रविवार, मार्च 04, 2007

होली के दिन दिल खिल जाते हैं


डा.टंडन


आज होली है। कहीं-कहीं तो हो ली है। इसीलिये ब्लागमंडल में पोस्टों की संख्या कम है। बहरहाल आप सभी को होली की मुबारक देते हुये आज की चर्चा करने चलते हैं।

होली पर साथी ब्लागरों नें आपको रंगीन शुभकामनायें दी हैं। इन रंगीनियों का दीदार करने के लिये आप अपनेदिल के दरमियां देखें, डा.टंडन के दवाखाने आयें, अच्छी चीजें देखें
टंडन जी जहां कहते हैं होली के दिन दिल खिल जाते हैं/रंगो में रंग मिल जाते हैं वहीं मोहिंदर अपने दिल का दर्पण दिखाने लगे। साथ में घुघुती बासुती जी के सवाल के जवाब भी देते गये। एक सवाल के जवाब में वे फर्माते हैं:-
बहुत से सपने आते हैं मुझे.. कुछ भूल जाता हूं कुछ याद भी रह्ते हैं. दिलचस्प सपना जो मुझे याद है वह बचपन का सपना है जिसमें रात को सपने में बहुत से पैसे मिलते थे.. मैं इक्ट्ठा करता रहता मगर जब आंख खुलती तब ठनठनगोपाल...

इधर इनका सपना टूटा नहीं उधर से अवधियाजी बोले लेओ अयोध्याकांड पढ़ो। और जहां पढ़ाई की बात शुरू हुयी उधर से मिर्ची सेठ एनसीआरटी कीकिताबें ले आये कि लेव पढ़ो। आज होली के दिन किताबें सही में मिर्ची की तरह लगेंगी लेकिन जिनकी किताबें गाय-बकरी खा गयीं होंगे और आगे बोर्ड के इम्तहान हैं वे लोग कहेंगे भैया पंकज जुग-जुग जियो।

किताबों के सजाल जाल से अलग डा.बेजी होली के मूड में हैं और अपनी फरमाइश पेश करती हैं:-
तुमसे होकर गुजर जाने दो
रंगो में बिखर जाने दो

बिखरे हुए रंगो को
अंग से लिपट जाने दो

अरे बेजी जी ऐसे पूछा थोड़ी न जाता है होली के दिन। बिखर जाया जाता है, गुजर जाया जाता है, लिपट जाया जाता है। आगे वे अपना जुगाड़ भी बताती हैं कि कहां से रंग का इंतजाम करेंगी:-
सूरज की लाली से आज...
टेसू का रंग लाकर दो....

नीले गगन से मुझे...
रंगीन बदली चुराकर दो...

आगे कुछ बताने के पहले कुछ समाचार देख लिये जायें।लोकमत का नाम बेहतर होगा कि हिंदूमत रख लिया जाये काहे से कि यहां की अधिकतर खबरें हिंदू, मुसलमान, पाकिस्तान से संबंधित रहती हैं। यह एक समूह साइट है। कई लोग दिन में लिखते हैं। जानकारी परक लेख भी रहते हैं। कुछ लोगों को आपत्ति थी कि लोकमत की पोस्टें नारद का सारा पन्ना घेर लेती हैं इसलिये जीतेंन्द्र ने तात्कालिक उपाय यह किया नारद में इसकी कैटेगरी बदल दी। इससे जीतू के नाराज अनुज और प्रशंसक शशिसिंह ने इसे सेंसर की तरह बताया है। अभी इस बारे में कुछ और आगे फैसला हो तब तक आप लोकमत की साइट पर के समाचार देख लें।

इन समाचारों में ग्लोबल वार्मिंग का भारत पर असर से शुरु करके हिंदी यहूदी एकता की बात कहते हुये कश्मीर की घुसपैठ का जिक्र है। मतलब कुल जमा आठ पोस्टों का जायजा आप ले सकते हैं अगर आप लोकमंच देखें।

मोहल्ले से

इसके बाद बात मोहल्ले की। देश की चिंता करते हुये मोहल्ले वाले साथी कहते हैं- दलाल जहां देवता हैं, उस देश का क्‍या? । आज कुछ सवालों के जवाब देते हुये अभय जी जिनको स्त्रियां अपनी ओर खींचती हैं क्योंकि वे हमारी तरह नहीं होतीं। वे ज्‍यादा सक्षम, समर्पित और सुंदर होती हैं। कहते हैं:-
पता नहीं, किसी भी देश और उस देश के भविष्‍य के बारे में क्‍या राय रखनी चाहिए, क्‍या बोलना-बताना चाहिए। अमर सिंह जैसों का देश है, इस देश के बारे में क्‍या कहा जाए। हमारे गांव में कोई दो मंज़ि‍ला मकान बना लेता है, तो इज्‍ज़तदार हो जाता है, लेकिन कोई नहीं पूछता कि कहां से पैसे लेकर दोमंज़ि‍ला खड़ा कर लिये गुरु। दलाल जहां देवता है, उस देश का क्‍या। जिन जनांदोलनों में हमारी आस्‍था है, वे सच्‍चे होने के बावजूद सत्ता को पलटने की ताक़त नहीं रखते, इसलिए ग़ालिब चचा सही कहते हैं-

