शनिवार, फ़रवरी 20, 2010

किसी दूसरेके अंदर के जानवर को उकसा कर न जगाएं

नमस्कार मित्रों! मैं मनोज कुमार एक बार फिर शनिवार की चिट्ठा चर्चा के साथ हाज़िर हूँ। इसमें शुक्रवार की सुबह छह बजे से रात १२ बजे तक के प्रकाशित हुए कुछ चिट्ठों की चर्चा की गई है। फागुन का रंग उमंग पर है। तो आज की चर्चा इसी से शुरु करते हैं।

भर फागुन ...

बसंत के बाद फागुन की मस्ती भी सर चढ़कर बोलती है। फागुन के महीने में फगुनिया गीत सभी के मन को बहुत भाते हैं। ललित शर्मा जी ने अपने मित्र की दादी से रिक्वेस्ट की वो एक फाग गीत सुना दें। दादीजी ने उनकी रिक्वेस्ट पर त्वरित ध्यान दिया और उन्होंने आज जो फाग का गीत सुनाया उसे वे कागज में कलम से उकेर कर आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।

कै मन प्यारे ने रंग बनायो
सो के मन के सर धोली
नर्मदा रंग से भरी होली खेलेंगे श्री भगवान.
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नारदमुनि जी कह रहे हैं

फाल्गुन में प्यारा लागे
मोहे मोरा सजना,
उसके बिना री सखी
काहे का सजना।

यह कविता सिर्फ महसूस की जा सकती है। पढकर कीजिए!

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राकेश ’सोहम’ ने घोषणा कर दी है ..

गोरी को बहकाने

फाल्गुन आया रे ।

रंगों के गुब्बारे

फूट रहे तन आँगन,

हाथ रचे मेंहदी के

याद आते साजन ॥

प्रेम-रस बरसाने

फाल्गुन आया रे ।

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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने भी घोषणा कर दी है होली आई होली ... एक बहुत ही सरस गीत के माध्यम से ...

गली-गली में घूम रहीं हैं, हुलियारों की टोली।
नाच उठी चञ्चल नयनों में, रंगों की रंगोली।।
तन-मन बहका-बहका सा है,
उपवन महका-महका सा है,
नन्दनवन चहका और बोला, होली आई होली।
नाच उठी चञ्चल नयनों में, रंगों की रंगोली।।

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परिकल्पना पर फगुनाहट सम्मान 2010 आयोजित किया गया है। आज इस पर ललित शर्मा जी की एक बड़ी प्यारी रचना आपको आमंत्रण दे रही है होली के रंग में सराबोर होने के लिये।

सजना सम्मुख सजकर सजनी

खेल रही है होली

शब्दों के अनुप्रास की अद्भुत छ्टा में सजी इस कविता का सौंदर्य वर्णन से परे है। बस इसका आनंद लीजिए।

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डॉ. मोहनलाल गुप्ता का मानना है कि दिन का काफी हिस्सा टी वी देखने में बिताने वालों को अपनी जीवन शैली के बारे में नये सिरे से सोचना चाहिये और अपनी दिनचर्या का वर्केबल मॉडल ढूंढना चाहिये। अपनी तीसरी आंख पर वे हमेशा काम की बातें हमें बताते रहते हैं। आज भी वो एक गंभीर विषय पर अपना पक्ष रखते हुए कहते हैं कि यदि लोग आपस में मिलते भी हैं तो केवल शादियों के महाभोज में जहां वे एकदूसरे को देखकर मुस्कुराने की औपचारिकता निभाते हैं और डी जे के तेज शोर से तंग आकर अपने घरों को लौट जाते हैं। इस आलेख में आपने विषय की मूलभूत अंतर्वस्तु को उसकी समूची विलक्षणता के साथ बोधगम्य बना दिया है।

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डा. अनुराग कहते हैं कि उनकी बेतरतीब सी कई सौ ख्वाहिशे हैं। वाजिब -गैरवाजिब कई सौ सवाल हैं। कई सौ शुबहे हैं। एक आध कन्फेशन भी है। सब दिल की बात को सकेर कर यहां जमा कर रहे हैं ताकि गुजरे वक़्त में खुद को शनाख्त करने में उन्हें सहूलियत रहे। आज एक चौरस खिड़की...वक़्त की उस डोर का सिरा अब भी थामे बैठी है शीर्षक संस्मरण के ज़रिए उन्होंने बहुत खूबसूरती से यादों को संजोया है। शीर्षक के बारे में बताते हैं कि गुलज़ार की एक नज़्म से बिना शुक्रिया किये उधार लिया हुआ है। असाधारण शक्ति के इस गद्य की बुनावट की सरलता और रेखाचित्रनुमा वक्तव्य सयास बांध लेते हैं, कुतूहल पैदा करते हैं। आपकी रचना में भाषा का ऐसा रूप मिलता है कि वह हृदयगम्य हो गई है। तभी तो नीरज जी कहते हैं आप जैसा लिखना तो छोड़ सोचना भी बहुत मुश्किल है. लिखते रहें...पढना अच्छा लगता है।

