मंगलवार, अक्तूबर 13, 2009

तुम्हारा तसव्वुर, तुम्हारे कांधे सा महकता है


दिये


दीवाली आने वाली है। नीरजजी दिया जला दिये पहले से ही। हर कोने अतरे में एक दिया। राज जैन की कविता पेश करते हुये वे आवाह्नन करते हैं:
एक मुहब्बत के कुएँ पर
नोंक झोंक की नुक्कड़ पर भी
एक भरोसे के दरखत पर
चतुराई की चौपड़ पर भी

हर कोना हो जाए रोशन

दिये जला देना मेरे मन

इस पर सागर की टिपियावन है: गोया कहीं पैर रखने का जगेहे नहीं छोड़ा! अब उ कोना में दिया ले के कैसे जाएँ... ? एक ठो दिया हमारे असमंजस पर भी जलाया जाये...

सागर ब्लाग जगत के अनछुये बिम्ब पेश करने वाले लिक्खाड़ हैं। इत्ते कि कुश बौखला के क्या मारे जलन के कहते हैं -मैं तो कहता हु साले तुम पागल हो गए हो. टिप्पणी के साथ लगी स्माइली से कुश की खुशी टप्प-टप्प चूती दिखती है कि अपना कोई तो है। लेकिन ऊ वाली लाइन भी तो देखी जाये जिसके लिये कुश ने और साथियों ने ऐसा कहा। सागर लिखते हैं:
तुम्हारा तसव्वुर, तुम्हारे कांधे सा महकता है
तुम्हें ता-उम्र चांद ने नहलाया होगा

हो सके तो उस तिल को क्वांरा रखना
मेरे चूमे से जो गहरा गया होगा

अब देखिये ससुर तसव्वुर ( याद ही न) में इत्ती कशिश कि वो कांधे सा महके तो बकिया का क्या हाल होगा। एक जवां दिल वाला ही ऐसी धांस के कल्पना कर सकता है। तिल को क्वांरा रखने की गुजारिश। क्या बात है मियां। जैसे लगता है कि किसी पैसेंजर ट्रेन की सीट पर रूमाल धर के चला जाये कहकर- भाई साहब मेरी सीट जरा देखे रहना। अद्बुत है मियां। पढ़कर आनंद आ जाता है। इस थकेली और सकेली दुनियां में ऐसी हसीन कल्पनायें युवा मन ही कर सकता है और डंके की चोट पर कर सकता है। जियो भैया सागर।

ओम आर्य भी भैया जबरदस्त संवेदना वाले उस्ताद हैं। आज मामला कुछ अलगाव वाला है:
ना संभाल कर रखने को छोड़ा
कोई निशान
ना यादों के लिए कोई लकीर,
जिसे पकड़ के कभी दुबारा लौटना हो सके

एक लम्हा था
जो पलटा तो
एक तरफ कुछ कागजात थे हमारे दस्तख़त वाले
और दूसरी तरफ
उसकी पीठ जा रही थी.

ओम आर्य की यह कविता बांचकर ओ.हेनरी की एक मानवीय संवेदन से भरपूर कहानी याद आ गयी। उस कहानी में एक बुजुर्ग दम्पति जिंदगी भर की कलह से ऊबकर तलाक ले लेते हैं। तलाक लेने के बाद उनको लगता है कि वे एक-दूसरे के पूरक हो गये हैं। एक-दूसरे के बिना उनका जीवन संभव ही नहीं है। वे दुबारा जज के पास जाते हैं शादी करने और तलाक निरस्त कराने के लिये। जज फ़ीस के पैसे बताता है। पैसे उनके पास होते नहीं हैं। रात को वे दोनों मिलकर उसी जज को लूट लेते हैं और अगले दिन शादी की अर्जी देते हैं। जज पहचान लेता है कि रुपया उसी का लुटा हुआ रुपया है। लेकिन वह चुपचाप उनका निकाह पढ़वा देता।

