बुधवार, फ़रवरी 24, 2010

हाथ चूमने से लेकर ख्वाब बनने की तमन्ना तक


मसिजीवी ने अपनी पिछली पोस्ट में बज चर्चाकी थी। उसमें बात विनीत के जुकाम से शुरू हुई और अंतिम बज की डायलागिया चुनौती थी:
आपलोग जो मेरी बीमारी पर इतनी पंचैती कर रहे हैं। बीमारी की जड़ है कि मेरी जब भी तबीयत खराब होती है..मेस का खाना ताकने का मन नहीं करता और लगभग दिनभर भूखा रह जाता हूं। आपलोग घर-गृहस्थीवाले लोग है। घर का खाना खिलाइए कि देखिए तबीयत कैसी हरी हो जाती है।
अब विनीत को किसी घर-गृहस्थी वाले ने घर का खाना खिलाया कि नहीं ये तो नहीं पता चला लेकिन एक और लफ़ड़ा हो गया उनके साथ। कल उन्होंने बजियाते हुये लिखा:
टेलीविजन पर मेरा लेख पढ़कर कोलकाता से एक भाई साहब ने फोन करके पहली लाईन कही- आप सामने होते तो आपका हाथ चूम लेता। उनकी इस बात को मैं किस रुप में लूं।
अब जब हमने ये पढ़ा तो हमने सलाह बजा दी:
१. हमेशा हाथ साफ़ रखने हैं।
२. हमेशा इसी तरह के लेख लिखने हैं।
३.दिल्ली से कोलकता की सारी ट्रेनों का हिसाब-किताब रखना है! न जाने कब किस ट्रेन से कोई हाथ चूमने के लिये चला आये।
और भी बहौत कुछ है लेने को लेकिन फ़िलहाल इतना ही।
अब आगे की बज-कथा छोड़िये लेकिन गोपाल झा की ये वाली पोस्ट बांचिये जिसमें उन्होंने विनीत की तारीफ़ में कुछ लिखा है। इसमें वे लिखते हैं:
आज-कल ऐसे लोग बनने बंद हो गये हैं, जो सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई और अध्ययन, जानकारी की बातें करें। विनीत में आप वह सब पाएंगे। विनीत चाहें, तो एक सफल अधिकारी भी बन सकते हैं या और कुछ भी, लेकिन शिक्षा के प्रति उनकी निष्ठा की बातें मन को छू जाती हैं।
विनीत से जब-तब बात होती हैं तो उनका कहना है कि वे मुद्दों-सरोकारों से संबंधित पोस्टों के जरिये बताना चाहते हैं कि हिन्दी ब्लॉगिंग में गंभीर विमर्श भी होता है। अपनी पिछली पोस्ट में विनीत ने आशा किरण होम में व्याप्त अव्यवस्थाओं के बारे में लिखा था इसके बाद उन्होंने तब आशा किरण होम से मिली धमकी.. में लिखा
बाकी तमाम तरह की घटनाओं की तरह ही इस पर बयानबाजी शुरु हो गयी लेकिन इस होम के भीतर जो रैकेट चल रहे हैं जो कि बयान से इसकी आशंका बनती है,उस दिशा में क्या काम किए जा रहे हैं,इस पर भी बात होनी चाहिए।



विनीत के साथ और लफ़ड़े तो चलते ही रहते हैं अब यहां एक और लफ़ड़ा हो गया। भाई लोगों ने उनको पकड़कर हैप्पी बर्थडिया दिया। आगे की कहानी सुनिये विनीत की ही जबानी।

बज से ही पता चला कि मास्टर साहब अपने लिखते हैं-….अब तो सब रिवाल्वर ही मांग कर रहे हैं। …फ़ुरसतिया जी की माया है इस माया के बारे में फ़िर कभी लिखा जायेगा।

इस तरही मुशायरे का लुत्फ़ अगर न उठाया हो तो उठा लीजिये अभी। समय के साथ वजन बढ़ता जायेगा इसका।

गौतम राजरिशी क्या जुलुम ढा रहे हैं देखिये:
सितारों ने की दर्ज है ये शिकायत
कि कंगन तेरा, नींद उनकी उड़ाये

अब क्या किया जाये? सितारों को नींद की गोली खाकर सोने की सलाह दे दी जाये?

