मंगलवार, फ़रवरी 02, 2010

रायपुर की तवायफ़, सदी का महानालायक और काशी का गुंडा


घुंघरू टूट गये
राजकुमार सोनी के प्रोफ़ाइल से उनके बारे में सूचना जो मिली वह यह है:
जिस दिन दुनिया में आंखे खोली वह तारीख थी- 19 नवंबर। भिलाई इस्पात संयंत्र के कोकवन में काम करने वाले मजदूर पिता ने मुझे बेफिक्री से सोते हुए देखकर कहा-हमारी झोपड़ी में तो लाट साहब आ गया है। धीरे-धीरे नाम पड़ गया- राजकुमार।
आज की अपनी पोस्ट में राजकुमार ने रायपुर तवायफ़ों के बारे में जानकारी देते हुये पोस्ट लिखी तो मुझे अमृतलाल नागर की किताब ’ये कोठेवालियां’ याद आई और शरद कोकस को अपनी अधूरी कविता। शरद कोकास ने अपनी टिप्पणी देते हुये लिखा:
माय डियर राजकुमार , तुम्हारी इस पोस्ट का दूसरा भाग पड़ने से पहले तुमसे सम्वाद करने का लोभ नही संवरण कर पा रहा हूँ ..वह सिर्फ इसलिये कि तुमने एक ऐसे विषय पर कलम चलाई है जिसके लिये दुश्यंत कुमार ने लिखा है " लहूलुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो शरीफ लोग उठे दूर जाके बैठ गये " । मुझे याद है अस्सी के दशक में जब हम लोग रायपुर जाया करते थे तो बाबूलाल गली के मुहाने पर तवायफों को खड़े हुए देखा करते थे । बहुत हिम्मत करने के बावज़ूद भी कभी उस गली में उस तरह जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाये । इसी तरह उज्जैन के पिंजारवाड़ी इलाके में भी कभी मुजरे हुआ करते थे और भोपाल के लक्श्मी टाकीज़ वाले एरिया में भी । तुम्हारी यह पोस्ट उन तवायफों के प्रति करुणा उपजाती है जो पता नहीं आज कहाँ गुमनामी के अन्धेरे में खो चुकी हैं । मेरी एक कविता इसी विषय पर बहुत दिनों से अधूरी पड़ी है । पिछले दिनो कवि लीलाधर मंडलोई आये थे उन्होने वह कविता पढ़ी थी कहा कि इसे आगे क्यों नही बढ़ाते हो मै कुछ नही कह पाया था लेकिन आज तुम्हारी यह पोस्ट पढ़कर मैने अपनी वह अधूरी कविता निकाल ली है । तुम्हे इसके लिये धन्यवाद देता हूँ । अब फोन पर मुझे बर्दाश्त करने के लिये तैयार रहो क्योंकि अब तुम मेरे मोहल्ले मे तो रहते नहीं हो जो देर रात हम बतिया सकें ?


अब ऐसी पोस्ट को तो आप फ़ौरन से पेश्तर ही पढ़ना चाहेंगे न! तो बांचिये घुंघरू टूट गये का पहला भाग। ऊपर का फ़ोटो इसी ब्लॉग पोस्ट से है:

घुंघरू टूट गये
बुजुर्गों के मुताबिक ज्यादातर तवायफें इलाहाबाद के पास के एक गांव ‘चिलबिला’ से यहां आई थी। ‘नर्गिस’ की मां ‘जद्दन बाई’ इसी गांव की रहने वाली थी और यहां आने वाली ज्यादातर तवायफें उन्हीं के गांव की थी। जो तवायफें रायपुर में आ बसी थीं वे शरीर बेचने का धंधा नहीं करती थीं।
जिस्मफरोशी का यह धंधा बाबूलाल टाकीज (अब ध्वस्त) के बाजू से निकलने वाली एक गली में संचालित होता था। इस धंधे का संचालन जानकी बाई नामक एक दबंग महिला के हाथों में था। अब जानकी बाई कहां है इसकी जानकारी भी लोगों को नहीं है लेकिन बताते है कि जानकी बाई के ग्रुप से जुड़ी महिलाओं और तवायफ गली में नाच-गाकर पेट भरने वाली महिलाओं के बीच अक्सर झड़प की स्थिति बनते रहती थी। कारण साफ था, जिस्मफरोशी के धंधे से जुड़ी महिलाये जहां दिन भर में चार से पांच सौ रुपए कमाती थीं वहीं तवायफें शाम छह बजे से सुबह छह बजे तक चार से पांच हजार रुपये पीट लेती थी।