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छेड़छाड़ के विरोध में कुछ भी कहने के पहले नारी ब्लाग पर आज की रचना छेड़ा तो शेरनी बनकर टूटी शोहदे पर पढ लेना ज़रूरी है। शोहदे ने सोचा था कि टिप्पणी करके भाग निकलेगा मगर स्कूटी सवार युवती ने लोडर को ओवरटेक कर रोक लिया। लोडर से नीचे उतारा और तबीयत से पीटा। फिर पुलिस को सौंप दिया। इतना ही नहीं उसने तमाशबीनों को भी 'क्या तुम्हारी मां-बहन नही है' कहकर बड़ा सबक सिखा दिया। साथ ही इसकी लखिका रेखा श्रीवास्तव जी यह भी प्रश्न करती हैं कि ऐसी हिम्मत वाली लड़कियाँ कितनी होती हैं? लेखिका ने इस घटनाक्रम से परिचित करा कर बहुत ही अच्छा काम किया है। आप स्वयं ही देख लीजिए।

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अनिल कान्त जी का कहना है कि कहने को तो कुछ भी कह दूँ..मगर बदलते दौर से डरता हूँ मैं..कब तक रहेगा यही मुखौटा चेहरे पर मेरे..खुद भी नहीं जानता हूँ मैं। उनकी अनुगमन रचना आधुनिक अनुकरण प्रवृत्ति और अपसंस्कृति की दशा का वास्तविक चित्रण है।

हम सोचते हैं कि
कोई आये, और
हम बन जायें अनुयायी
कि शायद
जो दिला सके हमें
पुनः आजादी ।
मगर कौन ?

इस पर वन्दना जी ने सही कहा है कि पहल कोई नहीं करना चाहता, बातें चाहे जितनी भी कर लें. अनुयायी होने की आदत सी हो गई है।

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दीपक जी एक बहुत ही सुन्दर लघु कथा वर्ना मैं तुझ जैसों के मुँह नहीं लगता लेकर आये हैं। इस लघुकथा में वो बता रहे हैं कि फ़िल्मों में नायक तो केवल रोल कर सकते हैं जी नही सकते किसी गरीब की ज़िन्दगी और विडंबना देखिए कि इन लोगों का रोल करके वे करोडों कमा लेते हैं और जिस गरीब का रोल करते हैं उसे शायद वो फिल्म देखना भी नसीब नही होता।

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अपनत्व जी गहरे भावों को समेटे हुए एक खूबसूरत रचना आईना पेश कर रहीं हैं। सच है कि आईना झूठ नहीं कहता। जैसी हमारी मन:स्थिति होती है वही भाव चेहरे पर होते हैं....

मेरे कमरे के आईने पर
जब भी नज़र डालू मै
हर बार एक नयी
शकल नज़र आती है ।

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डा. मेराज अहमदहौसला इतना अभी यार नहीं कर पाये प्रस्तुत कर रहे हैं। इस ग़ज़ल को पढ़ कर मैं वाह-वाह कर उठा। आप भी लुत्फ़ उठाइए ..

दिल में करते रहे दुनिया के सफ़र का सामाँ
घर की दहलीज़ मगर पार नहीं कर पाये

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कल्पनाओं के वृक्ष कल्पतरु पर विवेक जी बता रहे हैं आखिर मैं कब तक भाग-भाग कर जिंदगी को पकड़ता रहूँगा

कभी एक पहलू को छूने की कोशिश में

दूसरा हाथ से निकल जाता है

और बस फ़िर दूसरे पहलू को

वापस अपने पास लाने की

जद्दोजहद उसके समीकरण

हमेशा चलते रहते हैं

इस कविता में उन्होंने कोई सपाट बयानी नहीं की है। जीवन की सच्चाई को सामने लेकर आये हैं।

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अविनाश जी सोच रहे हैं ऑफिस आने जाने के लिए एक रिक्शा खरीद ही लें। उनके इस ख़्यालात पर मिथिलेश जी का कहना है

देर किस बात की ,
लीजिए खरीद फटाफट,
हमको भी लेकर चलियेगा,
फायदा आपका भी होगा और हमारा भी,
ब्लोगर मिट भी कर लेंगे,
कुछ बातें भी वहीं करलेंगे ,
तो फटाफट ले ही लिजिए।

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बहुत अनजान है राहें मगर चलना जरुरी है |
इश्क में बंदिशे लाखों मगर मिलना जरुरी है ||

पी.एस. सिंह बहुत गूढ बातें बता रहे हैं

बात कहने से दिल को सुकूँ मिलता है लेकिन |
बात को कहने से पहले मगर सुनना जरुरी है ||

बिल्कुल सही बात है कि बात कहने के यदि पहले नहीं तो साथ-साथ सुनना भी ज़रूरी है। पर आजकल तो लोग टिप्पणी का आप्शन ही बंद कर देते हैं। या फिर मोडरेशन चालू रहता है।