मनीषा पाण्डेय दिल्ली पुस्तक मेला क्या गयीं पुस्तक मय हो गयीं और मेरी जिन्दगी में किताबें सीरीज की तीन पोस्टें निकाल दीं। देखिये आप भी कुछ अंश:
लेकिन कुछ तो वो उम्र ही ऐसी थी और कुछ हम ज्‍यादा नालायक भी थे, कि अंग्रेजी की किताबों से ढूंढ-ढूंढकर इरॉटिक हिस्‍से पढ़ते और कंबल में मुंह छिपाकर हंसते। वो लाइब्रेरी से लेडी चैटर्लीज लवर खासतौर से इसलिए लेकर आई थी कि उसके कुछ विशेष हिस्‍सों पर गौर फरमाया जा सके। ऐसे हिस्‍सों का ऊंचे स्‍वर में पाठ होता था। हम मुंह दबाकर हंसते थे। ऊऊऊ……. सो सैड, सो स्‍वीट, सो किलिंग, सो पथेटिक।

आगे भी देखा जाये किताबों से अपने लगाव को जाहिर करती हुई मनीषा लिखती हैं:
ऐसा नहीं कि मैं लिप्‍स‍टिक नहीं लगाती या सजती नहीं, फुरसत में होती हूं तो मेहनत से संवरती हूं, लेकिन अगर काफ्का को पढ़ने लगूं तो लिप्‍सटिक लगाने का होश नहीं रहता। हॉस्‍टल के दिनों में नाइट सूट पहने-पहने ही क्‍लास करने चली जाती थी और आज भी अगर मैं कोई इंटरेस्टिंग किताब पढ़ रही हूं तो ऑफिस के समय से पांच मिनट पहले किताब छोड़ जो भी मुड़ा-कुचड़ा सामने दिखे, पहनकर चली जाती हूं। होश नहीं रहता कि बालों में ठीक से कंघी है या नहीं। यूं नहीं कि मैं चाहती नहीं कि लिप्‍स्‍टिक-काजल लगा लूं पर इजाबेला एलेंदे के आगे लिप्‍सटिक जाए तेल लेने। लिप्‍सटिक बुरी नहीं है, लेकिन उसे उसकी औकात बतानी जरूरी है। मैं सजूं, सुंदर भी दिखूं, पर इस सजावट के भूत को अपनी खोपड़ी पर सवार न होने दूं। सज ली तो वाह-वाह, नहीं सजी तो भी वाह-वाह।


अब जब दुनिया भर में अमीर बनने-दिखने की मारामारी मची हुई है तब कोई कहे कि आओ गरीब दिखें तो कैसा लगेगा। बताइये भाई शेफ़ाली पाण्डेयजी कह रही हैं:

ऑस्टेलिया का कहना है कि भारत वाले हमारे देश में सुरक्षित रहना चाहते हैं तो गरीब दिखें. यह बताना वे भूल गए कि गरीब कैसे दिखा जाता है? क्या गरीब दिखने की कोई स्पेशल किट बाज़ार में उपलब्ध हो गई है? कौन इस किट के कपड़ों को डिजाइन करेंगे? डिज़ाईनर भारतीय होंगे या ऑस्ट्रेलियाई? गरीब दिखने के सौन्दर्य प्रसाधन कौन कौन से होंगे? भारत के हिसाब से गरीब दिखना होगा या ऑस्ट्रेलिया के हिसाब से?


शेफ़ाली आपको गांव की ओर चलने का न्योता दे रही हैं और वहां की हालत भी बयां कर रही हैं लगे हाथों:
स्वागत कैसा होगा और कौन करेगा ? महिलाएं यानी आधी आबादी? वह तो सुबह मुँह-अँधेरे ही खेतों में चली जाती है ताकि गृहस्थी की गाड़ी के पंक्चर हो चुके दूसरे पहिये को रात को दारु पीकर मार-पीट करने के लिए ताकत मिलती रहे|


साहस का क़द पांच फ़ुट दो इंचनीलाभ जी सीमा आजाद के बारे में जानकारी देते हुये बताते हैं
दोस्तो, आज भी मन कल ही के प्रसंग पर ठहरा हुआ है. आंखों के सामने बार-बार सीमा आज़ाद का चेहरा घूम जाता है. कन्धों तक कटे उसके घुंघराले बालों से घिरा उसका गोल मुखड़ा, खिले-खिले दांतों वाली उजली मुस्कान, औसत से कुछ कम, लगभग पांच फ़ुट दो इंच का क़द और पूरी चाल-ढाल में कूट-कूट कर भरा साहस.


