रविवार, फ़रवरी 07, 2010

टू कमेंट ऑर नॉट टू कमेंट?

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पिछला पूरा हफ्ता टिप्पणीमय रहा. जो भाई लोग हिन्दी ब्लॉग जगत में चल रहे जूतम पैजार को लेकर गाहे बगाहे घोर चिंता में जीने लगते हैं, उन्हें दुनिया के दूसरे हिस्से में क्या कैसा चल रहा है इसका अंदाजा संभवत: नहीं होता होगा, नहीं तो उनकी चिंता सिरे से काफ़ूर हो जाती. हिन्दी ब्लॉग जगत् अभी उन गहराइयों में नहीं पहुँचा है, पर तैयारी पूरी है और आने वाले समय में पोस्टों-टिप्पणियों में पतन की घोर, अनंत गहराईयाँ नापी जाएंगी ये भी तय है.

हाल ही में अंग्रेज़ी की एक अत्यंत लोकप्रिय ब्लॉग साइट एंगजेट ने अपने ब्लॉग से टिप्पणी की सुविधा बंद कर दी. इसका कारण गिनाते हुए बताया गया कि लोग बाग वहाँ भद्दे, अत्यंत निम्न स्तरीय, मुद्देहीन, व्यक्तिगत, छिछोरी टिप्पणियाँ किए जा रहे थे. एंगजेट ने ये भी बताया कि टिप्पणियों में हिस्सेदारी उनके पाठक वर्ग का एक अत्यंत छोटा हिस्सा ही लेता रहा था और गंदी टिप्पणियाँ करने वाले लोगों की संख्या और भी कम थी, मगर उनके कारण मामला सड़ता जा रहा था, और मॉडरेशन जैसा हथियार भी काम नहीं आ पा रहा था.

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दूसरी तरफ इधर, जॉन ग्रबर का एक ब्लॉग है डैरिंग फायरबाल. इस ब्लॉग में टिप्पणी सुविधा नहीं है. तो भाई लोगों ने क्या किया? डैरिंग फायरबाल का एक मिरर ब्लॉग - डैरिंग फायरबाल विथ कमेंट्स - टिप्पणी सुविधा युक्त बना कर टांग दिया!

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मूल ब्लॉग में टिप्पणी की सुविधा न हो अपनी बला से! हम तो टिप्पणी लिख मारेंगे, उसके ब्लॉग का प्रतिरूप बना कर! है न वाकई नायाब, आउट ऑफ द बॉक्स थिंकिंग? हाल ही में कुमारेंद्र सिंह सेंगर ने अपने ब्लॉग में टिप्पणी सुविधा बंद कर दी. भले ही आपने वहाँ, जब सुविधा चालू थी, टिप्पणी करने में कंजूसी बरती हो, मगर जब से यह सुविधा वहाँ बंद की गई है, खुजली तो मच रही होगी वहाँ टिप्पणी मारने को? तो चलिए, उनका एक मिरर ब्लॉग बनाते हैं – आखिर, बिना टिप्पणी के ब्लॉग भी कोई ब्लॉग होता है भला?

लिखते – लिखते :
पता चला कि अदा ने  अपने ब्लॉग में टिप्पणी सुविधा बंद कर फिर से चालू कर दी है. उनका कहना है –

कभी लगे यूँ बस प्रेयसी का प्यार है टिप्पणी

तथा,

भोली ना समझियो इसको खूंखार है टिप्पणी

एनी कमेंट?
---
(ऊपर का चित्र – साभार, एंगजेट)

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28 टिप्‍पणियां:

  1. टिपण्णी बंद कर दी तो ब्लॉग और अखबार में क्या फर्क है? ब्लॉग है ही सीधा वार्तालाप....

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  2. टिप्पणीयों का रास्ता बंद करने के मामले में मेरा मानना है कि कभी कभी जब रैली वगैरह निकलती है, जूलूस वगैरह निकलता है तो सडक को वन वे कर दिया जाता है। उसी तरह से टिप्पणी वाले मामले में भी जब भद्दे कमेंट आने लगें, ज्यादा बेतुकी बातें होने लगें तो थोडी देर के लिये रैली मान कर टिप्पणी ट्रैफिक वन वे कर देना चाहिये।

    जिसको टिप्पणीयों के जरिये मूल लेखक तक बात पहुंचानी हो, वह मेल वाले दूसरे रास्ते का उपयोग कर सकता है। लेकिन ज्यादा देर तक वन वे रहना ठीक नहीं है। सडक का पूरा लाभ नहीं हो पाता।

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  3. अब तो आपको पता चल ही गया होगा कि अदा ने टिप्पणी विकल्प क्यों बंद किया और फिर चालू किया -
    उनके सलाहकारों में कुछ पुरवैया हैं -सतीश जी नंबर एक पर हैं!

