बुधवार, अक्तूबर 07, 2009

प्रस्तुत है आज की चिठ्ठा चर्चा..

नमस्कार चिट्ठा चर्चा में आपका स्वागत है.. टाईम कम है और ब्लॉग्स ज़्यादा इसलिए हम तुरंत चलते है अपने पहले ब्लॉग की ओर..

रंजना जी अपने ब्लॉग पर नक्सलियो के उत्पात के बारे में लिखती है

यह हमारे देश की कैसी न्याय प्रणाली है,जिसमे दुर्दांत अपराधियों के मानवाधिकारों के लिए भी इतनी चिंता की जाती है कि न्यायिक प्रक्रिया में उसमे और सामान्य अपराधी में कोई भेद नहीं किया जाता और दूसरी ओर कमजोर मासूम आदमी की रक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं....

कहा जाता है कि दलित शोषित गरीब लोग हथियार उठा नक्सली बन रहे हैं.यदि यह समूह दलित शोषित उन गरीब लोगों का है,जिनके पास अन्न,वस्त्र,छत,जमीन और रोजी रोजगार नहीं हैं, तो भला इनके पास बेशकीमती अत्याधुनिक हथियार कहाँ से आ जाते हैं ?? यह सोचने और हंसने वाली बात है..यह किसी से छुपा नहीं अब कि, इस समूह के आय के श्रोत क्या हैं और इनके उद्देश्य क्या हैं...


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रंजना सिंह

समूह तो पथभ्रष्ट हो ही चुका है,पर सबसे दुखद यह है कि हमारे देश के कर्ताधर्ताओं को अभी भी यह कोई बड़ी समस्या नहीं लगती.हमारे यहाँ एक विचित्र व्यवस्था है,व्यक्ति का अपराध ही दंड प्रक्रिया से गुजरता है,समूह का अपराध जघन्य नहीं माना जाता और उसमे भी जितना बड़ा समूह, वह उतना ही उच्छश्रृंखल उतना ही मुक्त होता है... जानकार जानते हैं कि अपने ही देश में कई समूहों ने इसे अपना रोजगार बना लिया है..कहीं उल्फा ,कहीं नक्सल कहीं किसी और नाम से एक समूह संगठित होता है

निर्भय जैन अपने ब्लॉग पर करवा चौथ की कथा के बारे में लिखते है

एक समय की बात है कि एक करवा नाम की पतिव्रता धोबिन स्त्री अपने पति के साथ तुंगभद्रा नदी के किनारे के गाँव में रहती थी। उसका पति बूढ़ा और निर्बल था। करवा का पति एक दिन नदी के किनारे कपड़े धो रहा था कि अचानक एक मगरमच्छ उसका पाँव अपने दाँतों में दबाकर उसे यमलोक की ओर ले जाने लगा। वृद्ध पति से कुछ नहीं बन पड़ा तो वह करवा...करवा.... कह के अपनी पत्नी को पुकारने लगा।…………. पूर्ण कथा आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते है

ब्लॉग सच्चाई कुछ और है पर 'ab inconvenienti' सिगरेट पिने वालो के लिए लिखते है

मेरे नज़रिए से तो सभी सिगरेट शराब पीने वाले, गुठखा-तम्बाकू-पान खाने वाले लोग बुरे, कुसंस्कारी और अनैतिक होते हैं. पर मैं कभी किसी को मना नहीं करता, बल्कि कभी कभी अपने पैसे से सिगरेट पिला देता हूँ, जिससे की यह धरती के बोझ जल्द दुनिया से विदा लें या फिर जल्द ही काम करने लायक न बचें. वैसे ही जनसँख्या काफी बढ़ रही है. लिविंग स्पेस की भारी कमी हो रही है, कुछ स्मोकर्स मरेंगे तो अच्छे लोगों के लिए ज्यादा मौके होंगे.