बात प्रेम कविताओं की अगर हो तो मुझे लगता है कि पूजा ने जिस आवेग की कवितायें लिखी हैं वे अद्भुत हैं। वे बकैत कवियत्री हैं। उनकी कवितायें उनके मूड की गुलामी करती हैं। तीन दिन पहले अपनी एक कविता में वे लिखती हैं:

सड़कों सड़कों क़दमों की आहट चुन लूँ
फ़िर तेरे लौट आने का गुमां हो जाए

तेरी आंखों में हँसता ख़ुद को देखूं
यूँ जिंदगी जीने का गुमां हो जाए


प्रशान्त ने भी अपने ब्लाग पर अपने ई-मेल से उठाकर कविता चेंप दी है। देखिये:
ईश्वर है
कि बस पहाड़ पर लुढ़कने से बच गये
बच्चे लौट आये स्कूल से सकुशल
पिता चिन्तामुक्त मां हंस रही है
प्रसव में जच्चा-बच्चा स्वस्थ हैं
दोस्त कहता है कि याद आती है
षड्यंत्रों के बीच बचा हुआ है जीवन
रसातल को नहीं गयी पृथ्वी अभी तक!

तुम डर से
भोले विश्वासों में तब्दील हो गये हो
ईश्वर बाबू!!!


प्रशांत ने पिछले दिनों कुछ बहुत बेहतरीन पोस्टें लिखीं। ऐसी ही एक पोस्ट है दो बजिया बैराग्य। यह एक ऐसे युवा मन के मन की बात है जो दुनिया और खुद अपनी नजरों में उतना सफ़ल नहीं है जितना हो सकता है/था। मैं इसे कई बार पढ़ चुका हूं लेकिन समझ में नहीं आया क्या टिपियाऊं। ऐसी पोस्टें भावुक सी लगती हैं लेकिन सचबयानी है इनकी जो इनको बार-बार पढ़ने पर मजबूर करती है। आप इसे खुद देखिये और बताइये कि आप क्या सोचते हैं। प्रशान्त लिखते हैं:
मुझे एक और आत्मग्लानी अक्सर अंदर से खाये जाती है.. मेरे मुताबिक मैंने अभी तक अपने जीवन में कोई भी ऐसा काम नहीं किया है जिस पर पापा-मम्मी गर्व से कह सकें कि "हां! देखो प्रशान्त मेरा बेटा है.." भैया ने उन्हें इस तरह के इतने मौके दिये हैं कि अब तो उन्हें भी याद नहीं होगा.. भैया सन् 1994 में जब मैट्रिक में गणित में 99 अंक लाये थे तब से उस गिनती की शुरूवात हुई थी, जिसमें आई.आई.टी. में टॉप करना भी शामिल रहा.. भैया उम्र में मुझसे बहुत बड़े नहीं हैं.. ऐसे में हर चीज में मैं उनसे स्पर्धा किया करता था.. और हर चीज में उनसे हारता भी था, चाहे वो कोई खेल हो या पढ़ाई.. उस समय बहुत चिढ़न होती थी.. मगर अब वही बातें अब मैं अपने सभी परिचितों के बीच गर्व से सुनाता हूं कि हां मेरे भैया आई.आई.टी. जैसे संस्थान के टॉपर रह चुके हैं और यू.पी.एस.सी. में भी अच्छे रैंक लाये थे..



पिछले दिनों समीरलालजी के काव्य संग्रह बिखरे मोती का कनाडा में विमोचन हुआ और समीरलाल सम्मानित कर डाले गये। उनको मेरी फ़िर से बधाई। समाचार विस्तार से यहां देखिये।

एक लाईना


  • दिये जला देना मेरे मन : तेल का खर्चा हम देंगे


  • और अंत में


    फ़िलहाल इतना ही। कल की पोस्ट पर टिपियाने में ही टाइम निकल गया इत्ता कि चर्चा सिकुड़ गयी। चलिये फ़िर सही। मौज करिये। मस्त रहिये। एक लाईना फ़िर पोस्ट किया जायेगा। देखते रहियेगा। अपनी रचनाऒं के लिंक भेजिये न जल्दी से। किताब छप जायेगी तब कहेंगे कि हमें नहीं छापा हमें छोड़ दिया।