सलमा सुल्तान की आप बीती सुनिये वे लिखती हैं-वे पढ़ाई बंद करा कर मुझसे सिर्फ ब्याह और बच्चे चाहते थे उसके बाद जो हुआ उसके बारे में सलमा लिखती हैं-
अन्त में मैंने शादी के लिए साफ मना कर दिया और अपने सख्त फैसले पर अड़ी रही। आखिरकार सबों को झुकना पड़ा और आज मैं अपने मंजिल की ओर बढ़ रही हूं। मेरी शादी कट गयी।

अपनी मनचाही जिन्दगी जीने की दिशा में बढ़ने के लिये सलमा को बधाई!
समीरलाल ब्लॉग जगत के सारे सम्मान पा चुके हैं। अब आपको भी दिला रहे हैं और कह रहे हैं-आओ!! तुम्हें सम्मान दिला दूँ!! :

सुबह शाम तुम खूब लिखे हो
टिप्पणी में हर ओर दिखे हो
ब्लॉगिंग से क्या हासिल होगा
जाने क्या तुम सोच टिके हो.

चल खुशियों की शाम दिला दूँ
आओ तुम्हें इक नाम दिला दूँ
ब्लॉगिंग का सम्मान दिला दूँ.


मनोज मिश्र अपनी आवाज में फ़ागुन गीत सुना रहे हैं! देखिये और सुनिये:
तरसे जियरा मोर-बालम मोर गदेलवा
कहवाँ बोले कोयलिया हो ,कहवाँ बोले मोर
कहवाँ बोले पपीहरा ,कहवाँ पिया मोर ,
बालम मोर गदेलवा.....
अमवाँ बोले कोयलिया हो , बनवा बोले मोर ,
नदी किनारे पपीहरा ,सेजिया पिया मोर
बालम मोर गदेलवा...


प्रवीण पाण्डेयजी से उनकी पिछली वुधवारीय पोस्ट में सवाल/आग्रह किया गया-आप यह भी बताते कि आपका योगदान मुख्य अतिथि के अलावा क्या रहा तो यह पोस्ट अपनी सही निष्पत्ति पा जातीइस पर उन्होंने आज लिखा-

ज्ञान बखानना आसान है, एक जगह से टीप कर दूसरी जगह चिपका दीजिये। मेरे लिये यह सम्भव नहीं है। मेरे लिये आयातित ज्ञान और कल्पनालोक का क्षेत्र, लेखनी की परिधि के बाहर है, कभी साथ नहीं देता है। यदि कुछ साथ देता है तो वह है स्वयं का अनुभव और जीवन। वह कैसे झुठलाया जायेगा?
पोस्ट में आगे उनकी कविता भी है जिसमें कवि लिखता है-
सच नहीं बता पाती, झुठलाती, जब भी कविता डोली है,
शब्दों का बस आना जाना, बन बीती व्यर्थ ठिठोली है।
फिर भी प्रयत्न रहता मेरा, मन मेरा शब्दों में उतरे,
जब भी कविता पढ़ू हृदय में भावों की आकृति उभरे।
भाव सरल हों फिर भी बहुधा, शब्द-पाश में बँधता हूँ।
जो दिखता हूँ, वह लिखता हूँ।

कविता की बात चली तो अनुराधा नहीं भाई आराधना की लिखी यह मनभावन कविता भी देखी जायें-

एक सुबह,
बांस की पत्ती के कोने पर अटकी
ओस की बूँद
कैद कर ली थी,
आँखों के कैमरे में
आज भी कभी-कभी वो
बंद पलकों में
उतरती है,