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वैसे ही जैसे जीवन में रिश्तों को प्रगाढ़ करने के मौकों के महत्व को, सफलता के मौकों को, सहेजना होता है..बस, जरा चूके और वो फिर नहीं लौटते. बच रहता है एक खोया खोया अहसास और कुछ चूक जाने का अपराध बोध. विल्स नेवीकट के कार्ड पर सहेजे कुछ मन में उठते भावों को ले कर फिर से आये हैं समीर लाल जी। इन रचनाओं में प्रत्यक्ष अनुभव की बात की गई है, इसलिए सारे शब्द अर्थवान हो उठे हैं । सरलता और सहजता का अद्भुत सम्मिश्रण बरबस मन को आकृष्ट करता है। चूंकि कविता अनुभव पर आधारित है, इसलिए इसमें अद्भुत ताजगी है। समीर जी के प्रस्तुत करने का अलग और नया अंदाज है जो काफ़ी मन को भाता है।

याद है तुमको / जब बरसों पहले / सार्दियों में तुम मुझको

चली गई थी छोड़ कर / उस बरस / गिर गया था

आँगन वाला / आम का पेड़ / और / बच रहा था / एक ठूंठ!!

देखता हूँ / इतने बरसों बाद / अबकी

उसमें कुछ हरी हरी पत्तियाँ निकल आई हैं..

क्या तुम आने को हो?

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सत्यार्थमित्र की कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें। जाड़े का मौसम विदा ले रहा है, वसन्त अपनी रवानी पर है, फागुन की मस्ती से दिशाएं सराबोर हैं और देश की जनता हर हाल में अपने मनोरंजन के लिए उतावली है। इसी मनभावन माहौल में प्रयाग की पुण्य भूमि पर अगले सात दिनों तक कला, शिल्प और संस्कृति का संगम त्रिवेणी महोत्सव की महक बिखरने वाली है। सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी द्वारा बडे़ ही रोचक अंदाज़ में लिख गया पूरा विवरण पढ़ें यहां

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अदा जी आज एक भजन सुना रहीं हैं जगमग दीप जले .. आप भी सुनिए।

कर तू कर्म सदा निष्काम

ध्यान लगा तू प्रभु के नाम

राम नाम हो हर परिणाम

जग में सारे जहान

जग मग दीप जले

दीप जले दीप जले

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रचनाकार के अन्दर धधकती संवेदना को पाठक के पास और पाठक की अनुभूति की गरमी को रचनाकार के पास पहुँचाना आँच का उद्धेश्य है। महाकवि बाणभट्ट को याद करते हुए उनकी प्रसिद्ध रचना कादम्बरी में कथा के स्वभाव को दर्शाती पंक्ति रसेन शय्यां स्वयमभ्युपागता कथा जनस्याभिनवा वधूरिव। अर्थात् संयोग (शृंगार) के उल्लास रस से भरपूर, जैसे लज्जा से संकुचित नवविवाहिता वधू स्वयं शय्या पर पति के पास प्रणय निमंत्रण लेकर जाती है, वैसे ही कथा (शब्दों और अर्थ के संकोच में लिपटी) लोगों (अपने पाठकों) को रसपान के लिए आंमत्रित करती है। इस उपमा से कहानी के जिस स्वभाव को महाकवि बाण ने व्याख्यायित किया है, इस स्वरूप को पाठकों और लेखकों, दोनों से परिचय कराते हुए मनोज पर परशुराम राय ने एक बहुत ही अच्छी समीक्षा प्रस्तुत की है। जिसे पढकर निर्मला दीदी ने कहा है सही मायने मे इसे कहते हैं समीक्षा। आनन्द आ गया । ये प्रयास बहुत सराहणीय है एक समीक्षा से हम लेखकों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है। इसकी आँच जरूर पठकों तक पहुँची है ।

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वसंती रंग में नत्तू पांडे ज्ञानदत्त पाण्डेय जी बता रहे हैं और सुना रहे हैं कि ताजा ताजा चित्र भेजे हैं नत्तू पांडे के वाणी-विवेक ने; ई-मेल से। पूरा घर भर इकठ्ठा हो गया लैपटॉप के पास फोटो का स्लाइड शो देखने। इस रोचक विवरण पर नीरज जी ने कहा नत्तू पाण्डे जी बहुत अधिक स्मार्ट हो गए हैं आप...एक दम गुलगुले से मजेदार....और नानी कह रही है दुबले हो गए हैं...नानी को कौन समझाए कि आज कल दुबला होना फैशन है...स्लिम ट्रिम हैं आप नत्तू जी...मस्त रहिये और खूब उछल कूद कीजिये. ऐसा फोटो जिसने आनंद की सरिता बहा दी दिल में. वाणी बिटिया भी बहुत अच्छी लग रही है।

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अगर नर्क ही नहीं होता तो स्वर्ग की कामना इंसान कैसे कर सकता, अगर बुरे आदमी दुनिया में नहीं होंगे तो अच्छे आदमियों की पहचान कैसे बन पाएगी, आज अपने द्वारा खोजी गई किसी चीज का विरोध हम खुद करते हुए उसको लेकर भेड़ बकरियों की तरह लड़ते झगड़ते रहते हैं। ऐसा माना गया था कि एक दिन ऐसा भी आएगा, जब इंसान की नई प्रजाति जन्म लेगी, जिसको 'महामानव' कहा जाएगा। अगर आज अजमल कसाब और अफजल गुरू नहीं होते तो भला उन भ्रष्ट नेताओं को कौन पहचानता। हम हमारे भारत देश में चाहकर भी महामानव पैदा नहीं कर सकते, अतिथि कोना में कुलवंत हैप्पी प्रस्तुत कर रहें हैं जनकसिंह झाला को जो उप संपादक हैं वेब दुनिया गुजराती के। एक विचारोत्तेजक आलेख पढिए।