अमिताभ बच्चन को सदी का महानायक नाम से नवाजते हैं तमाम लोग। लेकिन रवीश कुमार उनको सदी का महानालायक बता रहे हैं। कारण देखने के लिये उनकी पोस्ट तक आना होगा। उनके इस बयान पर लोगों की सहमतियां/असहमतियां और सम्मतियां पठनीय हैं।

ज्ञानदत्त पांडेय जी और समीरलाल की पगली पर लिखी पोस्टों के बाद अब मनोज कुमार ने भी अपनी पगली पेश की है:
वह जो पेड़ तले पगली झुमरी लेटी है
किसी भले घर की बेटी है
और उधर धूप में जो बच्चा लेटा है
उसका नाजायज़ बेटा है
किसी इंसान के फरिश्ते ने उसे छला था
तभी तो उसकी कोख में वह नौ महीने पला था
इज़्ज़त के साथ-साथ
मानसिक संतुलन खो चुकी है
निकलती नहीं , अधरों में जो सांसें रुकी हैं


विवेक रस्तोगी का कथन ही पूरी पोस्ट की कहानी कह देता है:
क्यों हमारा मन अशांत होता है जब कोई अपना हमसे रुठ जाता है… एक विश्लेषण… क्यों हमारी कार्य क्षमता अपने आप खत्म हो जाती है…


इसी तरह अनिल पुसदकर भी तो हैं। पूरी पोस्ट शीर्षक में लिखकर फ़िर उसका भाष्य लिखते हैं:ब्लागर मीट के बाद पता चला कि पार्क मे बैठ कर मूंगफ़ली और चना खाने वाले ही ईमानदार होते हैं,और समोसा उससे तो अब नफ़रत हो गई है!

संजीत त्रिपाठी का सवाल लगता है अभी और आगे जायेगा-ब्लॉग लिखना है तो इसलिए लिखना है कि अपना लिखा सुरक्षित हो सके लेकिन वहीं ब्लॉग के बारे में अवधारणा ऐसी कि "इसके बहाने प्रतिक्रियावादियों की जमात खड़ी की जा रही है"!

सैकड़ों वर्ष पहले के इंजीनियर ही बेहतर थे उन्मुक्तजी की यह बात सुनने और समझने के पहले की शर्त भी पढ़ लीजियेगा:
‘Please switch off proper English check programme installed in your brain.’
कृपया, अपने मस्तिष्क में अंग्रेजी चेक करने वाले प्रोग्राम को बन्द कर दें।


अदा के प्रोफ़ाइल मे मुताबिक तो उनके पास कुछ खास नहीं है कहने को लेकिन वे आज जो कह रही हैं वह तो खास लगता है:

