शुदा हो ना? भाभी जी कहतीं होगीं कि चौबीस घन्टे की ड्यूटी करते रहते हो, कभी उनके साथ जाओ. अगर कुंवारे हो तो किसी से प्यार कर के देखो. इस जहर को थूक दो मेरे भाई. फ़िर देखो ये दुनिया कितनी भली लगेगी. आज की अपनी दो पोस्टों से धुरविरोधी ने दिल खुश कर दिया और कोई तो बोला - आप तो धुर समर्थक निकले! नारद का हिट मीटर जहां सागर को लुभाता है वहीं रविरतलामी को डराता है। लेकिन रवि भाई आपने ही योगेश समदर्शी की गजल पेश की है न! उसी की लाइने आपके लिये:- आज आंसू बह रहे है देख जिनकी आंख में वक्त की तहजीब है उनको हंसी भी आएगी परसों हम पूनमजी बतियाये तो यह अनुरोध भी उछाल दिये कि कुछ लेख-वेख भी हुआ करे तो कित्ता अच्छा हो! हमें अपने जीतू की तबियत की फिकर है। बेचारे का रक्तचाप एक कविता पढ़कर पांच प्वाइंट उचक जाता है। हमें नहीं पता था कि हमारे अनुरोध की इतनी कद्र की जायेगी कि पूनमजी अगले दिन ही कविता छोड़कर लेख लिख देंगी। लेकिन उन्होंने लेख में अपनी रचना प्रक्रिया के साथ आगे के वायदे भी कर डाले- कविता का क्या है.कुछ दिल ने मह्सूस किया,बच्चों का टिफिन पैक करते कुछ पंक्तियां भी पैक हो गईं , आफिस पहुँचे ,दो कामों के बीच टाइप किया,और तीसरा कोइ काम करते करते पोस्ट कर दिया. बाकी का काम नारद्जी के जिम्मे .जिसको पढना पढे,और जिसको नहीं पढना वो आगे बढ जाये,पर एक नज़र डालने के बाद! लेख का क्या किया जाए.टिफिन जल्दी पैक हो जाता है और तब तक लेख की आत्मा तक पास नहीं फटकती.अब सोचा है कि कुछ रास्ता तो निकालना होगा . तो अब अभियान -गद्य चालू हो गया है. पांच सवालों के तीरों से लोग घायल होते जा रहे हैं। आज के शिकार लोगों में सागर, नीलिमा, नितिन व्यास । नीलिमा के एक अंतरंग सवाल वैसे कभी अवसर मिला तो जानना चाहूंगी कि जीतू, अनूप, रवि रतलामी आदि को कैसा लगता है जब उन्हें एक दिन अपने ही खड़े किए चिट्ठाजगत में आप्रासंगिक हो जाने का खतरा दिखाई देता होगा पर जीतेंद्र सेटिया गये और लरजते हुये से उवाचे- अप्रासंगिक? (इस शब्द पर मुस्काराने को जी करता है)वैसे आलोक, रवि, देबू, जीतू, फुरसतिया एक सोच है, व्यक्ति नही। और सोच कभी नही मरती। हमने हिन्दी चिट्ठाकारी के लिए जो योगदान करना था वो किया,इमानदारी से किया और जितना हो सकेगा करेंगे। लेकिन भविष्य तो युवा कंधो पर ही होगा ना। उनको आगे लाने के लिए भी हमने पूरे पूरे प्रयत्न किए। उदाहरण देना नही चाहता था, लेकिन आपने कहा है तो सुनिए, इस बार के इन्डीब्लॉगीज के चुनाव मे मैने या किसी वरिष्ठ चिट्ठाकार ने चुनाव प्रचार नही किया। ये नए चिट्ठाकारों को आगे लाने के प्रयास ही था। हम रहे या ना रहें, हिन्दी चिट्ठाकारी रहेगी, हमारी सोच जिन्दा रहेगी, हमेशा। बकिया तो सब ठीक जीतू ये युवा कंधे की बात करके क्या तुम अपने बुढौ़ती की घोषणा कर रहे हो? अरे अभी तो बचपना तुम्हारे ऊपर रोज लाइन मारता है। अभी काहे बदे अनिल कुम्बले बन रहे हो :) अरे हमसे भी पूछा गया था यह सवाल सो अपना जवाब हम वहीं लिख दिये। आप देख लीजिये नीलिमाजी, जवाब