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हिमांशु कहते हैं चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफिर का नसीब सोचते रहतें हैं किस ओर किधर के हम हैं। आज वो प्रस्तुत कर रहे हैं मुरली तेरा मुरलीधर 45

यदि न बोलते प्रिय तो उनका गहन मौन ले भर मधुकर
शान्त निशा सा नत शिर कोने खडा प्रतीक्षा कर निर्झर
चरणन्यास द्रुत उषा करेगी खोल असशय तिमिर पटल
टेर रहा है धैर्यत्रिपथगा मुरली तेरा मुरलीधर ।२४५।

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श्याम कोरी 'उदय' कहते हैं क्या कहूं मुझसे भी रहा नहीं जाता कुछ-न-कुछ "कडुवा सच" मेरे मुंह से निकल ही जाता है । आज वो एक लालची बुढडा के कड़ुवे सच को सामने ला रहे हैं। लोगों की असलियत को उजागर करने के लिए उन्होंने यह रचना की है आप भी पढिए।

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तीसरा खम्भा पर दिनेशराय द्विवेदी जी एक बहुत अच्छी जानकारी लेकर आए हैं। बता रहे हैं भारत में विधि का इतिहास। इस बार का विषय है राजस्व और दीवानी न्यायालयों का फिर से पृथक्करण।

नेट साहित्य साहित्य और संस्कृति का ब्लॉग है। साहित्य और सैद्धान्तिकी के गंभीर विश्लेषण का संसाघन। जगदीश्वर चतुर्वेदी,प्रोफेसर, हिन्दी विभाग,कलकत्ता विश्वविद्यालय, कोलकाता ने इस पर एक बहुत ही सार्गर्भित आलेख आधुनिककाल का सार्वजनिक वातावरण प्रस्तुत किया है। उनका मनना है कि आधुनिकाल के आगमन के साथ विभिन्न किस्म के विनिमय रूपों का व्यापक विकास हुआ। परिवारों के बीच में विनिमय। एकल परिवार अच्छा परिवार था, सकारात्मक कदम था, किंतु भारत में इसका असमान ढ़ंग से विकास हुआ। उनका आगे मानना है कि निजता का व्यापक विकास तब ही हो पाया जब हम भूमंडलीकरण के दौर में दाखिल होते हैं। सार्वजनिक वातावरण के नाम उपभोक्तावादी वातावरण बनाने पर ज्यादा जोर दिया गया इसके कारण पितृसत्ता को नयी ऊर्जा मिली। ऐतिहासिक संदर्भों को पूरे विस्तार के साथ इस आलेख में उन्होंने प्रस्तुत किया है। एक बहुत ही अच्छा आलेख है, इसे अवश्य पढें।


स्वागतम ... नए चिट्ठे

आज १३ नये चिट्ठे जुड़े हैं चिट्ठाजगत के साथ। इनका स्वागत कीजिए।

१. पंकज सुबीर जी लेकर आये हैं महुआ घटवारिन कुछ प्रेम कथाएं। आज की कथा का शीर्षक है मुट्ठी भर उजास

२.

''साधु हो या सांप नहीं अंतर कोई,
जलता जंगल दोनों को साथ जलाता है।
कुछ ऐसी ही है आग हमारी बस्ती में...''

यह किसी कविता की लाचार लाइनें नहीं हकीकत है। देश जंगल में बदल रहा है और जंगल जल रहा है। इस आग के गुणनफल की गुणात्मक विवेचना तो करेंगे ही पर शेषफल तो राख ही होगा। अब तय करो हे संपादकों, लेखकों, पाठकों और नागरिकों कि आपके शब्द 'राख' हों या 'आग'। मैं अपना मत व्यक्त करता हूं, सहमत हो तो साथ देना। आगे अतुल कुमार जी की इस पोस्ट में पढिए।

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१३. कर्णावती (http://karnavatee.wordpress.com) चिट्ठाकार: Shailesh

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अलका जी हमेशा बड़े काम की जानकारी देती हैं। आज वो बता रही हैं टमाटर के बारे में। ये सोलेनेसी कुल का प्राणी है। लेकिन ये बड़ा करामाती जीव है। आपको विश्वास तो होगा नहीं , पर ज़रा ध्यान से पढ़िए इसकी करामाती अर्थात जादुई फितरत इनके आलेख में, आपके मुंह से स्वतः वाह!! निकल जाएगा। फिर तो आप के घर ही नहीं नजर में भी इसका विशिष्ट स्थान हो जाएगा।