अदा
पहुँचेंगे शिखर पर वो
जिन्हें विश्वास होता है

सच्चा प्रेम मिल जाए
फिर मधुमास होता है

सुधि सा जो साथी हो
जीवन ख़ास होता है


शब्दों के सफ़र में आजका विषय है-ग्रैमी, फोनाफोनी और भुनभुनाना इसमें अजित भाई ग्रामोफ़ोन, फोनोफ़ोन के बारे में बताते हुये ग्रैमी अवार्ड तक जाते हैं:
लोकप्रिय संगीत के विश्वस्तरीय सम्मान को आज ग्रैमी अवार्ड्स के नाम से जाना जाता है। ग्रैमी अवार्ड्स की स्थापना अमेरिका की द नेशनल ऐकेडमी ऑफ रिकॉर्डिंग आर्टस् एंड साइंसेज़ ने 1957 में की थी जिसका उद्धेश्य संगीतकारों और रिकार्डिस्टों को संगीत के सुरीले सफर में उनके योगदान के लिए पुरस्कृत करना था। पुरस्कार का नाम चुनने के लिए ग्रामोफोन के ग्राम से ही ग्रैमी शब्द चुना गया। दरअसल इसके मूल में अमेरिकन एकेडमी ऑफ टेलीविज़न आर्ट्स एंड्स साइंसेज द्वारा स्थापित एम्मी अवार्ड से नाम साम्य बैठाना था। इस अवार्ड के रूप में जो पदक दिया जाता है उसमें ग्रामोफोन की रूपकृति ही है।


और अंत में


फ़िलहाल इतना ही। चलते-चलते जयशंकर प्रसाद की कहानी गुंडा का यह अंश देखिये:
दूर से बोधीसिंह का बाजा बजता हुआ आ रहा था। नन्हकू सिंह ने पूछा-”यह किसकी बारात है?”

“ठाकुर बोधी सिंह के लड़के की।” -मन्नू के इतना कहते ही नन्हकू के ओठ फड़कने लगे। उसने कहा-”मन्नू! यह नहीं हो सकता। आज इधर से बारात न जायेगी। बोधीसिंह हमसे निपटकर तब बारात इधर से जा सकेंगे।”

मन्नू ने कहा-” तब मालिक, मैं क्या करूं?”

नन्हकू गंड़ासा कंधे पर से और ऊंचा करके मलूकी से बोला-” मलुकिया देखता है, अभी जा ठाकुर से कह दे कि बाबू नन्हकू सिंह आज यहीं लगाने के लिये खड़े हैं।
समझकर आवें, लड़के की बारात है।” मलुकिया कांपता हुआ ठाकुर बोधीसिंह के पास गया। बोधीसिंह और नन्हकू में पांच वर्ष से सामना नहीं हुआ था। किसी दिन नाल पर कुछ बातों में ही कहा-सुनी होकर, बीच-बचाव हो गया था। फिर सामना नहीं हो सका। आज नन्हकू जान पर खेलकर अकेले खड़ा है। बोधीसिंह भी उस आन को समझते थे। उन्होंने मलूकी से कहा-” जा बे, कह दे कि हमको क्या मालूम कि बाबू साहब वहां खड़े हैं। जब वह हैं ही, तो दो समधी जाने का क्या काम है।”बोधी सिंह लौट गये और मलूकी के कंधे पर तोड़ा लदवाकर बाजे के आगे नन्हकू सिंह बारात लेकर गये। ब्याह में जो कुछ लगा खर्च किया। ब्याह करा कर तब, दूसरे दिन इसी दुकान तक आकर रुक गये। लड़के को और उसकी बारात को उसके घर भेज दिया।


दो सौ, तीन सौ साल पहले की दुश्मनी निभाने के अंदाज को पढ़ने के बाद आजकल के लोगों के भले मनुष्यों के व्यवहार और भाईचारे की भावना पर बलि-बलि जाने वालों की हरकतें देखता हूं तो लगता है कि हमसे शायद गुंडा ही भला। भले आदमी जो बात-बात भाई चारे की बीन बनाते हैं, रामायण और गीता से श्लोक चौपाई लाकर धर पटकते हैं वे इन भाईचारा बढ़ाने वाली हरकतों में शामिल हैं या मौन समर्थन दे रहे हैं तो बरबस परसाईजी की बात याद आती है-- इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं,पर वे सियारों की बरात में बैंड बजाते हैं.