ठीक है न! :) अविनाश अंग्रेजी की लेखिका रूपा बाजवा के ३१ साल की उमर में साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने को हिंदी कवि ज्ञानेन्द्रपति और उर्दू लेखक मख़मूर सईदी के ५० साल की उमर में इसी इनाम से नवाजे जाने की तुलना करते-करते मैथिली के वयोवृद्ध लेखक चंद्रनाथ मिश्र अमर से होकर अपने दादाजी को याद करते हुये कहते हैं हिंदी के कितने ही लेखक अभी रूपा बाजवा की उम्र में हैं और वे दरियागंज से लेकर मंडी हाउस में सर उठाये घूमते रहते हैं, लेकिन कलमकारी के नाम पर हंस और कथादेश में कविता-कहानी छप जाने से आगे उनका उत्साह जवाब दे देता है. ज्यादा से ज्यादा इस काबिलियत का इस्तेमाल अख़बारों या व्यावसायिक तरीक़े से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं में नौकरी हासिल करने तक ये उत्साह बना रहता है. और जब तक ऐसी नौकरियां नहीं मिलती हैं घरों से पैसे आते हैं, फ्रीलांसिंग चलती है और कभी कभार एक अदद साहित्य अकादमी की लाइब्रेरी में वे पाये जाते हैं. क्या अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी लेखकों की बहुतायत उनके कम उमर में इनाम पाने का कारण है? तकनीकी तहलकों में नितिन फोटोशाप के बारे में बात करते हैं तो भोलाराम मीणा अपने ब्लाग की कीमत आंकने की कसौटी बताते हैं जिस पर मसिजीवी अपने ब्लाग को कसते हैं और बताते हैं कि ब्लाग मंडी में उनका भाव फर्जी है। देबू के पुस्तक चिंन्ह स्वादिष्ट कैसे होते हैं किसी ने खायें हों तो बताये। नितिन व्यास डिजाईनरों की दुविधा बयान करते हैं। उधर हरिराम को यही नहीं समझ आया कि कंप्यूटर पुल्लिंग है या स्त्रीलिंग! यहीं मौका है कि आप झट से जान लें कि सोमेश से लड़की कहती क्या है! पद्म्नाथ मिश्र अपनी लेखनी वियोग की कथा कह रहे हैं तो जीकेअवधियाजी रामकथा! इसीबीच बात पते की में एनडीटीवी के पत्रकार प्रियदर्शन समाज की बदलती हुयी सोच और खेलों में सट्टेबाजी के ताने-बाने का जिक्र करते हुये कहते हैं:- ये वो क्रिकेट है जो पैसे की मदद से खेला जाता है। जिसमें कभी दुनिया का सबसे शानदार माना जाने वाला हैंसी क्रोनिए जैसा कप्तान फंस चुका है और एक दौर में भारत का सबसे कामयाब कप्तान रहा अजहरुद्दीन भी। लेकिन ये सिर्फ खिलाड़ियों का मामला नहीं है, चमक-दमक और शोहरत से घिरी एक पूरी जमात का मामला भी है, जिससे रातों-रात हासिल हुई अपनी अमीरी संभाली नहीं जा रही। इसमें फिल्मी सितारे हैं, बार डांसर हैं, इन सबके करीब रहने वाले वैसे बिगड़े हुए लोग हैं जिन्होंने सट्टेबाजी को धंधा बना रखा है। इन सबके ऊपर अंडरवर्ल्ड है जो कभी मैच फिक्स करवाता है और नाराज होने पर किसी खिलाड़ी के लिए सुपारी देने से भी नहीं हिचकता। अभय तिवारी आपको सट्टे के संसार से नींद की दुनिया में ले जाते हैं अफलातून साने गुरु का समग्र साहित्य हिंदी में पढ़ाते हैं। तुषार जोशी हमारे चर्चाकार हैं। पता नहीं क्यों वे मराठी चिट्ठों की चर्चा स्थगित किये हुये हैं? बहरहाल,वे समीरखरे की कविता का भावानुवाद पेश करते हैं:- कितना प्यारा, कितना सुंदर ऐसा अपना दूर ही रहना मेरे लिये तुम बाद में मेरे उसी जगह फिर आकर जाना एक और कविता में संदीप खरे लिखते हैं:- शोख इन गालों पे देखो छुप के आती लालियाँ छुपके छुपके जब से मुझको तुम लगे हो देखने बिजली ना बादल लगे फिर मोर कैसे नाचने