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शिवजी को पढ़ने का अपना ही सुख है। बहुत जानदार मगर शानदार तरीके से अपनी बात को रखते हैं। आजकल जिधर देखिये उधर पुरस्कार. उधर सम्मान. दो ही काम हो रहे हैं आजकल, पुरस्कार देना और सम्मानित करना. अब बाघों को बचाने के लिए भी पुरस्कार! सरकार ने पहले ही क्यों नहीं एक कमीशन बैठाकर पता लगवा लिया कि बाघों को बचाने का सबसे बेहतर तरीका लेखन है. इसे पढकर रंजना जी कहती हैं आपका ई पोस्ट पढ़ के आपके ई पोस्ट से भी लम्बा विचार मन में आया है...केतना कहें केतना छोड़ें समझ नहीं पा रहे हैं...
सबसे पहले तो आपको बहुत बहुत बधाई.....ई कोई छोटा बात है का कि आपके लेखनी को इतना समर्थ समझा गया "बाघ बचावक संस्थान " द्वारा .....कि आप लिखे नहीं कि बाघ बच गया...माने बाघ और उसे मारने वाले से भी ताकतवर आपका कलम....हम इससे पूरा सहमत हैं...
और बाकी का लिखे हैं आप....वाह....एकदम से मन जीत लिए....तारीफ को शब्द खोज खोज के रह गए,लेकिन नहीं मिला...तब अचानक से ध्यान आया ... ओह १४११ में से १४१० शब्द तो आप यूज कर लिए...इसीलिए न हमको ढूंढें नहीं मिल रहा है.... बस इसे ही मेरा भी कमेंट मान लीजिए।

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हर्षिता जी कह रही हैं मेरा छोटा प्रयास यदि बाघ बचावो अभियान में योगदान दे सकता है तो मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी,क्योंकि यह हम सभी का कर्त्तब्य भी है कि इस धरा के सौन्दर्य को कभी न मिटाएं।

शहंशा थे, हम
अपने जहां के
नृशंस पशु तुम
बन बैठे बाघखोर
कुछ ही तो
बचे हैं हम
बस भी करो
अब तो
जीने दो हमें।

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पी.सी. गोदियाल जी समझा रहे हैं लोग देशी मॉल पर विलायती ठप्पा लगाकर माल को बेचते है। वहां से फालतू का कूडा-कचडा मत उठा लाना। पर्यटकों को मूर्ख बनाते है। अगर कोई चीज बहुत पसंद आ भी रही हो तो लेते वक्त दूकानदार जो दाम बताये, उससे ठीक आधे पर भाव तय करना।

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कुसुम कुमारी कुंज बेहारी में प्रत्यक्षा के शब्दों के चमत्कार से आप अभिभूत रह जाएंगे। कह रही हैं सपने के भीतर एक और सपना था , पानी पर तैरती मरी मछली के पेट जैसा , पीला फीका और निस्तेज़। ऐसा नहीं था कि जागी दुनिया कुछ शोख चटक थी लेकिन सपनों से एक दूसरे उड़ान की कल्पना और उम्मीद तो रखी ही जा सकती थी। इस बेहद रोचक आलेख के बारे में डा. अनुराग की टिप्पणी है उम्र के साथ शौंक कम नहीं होती.....अजीब तरह से घुल मिल जाते है .... सपने आर ई एम् ओर नॉन आर ई एम् स्लीप के दरमियाँ मेमोरी सेल को इफेक्ट करने लगते है पर किताबे ....बीच बीच में बाहर आकर जिंदगी का रिफ्रेश बटन दबा जाती है। एक ओर "प्र्त्यक्षाना "अंदाज!

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ग़ज़ल के बहाने ज़िन्दगी की हक़ीक़तों से रू-ब-रू करा रहे हैं श्याम सखा 'श्याम'। इनकी ग़ज़ल जिसको भी मारा अपनो ने मारा है एक बहुत ही अच्छी ग़ज़ल है, जो दिल के साथ-साथ दिमाग़ में भी जगह बनाती है।

खारा है सागर सचमुच खारा है
नदिया ने फ़िर भी सब कुछ वारा है
जीत सदा सच की होती कहने भर को
सच बेचारा द्वापर में भी हारा है
बेशक यह सुन्दर और गठीली भी है
देह मगर कहते सांसो की कारा है

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हिन्दी साहित्य मंच से रंजना (रंजू) भाटिया कह रही हैं बहुत दिन हुए फिर से हंसी की बरसात का बेमौसम वो सावन नहीं देखा। इस कविता में बहुत खूबसूरती से उन्होंने बचपन के दिनों को याद किया है।

बहुत दिन हुए ..
यूँ बचपने को .....
फिर से जी के नहीं देखा....
और एक बार मिलना है

उन कपड़ों की गुड़िया से..