इस कविता में आगे देखिये व्याकरण लोचा और उस पर अमरेन्द्र के विचार और आगे काफ़ी कुछ! अपने ब्लॉग में स्त्री विषयक कविताओं के अलावा नारी ब्लॉग पर लिखे एक लेख में आराधना ने समाज में एक आम लड़की की स्थिति अपने अनुभव के आधार पर बयान की है:
धीरे-धीरे पता चला कि मैं अपने भाई जैसी नहीं हूँ, मैं उससे अलग कोई और ही "जीव" हूँ, जिसे जब चाहे छेड़ा जा सकता है, जैसे चिड़ियाघर में बन्द जानवरों को कुछ कुत्सित मानसिकता वाले लोग छेड़ते हैं. जब भी मेरे साथ ऐसी कोई घटना होती मुझे लगता कि मेरे अन्दर ही कोई कमी है ,मेरे शरीर में कुछ ऐसा है जो लोगों को आकर्षित करता है .ऐसी बातें सोचकर मैं अपने शरीर को लेकर हीनभावना का शिकार हो गयी. मैं अपनी लम्बाई के कारण उम्र से बड़ी दिखने लगी थी, इसलिये मैं झुककर चलने लगी. मैं अपने उन अंगों को छिपाने लगी जो मुझे मेरे लड़की होने का एहसास कराते थे. इस तरह एक लड़की जो बचपन में तेज-तर्रार और हँसमुख थी ,एक गंभीर, चुप ,डरी-डरी सी लड़की बन गयी.
अपने नारीवादी-बहस ब्लॉग में आराधना छेड़छाड़ की समस्या के कुछ कारणों की पड़ताल की और कुछ समाधान सुझाये! इन सुझावों में सबसे अहम सुझाव है:
ऐसी एक दो नहीं अनेक बातें हैं. पर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात बेटियों को आत्मविश्वासी बनाना है और अति आत्मविश्वास से बचाना है.


अजित वडनेरकर जी आज चम्मच, चमचागीरी और चाटुकारिता की जानकारी दे रहे हैं। इसमें चमचा चरित्र भी है और आज मक्खन के मंहगे होने की वजह भी। देखिये तो सही।

निशांत हमको वैसे तो ज्ञान की बातें बताते ही रहते हैं! आज वे बता रहे हैं भौतिकी की पुस्तक "फिजिक्स ऑफ़ द इम्पोसिबल" के बारे में! देखिये।

सुरेश चंद्र शुक्ला की पोस्ट से पता चला कि परसों अमृतलाल नागर जी की पुण्य तिथि थी। नागर जी को विनम्र श्रद्धांजलि।

इसी क्रम में नागर जी की पुस्तक टुकड़े-टुकड़े दास्तान के एक संस्मरण लेख के कुछ अंश। नागर जी ने इस किताब को अपनी पत्नी को समर्पित करते हुये लिखा था:
प्रतिभा को जिसने मुझे हर निराशा से बचाये रखकर मुझे लेखक बनाये रखा, जो बहुत दूर होकर भी मेरे बहुत पास है।
यह लेख नागर जी ने अपनी पत्नी के निधन के बाद लिखा था। पत्नी के निधन के बाद दिये एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था- तीन-चौथाई अमृतलाल नागर तो मर गया।

बेटा सम्हाल रहा है कि बाप कहीं लड़खड़ा न जायें,परन्तु मैं पूरी तरह से अपने काबू में हूं। ऊपर ’इंटेसिव केयर यूनिट’ में प्रतिभा सामने ही शांत निद्रा में है। न धौंकनी सी चलने वाली सांस, न नाक में आक्सीजन की नली,न बांह में धंसी ग्लूकोस सैलाइन की सुई। सब कुछ नार्मल। कपाल छुआ,गाल पर हाथ रखा। शरीर अभी भी गर्म है। बस सांस नहीं है। मेरे पंडित बुड्ढन लाल, मेरी लाला बुढिया मल ,मेरी ओल्डी, मेरी बा, मेरी प्रतिभा मृत्यु में भी जीवन की सारी सुन्दरता समेटे शांत सो रही है। परसों दिन में बीमार लगती थी। चेहरा स्याह पड़ गया था, लेकिन इस समय.... नजर न लगे, बड़ी सुन्दर लग रही है। इधर कुछ बरसों से उन्हें नींद न आने की बीमारी लग गयी थी। बब्बन रात में उन्हें ’कांपोज’ की गोली दे देता तो देर तक सोती रहती। मैं जल्दी उठता हूं। नहा-धोकर लिखने के कमरे में जाने से पहले उनके पलंग के पास जाता, उनकी निद्रा मग्न सुन्दरता निहारकर ,उनके बालों को सहलाता और बड़ी कुंकुम बिंदी लगे कपाल को चूमकर कहता," मन्नू,जागो, सबेरा हो गया।"