कितनी कोमल फूल मेरे उम्र तेरी है अभी रंग हो गए बोझ लगती पंखुडीयाँ है कापने बिजली ना बादल लगे फिर मोर कैसे नाचने कविता में जहां एक तरफ़ रंजू का दर्द है:- बदल गये वो भी हवाओ, की रुख़ की तरह कुछ तो अपने जाने की ख़बर हमको दी होती वहीं रवीशकुमार जानकारी देते हैं: इस बीच अभी अभी खबर मिली है पत्थरों में विसर्जित गांधी को अब पुरातत्व विभाग के हवाले कर दिया गया है और गुजरात नरेंद्र मोदी को दे दिया गया है उधर मान्या लिखती हैं- अजनबी,नामालूम सा दिल से गुजर गया कोई किसी को मन ने चाहा मानो भी ऐसा मानो कुछ चाहा ही नहीं हां कुछ हुआ ऐसा कि कुछ हुआ ही नहीं! अब हम अजनबी, मालूम, न मालूम के बारे में तो कुछ नहीं कहेंगे लेकिन एक बात यह है कि मान्या के चिट्ठे से कापी-पेस्ट नहीं होता सो मालूम हो! बनारसी पांडे़ अभिषेक से सुनिये अगले शेरों की किस्त:- ना हमने बेरुखी देखी न हमने दुश्मनी देखी तेरे हर एक सितम मे हमने कितनी सादगी देखी अभिनव पेश करते हैं सुरेन्द्र चतुर्वेदी की कविता पंक्तियां:- मत चिरागों को हवा दो बस्तियाँ जल जाएँगी, ये हवन ऐसा कि जिसमें उंगलियाँ जल जाएँगी, उसके बस्ते में रखी जो मैंनें मज़हब की किताब, वो ये बोला, "अब्बा, मेरी कापियाँ जल जाएँगी"। आप लोकमंच पर भी कविता देखें, एक किसान की तारीफ़ करें कि वह अपने बीज से अपनी फसल उगाने का प्रयास कर रहा है, बाजरवाले का लेख देखें और चलते-चलते रवीश कुमार का कस्बे में किया हुआ यह वायदा देखें- चुनावों के मौसम में झूठे वादों की बरसात है। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई भींगता नहीं। तो साथियों यह रही हमारी चिट्ठाचर्चा २४ फरवरी के चिट्ठों की।आप बताइये कैसी लगी। हम देर से आये यह तो सबको पता है लेकिन दुरुस्त आये कि यह भी बताया तो जाये। आगे की चर्चा कल करेंगे रवि रतलामी। आज की टिप्पणीमनीषा ने इस बहस को बढ़ाया है। आखिर मौजूदा हाल में धर्मनिरपेक्ष होने से पहले हम अपने भीतर सांप्रदायिकता के तत्व पालते ही तो रहे हैं। उसका लिखना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों के सामाजिक सैंपल लेते वक्त हम लड़कियों के अनुभवों को कम ही शामिल करते हैं। करते भी है तो महिला क्रिकेट टीम की तरह। मनीषा के संस्मरणों में अपना भी एक संस्मरण जोड़ रहा हूं क्रिकेट ने मुझे कुछ समय के लिए खास किस्म के राष्ट्रवादी कुंठा में डाल दिया था। जब रेडियो से कमेंटरी सुनकर क्रिकेट के रोमांच को अपने भीतर उकसा रहा था। तभी अफवाहें भी रोमांच के साथ धारणा बना रही थीं। जब भी भारत हारता पटना के गांधी मैदान में खेलते वक्त यह समाचार मिल जाता था। घर लौटते वक्त सब यही बातें करते कि सब्ज़ीबाग जो मुस्लिम बहुल इलाका है वहां पटाखे छूट रहे