जिनको ब्याह दिया था..
सामने वाली खिड़की के गुड्डे से

यह कविता सिर्फ सरोवर-नदी-सागर, फूल-पत्ते-वृक्ष आसमान की चादर पर टंके चांद-सूरज-तारे का लुभावन संसार ही नहीं, वरन जीवन की हमारी बहुत सी जानी पहचानी, अति साधारण चीजों का संसार भी है। यह कविता उदात्ता को ही नहीं साधारण को भी ग्रहण करती दिखती है।

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जिसने अकेले ही हजारों अजेय राक्षसों का संहार किया -
जिसने कर्तव्य की कठोरता को भावनाओं की कोमलता के आगे कभी झुकने नहीं दिया और कर्तव्य की घडी उपस्थित होने पर अपने ही खून के टुकड़ों का खून करने के लिए , अपने ही हाथों अपने वंश को निर्वंश करने के लिए , जीवन की सुरम्य वाटिका में आग लगाकर अपने ही हाथों उजाड़ने के लिए लव और कुश जैसे पुत्रों से युद्ध करने के तैयार हो गया - वह राम ही था| आस्था और आशावादिता से भरपूर स्वर इस रचना में मुखरित हुए हैं । आगे यहां पढिए।

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फिर शुरू हुआ समस्यायों का सिलसिला आज पानी नहीं आया...बिजली नहीं है...बच्चे हिंदी में फेल हो गए..उफ़ कितनी गर्मी है ..हाय कितनी महंगाई है....और फिर से वही ....बेकार आये काश वहीँ रह जाते....ये तो अजीब घनचक्कर है चक्कर ....आपको समझ में आया ये चक्कर? अजी जब अब तक शिखा वार्ष्णेय जी (इस रचना की लेखिका) को नहीं समझ में आया तो आपको क्या खाक समझ में आएगा ये चक्कर घनचक्कर। इस व्यंग्यात्मक आलेख पर शहरोज़ जी कहते हैं अंदाज़ भले व्यंग्यात्मक हो लेकिन ऐसी विडंबना की ओर लेखिका संकेत देती है जो आज की या यूँ कहें भौतिकवादी-समय की नियति है!! जिस से हम सभी दो-चार हैं, गाहे-ब-गाहे.हाँ! रूप-रंग में अंतर हो सकता है लेकिन उसकी दुष्टताएँ सामान ही हैं।

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पूनम श्रीवास्तव जी की कविता वक़्त की डोर सीधे सीधे जीवन से जुड़ी है इस कविता में नैराश्य कहीं नहीं दीखता। एक अदम्य जिजीविषा का भाव है। कविता में इस भाव की अभिव्यक्ति हुई है।

वक्त के संग संग चलना

मजबूरी नहीं जरूरत है

जो कदम मिला ले

वक्त के संग तो

वक्त भी हम कदम बन जाता है।

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आज का सबसे ज़्यादा पसंदीदा

चिट्ठा जगत पर दिख रहे सबसे अधिक टिप्पणियों के आधार पर ...

विवाह की 29वीं वर्षगांठ पर अरविंद मिश्र जी कह रहे हैं परिणय के वर्ष हुए आज उनतीस ना कोई खटपट हुई ना रिश्ते छत्तीस। बताते हैं सुधियों के वातायन में उनतीस वर्ष पीछे लौटता हूँ -इलाहाबाद विश्विद्यालय के ताराचंद छात्रावास में था उन दिनों एक शोधार्थी ..पिता जी ने लडकी देखी और शादी तय कर दी बिना मुझसे जाने बूझे ,पूंछे पछोरे। हम भी उन्हें ढेरो बधाई और शुभकामनाएं देते हैं। जीवन बस ऐसे ही चलता जाए। लड़ते झगड़ते मनते मनाते। इसी में प्यार और मुहब्बत है।

गिरिजेश राव जी का कहना है

एक आशीर्वाद, जाने किसका, उठ रहा मन में
सधते रहें तब भी जब मुँह में 32 न हों।

अरुण प्रकाश जी का कहना है आज के दिन उनका विशेष आभार प्रदर्शन करना चाहिये जिनका आप के ब्लाग विषयो के चयन पर कोई सम्पादकीय नियन्त्रण ना होने के कारण ही आप द्वारा इतना उच्च कोटि का विषयगामी पोस्ट पढने को मिला।