मेरी पसंद


जहाँ तुम्हारी नींद हाथ रखती है
वहीँ मैं हो गया हूँ खड़ा
इस उम्मीद में कि
आज नहीं तो कल, तेरा ख्वाब हो जाऊँगा

अब जबकि सारी दुनिया ओट हो चुकी है
आवाज खींच के तुमने जो तानी है, उससे
मैं बेसब्र हो रहा हूँ कि
कितनी जल्दी तुम झुक जाओ तानपुरे पे
मुझे धुन देने के वास्ते,
और मैं निःशब्द हो जाऊं

मैं बहता हूँ पर शजर नहीं हिलते
खाली-खाली रह जाती है मेरी छुअन,
जिस्म जीवन का मिल जाए
अंक में भर लिया जाऊं गर तेरे एक बार
इसी इंतज़ार में हूँ बस

खाली हो गया था किसी समय,
कोई जगह सुनसान हो गयी थी मेरे अन्दर
और फिर भरा नहीं गया कभी
मेरी रिक्तता कों अब
तुम्हारी रूह मिले, तो चैन मिले

कुछ करो
कुछ करो अब कि
अगली बार जब पलकें झपक कर उठें
तो तुम्हारा आगोश सामने हों

एक बार अपने आगोश दृश्य कर दो मुझे
ओम आर्य

और अंत में

फ़िलहाल इतना ही। बाकी बहुत कुछ छूट गया वो आपको यहां और यहां मिलेगा। बांचिये और बताइये कैसा लगा? कल की चर्चा अगर न बांचे हों तो पहुंचिये उधर जीकाहे को पकड़ना वहशत का रंग

अगली मुलाकात के पहले तक के लिये शुभकामनायें।

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19 टिप्‍पणियां:

  1. Main kaafi dino se sonch raha tha ki Anoop ji ki pasand ka hissa kyon nahi ban pa raha hoon.Viewers bhi lagataar kam ho rahi hain mere blog pe...so ek khyaal man men ye aa raha tha ki shayad meri kavitaaon ki shakti ghat gayee hai..par aaj Anoop ji kee pasand ban kar phir thoda thik lag raha hai..

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  2. कमाल है...ओम आर्य जी से पहली बार मुलाकात हो रही है और क्या लिखते है जनाब..वाह..
    मनीषा जी एक कमाल की लेखिका है, उनके ब्लाग पर परसो रात जाना हुआ था, फ़िर काफ़ी कुछ गूगल रीडर के थ्रू मित्रो से शेयर किया...काफ़ी समय के बाद रात भर जागा और लगा ही नही, कि नही पढना चहिये..I was glued and engrossed into her writings..

    प्रवीण जी वाली बुधवारीय पोस्ट अभी पढनी है..आफ़िस भाग रहा हू..आकर पढता हू..
    समीर जी की कविता एक बहुत अच्छा व्यग्य थी आजकल के हिन्दी ब्लागजगत पर..

    अनूप जी, कुल मिलाकर एक बहुत अच्छी कामयाब चर्चा ..मज़ा आ गया..

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  3. लगभग सभी पोस्ट मेरी पढ़ी हुई ठहरीं,
    टिपियाने के नाम पर यही लिखा जा सकता है कि,
    उत्तम, nice, बेजोड़ चर्चा, महाराज आपका ज़वाब नहीं, इत्यादि इत्यादि
    सो कोई एक उपर्युक्त शब्द छाँट लीजिये, या सभी रख लीजिये । नमस्कार..

