बुधवार, फ़रवरी 03, 2010

.....कभी जर्रा तो लगता कभी खुदा हूँ

कल अवधी कवि रमईकाका की जन्मतिथि थी। इस मौके पर उनको याद करते हुये अमरेन्द्र ने उनकी कविता प्रस्तुत की। इस कविता में धरती के प्रति प्यार दिखाया गया है:

अमरेन्द्र
धरती हमारि ! धरती हमारि !

है धरती परती गउवन कै औ ख्यातन कै धरती हमारि |

धरती हमारि ! धरती हमारि !

हम अपनी छाती के बल से धरती मा फारु चलाइत है |

माटी के नान्हें कन - कन मा , हमही सोना उपजाइत है ||

अपने लोनखरे पसीना ते ,रेती मा ख्यात बनावा हम |

मुरदा माटी जिन्दा होइगै,जहँ लोहखर अपन छुवावा हम ||
कँकरील उसर बीजर परती,धरती भुड़गरि नींबरि जरजरि |
बसि हमरे पौरख के बल ते,होइगै हरियरि दनगरि बलगरि ||
हम तरक सहित स्याया सिरजा , सो धरती है हमका पियारि ...
धरती हमारि ! धरती हमारि !


आजकल ब्लॉगिंग में बात-बात पर अदालत आ जाती है। इस पर अपनी बात रखते हुये संजय बेंगाणी लिखते हैं-ओ रे बन्धू मत लिखियो ब्लॉग अपनी बात कहते हुये वे लिखते हैं:
आश्चर्य होता है, क्या ब्लॉगिंग में इतने गम्भीर मसले हैं जो आपस में ई-मेल से न सुलझ, मुकदमों के सहारे सुलझाने पड़े. यह अपने ही हाथों, अपने हाथ आए हथियार (ब्लॉगिंग) को खत्म करने जैसा है
इस पोस्ट की टिप्पणियों में साथी लोगों ने अपनी बात कही है।

फटा पोस्टर निकला हीरो.. में कुश ने कुछ पिक्चरों के डायलाग दोहराये हैं। मां, पिता, डाक्टर आदि के कुछ रूटीन संवाद देखिये!

ज्ञानजी इस पोस्ट पर कुल तेरह टिप्पणियां हैं उनमें से पांच यह कहती हैं कि पोस्ट समझ नहीं आई! आप देखिये शायद आपको समझ आ जाये।

चैन्नई में तीन हिन्दी ब्लॉगरों की मुलाकात.. साधक उम्मेद सिंह जी और पीडी से हुई बातों का ब्योरा..


कथाकारों ने वर्धा में विभूति के प्रयासों की सराहना की यह रपट है कथाकार सूरज प्रकाश जी की।

हैप्पी अभिनंदन में निर्मला कपिला का साक्षात्कार पढिये। वे कहती हैं:

निर्मला कपिला
मुझे कुछ पता नहीं कि मैं क्या हूँ
कभी जर्रा तो लगता कभी खुदा हूँ

फुरसत मिली ही नहीं अपनी तलाश की
कभी इधर कभी उधर भटकती सदा हूँ

कभी सर्दियाँ मिली तो कभी तल्खियाँ
पतझड बसंतों का सिलसिला हूँ


ब्लॉगिंग के कुछ फ़ार्मूले भी देख लीजिये फ़िर से।

इन्ही के लिए सब इतना हलकान है??? में शिवकुमार मिश्र अपने पाकिस्तान प्रेम को नये आयाम देते हैं!

ब्लॉगगढ़ में आ गया गब्बर का बाप...खुशदीप पढ़कर तो यही लगता है कि खुशदीपजी गब्बरजी के पिताश्री हैं।

क्यों नहीं लिखतीं महिलाएं व्यंग्य? में देखिये सवाल-जबाब!

खिचड़ी पोस्ट तो अभय को चिट्ठाचर्चा पर लिखनी चाहिये थी!

बालकिशन आ ही गये कविता लेकर
भाई-चारा से चारा निकाल
फिर उसमें थोड़ी मिर्च डाल
अब खाकर थोड़ा मुंह बिचका
औ कर ले भाई से भिड़ंत
ब्लॉगर का धाँसू हो बसंत

कह ले चाहे परिवार इसे
चाहे कह रिश्तेदार इसे
जब बात लगे कोई भी बुरी
गाली-फक्कड़ दे दे तुरंत
ब्लॉगर का धाँसू हो बसंत


राम रसोई हुई मुखर…| में खदर-पदर कविता के साथ संवाद भी चालू आहे।



चलते-चलते

ज्ञानजी की पोस्ट पर यह टिप्पणी देखें जो मैं आपसे भी कहना चाहता हूं
बाबा समीरानन्द जी ने अनूप जी का बाजा बजा दिया और अब अगला नम्बर आपका ही है।

कवि यहां जो कहना चाहता है वह आपने अनुवाद करके बता दिया है। बाबा समीरानन्द बाजा बजाने का काम करते हैं। वे अपनी सेवायें अनूप जी को प्रदान कर चुके हैं और अब आगे मसिजीवी को अपनी सेवायें देने के लिये कमर कस चुके हैं।

इस पोस्ट का मंतव्य मुझे अच्छी तरह से समझ में आ रहा है। व्याख्याकार ज्ञानजी इशारे-इशारे में इस बात/ पृवत्ति की निन्दा कर रहे हैं कि लोग इस तरह बाजा बजाने की बात करते हैं।

ज्ञानजी समझदार हैं! अन्य साधुवादियों के तरह वे अच्छे-बुरे (सूचना और धमकी) के प्रति समान नजर रखते हैं। समदर्शी नजरिया है इसलिये मसिजीवी की पोस्ट पर भी very nice लिखते हैं और मसिजीवी को अदालती धमकी देने वाली पोस्ट पर भी very nice!