होंगे। भारत हारता है तो मुसलमान खुश होता है। बहुत जी करता था कि कभी भारत के हारते ही सब्ज़ीबाग़ पहुंच जाऊं और खुद अपनी आंखों से देख लूं कि वाकई में पटाखे छूट रहे हैं या नहीं। एक बार पिताजी ने दर्जी के यहां से अपनी कमीज लाने के लिए सब्जीबाग ही भेज दिया। मुस्लिम दर्जी की दुकान में सरफराज़ नवाज़ और इमरान ख़ान की तस्वीर देख कर मेरे हाथ कांप गए। लगा कि मैं पाकिस्तान आ गया हूं। दोस्तों ने ठीक कहा है। यहां ज़रुर पटाखे छूटते होंगे। बहुत देर तक सोचता रहा। घर आकर भी सोचा हम जब दीवाली मनाते हैं तब तो मुसलमान पटाखे नहीं छोड़ते फिर पाकिस्तान की जीत पर क्यों छोड़ते होंगे? क्या उनके मज़हब में गुनाह नहीं होगा। खैर रात को बिस्तर पर अपनी एक कापी निकाल ली। तब मैं पत्रिकाओं से क्रिकेट खिलाड़ियों की तस्वीरें काट कर चिपकाता था। दीवारों पर चिपकाने का चलन शुरु नहीं हुआ था। मैं उन तस्वीरों को देख सन्न रह गया। डर गया कि अगर दोस्तों ने देख लिया तो क्या कहेंगे। पहली तस्वीर इमरान ख़ान की थी। और दूसरी ज़हीर अब्बास की। मुझे दोनों खिलाड़ी बहुत अच्छे लगते थे। कपिल देव की भी तस्वीर थी लेकिन रिचर्ड हेडली के बाद। मैं बहुत दिनों तक डरा रहा कि कहीं कोई मेरे भी देशप्रेम पर सवाल न उठा दे। अब वह डर खत्म हो गया है। इमरान खान और अकरम हमारे देश के अखबारों में कालम लिखते हैं। टीवी में आकर राय देते हैं। अच्छा लगता है। रवीश कुमार मोहल्ले की पोस्ट पर
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February 24, 2007 को प्रकाशित। लेखकः Debashish
सूचक आशावान व्यक्ति हैं, अब भी टीवी बहसों में मर्यादा की अपेक्षा रखते हैं। एक चैनल को क्या सूझी कि वो दो समझदारों के साथ "वन साइज डजेंट फिट एवरी वन" पर बहस करे...सवाल ये है कि क्या ये बहसें अपनी मर्यादा जानती हैं? जिस कार्यक्रम की बात यहीं हो रही है उसमें सभी हंस हंस कर ये बता रहे थे कि साइज से क्या, क्यों और कैसे...वे हंस क्यो रहे थे! शर्म से। महंगाई जैसे विषयों पर सरोकार रखने वाले छद्म लेखों के बाद लोकमंच अब अपनी औकात पर आ रहा है। भले ही ख़बरों के थाल पर परोसा जा रहा हो पर खोमचा वैमनस्य का ही है। " इस्लाम के अपमान के नाम पर ब्लागर को चार साल की कैद", " पाकिस्तान में नये पाठ्यक्रम का कट्टरपंथियों ने विरोध किया" जैसी खबरोंं को प्रमुखता। इस्लाम और मुसलमान शब्दों के प्रति भारतीय पूर्वाग्रह अद्वितीय है। यह विषय हिन्दी ब्लॉग जगत में गये हफ्ते से इरफ़ान के रूप में छाया रहा। मोहल्ले में इरफ़ान के हवाले से अविनाश ने एक लेख लिखा, मुद्दे सही पर ट्रीटमैंट अतिनाटकीय। यह चर्चा मुद्दे पर ही। ओम ने प्रतिक्रिया में कहा, "मैं तो हिंदू हूं पर दिल्ली में बिहारी कहा जाता हूँ...मुझे घिन्न हो गई हैं ऐसी व्यवस्था से..."। प्रियंकर ने लिखा, "समाज में कई स्तरों पर जाति, धर्म और भाषा को लेकर भेदभाव भी है। सारा के साथ स्कूल में अंडे वाली घटना को समाजीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा मान कर देखना चाहिये जो बहुधा संख्याबहुलता से अनुकूलित होती दिखाई देती है। कोलकाता में मेरे बेटे को यदि रहना और पढना है तो उसे मांसाहारी वातावरण में ही रहना होगा...