कोई उम्‍मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

पहले आती थी हाले दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती

रमन कौल वर्डप्रेस 2.1.1 के खतरे के बारे में बताते हैं।
अभय तिवारी आज मूड में हैं। एक तरफ़ वे रूमी हिंदी में सूफियाना कलाम पेश करते हैं:-
ऎसो होरी की धूम मची है
चहुँ ओर परी है पुकार
ऎसो अनोखो चतुर खिलाड़ी
रंग दीन्यो संसार
नियाज़ पियाला भर भर छिड़के
एक ही रंग सहस पिचकार
वहीं अपने निर्मल आनन्द के क्षणों में नायिका को दुखी करके उसको शब्द भी दे रहे हैं:-
पिचका चलाइ और जुबती भिजाइ नेह
लोचन नचाइ मेरे अंगहि बचाइगो।

सासहि नचाइ भोरी नन्दहि नचाइ खोरी
बैरिन सचाइ गोरी मोहि सकुचाइगो॥

अंत में आज की सबसे अहम पोस्ट के बारे में चर्चा। रविरतलामी रचनाकार में निरन्तर बेहतरीन रचनायें पोस्ट करने का प्रयास करते रहते हैं। आज उन्होंने रविकान्त का लेख प्रस्तुत किया कसपावतार में मनोहर श्याम की भाषा-लीला यह सच है कि जोशीजी के शिल्प का अनूठापन उसके खिलंदड़पन में है। उन्ही जोशी की भाषा के बारे में लिखते हुये रमाकान्तजी कहते हैं
'खिलंदड़ी भाषा' के गूँगे-के-गुड़ का विखंडन करना है। पर ध्‍यान रहे कि यह मैं किसी पहुँचे हुए भाषा-मर्मज्ञ होने के गुमान में या आलोचक के किसी औचक अवतार में नहीं कह रहा हूँ। ये उद्गार एक निरे फ़ैन के हैं, अस्‍तु!
कसप के बारे में लिखते हुये रविकान्तजी लिखते हैं:-
यह कहानी प्रेम-कहानियों की अपनी साहित्यिक विरासत से भी मुखामुखम है, और ख़ुद को कहने के लिए तमाम तरह के संसाधन दस्‍तयाब करती है, उनकी ऐतिहासिक व्यंजना-अक्षमता से जूझती है, उनकी नुक़्ताचीनी करती है, उनसे चुनती-बीनती है, आड़ा-तिरछा, कोहनीमार संबंध बनाते हुए उन्हें फ़ुटनोट में घायल करती चलती है। इस तरह की हायपरलिंक्ड अंतर्पाठ्यता कसप की ख़ासियत है, पर शायद यह समस्त जोशी-वाङ्मय का ही वैभव है। इस अर्थ में जोशीजी थोड़े डिमांडिंग लेखक हैं, उनकी क़िस्सागोई इतालवी उपन्यासकार उम्बर्तो इको जैसी क़िस्सागोई है, कि अगर ख़ूब मज़ा चाहिए तो आपको बहु-नहीं-तो-थोड़ा-पठित तो होना ही चाहिए।
यह लेख पठनीय है, संग्रहणीय है, चर्चनीय है।

आज की फोटो:


आज की फोटो आशीष के अंतरिक्ष से| इसमें रोचक जानकारियां हैं आकर्षक फोटो हैं। देखिये तो सही!

चन्द्रवाहन के पास सेरनन

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4 टिप्‍पणियां:

  1. आपका अंदाज हमेशा की तरह पूर्ण होता है…
    अच्छी चर्चा लगी.।

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  2. होली पर आपकी यह चर्चा बहुत पसंद आई. बधाई.

    होली की बहुत शुभकामनायें और मुबारकबाद!!

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  3. लोकमंच पर संज्ञान लेने के लिए धन्यवाद. लेकिन एक बात स्पष्ट कर दूं कि लोकमंच, लोकमंच ही है हिंदूमत नहीं. जैसा कि नाम से ही जाहिर है लोक मंच यानी लोगों का मंच... यह मंच सभी विचारधाराओं और मान्यताओं के लिए खुला है. यह एक संयोग है कि इस समय इस मंच पर हिंदूमत वालों की बहुलता है. लिहाजा इसकी झलक खबरों लेखों के चयन में दिखना स्वाभाविक है. मेरा दूसरे मतावलंबियों को खुला आमंत्रण हैं कि वे भी इस मंच का हिस्सा बनें और यहां लोकवाद का संतुलन बनायें.

    शशि सिंह
    लोकमंच

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  4. दिव्याभ,समीरलालजी को शुक्रिया।
    शशि, आमीन!

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