गुरुवार, फ़रवरी 25, 2010

ज़िन्दगी फुलवारियों का नाम हो जैसे

भारत और पकिस्तान के विदेश सचिव दिल्ली में मिल रहे हैं. मिलने-मिलाने के लिए मौसम भी अनुकूल है. न तो ज्यादा सर्दी और न ही गर्मी. ऐसे में मिलने का मज़ा आ गया होगा. कितना आया वह तो शायद कल तक ही पता चले लेकिन इतना ज़रूर कह सकते हैं कि कल बहुत मज़ा आया. कारण यह कि सचिन तेंदुलकर ने कल ही अंतर्राष्ट्रीय एक दिवसीय मैच में पहली बार डबल सेंचुरी ठोंक दी.

जब तमाम लोग यही दोहराए जा रहे थे कि यह एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैचों में बने गई पहली डबल सेंचुरी है, तभी सचिन ने लोगों को आगाह किया कि; "पहला नहीं, वनडे का दूसरा अर्धशतक है." सचिन का कहना है;
"सचिन के २०० रन को वनडे इतिहास का पहला दोहरा शतक घोषित करने वाली मर्द मानसिकता को सलाम."


यह कहने के बाद उन्होंने बताया कि आस्ट्रेलिया की महिला क्रिकेट खिलाड़ी बेलिंडा क्लार्क ने पहले ही दोहरा शतक लगा दिया है. पूरी घटना आप सचिन के ब्लॉग पर ही पढ़िए.

जहाँ सचिन ने मर मानशिकता को सलाम किया वहीँ तमाम ऐसे भी ब्लॉगर हैं जिन्होंने सीधे-सीधे सचिन को ही सलाम कर लिया. सलाम करने वालों की लिस्ट लम्बी है. देखिये;

अवधेश अकोदिया जी का सलाम यहाँ है.

राम कुमार सिंह जी का सलाम यहाँ है.

समरेन्द्र जी ने बताया कि रेल बजट और सचिन में चुनना पड़े तो वे सचिन के साथ हैं. क्यों हैं, आप यहाँ क्लिक करके जानिये.

जहाँ कुछ लोग सचिन को सलाम भेज रहे हैं वहीँ शंकर फुलारा जी पूछते हैं कि काहे का सलाम? ये (क्रिकेटर) देश और समाज के लिए क्या करते हैं? फुलारा जी लिखते हैं;

सचिन का एक और "रिकार्ड"...!
इसी की कमी थी, चलो...! बन गया!
अब...कुछ भूखों को रोटी मिल जायेगी, कुछ नंगों को कपडा
कुछ बीमारों को दवाएं.



फुलारा जी के सवाल तो हैं. सवालों में दर्द है. गरीबी का, भूख का...

कल एक बजट गया और कल एक और आ जाएगा. सुनकर लगता है जैसे भारत एक बजट-प्रधान देश है. कल वित्तमंत्री बजट पेश करेंगे. इसीलिए बजट से पहले अंशुमाली रस्तोगी जी ने उन्हें एक पत्र लिखा है. वे लिखते हैं;

"कागज और कलम को खपाने में हम लेखकों का बहुत बड़ा हाथ है। हम सालभर में कितने टन कागजों को काला और कितने दर्जन कलमों को कलम कर देते होंगे, इसका अंदाजा तो हमें भी नहीं है। अपना दिमाग और समय खर्च कर हम जो रचनात्मक सहयोग समाज को देते हैं, वो इतना आसान भी नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि हम लेखक बेहद उपेक्षित हैं। हमारे पास न ढंग के पुरस्कार हैं न आर्थिक सुख-सुविधाएं। जबकि सरकार और आपको हमारी तरफ भी बराबर का ध्यान देना चाहिए।"

पूरा पत्र आप अंशुमाली जी के ब्लॉग पर जाकर पढ़िए. वे हम 'लेखकों' के लिए कितने चिंतित हैं.

अनिल पुसदकर जी का मानना है कि शांति से नहीं पूरी तसल्ली से निपटाए जा रहे हैं हिन्दुओं के त्यौहार. अनिल जी लिखते हैं;

"होली आई नही कि प्रशासन को उसे शांतिपूर्ण ढंग से निपटाने की चिंता शुरु हो जाती है।इसके लिये शहर की शांति समिति की बैठक बुलाई जाती है और उसमे शामिल यस मैन पुलिस को कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये अच्छे-अच्छे?सुझाव देते हैं।इस बार यंहा की शांति समिति ने गुब्बारों पर प्रतिबंध लगवा दिया है।इससे अच्छा तो ये होता कि रंग पर ही प्रतिबंध लगा देते।सात दिनों की होली अब सात घण्टे भी नही चलने दी जाती और धीरे-धीरे लगता है इसके लिये भी त्योहार बचाओ आंदोलन छेड़ना पड़ेगा।"


वे और भी बहुत कुछ लिखते हैं. आप देखिये.