    ठीक है न! भेजिये जल्दी से अपनी रचनाओं के लिंक।

    चला जाये। दफ़्तर जाना है।

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    27 टिप्‍पणियां:

    1. दफ्तर से लौट कर पुनः ब्लॉगवाणी देख लेना..कहाँ तक लिंक भेजें. :)

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    2. अनूप जी,

      बड़ा बढिंया चर्चा भा।

      सादर,


      मुकेश कुमार तिवारी

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    3. आज की इस चर्चा में कविताओं/कवियों पर बेहद अच्छी पंक्तियाँ लिखी हैं आपने ।

      एक लाइना की प्रतीक्षा है..।

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    4. बहुत खुब। बढिया चर्चा रही

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    5. मस्त महकती चर्चा।ये लिंक-फ़िंक क्या है गुरूजी?

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    6. सुन्दर चर्चा , वैसे साले शब्द की टिप्पणी अच्छी लगी :)

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    7. और हां एक बात तो कहना बहूल ही गया के अच्छा लगा लगा देखकर की उड़नतस्तरी की खुशखबरी की यहाँ चर्चा हुई है ...

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    8. "अह्सासे -जमाना" में सागर जैसे लोगो की बहुत जरुरत है .....दुनियादारी के पेचीदा लफडो में रहकर भी सागराई टच मेंटेन करना वाकई काबिले तारीफ़ है ....

      आपने एक कहानी सुनाई मै एक कविता बताता हूं.... राजेश जोशी जी की एक कविता है ..
      तरह तरह की नाफ्रातो से भरे
      उस बर्बर समय में
      प्रेम का एक मनगढ़ंत किस्सा गढ़ने में
      हर्ज ही क्या है
      प्रेम के हर झूठे किस्से के लिए मन करता है
      जोर जोर से चिल्ला कर कहूं
      मुकरर ........इरशाद !

      ओम साहब भी अपने आप में एक शानदार कवि है ...अभूतपूर्व संवेदना लिए हुए ...उनको पढना अच्छा लगता है ....

      .
      इन दिनों अहमद फराज साहब का एक शेर याद आ रहा है

      बरहम उस खता पे अमीराने शहर है
      उन जोह्डो को मैंने समंदर नहीं कहा


      कमाल है न शायर लोग कितने पते की बात कह जाते है !!!!!!!!

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    9. वाकई इस चर्चा में कविता की सम्मोहक खुशबू है । बहुत ही बेहतरीन संकलन है कविताओं का । सागर जी तो अपनी कल्पना से बिल्कुल अवाक ही कर देते हैं । बाकी सभी कवितायें भी आनंदित कर देने वाली हैं ।

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    10. बेहतरीन चर्चा. ओम, सागर और पूजा की रचनाएँ अनमोल लगीं.

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    11. कविता को लेकर अनूप जी की पसँद लाज़वाब है ।
      इन्हें पढ़ना बस मानो ये ढलती उम्र का ख़िज़ाब है ॥

      ख़िज़ाब लगाने वाले दोस्तों, बुरा मत मान लेना
      क्योंकि गैर-फ़ुरसतियाई चर्चा आलरेडी अच्छी है

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    12. सागर जी उस दाद-खाज से कहीं ज्यादा के हकदार हैं जो अब तक उन्हे मिली..सो उनकी चर्चा देख कर बेहद खुशी मिली..और ठंडक भी !.और ओम साहब की कलम का जादू तो पूरी ब्लॉग-पब्लिक को सम्मोहित किये है..सो बन्दा क्या कहे..हाँ प्रशान्त जी को पहली बार पढ़ना सुखद रहा..धन्यवाद..उम्दा चर्चा के लिये

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    13. सुन्दर चर्चा...एक लाइना बहुत शानदार.

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    14. बहुत ही सुन्दर चिटठा चर्चा रही आपकी..
      ह्रदय से बधाई...