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तकनीकी बाते

यूनिकोड कन्सॉर्शियम, लाभ न कमाने वाला एक संगठन है जिसकी स्थापना यूनिकोड स्टैंडर्ड, जो आधुनिक सॉफ्टवेयर उत्पादों और मानकों में पाठ की प्रस्तुति को निर्दिष्ट करता है, के विकास, विस्तार और इसके प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। इस कन्सॉर्शियम के सदस्यों में, कम्प्यूटर और सूचना उद्योग में विभिन्न निगम और संगठन शामिल हैं। इस कन्सॉर्शियम का वित्तपोषण पूर्णतः सदस्यों के शुल्क से किया जाता है।


प्रवीण त्रिवेदी

अपने चिट्ठे या ब्लॉग पर ज्यादा पाठक कैसे लाये जायें इस पर अंग्रेजी में तो इंटरनेट पर ढेरों लेख मिल जायेंगे। हिंदी में इस बारे में बहुत ही कम लिखा गया है। और अगर लिखा गया है तो ज्यातार वही तरीके लिखे गये हैं जो अंग्रेजी में लिखे गये हैं। भारतीय जरूरतों के हिसाब से हिंदी  चिट्ठों के लिये SEO यानि Search Engine Optimization (गूगल से हिंदी अनुवाद ’खोज इंजन अनुकूलन’) की जरूरतें अलग भी हो सकती हैं।

जगदीश भाटिया
एक छोटी सी जावा स्क्रिप्ट से आप यू-ट्यूब से विडियो को ।MP4 फॉर्मेट में डाउनलोड कर सकेंगे | मैं स्क्रिप्ट यहाँ लिख रहा हूँ ,उसे आप जिस विडियो को डाउनलोड करना चाहते है ,उसी पेज के URL बार में पेस्ट करना होगा | बस चित्र की तरह आपके सामने विडियो फाइल डाउनलोड के लिए तैयार मिलेगी |

राहुल प्रताप सिंह राठौड़

हिन्दी में गूगल सर्च करने के प्रति अब लोगों की रुचि बढ़ते जा रही है। यकीन नहीं होता तो http://google.co.in खोलिए और अंग्रेजी के एक दो अक्षर टाइप कीजिए। फौरन आपके समक्ष ड्रॉपडाउन बॉक्स खुलेगा और हिन्दी में किए गए सर्च की लिस्ट दिखाई देने लगेगी।

जी के अवधिया

ब्लॉग दिल की बात पर डा. अनुराग आर्य कुछ यु फरमाते है


कहते है ये वक़्त तकनीक का है पर तकनीक की  दुनिया की अपनी पेचीदगिया है .....बाजार   की  अंगुली थाम के   बढे होते बच्चे   है ..चौबीस साल के घनघोर कैरियरिस्ट है....ज्यादा   फ्लेक्सेबल  रीड की हड्डिया है ....ख्वाहिशे   डबल   अंडर लाइन करे भागता  युवा  है    ...   अपने अपने  इगो की  बड़ी  बड़ी  आलीशान  ड्योढी में  बैठकर इतराने वाले कुछ अधेड़   दुनियादार   लोग है ...  ...   इत्ते  बड़े  बड़े  रंग बिरंगे  ग्लो साइन बोर्ड   है जो रात  को  चमककर सच ओर झूठ  को  गडमड कर देते है .. .   ..ओर हर   ख्वाहिश पे  अलादीन  का चिराग न सही ...एक अदद  इ एम  आई   जरूर  है ...काश चेप्टर होते जिंदगी के भी .....किसी स्कूल में सिखाया जाता ...कैसे   खामोशी   से   मुमकिन है .......इत्ते  मुखोटो  में  रोज आवाजाही .....कैसे पकड़ना जमीर का इक कोना ...जब दुनियादारी का बुलडोज़र बढा आये
anurag अनुराग आर्य