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  4. भी तो टिप्पणी का नशा जोर पर है उतरेगा तो देख लेंगे । मगर लगता है कि आने वाला समय ठीक नहीं।

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  5. हिन्दी ब्लाग के विकास का अपना मार्ग है। जैसा भी है विकसित हो रहा है। चाहे लड़ाई-भिड़ाई के जरीए ही सही।

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  6. हिंदी ब्लोग्स पर ज्यादातर टिप्पणियाँ सिर्फ फोर्मेल्टी होती है जो सिर्फ गिनती ही बढ़ाने का कार्य करती है सही व काम की टिप्पणियाँ बहुत कम ही आती है हाँ इतना जरुर है ये फोर्मेल्टी टिप्पणियाँ लिखने के लिए प्रोत्साहित जरुर करती है |
    मेरे ब्लॉग पर ६०%पाठक गूगल खोज के द्वारा पहुँचते है और उनमे से कोई तभी टिप्पणी करता है जब उन्हें कोई प्रश्न करना हो और यदि ब्लॉग पर आपका फ़ोन न. उपलब्ध हो तो ऐसे पाठक टिप्पणी के बजाय सीधा फोन पर ही संपर्क करना पसंद करते है |

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  7. अरे, समीरलाल कैसे मिस कर गये ये पोस्ट!?

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  8. अगर आते हों तो जरूर बतायें कि टिप्पणी ऑप्शन बन्द करने पर क्या मत है उनका।

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  9. मैं सुबह से सोच रह हूँ टू कमेंट और नौट टू कमेंट?
    पर यह कहना चाहता हूँ कि अगर पोस्ट के ज़रिये आप अपनी बात सुना रहे हैं तो हमारी भी सुनिए न! रही बात औपचारिकता की तो मैं अपनी बता सकता हूँ। मैं भी ख़ूब औपचारिक टिप्प्णियाँ करता हूँ। कई कारण हैं -
    १. मैंने आपका पोस्ट पढा यह बताने के लिये।
    २. अच्छा लगा यह बताने के लिये।
    ३. कुछ खास नहीं था, मेरे हिसाब से।
    ४. मैं विवाद में नहीं पड़ना चाहता।
    ५. और सबसे अहम कि मैं सरकारी कर्मचारी हूँ, और उसके आचरण संहिता से बंधा हूँ, अत: कुछ विशेष विषय जैसे राजनीति आदि पर अपने विचार सार्वजनिक तौर पर नहीं रख सकता।

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  10. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  11. सरकारी कर्मचारी तो मैं भी हूँ। ...लगता है कुछ ध्यान रखना पड़ेगा। :)

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  12. chalo hato....baap re re baap.....bhago-bhago... ham yahaan nahin tipiyaayenge yahaan pe.....!!

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  13. आदरणीय महोदय, यह सवाल गैर वाज़िब है ।
    कोई भले ही न माने, टिप्पणियों का कोई विकल्प नहीं !
    रही बात ई-मेल या फोन से टिप्पणी करने की, तो वह गैर-वाज़िब है,
    क्योंकि यह विकल्प अन्य पाठकों को प्रतिक्रियास्वरूप हुये विचार विनिमय में सहभागिता और समाधान से वँचित कर रहा होता है ।
    हिन्दी ब्लॉगिंग यदि अपने शैशव पर ही टिकी है, और ब्लॉग-सँख़्या बढ़ने के साथ ही परिपक्वता का स्थान उन्मुक्तता ने ले लिया है,
    तो ऎसे ’ रिटार्डेड या डिफ़ॉर्मेटेड ग्रोथ ’ पर क्या नज़र रखने की ज़रूरत नहीं है ?
    यदि इससे आँखें मूँद लें तो हमारा बौनापन ( मैं दोहराऊँगा बौनापन ! ) अपने स्थान पर ही स्थिर होकर रह जायेगा !
    टिप्प्णी विकल्प बनाये रखना इस जाँच-परख का स्टेथोस्कोप है ।
    यदि यह विकल्प मॉडरेशन-वीज़ा के सँरक्षण में है, तो यह भी उचित नहीं !
    सँवाद का खुलापन इसमें आख़िर कहाँ जाकर ठहरता है ?
    सँवाद के विकल्प सीमित या सुविधाप्रद रखे जाने की वज़ह से हिन्दी साहित्य का नाश हो गया,
    अधिकाँश स्वनामधन्य रचनाकार एक दूसरे की चरचा करते रहने में ही खरचा हो गये ।
    वे अपनी ऊर्ज़ा परस्पर वाहवाहियाँ और सम्मान ’ मैनिपुलेट ’ करने में ही जाया कर गये ।
    उनसे कोई सीख न लेकर, ब्लॉगमँच पर हम भी तो यही करने जा रहे हैं, बल्कि कर भी रहे हैं !