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हमारी पसंद

आज की हमारी पसंद है अजय झा जी की पोस्ट।

ये निर्विवाद सत्य है कि ब्लोग्गिंग की विधा , एकनिरंकुश और निर्बाध मंच है अभिव्यक्ति का , सभी के लिए ब्लोग्गिंग में आने के, ब्लोग लिखने के , पढने के अपने अपने निहितार्थ हैं ।आपकी अभिव्यक्ति सिर्फ़ तब तक ही आपकी रहेगी जब तक कि वोआप तक सीमित रहे कुछ मित्र ब्लोग्गर्स जाने अनजाने बार बार अपनी टिप्पणियों से ,अपनी पोस्टों से किसी बहसको , किसी मुद्दे को अपने तरीके से रख रहे हैं और ऐसा करने में वे बार बार उससीमा को पार कर रहे हैं जो तो अभिवयक्ति के दायरे में आता है ही किसीऔर ..।पता नहीं क्यों और किस बात से नाराज़ होकर पूरे ब्लोगजगत को हीएक गलत दिशा में ले जाने में लगे हुए हैं अजय झा जी ने खुल कर बात सामने रखी है और आग्रह किया हैकिकिसी दूसरेके अंदर के जानवर को उकसा कर जगाएं ........क्या पता अंदर से निकलाजानवर डायनासोर ही साबित हो ? यदि आप उनको फालो करते होंगे तो आपने पाया होगा कि वे कुछ दिनों से कुछ खास गतिविधियों से छुब्ध से लग रहे थे और काफ़ी दिनों से आत्ममंथन करते हुए से लग रहे थे। उनके आक्रोश में जो दिख रहा है, मुद्दा उससे ज्यादा गंभीर है। झा जी ने खुलकर बातें सामने रखी है, दरअसल यह विमर्श का निमंत्रण है। इस पर चर्चा आगे बढाते हुए राज भाटिया जी कहते हैं छद्म प्रोफ़ाईलधारी वाले और बिना फ़ोटो के या किसी बच्चे की या हीरो हीरोईन की फ़ोटो वाले ब्लांग पर जाना ही बन्द कर दे, उन की टिपण्णियो का जबाब ही ना दो उन पर गोर ही ना करो, क्योकि जितने भी झगडे होते है आधे से ज्यादा इन्ही लोगो की करतूत से होते है: ओर जो किसी की भी टांग खींचे पहले उसे समझाया जाये, अगर ना समझे तो सब उस से रास्ता अलग कर ले, झगडे की कोई बात ही नही। मुझे यह सलाह काफ़ी पसंद आई। आपका क्या मनना है?

किंतु कई लोगों की प्रतिक्रियाएं पढ़ कर मन दुखी हो जाता है। ऐसा लगता है कि इस माध्यम का प्रयोग वे अपनी कुंठा और भड़ास निकालने में कर रहें है।

जो तबियत हरी नहीं करते,

उनसे हम दोस्ती नहीं करते।

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चलते-चलते

डा. सत्यव्रत शर्मा की एक कविता

जनतंत्र अगर यही है

तो हमारे लिये नहीं है

वह सुशील माहौल

सदियों तक रोता है

जिसे यह पता नहीं होता कि

अपराध का अंत

व्यवस्था के अंत के साथ होता है।

*** *** ***

भूल-चूक माफ़! नमस्ते! अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे।

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31 टिप्‍पणियां:

  1. Sundar charcha, bahut se acche acche links mile...Dhanywaad!
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

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  2. आदरणीय
    आप अपने ब्लॉग से हिन्दी ब्लॉगर्स को जो निस्वार्थ सेवा दे रहे हैं वह श्लाघनीय एवम्‌ अनुकरणीय है।जब कभी हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास लिखा जाएगा तो
    आप व श्री आशीष खंडेलवाल सरीखे लोगों का जिक्र उसने कहा था के लेखक गुलेरी जी जैसा ही होगा ऐसा मेरा मानना है।

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  3. मनोज जी आपकी चर्चा की तो छटा निराली है,
    बहुत ही सुंदर चर्चा।
    आभार

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  4. वाह सभी तरह की विशेषताओं के साथ..

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  5. मनोज जी
    आपने मेरे ब्लाग www.kaduvasach.blogspot.com मे प्रकाशित "लालची बुढडा" को चर्चा मे शामिल किया, बहुत बहुत शुक्रिया !
    आपके द्वारा की गईं सभी चर्चाएं महत्वपूर्ण हैं!
    बेहतरीन व सार्थक अभिव्यक्ति,बधाई !
    श्याम कोरी 'उदय'

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  6. काफी समेट लिया आपने आज तो -आपकी अच्छी बात यह है की आप डूब कर पोस्टों को पढ़ते हैं .
    और बुरी बात पर मैंने ध्यान देना छोड़ दिया है कम से कम इस होली तक तो जरूर ही

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  7. किसी दूसरेके अंदर के जानवर को उकसा कर न जगाएं ........क्या पता अंदर से निकलाजानवर डायनासोर ही साबित हो ?

    वाह कितना सही और सच हैं , बचपन से हर कन्या को यही समझाया जाता रहा हैं और उसी बात को सीना ठोक कर लडके जिन्दगी जीते हैं । ब्लॉग जगत भी इस वक्तव्य कि पीठ थपथपा रहा हैं पढ़ कर विरक्ति हुई लेकिन फिर याद आया कि आम ब्लॉगर यानी जो रेगुलर नहीं पोस्ट से पोस्ट को मिलते नहीं हैं और जो रेगुलर हैं वो इनकी पीठ थपथपा कर जानवर को उकसाते हैं । चलिये देखना हैं और किस किस का जानवर बाहर आकर किस कि बलि लेगा और किस किस का चीर हरण होगा ।

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  8. कुछ अलग तरह की चर्चा. अच्छा लगा.