कविताओ का कोना


फिर कोई
पूछ ही लेता है
घर के बारे में
माँ-पिता के बारे में
अजूबा सा लगता होगा
एक प्रौढ़ लड़की
बिना अभिभावक के अकेले
कैसे काटती है ज़िंदगी,
जी लेगी वो
अगर दुनिया
ना कुरेदे
उसके ज़ख्मों को

- अराधना चतुर्वेदी
3
यूँ मैं झेलता तुम्हारे जाने की आवाज़
कि सीढ़ियों पर बिछा देता अपनी आँखें

और नीचे की ओर धंसती इस कुतुब मीनार से
नीचे फेंकता कीचड में
अपनी कविताएँ एक एक करके।
मैं तुम्हारे जबड़े में
डालता अपना दिमाग
और शराब की बासी गंध के बीच
तुम मुझे तमीज़ से खाती जानेमन।

 
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एक दिन नश्वरता का होगा 
भीगी पलकों 
रुंधे कंठ और 
हृदय में हाहाकार का होगा 
शेष सबका होगा 
बस तुम्हारा न होगा 
वह एक दिन
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गये वक्त को मै,
ऎश की तरह झाड देता हू
और वो माटी के साथ मिल जाता
है,
खो जाता है उसी मे कही......
बस होठो पर एक रुमानी
अहसास होता है,
कहते है कि वक्त को जलाने का भी
अपना ही मज़ा है......

- पंकज उपाध्याय
3
देखो तो खिला है चाँद कैसा तीज का
चौथ का होता भला तो इस तरह देता दरस ?
ढूंढ़ते फिरते अटारी ,
आंगना,घर द्वार हम
ताकते रहते उचक कचनेरियों  के पार हम
देखते, अटका  न हो वो 
बदलियों की आड़ में या फिसल कर गिर गया  हो बेरियों के झाड़ में

बाथरूम में घुसकर उछलने वाले चालू मेंढको से किस प्रकार निजात पायी विवेक सिंह ने.. आइये देखते है 


मेंढक भी कम चालू नहीं था । मैंने आदमी के अलावा कभी किसी जीव को इतना चालू नहीं देखा । मैं उसे हाथ से पकड़ना नहीं चाहता था । चाहता भी तो शायद पकड़ न पाता । लिहाजा मग से पानी भरकर उसे बहाने की कोशिश की किन्तु उसने भाँप लिया और जहाँ मैंने पानी डाला वहाँ से पहले ही वह सुरक्षित स्थान की ओर पलायन कर गया । मैंने कई मग पानी इसी तरह असफल प्रयास में बहा दिया । मेंढक कभी बाल्टी के पीछे छिप जाता तो कभी वाश बेसिन से आने वाले डेढ़ इन्च के पाइप के पीछे जा छिपता ।
VIVEKSINGH विवेक सिंह



ब्लॉग काव्य मंजूषा पर लिखा गया है
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धर्म और संस्कृति दो अलग-अलग विधाएं हैं ....धर्म आप पर आपके जन्म के साथ ही थोप दिया जाता है....मेरा जन्म हिन्दू परिवार में हुआ इसलिए मैं हिन्दू हूँ.....मेरा अपना कोई चुनाव नहीं है....लेकिन संस्कृति !!..जहाँ लोग रहते हैं वहीँ की अपनाते हैं....
आज मैं यह बताना चाहती हूँ की हम महिलाएं इस धर्मवाद से कितनी अलग हैं ...
महिला हिन्दू हो या मुसलमान पुरुषों की अपेक्षा हर अच्छी चीज़ जल्दी अपना लेती है...