    अब बात जा टिकती है, अशोभनीय और भड़काऊ एवँ अस्वस्थ टिप्पणियों पर.. मेरे ख़्याल से यह हमेशा बनी रहेगी ।
    ऎसी टिप्पणियाँ अपने आप में एक प्रवृत्ति समेट कर चलती हैं । इन्हें देख कर एक डॉक्टर होने के तौर पर मुझे हर्ष ही होता है,
    यह अपने को कम से कम ज़ाहिर तो कर रहीं हैं ? इनके खेमों और बढ़ते और घटते प्रतिशत को हम चिन्हित कर पायें, तभी निदान के कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकेंगे ।
    मैं स्वीकारता हूँ कि यह ज़ूतमपैज़ार अस्वस्थता का प्रतीक है, पर कमोबेश यह हमेशा बना रहेगा और इसे उपस्थित रहना भी चाहिये ।
    यह हमारी अपरिपक्वता ही है, कि ज़ूते चलाने वाली मनोस्थिति पर दिमाग खपाने के बजाय हम ज़ूते की टी.आर.पी. बढ़ाने में जुट जाते हैं ।
    दलील यह है कि स्वाँतः सुखाय और मौज़ मज़े के माहौल में इसकी अपेक्षा ही न करें । जो चल रहा है.. चलने दीजिये भले ही वह ज़ूता ही हो,
    आख़िर कुछ चल तो रहा है क्योंकि चलना और चलते रहना जीवँतता का प्रतीक है । ( यहाँ स्माईली का एक डिस्क्लेमर भी लगाऊँ ? )
    विज्ञान के नियमों के अनुसार हर क्रिया के अस्तित्व के साथ प्रतिक्रिया अवश्य जुड़ी होती है, और टिप्पणियों में अस्वस्थता भले ही मौज़ूद हो पर इसे अच्छे स्वास्थ्य का निगेटिव पोल मान लीजिये । पूर्ण निरोगी काया या पूर्ण स्वस्थ समाज एक ’ यूटोपिक’ सोच भर है.. इससे आँख मूँदने को टिप्पणियों की उपादेयता पर प्रश्नचिन्ह स्वयँ में ही एक प्रश्न है ।
    सादर !

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  14. राजनीति, धर्म व अपने रोजगारदाता संबंधित विषयों पर टिप्पणी से तो मैं भी बचता हूँ

    अपने प्रिंट मीडिया वाले ब्लॉग पर टिप्पणी सुविधा एक बार बंद कर चुका हूँ, किन्तु पुन: आरंभ करनी पड़ी :-)

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  15. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  16. चिट्ठा चाहे हिन्दी का हो या अंग्रेजी का, टिप्पणी-नीति जरूरत के अनुसार तय करना होगा.

    सस्नेह -- शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.IndianCoins.Org

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  17. इसी बहाने टिप्पणियों पर मजेदार कमेंट पढ़ने को मिल गये। डा.अमर कुमार की टिप्पणी से बहुत हद तक सहमत।

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  18. आदरणीय,
    जहाँ तक मेरा मत है, ब्लोगिंग का मुख्य उद्देश्य है आपके विचार आपकी आवाज़ दूसरो तक पहुचना और उस पर उचित प्रतिक्रिया (टिप्पणी ) प्राप्त करना ! अब ये टिप्पणी हमारी आवाज़ में मिली हुई आवाज़ भी हो सकती है या फिर सही तरीके से उचित शब्दों में हमारे खिलाफ कोई आवाज़ भी हो सकती है ! क्योकि हर समय हम ही पूरी तरह से सही हो ये जरुरी नहीं ! बल्कि सही भावना से की गई समीक्षा उन्नतलेखन को तो बढावा देती है ! विषय का सही प्रारूप भी प्रस्तुत करते है
    किन्तु विडन्मबना यह है, की आज कल कुछ ब्लोगोर्स टिप्पणियों को प्रेस्टीज पॉइंट बना कर टिप्पणियों पर ही राजनीति कने लगे है ! जोकि ब्लोगिंग के भविष्य के लिए घातक है ! वरना टिप्पणी की महत्ता को कम नहीं समझा जासकता !!
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

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  19. डॉ. अमर की बातों से सहमत हूँ...
    टिपण्णी आप्शन बंद करके मैंने एक पल के लिए पलायन का ही बोध करवाया था शायद....
    लेकिन ऐसा नहीं था ..यह विरोध था मेरा उनलोगों के लिए जो बार-बार यह जताते रहे कि टिप्पणी करके वो मुसीबत मोल ले रहे हैं...न जाने कितनी जगह यही पढने को मिला कि अब टिप्पणी करने में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए...अपने वकील कि सलाह से ही टिप्पणी करनी चाहिए....मेरा टिप्पणी आप्शन बंद करना इस बात का विरोध था....
    कुछ बातें उनके लिए जो कुछ भी अनाप-शनाप लिख देते हैं....