इसे किसी सामाजिक अन्याय की तरह देखने की बजाय समाजशास्त्रीय प्राचलों के आधार पर देखना बेहतर होगा"। मैं सहमत हूँ। पर यह हमारा ही समाज है जहाँ सहस्त्रों बरसों पहले मुस्लिम शासकों ने जो किया उसकी दुहाई देकर आज तक मुसलमानों को कोसा जा रहा है। उन्हीं मुग़लों का बनाया ताजमहल बस एक हेरीटेज मोन्यूमेंट है। और जिन अंग्रेज़ों ने २०० सालों तक पैरों तले रौंदा उनकी भाषा और संस्कृति के तलुवे चाटने में ज़रा भी हया नहीं। मुसलमान शासक काफ़िर हमलावर रह गये और अंग्रेज़ हमलावर सॉफिस्टीकेटेड शासक। मदरसा बुरा है, पर मिशनरी स्कूल और वैदिक स्कूल दूध के धुले हैं। मदरसों से हर बच्चा आतंकवादी हो कर निकलता है और बाकी स्कूलों से कल्चर्ड अंग्रेज़ बन कर। भारतीय कौन सा स्कूल बना रहा है फिर आजकल? क्या हम अब भी उपनिवेश नहीं हैं? जगदीश ने कहा, "यह जो दुनिया-समाज हम सारा को दे रहे हैं न अविनाश, यह तुम्हारी, मेरी और मोदी जैसों की ही बनाई है और हमीं को ध्यान देना होगा इस तरफ।" मुनीश ने लिखा, "ये दुखद सत्य है कि अधिकाँश मुसलमान धर्मांध हैं, मुट्ठी भर लोग की पढ़े लिखे और प्रगतिवादी हैं। जब पाकिस्तान क्रिकेट मैच जीतता है तो वे खुशियाँ मनाते हैं"। यह भारत में ही हो सकता है जहाँ इस तरह के फोकलोर प्रचुरता से मशहूर हों, मुसलमान अशिक्षित है, मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा करता है, मुसलमान आतंकवादी है। इन्हीं के दम पर मुख्याधारा से इन्हें अलग रखिये, अपना न बनने दीजीये और "मुसलमान के घर कटार पर हिन्दू के यहाँ तो कुत्ते भगाने के लिये लाठी तक नहीं होती" के आग्रह पर कट्टरता को गाली देते हुये खुद कट्टर बन जाईये। मस्त देस है मेरा! जीवन से पहले धर्म आता है यहाँ। धुरविरोधी की तरह कहने को जी करता है कबीरः कितना दुर्बल धर्म हमारा एक पशु गन्दा कर जाता और एक पशु की खातिर ही भारत आपस में लड़ जाता इससे तो मैं भला नास्तिक, चादर ताने सो रिया गणपति बप्पा मोरिया। चलते चलतेः भारतीय और अतर्राष्ट्रीय सिनेमा पर एक नया ब्लॉग सिलेमा प्रशंसनीय है अगर पढ़ा न हो तो आज ही पढ़ें। Labels: debashish
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February 22, 2007 को प्रकाशित। लेखकः गिरिराज जोशी
1. चिट्ठाकार होने का मतलब क्या है? 2. जिन ताजा प्रविष्टियों की ख़बर प्रभू नारद नहीं दे पाते है, उनकी चर्चा कैसे की जाये? 3. यह पाँच-प्रश्नों का सिलसिला कब थमेगा? 4. क्या पाँच-प्रश्न सोये चिट्ठाकारों को जगाने में उपयोगी हो सकते है? 5. आपने आज का चिट्ठाचर्चा क्यों पढ़ा? अनुपजी ने उम्र का लिहाज किये बगैर अपनी फ़ुरसत को आमजन की फ़ुरसत समझकर आमजन को फ़ुरसत का भी फ़ुरसत से आनन्द नहीं लेने दिया। बेजीजी ने लम्बी पोस्ट लिखने का कष्ट शुरूआत में ही यह लिखकर जता दिया कि – “अनुपजी जवाब लिख रही हूँ” तो मैथिली जी घबरा गये। उन्हें लगा कि चिट्ठाजगत के चाचु गुस्से में आकर कहीं फिर से चोर-चोर का चक्कर ना चला दें इसलिए कहे उठे – “मेरे जवाब हाज़िर है”… यह माहामारी पानी के बताशे में भी मिक्स हो गई, इल्ज़ाम प्रत्यक्षाजी पर लगा... श्रीशजी घबराने लगे कि अब पंडितजी को तकनीकी ज्ञान छोड़कर इन बकवास प्रश्नों के जवाब देने पड़ेंगे।