ब्लॉग काल चिंतन पर टी चैनलों द्वारा अमिताभ बच्चन की अच्छी फिल्मो को ना दिखाए जाने पर लेख लिखा गया है

देखता हूँ एक बार फिर से "अब तक बच्चन" नाम से मेक्स चैनल पर अमिताभ बच्चन की फिल्मों की श्रृंखला परोसी जा रही है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब किसी चैनल ने इस मेगास्टार के सम्मान में ऐसा प्रयास किया हो। लेकिन बार बार उसी घिसी पिटी लिस्ट को दोहराना चैनलों को लकीर का फ़कीर साबित करता है। ऐसा भी नहीं है कि फिल्मों का चयन उनकी बॉक्स ऑफिस सफलता के आधार पर किया जाता हो। मि नटवरलाल, इन्कलाब, शहंशाह, अग्निपथ अपने ज़माने की सुपर हिट फिल्मों में नहीं गिनी जाती। सूर्यवंषम जैसी फिल्मों का प्रदर्शन तो हास्यास्पद है।

ब्लॉग चीरफाड़ पर एस.एन. विनोद जी लिखते है

राहुल गांधी फिर चूक कर बैठे। देश और कांग्रेस के इतिहास का या तो इन्हें ज्ञान नहीं या फिर ये देश की पूरी जनता को अज्ञानी मान बैठे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो राहुल गांधी उत्तरप्रदेश में अपने जनसंपर्क अभियान के दौरान यह कदापि नहीं कहते कि ''...मेरा परिवार एक बार जो ठान लेता है उसे पूरा करके ही छोड़ता है। यह मत भूलिए कि मैं इंदिरा गांधी का पोता हूं।ÓÓ इन शब्दों को उछालकर आखिर राहुल गांधी देश को क्या संदेश देना चाहते हैं?
mr s[1].n vinod1 एस.एन. विनोद


राजीव जैन अपने ब्लॉग पर बता रहे है एक स्वाभिमानी व्यक्ति की कहानी

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ऑफिस के लिए निकला ही था कि किसी ने हाथ देकर लि�ट मांग ली। मेरे बैठाते ही भाई ने अपनी कहानी सुनाना शुरू कर दिया। कहने लगा कोटा से आ रहा हूं दौसा जाना है, जहां तक जाओ छोड़ देना। मैंने कहा, कोटा से पैदल। बोला कि मजदूरी को लेकर ठेकेदार से लड़ाई हो गई, इसलिए छोड़कर आ गया। मैंने कहा तो पैदल क्यूं आ गए। बोला कि साहब पैसे नहीं थे, इसलिए आ गया। मैंने कहा भाई ट्रेन तो सरकारी है, उसी में आ जाते। बोला बैठा था पर टीटी आ गया। पैसे मांगने लगा, मेरे पास थे नहीं तो लप्पड़ मार दिया। बस उतर कर पैदल ही चला आ रहा हूं।



आज के कार्टून


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ब्लॉग मानसिक हलचल पर बुधवारीय पोस्ट में प्रवीण पाण्डेय जी कार्यक्षेत्रों में दिखने वाले चार आयामों वाले व्यक्तित्वों के बारे में बता रहे है 

1 पहले लोग वो हैं जो न केवल अपना कार्य समुचित ढंग से करते हैं अपितु अपने वरिष्ठ व कनिष्ठ सहयोगियों के द्वारा ठेले गये कार्यों को मना नहीं कर पाते हैं। कर्मशीलता को समर्पित ऐसे सज्जन अपने व्यक्तिगत जीवन पर ध्यान न देते हुये औरों को सुविधाभोगी बनाते हैं।

2 दूसरे लोग वो हैं जो सुविधावश वह कार्य करने लगते हैं जो कि उन्हें आता है और वह कार्य छोड़ देते हैं जो कि उन्हें करना चाहिये। यद्यपि उनके कनिष्ठ सहयोगी सक्षम हैं और अपना कार्य ढंग से कर सकते हैं पर कुछ नया न सीखने के सुविधा में उन्हें पुराना कार्य करने में ही मन लगता है। इस दशा में उनके द्वारा छोड़ा हुया कार्य या तो उनका वरिष्ठ सहयोगी करता है या कोई नहीं करता है।