इस पोस्ट से इस बात की पुष्टि होती है कि ज्ञान जी के अंदर एक खिलंदड़ा बालक भी मौजूद है जो बेवकूफ़ी की बातों की खिल्ली उडा़ना जानता है। लेकिन बालक को यह एहसास नहीं है कि उसकी टिप्पणियों को जो दूसरे देखेंगे वे यह नहीं समझ पायेंगे कि ज्ञानजी की बात का असल मतलब क्या है। आपका very nice का मतलब वहां डिक्शनरी वाला ही निकाला जायेगा। (---बहुत अच्छा किया जी आपने मसिजीवी का इलाज तो करना ही चाहिये)

मैं तो बहुत अच्छी तरह समझता हूं कि आपके मंतव्य ऐसे कतई नहीं हैं। आप इस सब प्रवृत्तियों के खिलाफ़ हैं लेकिन आम जनता आपकी टिप्पणियों से यही समझेगी। आपके हाथ में ऐसी कोई ताकत नहीं है कि आप अपने दोनों very nice को हायपर लिंक से अपने मन तक पहुंचा दें और लोग आपके कहे का असल मतलब समझ लें।

मेरी अपनी समझ है कि अगर हम किसी बात को सही और गलत को समझ सकने में सक्षम हैं तो सही के साथ स्पष्ट रूप से खड़े होने का प्रयास करें। अगर सही के साथ खड़े होने की हिम्मत न जुटा सकें तो कम से कम ऐसे तो न खड़े हों कि गलत भी अपने समर्थकों में हमको शामिल कर ले।
सही को सही न कह सकें तो कम से कम ऐसा तो कुछ न कहें कि जिससे यह लगे कि गलत को आप सही ठहरा हैं।

यह बात इसलिये कही क्योंकि आपने पूछा था। आपकी पोस्ट समझने में मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। सुन्दर, सामयिक पोस्ट! :)



फ़िलहाल इतना ही। बकिया फ़िर कभी। आपका दिन शुभ हो!

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16 टिप्‍पणियां:

  1. अनूप जी कल बहुत से ब्लाग नही पढ पाई थी खास कर अमरेन्द्र जी को आज पढूँगी धन्यवाद मेरी पोस्ट को शामिल करने के लिये ।

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  2. अमरेन्द्र हिन्दी/अवधी ब्लॉगिंग के लिये उभरता सितारा है।

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  3. आज तो बहुत सस्ते में निपटा दी चिट्ठा चर्चा!

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  4. जिन्हें कुछ समझने मं असमर्थता हो रही है, वे केवल एक बात समझ लें कि

    कुछ विशेष व्यक्तियों के ब्लॉग या पोस्ट पर बेनामी/ अनामी/ बेप्रोफाईल टिप्पणियाँ क्यों नहीं आती हैं?

    या फिर कुछ विशेष व्यक्तियों के ब्लॉग पर नहीं जाने वालो के ब्लॉग या पोस्ट पर बेनामी/ अनामी/ बेप्रोफाईल टिप्पणियाँ क्यों आती हैं?

    यदि इतनी सी बात वे समझ लें तो सब कुछ समझ में आ जाएगा

    उपरोक्त टिपण्णी मैंने इस ब्लॉग पर भी की है..

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  5. Acchi lagi aapki charcha...kaii acche link mile dekhne ko..
    dhanyawaad..

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  6. '' ...बाजा बजा दिया ... '' गजब है , मान गए !
    समीर में आनंद ! जाड़े में भी !!

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  7. निर्मला कपिला जी की कविता बहुत अच्छी लगी
    'कभी सर्दियाँ मिली तो कभी तल्खियाँ
    पतझड बसंतों का सिलसिला हूँ'
    सुंदर
    ब्लोगिंग के फ़ॉर्मूले भी बहुत मजेदार लगे।
    अच्छी चर्चा, धन्यवाद

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  8. अमरेन्द्र जी अवधी के लिये बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. बहुत लगन, परिश्रम और ईमानदारी से. उनको अधिक से अधिक पढ़कर उनका उत्साहवर्धन करना चाहिये. निर्मला कपिला जी की कविता बहुत अच्छी लगी. ध्न्यवाद!!

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  9. देख कर दुःख होता है की जिस कीचड को लोग छु जाने से डरते है उसे ही दूसरों के चहरे पर फेकने से बाज़ नहीं आते

    वीनस

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