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  4. विनीत बाबु धुन के पक्के हैं... एक बार जब मैं उनके लेख पर फोन करके बधाई दी तो पता लगा की कई लोग ऐसे हैं जो मुबारकबाद देते रहते हैं...
    मनीषा जी का जिक्र लाज़मी था... उनकी किताबों वाली सिरीज़ अनूठी थी, सामान्यतया यहाँ किताबों से सभी दीवाने हैं किन्तु उसे ऐसे लिख डालना प्रभावी लगा है विशेष कर तीसरी किस्त में तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे... कल उनका एक लेख चवन्नी चैम्प पर भी पढ़ा...

    ओम आर्य तो अच्छा ही लिखते हैं... ऐसा कोई और ब्लॉग नहीं दीखता जो हर २-३ दिनों के अंतराल पर आपको लगातार बेहतरीन सोच रुपी कविता देता हो.

    रही बात शेफाली जी की तो भाई उन्होंने कह दिया है अब वे किताब छपने को दे रही हैं... व्यंग जहाँ अब दोअर्थी लाइन बन कर रह गया है ऐसे में उनका व्यंग बहुत संतुलित लगता है... शुक्रिया...

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  5. विस्तृत लेकिन सन्तुलित चर्चा. आराधना जी की कविता सचमुच बहुत अच्छी है. ओम आर्य जी भी उपयुक्त स्थान पर हैं . बहुत सुन्दर कविता है उनकी. शेफ़ाली जी का व्यंग्य भी कहीं-कहीं ज़बर्दस्त चुटकी लेता है.

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  6. एक बहुत अच्छी चर्चा ..मज़ा आ गया..

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  7. एक आड़ लिंक्स को छोड़ दिया जाए तो बाकी के लिंक्स आपने खूब जमा कर दिए है.. कम से कम हम तो ऐसा मानते है..
    अनुराग जी की पिछली चर्चा और आपकी ये आज की चर्चा देखकर मेरा भी चर्चाने का मन कर रहा है..

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  8. बहुत अच्छी लगी चर्चा धन्यवाद्

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  9. दिलचस्प चर्चा...अगली चर्चा का इंतजार.

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  10. मनीषा ......शेफाली जी ....ओर आराधना जी...तीनो इसी दुनिया का प्रतिनिधित्व करते है ...सबके पास अपने हिस्से का सच है ...ओर अपने तरीके से कहने की काबिलियत भी.... ...ऐसे लोग ब्लोगिंग को सम्रद्ध करते है ....आराधना जी की पोस्ट पढ़कर मुझे आँखों देखा एक किस्सा याद आया जिसे मैंनेयहाँ लिखा था ......
    दुर्भाग्य से आदमी की नीयत में कोई इवोल्यूशन नहीं हुआ है ....
    ओर हाँ
    अमृतलाल नागर जी को देकर ....आपने इसे ओर यादगार बना दिया....बाय दी वे एक हाथ हमें भी चूमने है आज......सचिन के २०० हो गए है

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  11. ओर हाँ ओम आर्य जी से कहियेगा .टिप्पणियों के गणित से अपनी काबिलियत इस सोशल नेटवर्किंग के जमाने में न आंके ...बस लिखते रहे ......

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  12. धन्यवाद! आपकी चिट्ठापरिक्रमा ने काफिर श्रम बचा दिया और के ही स्थान पर काफी जानकारी मिली और कुछ चिट्ठों को विशेष रूप से पढाने की प्रेरणा मिली|

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  13. हमेशा की तरह चर्चा बहुत अच्छी लगी और हमेशा की तरह सबसे अच्छी लगी आपकी पसंद !!

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  14. सब रंग शामिल हैं इस चर्चा में ।

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  15. बेहतरीन चर्चा, बहुत सारे लिंक आराम से खोले जाये्गें। आर्य जी को अपनी काबलियत पर शक नहीं करना चाहिए बस लिखते रहें अच्छा लिखते हैं

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  16. अब आपकी चर्चा में चित्रों की संख्या बढ़ने से बहुत अच्छा लगता है. शैली का आनंद तो है ही. आभार.

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