3 तीसरे लोग वो हैं जिन्हें कार्य को खेल रूप में खेलने में मजा आता है। यदि कार्य तुरन्त हो गया तो उसमें रोमान्च नहीं आता है। कार्य को बढ़ा चढ़ा कर बताने व पूर्ण होने के बाद उसका श्रेय लेने की प्रक्रिया में उन्हें आनन्द की अनुभूति होती है।

4 चौथे लोग वो हैं जो सक्षम हैं पर उन्हें यह भी लगता है कि सरकार उनके द्वारा किये हुये कार्यों के अनुरूप वेतन नहीं दे रही है तो वे कार्य के प्रवाह में ही जगह जगह बाँध बनाकर बिजली पैदा कर लेते हैं।



पोस्ट ऑफ़ द डे

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पोस्ट ऑफ़ द डे में पढिये कंचन जी के ब्लॉग पर ब्रेव लेडी "श्रीमती संजीता राजरिशी" जी के बारे में


मैं उनकी बात नही कर रही...उनके विषय में तो सबने खूब लिखा...सबने दुआएं की.... सबने प्रेम दिया..! वाक़ई अच्छा भी लगा और गर्व भी हुआ कि जिससे रक्षा का वचन लिया वो इस क़ाबिल है-

बात उनकी करूँगी जिस का इस समर में नाम भी नही और योद्धा भी महान है जो...जिसके हाथ में तलवार भी नही मगर लड़ाई जीतने का जज़्बा जिससे होकर जाता है।

"हाँ भाभी मै कंचन बोल रही हूँ।"
"हाय कंचन ..कैसी हो ??"
"ठीक हूँ भाभी आप कैसी है..?"
"मै ठीक हूँ..." साथ शायद उनके दिमाग में कुछ आया और उन्होने पूँछा
"भईया से तुम्हारी बात हुई ?"
"कहाँ भाभी"

"ओह..तभी तुम ऐसे बात कर रही हो...!कुछ नही हुआ भईया को कंचन। he is very fine.बस हलका सा छिल गया है। उन्हे आई०सी०यू० मे रखा है ना इसलिये बात नही हो पा रही उनसे। तुम बिलकुल चिंता ना करो बच्चे..!"


बाप रे... खुद पे शर्म आने लगी। जो बात मैं जान रही हूँ, वो ये भी जान रही हैं। जिनसे मैं ६ माह से जुड़ी हूँ उनसे वो १४ साल से जुड़ी हैं। जो बात मुझे लग रही है उसके १० २० गुना ज्यादा इन्हे लग रही है। फिर भी बस एक बात कि जिस शख्स से बातकर रही हैं वो उस से जुड़ा है जिससे वो जुड़ी हैं। बस इस बात के चलते अपनी बात किनारे और ऐसा सामान्य और प्रेम भरा व्यवहार।

मैने कितनी बार प्रणाम किया उन्हे..!क्या इन्ही महिलाओं की कहानी सुनी है मैने इतिहास में। जिनके बारे में कल्पना करती हूँ, कि वो कैसी होंगी..??



तो दोस्तों ये थी आज की चिठ्ठा चर्चा.. कल और आज में कई ब्लोग्स ऐसे थे जिन पर कुछ अच्छी पोस्ट आई पर सबको समेटना थोडा मुश्किल था.. कुछ पोस्ट के लिंक आप भी टिपण्णी के माध्यम से दे सकते है.. अभी हम विदा लेते है.. फिरमिलेंगे

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24 टिप्‍पणियां:

  1. http://mithileshdubey.blogspot.com/2009/10/blog-post_06.html

    आप इस चिट्ठे को शामिल कर सकते है।

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  2. बेहद खूबसूरत फॉर्मेटिंग ! सजी सँवरी बेहतर चिट्ठों के उल्लेख वाली इस चर्चा के लिये धन्यवाद ।

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  3. भाई कुशजी!, क्या वाचन किया है चिठठा चर्चा का शुब्बान अल्ला! अति सुन्दर, पर बडॆ ही अच्छे से, बहूत मगल भावनाऎ. वैसे हम तो आपके लेखनी के पुराने फ़ैन है जी!