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  9. समर्पित भाव से की गयी चिट्ठा-चर्चा । अत्यन्त विस्तृत भी और सुन्दर चयन भी । आभार ।

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  10. अजय झा की पोस्ट से मैं सहमत हूँ , हर पोस्ट में लेखक का अपना एक मंतव्य और सन्देश निहित होता है मगर पाठक अपनी मनस्थिति के हिसाब से ही उसका अर्थ निकालता है! बहुत से उसे निकृष्ट और कुछ धमकी युक्त भी मान सकते हैं ! वर्चस्व की होड़ में शामिल बड़े बड़े नाम भी अक्सर शालीनता की सीमा तोड़ते पाए जाते हैं, गरिमायुक्त दुशाला ओढ़े आत्ममुग्ध हम ब्लागर, अपने सामने वाले को कुछ गिनते ही नहीं और ठीक वैसे ही अजय झा जैसे समझदार नवयुवक, आसानी से अगर प्रभावित न हों तो इसमें आश्चर्य और अपमान कैसा !
    अगर धुरंधरों ने अपनी आत्म मुग्धता न छोडी तो समझिये ना फ़रमानी के दिन आ गए और हर जगह नए अजय झा मुस्कराते मिलेंगे !!

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  11. बहुत सुन्दर पोस्ट
    सभी ब्लोगर को एक सूत्र में पिरोया है और निष्पक्ष टिप्णी की है |
    जो की काबिले तारीफ है |
    और सभी ब्लोगर का इसी बहाने अपने होली मिलन समारोह भी करा दिया
    आपको होली की शुभकामनाएं

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  12. आदरणीय मनोज कुमार जी, आपने हमारी होली की कविता को चिट्ठा चर्चा में शामिल किया, धन्यवाद .
    मेरे अपने ब्लॉग पर भी कभी नज़र करें - http://rakeshsoham.blogspot.com/
    मेरी एक और पोस्ट जो ध्वनि प्रदूषण पर है : http://i-prakriti.blogspot.com/ भी आपकी नज़र . होली के रंग-गुलाल .
    [] राकेश 'सोहम'

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  13. वाह कितना सही और सच हैं , बचपन से हर कन्या को यही समझाया जाता रहा हैं और उसी बात को सीना ठोक कर लडके जिन्दगी जीते हैं । ब्लॉग जगत भी इस वक्तव्य कि पीठ थपथपा रहा हैं पढ़ कर विरक्ति हुई लेकिन फिर याद आया कि आम ब्लॉगर यानी जो रेगुलर नहीं पोस्ट से पोस्ट को मिलते नहीं हैं और जो रेगुलर हैं वो इनकी पीठ थपथपा कर जानवर को उकसाते हैं । चलिये देखना हैं और किस किस का जानवर बाहर आकर किस कि बलि लेगा और किस किस का चीर हरण होगा ।


    ओतेरे कि .....अमां ये कौन जाग गया .....ओह मतलब कि ये भी आपके लिए लिखा गया था .....राम राम राम राम ....नारायण नारायण ...ये तो जुलम है जी एकदम घनघोर जुलम ....ओह चलिए कोई तो जागा
    अजय कुमार झा

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  14. जब जागेगा इन्सान
    जमाना देखेगा

    इन्तजार मे

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  15. आपकी चिट्ठा चर्चा विस्तार लिए होती है और यह बात मुझे अच्छी लगती है

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  16. बहुत सारे लिनक्स मिले इस से पढने के लिए ""बहुत दिन हुए "'कविता को शामिल करने के लिए शुक्रिया ..

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  17. महोदय, मेरी ब्लाग पोस्ट ''दिनचर्या का वर्केबल मॉडल ढूंढा जाना चाहिये'' को चिट्ठा चर्चा में सम्मिलित करने तथा विचारों से सहमति प्रकट करने के लिये आभार। मैंने चिट्ठा चर्चा पहली बार देखा है, अब इसी को देख लिया करूंगा ताकि सारे चिट्ठों की अच्छी पोस्ट अल्प श्रम में ही प्राप्त हो जायेंगी। धन्यवाद।
    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता, जोधपुर

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  18. बेहतरीन चर्चा. लगता है आप भी फागुन के बहकावे में आ ही गए हैं मनोज जी!

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  19. क्या जमाना आ गया है ! किसी के अन्दर जानवर सोया हुआ है और कहते हैं कि उसे जगाओ मत । उसकी हेल्प करो भैये । जगाओ उसे, बाहर निकालो और ले जाकर जंगल में छोड़ दो । लेकिन ध्यान रहे कि अगर जानवर बाघ है तो उसे मारना हरगिज़ नहीं है । सुना है बाघ कम ही बचे हैं ।

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  20. बेहतरीन चर्चा के लिए बधाई ।

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  21. समर्पित भाव से की गयी चिट्ठा-चर्चा । अत्यन्त विस्तृत...shukriya

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  22. बढ़िया चर्चा है...बहुत सारी पोस्ट्स के लिंक्स हैं ...

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  23. बहुत विस्‍तार से और अच्‍छी चर्चा .. आप चूंकि साप्‍ताहिक चर्चा करते हैं .. सप्‍ताह भर के महत्‍वपूर्ण पोस्‍ट एक जगह इकट्ठा कर दें .. तो पाठकों को बहुत सुविधा होगी !!

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  24. विस्तृत चर्चा.....नए ब्लोग्स भी पढने को मिले....

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  25. बढ़िया चर्चा है...बहुत सारी पोस्ट्स के लिंक्स हैं ...


    जय हो!

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  26. विस्तृत चर्चा ...कई अच्छे लिंक मिले ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  27. सुन्दर है जी सुन्दर है। मजेदार च!

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