    ललकारो मुझे, मैं चुप रहूँगा
    तुम कोंचो मुझे, मैं चुप रहूँगा
    तुम थूरो मुझे, मैं चुप रहूँगा
    तुम हूरो मुझे, मैं चुप रहूँगा
    लेकिन.....
    तुम शांत हो गए तो, ध्येय खो जाएगा
    और मेरा चुप रहना, निष्फल हो जाएगा.....

    ब्लागगिंग में टिप्पणी का महत्व नकारा ही नहीं जा सकता है..
    हम भाषा की मर्यादा पर चाहे जितना भी भाषण दे लेवें....जिसे जो लिखना होता है वो टिप्पणी क्यूँ पूरी पोस्ट ही अभद्र लिख जाता है...
    यह तो अपना-अपना व्यक्तित्व है...अपनी-अपनी सोच है...
    मुझे अच्छी पोस्ट पर अच्छी टिप्पणी करना पसंद है...बल्कि अगर पोस्ट बहुत अच्छी है तो अच्छी टिप्पणी खुद ब खुद हो ही जाती है .....
    मेरी कोशिश रहती है की मैं लेखक/लेखिका को यह महसूस कराऊँ कि उसने जो मेहनत की है वह जाया नहीं गयी है...उसके सृजन की ख़ुशी में मैं उसके साथ हूँ...
    कई baar ...गलतियों की ओर भी इंगित किया है...लेकिन भाषा की गरिमा बनाये रखते हुए....
    इसलिए मेरा यही मानना है....बेशक दो-चार टिप्पणी ही करें लेकिन स्वस्थ टिप्पणी हो...

    उत्तर देंहटाएं
  20. डॉ. अमर की बातों से सहमत हूँ...
    टिपण्णी आप्शन बंद करके मैंने एक पल के लिए पलायन का ही बोध करवाया था शायद....लेकिन ऐसा नहीं था ..यह विरोध था मेरा उनलोगों के लिए जो बार-बार यह जताते रहे कि टिप्पणी करके वो मुसीबत मोल ले रहे हैं...न जाने कितनी जगह यही पढने को मिला कि अब टिप्पणी करने में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए...अपने वकीलकि सलाह से ही टिप्पणी करनी चाहिए....मेरा टिप्पणी आप्शन बंद करना इस बात का विरोध था....
    कुछ बातें उनके लिए जो कुछ भी अनाप-शनाप लिख देते हैं....
    ललकारो मुझे, मैं चुप रहूँगा
    तुम कोंचो मुझे, मैं चुप रहूँगा
    तुम थूरो मुझे, मैं चुप रहूँगा
    तुम हूरो मुझे, मैं चुप रहूँगा
    लेकिन.....
    तुम शांत हो गए तो, ध्येय खो जाएगा
    और मेरा चुप रहना, निष्फल हो जाएगा.....

    ब्लागगिंग में टिप्पणी का महत्व नकारा ही नहीं जा सकता है..
    हम भाषा की मर्यादा पर चाहे जितना भी भाषण दे लेवें....जिसे जो लिखना होता है वो टिप्पणी क्यूँ पूरी पोस्ट ही अभद्र लिख जाता है...
    यह तो अपना-अपना व्यक्तित्व है...अपनी-अपनी सोच है...
    मुझे अच्छी पोस्ट पर अच्छी टिप्पणी करना पसंद है...बल्कि अगर पोस्ट बहुत अच्छी है तो अच्छी टिप्पणी खुद ब खुद हो ही जाती है .....
    मेरी कोशिश रहती है की मैं लेखक/लेखिका को यह महसूस कराऊँ कि उसने जो मेहनत कि है वह जाया नहीं गयी है...उसके सृजन की ख़ुशी में मैं उसके साथ हूँ...
    कई बात ...गलतियों कि ओर भी इंगित किया है...लेकिन भाषा की गरिमा बनाये रखते हुए....
    इसलिए मेरा यही मानना है....बेशक दो-चार टिप्पणी ही करें लेकिन स्वस्थ टिप्पणी हो...

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  21. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  22. टिप्पणी यदि बंद है तो ब्लॉगिंग कैसी ?

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  23. टिप्पणी यदि बंद है तो ब्लॉगिंग कैसी ?

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