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  4. संतुलित चर्चा के साथ एक अच्छा पृष्ठ संयोजन
    बधाई

    बी एस पाबला

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  5. आपका यह पत्रिका कलेवर कम्प्लीट है
    हीट है
    चर्चा उत्कृष्ट है.

    - सुलभ सतरंगी (यादों का इंद्रजाल)

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  6. शानदार चिट्ठाचर्चा। नया कलेवर बढ़िया है

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  7. " कभी कभी अपने पैसे से सिगरेट पिला देता हूँ, जिससे की यह धरती के बोझ जल्द दुनिया से विदा लें"

    वाह जी, अच्छा तरीका ढूंढ निकाला धरती को हल्का करने का:)

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  8. तुमने कहा जल्दबाजी में की गयी चर्चा है यह......लेकिन यह यही सिद्ध करता है कि कलाकार कलाकार ही होता है,कितनी भी हडबडी में वह अपना काम क्यों न कर जाए,वह अनूठी ही रचेगा.....

    बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर चर्चा...हमलोग तो इन्तजार करते रहते हैं,तुम्हारे चिट्ठाचर्चा का...जियो...

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  9. कलेवर खूबसूरत है .गौरव ओर पंकज की कविता बहुत पसंद आयी...इसे आप आजाद नज़्म भी कह सकते है ...पर नंदिनी जी का लिखा यहां पढियेगा .बेहद खूबसूरत है.....
    मुहब्बत की उम्र से ज्यादा

    दूसरा प्रकाश जी ने बेहद खूबसूरती से कुछ टुकडो को जोड़ा है उन्हें

    यहां
    देखिये ....
    एक नज़्म कल दर्शन ने लिखी थी बेहद उम्दा थी....कल वक़्त मिला तो उसका भी लिंक दूंगा.....अभी निकलना है .

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  10. खूबसूरत कलेवर में चर्चा !

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  11. बहुत सुन्दर अन्दाज़ में प्रस्तुत चर्चा.

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  12. प्रिय कुश भाई,
    बहुत सधी हुई, संतुलित और सुन्दर चर्चा। बिल्कुल ऐसा लगा जैसे आपके साथ बैठकर आपकी स्नेहमयी, दार्शनिक और साहित्यिक अंदाज़ वाली कॉफ़ी पी रहे हों। आभार।

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  13. कुश जी आपका यह प्रस्तुतिकरण का तरीका हमे पसन्द आया । यह सुरुचिपूर्ण होने के साथ सुविधाजनक भी है । बधाई ।

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  14. कुश भाई..धन्यवाद हमारी ’आज़ाद नज़्म को’ शामिल करने के लिये :) और यकी मानिये सब कुछ यही मिल गया..अब क्या गूगल रीडर खोलू? :)

    आभार लीजिये॥

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  15. बेहतर प्रस्तुति !
    तुमसे और क्या उम्मीद ही की जा सकती है ?

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  16. वाह....!
    आज की चिट्ठा-चर्चा तो बड़े करीने से सजाई है।
    बधाई है......बधाई है........!!

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  17. kush ji,
    baap re chittha charcha mein kitnon ki shakal nazar aayi hain
    aur dekhiye hamri dulhan bhi muskaayi hai..
    thank you, shukriya, dhanyawaad..

    उत्तर देंहटाएं
  18. नया रूप और नई सज्जा भा गई है मन को अब तो ये ई पत्रिका हो गई और चर्चा भी खास लगी

    उत्तर देंहटाएं

चिट्ठा चर्चा हिन्दी चिट्ठामंडल का अपना मंच है। कृपया अपनी प्रतिक्रिया देते समय इसका मान रखें। असभ्य भाषा व व्यक्तिगत आक्षेप करने वाली टिप्पणियाँ हटा दी जायेंगी।

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