आपका दिन शुभ हो। मंगलमय हो।

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23 टिप्‍पणियां:

  1. अरे हमारे बहुत सारे लिंक छूटे थे धन्यवाद

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  2. सुबह का नाश्ता और उसमे गरमागरम समोसे,वाह वैसा ही मज़ा आता है आपकी चर्चा मे।और एक खास बात और है इससे अपच भी नही होता।हा हा हा हा हा।

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  3. गुंडा कहानी का यह अंश अंगुलि-निर्देश कर रहा है ...चलते-चलते कही गयी यह बात ज्यादा ठहर कर सोचने की है ।

    चर्चा सारगर्भित रही । आभार ।

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  4. मॉडरेशन क्यों ? जो हो चुका है इस मंच पर, उससे ज्यादा क्या होगा ?

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  5. हमसे शायद गुंडा ही भला। भले आदमी जो बात-बात भाई चारे की बीन बनाते हैं, रामायण और गीता से श्लोक चौपाई लाकर धर पटकते हैं वे इन भाईचारा बढ़ाने वाली हरकतों में शामिल हैं या मौन समर्थन दे रहे हैं


    कहां जय शंकर प्रसाद के ज़माने के गुंडे और कहां ...... चर्चा सही हैं पर वही हैं , आगे बढ़े और नये आयाम तलाशे आज के ज़माने मे जय शंकर प्रसाद और पारसाई के पात्रो को ना खोजे जिन्दगी के मेलो मे भिन्न भिन्न प्रकृति के लोग मिलते हैं पीढियां बदलती हैं और उनके साथ सबका अपना अपना अपना भोग हुआ यथार्थ होता हैं । सबके घर साफ़ हो ये संभव नहीं । जिन घरो मे सुख शांति नहीं होती वहाँ कि टंकार दूर तक जाती हैं और बहुत बार दूसरे घरो कि शांति को भंग करती हैं । अपाकाए घर का दरवाजा बंद हैं या खुला ज़रा देख ले , सनेध मारो कि कमी नहीं हैं और ये ना समझे आप ठगु कि नगरी मे रहते हैं इस लिये कोई आप को नहीं ठग सकता ।

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  6. बढ़िया चर्चा.

    कहते हैं जयशंकर प्रसाद के लेखन को समझना आसान नहीं है.....:-)

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  7. सुंदर, सार्थक और सटीक शब्दों के साथ एक बहुत अच्छी चर्चा।

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  8. आप्लावित और अभिभूत !
    'गुंडा' में सार-संक्षेप !!
    सारगर्भित चर्चा !!!
    आभार ,,,

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  9. हमको लगा कि मोडरेशन की गुंडई देखूंगा पर ... !...
    देख रहा हूँ कि आपने पोस्ट से मोडरेशन की करधनी खसका दी है ! ... औरौ आभार ,,,

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  10. बहुत बेहतरीन और सुन्दर चर्चा।बहुत बढ़िया पोस्टो का चयन किया है।आभार।

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  11. अच्छी पोस्ट आ रही हैं, यानि हिन्दी ब्लॉगिंग की मसें फूटने लगी है !
    सँक्षिप्त किन्तु उत्कृष्ट चर्चा !
    ____________________________________________
    मॉडरेशन क्यों ? जो हो चुका है इस मंच पर, उससे ज्यादा क्या होगा ?
    ( आभार : हिमाँशु पाँडेय )

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  12. जितनी शानदार चर्चा उतने ही शानदार लिंक्स भी.

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  13. बढ़िया चर्चा है । राजकुमार सोनी की यह पोस्ट तो अध्भुत है ।

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  14. लाजवाब.....जबरदस्त.....चर्चा....!!!
    प्रासंगिक कथा....

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  15. आभारी हूँ आपने इस योग्य समझा...
    अच्छी चर्चा...

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  16. मन प्रसन्न करने वाली चर्चा !.


    अब
    तक
    इसी
    को
    जांच
    रहे
    हैं - "इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं,पर वे सियारों की बरात में बैंड बजाते हैं."

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  17. सुंदर; सार्थक एवं सटीक चर्चा।

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  18. मुन्ना खालिदमार्च 23, 2014 12:18 pm

    सुंदर, सार्थक एवं सटीक चर्चा।

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