मनीषा पाण्डेय जी की पोस्ट पढ़िए. वे पूछती हैं;

"मैं सोचती हूं कभी और पूछती हूं कभी-कभी अपने आपसे कि मैं क्‍या होना चाहती हूं? किसी अखबार की एडीटर या कि कोई बड़ी तोप तुर्रम जंग रिपोर्टर? जिस राह निकल जाऊं तो लोग ‘फलां स्‍टोरी में तो आपने क्‍या कमाल किया था या ढंका रिपोर्ट में क्‍या अद्भुत समझ और गहराई थी’ का भोंपू उठाए मेरे पीछे-पीछे आएं। क्‍या मैं एक बेहद सजीले, रंगीले, सुरीले और मोहब्‍बत के झूले पर ऊंची-ऊंची पेंगे बढ़ाने वाला नौजवान के इश्‍क में गिरफ्तार होना चाहती हूं? मैं चाहती हूं क्‍या कि दो सुंदर-सुंदर गोल-मटोल मीठे झबरीले बच्‍चे मां-मां करते मेरी साड़ी खींचे और कहीं से दौड़ते हुए आकर मेरे पैरों से लिपट जाएं, जब मैं रसोई में उनके मनपसंद रसगुल्‍ले बना रही होऊं? बड़े लाड़ से मेरी गोदी में चढ़कर कढ़ाही में झांकें कि ‘मां, क्‍या पका रही हो?’ मैं गोदी से नीचे उतार दूं तो भी साड़ी में मेरे खुले पेट से मुंह चिपकाकर हवा निकालें और अजीब सी आवाजें करें?"

पूरी पोस्ट पढ़िए. वासी जानकारी के लिए बता दूँ कि पोस्ट को सुमन जी सर्टिफाई करते हुए लिख दिया है;

nice


संजीव के ब्लॉग पर मुक्तिबोध जी का लेख पढ़िए; " मेरी माँ ने मुझे प्रेमचंद का भक्त बनाया". संजीव का ब्लॉग कॉपी प्रोटेक्टेड है इसलिए मैं अंश नहीं दे पा रहा लेकिन आप पोस्ट ज़रूर पढ़ें.

फागुन में डॉक्टर मनोज मिश्र जी ने एक फाग गीत पोस्ट किया है. उन्होंने उसे अपनी आवाज़ में गाया भी है. आप सुनिए.


मेरी भी पसंद:

होंठ पर किलकारियों का नाम हो जैसे
ज़िन्दगी फुलवारियों का नाम हो जैसे

मन भिगोया तन भिगोया आत्मा भीगी
प्यार ही पिचकारियों का नाम हो जैसे

आस के अंकुर उगे कुछ कोपलें फूटीं
स्वप्न कोई क्यारियों का नाम हो जैसे

बाँटती फिरती हँसी को और खुशियों को
उम्र जीती पारियों का नाम हो जैसे

टांक कर रक्खीं ह्रदय में सब मधुर यादें
मन सजी गुलकारियों का नाम हो जैसे

आह आँसू करवटें तड़पन प्रतीक्षाएँ
प्यार भी सिसकारियों का नाम हो जैसे

ज्ञान 'भारद्वाज' बैठा भूलकर उद्धव
ध्यान में वृज-नारियों का नाम हो जैसे

---श्री चन्द्रभान भारद्वाज जी के ब्लॉग से साभार.



और क्या कहें? यह मालूम है कि चर्चा छोटी है. फिलहाल इसी से काम चलाया जाय.

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7 टिप्‍पणियां:

  1. छोटी नहीं है ये चिठ्ठा चर्चा...श्रीमान बहुत सार्थक है...भारद्वाज जी की ग़ज़ल का मुखड़ा लगा कर आपने अपनी बुद्धिमता का परिचय दिया है...बहुत आनंद आया पढ़ कर...
    नीरज

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  2. लाजवाब चर्चा है .. ग़ज़ल भी लाजवाब है ...

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  3. छोटी है, पर सार्थक है
    सोचूँ यही कि यह दरिया है या सागर है

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  4. बहुत खूब! मुझे भी पता नहीं था कि सचिन के पहले भी कोई दो सौ रन कूट चुका है!

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