हालांकि मौहल्लें में रहने वाले इसे पसंद नहीं करते मगर लोकमंच के लिए तो यह भी एक सच है। मगर मौसम और प्यार का जादू चलाकर प्रमेन्द्रजी पुनमजी को हौसला दिया तो उन्होनें वक्त को रोक लिया। जो कह ना सके वो मानवाधिकार की बाते करने लगे और कांतजी नयनों के चक्कर में नयनाभिमुख होकर कहते दिखे कि “वो नयनों में अपलक नयनों से ताकती थी”, अज़दक ने गिनाये ब्लॉग के फायदे और आशीष जी अपनी पोस्ट चोरी होने पर ढ़ोल-नगाड़े-ड्र्म और भी पता नही क्या-क्या बजाने लगे।
रितेश गुप्ताजी की भावनाओं को समझे बगैर गिरिन्द्र नाथा झाजी अपने अनुभवों से रीति-रिवाजों का किला तोड़ कर मुक्त होने की कोशिश में लगे रहे। अवधियाजी ने रामायण में पिनाक की कथा सुनाई, राजेशजी विश्व-कप क्रिकेट की समय सारणी बाई-मार्फत गुगलदेव लेकर हाजिर हुए, हरिरामजी “एड्स से बचाती हैं या बढ़ाती है- डिस्पोजेबल सीरिंज?” में खोये रहे और छायाचित्रकार फूलों की टोकरियों में मगर इन सबसे अलग गुरूदेव ने जो किया उसके लिए बाकि चिट्ठों की चर्चा को संक्षिप्तता में शीर्षक चर्चा बनाकर निकलना पड़ रहा है। मगर जाते-जाते मार्फत जीतु भाई से यह लिंक ले जाइये, काम आयेगा।
(नोट : गुरूदेव की पोस्ट को पढ़ने के बाद कल चर्चा विस्तार से करने को बाध्य हूँ इसलिए देर होने की प्रबल संभावनाएँ है, अब तक दिखी प्रविष्टियों की संक्षिप्त चर्चा तो कर चुका हूँ मगर कोशिश रहेगी की कल गुरूदेव की पोस्ट के साथ-साथ इनकी भी विस्तार से चर्चा की जाये) कल चर्चा विस्तार से की जायेगी, अवश्य पधारें।
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को प्रकाशित। लेखकः Jitendra Chaudhary
नमस्कार साथियों, मै आपका मित्र जीतेन्द्र चौधरी फिर से हाजिर हूँ, चिट्ठा चर्चा करने के लिए। अरे आप लोग सोचेंगे ये फिर आ गये, अभी रविवार को तो इसके झेला था, फिर पकाएगा? अरे का करें अपने शुकुल महाराज जो ना कराएं सो कम। एक दिन बोले, तो शनिवार की चर्चा, रविवार की रात तक करते हो, ये बात अच्छी नही। हम बोले महाराज तो कोई उपाय सुझाइए, बोले जाओ, तुम्हारा दिन बदल दिया, अब तुम बुधवार के चिट्ठों की चर्चा, गुरुवार को किया करोगे, इसके साथ ही फरमान टिका दिया, बिना रसीदी टिकट के। उल्टा पुल्टा करके कई बार पढा, समझ मे नही आया, लेकिन वो जो चैट पर कहा था, उसी के अनुसार प्रस्तुत है बुधवार के चिट्ठों की चर्चा। बुधवार दिनांक २१ फरवरी, २००७, के सारे चि्ट्ठेजब आज सुबह-सुबह अखबार उठाकर देखा तो बहुत हैरान परेशान हुआ, लेखिका अरुंधती राय का मन हिंसक हो गया, पढकर दु:ख हुआ, अगले शुक्रवार को चाँद निकलने का इन्तज़ार करें और हाथ मे हरा फीता बाँधे और नारद पर जाकर दुआ | |