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    15. कविताओ का अथाह सागर है ये तो.. कहते है ना कि योग्यता कभी छुपी नहीं रह सकती.. सबके सामने आ ही जाती है.. सागर भाई जैसो की जरुरत है इस दुनिया में..

      गुरुवर से सहमत.. कविताओं का आपका चयन वाकई लाजवाब है..

      एक लाईन तो एक लाईन की ही निकली

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    16. अच्छी चर्चा रही और ख़ूबसूरत कवितायें भी पढने को मिलीं...शुक्रिया..

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    17. या अल्लाह! इतने सारे विशेषण... कल कैसा संयोग था कुछ बेहद अच्छे ब्लॉग पर चला गया... जब हम अपनी उपलब्धियों पर खुश होते हैं तभी कुछ ऐसा मिलता है की हैसियत छोटा कर देता है... तब गीता की लाइन सच हो जाती है की यह प्रसन्नता ही तुम्हारे दुखों का कारण है...

      मुझे लगता था मेरे ब्लॉग पर कोई आता भी नहीं होगा... हिम्मत बढ़ने वाले भी कम ही लोग रहे... यह शिकायत नहीं है बस यह कांफेसन है की असरदार हो तभी तो बात बने... लिखने वाले पता नहीं क्या - क्या लिख डालते हैं... मैं तो बस एक कोशिश करता हूँ...

      कल भी यह पेज देखा था समझ नहीं आया की क्या जवाब दूँ... प्रशांत हमारे ही राज्य का है... उसके मन की हालत मैं समझ सकता हूँ... उस दौर से गुज़रा हूँ... ऐसे पन्ने मेरे डायरी में भी दर्ज हैं... संभवतः सबकी जिंदगी में ऐसे दिन आते होंगे...

      रही ओम आर्य की बात तो उनसे जब भी फ़ोन पर बात होती है हम बात कम हंसते ज्यादा हैं... उस वक़्त पता नहीं चलता यह इंसान बला की कवितायेँ लिख सकता है... इसमें कोई शक नहीं उनकी हर सोच कविता है... यही वज़ह है की वो मुसलसल बेहतर लिख रहे हैं... वरना ज्यादा पेड़ काटने से कुल्हाडी में धार नहीं रहती...

      काफी साजिदा बातें कर रहा हूँ ना...

      तो चलिए...

      ... कल सबने खूब मौज लिया ना यहाँ ! (कॉपीराइट - अनूप शुक्ल) हमको भी आपने आप पर काफी गुमान हो आया... लगा गालिब को वक़्त रहते दुनिया ने पहचान लिया... वरना हम भी गुरुदत्त की तरेह गलियों में ... यह गुमनाम शायर यह महलों की दुनिया.... दारु पी के डोलते रहते...

      एक इत्तेफाक और भी है - गुमनाम शायर ने सारी महफिल लूट ली (कुश की रीसेंट पोस्ट)...
      साले ! नामुराद ...
      हा- हा- हां...

      अनुराग जी ने चंद लाइन में फ़राज़ साहेब और राजेश की पंग्तियाँ दोहरा कर इस महफिल में आग लगा दी...

      मुकरर ........इरशाद !

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    18. abhi dekha ye post..
      kya kahun? jo likha tha sachche dil se likha tha..

      Om arya ji ki kavitayen bhi badhiya lagi.. :)

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    19. इतनी देर एक लाईना का इंतज़ार किये...पर एक लाइन के बाद दूसरी नहीं आई...आज की पोस्ट में कविताओं का चयन वाकई लाजवाब कर देने वाला है. सागर को इधर हाल में मैंने भी पढ़ा है...कल्पनाओं की बेहद खूबसूरत उड़ान भरता है वो भी. ऐसे मोती आप ही ला सकते हैं अनूप जी.
      पीडी की सबसे अच्छी बात ये लगती है की बिलकुल इमानदारी से लिखता है, जैसे अपने तरफ के किसी से बैठ कर बातें कर रही होऊं. ब्लॉग्गिंग के जरिये जाने गए लोगों में सबसे ज्यादा बात उसी से की है. बहुत भला बन्दा है :)

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