बुधवार, मार्च 14, 2007

सागर से पूछो- दरिया कहाँ है

आज मन किया कि कविताओं से शुरुवात की जाये. तो जा पहूँचे हिन्द-युग्म पर. कविता दिखी : सागर से पूछो, दरिया कहाँ है. राजीव रंजन की. सोचा कविता का कुछ अंश यहाँ पढ़वा कर पाठकों को लुभवा कर भेजा जाये, मगर वो तो कॉपी ही नहीं करने देता. हम तो समझ रहे थे कि कविराज सिर्फ़ चोरी बचाने की विधा सिखा रहे हैं जैसे हम सब को सिखाया जाता है कि सच बोलो, किसी का बुरा मत करो, गलत काम मत करो. अरे भाई, यह सब सिखाने की बातें हैं और विकल्प के आभाव में अपनाने की. आप तो पूरे से ही लागू कर दिये. तो हम कॉपी न कर पाये और फिर से टाईप करने का माद्दा जुटाना थोड़ा मुश्किल है. तो राजीव भाई जान लें कि यहाँ आपकी कविता के अंश न दिये जाने की वजह गिरिराज हैं, हम नहीं. मगर कविता सुंदर है तो शीर्षक छाप दिया गया है पुनः टंकित कर.

कविताई श्रृंखला मे हम पहूँचे भाई मृणाल कान्त जी के कुछ विचार सुनने, तो बहुत गहरे विचार सुनाये तेरा नाम लेकर मौत का वो जश्‍न करते हैं तीन शेरों की यह रचना भी अति प्रभावशाली है और इसके अंश यहाँ न दिये जाने का कारण अन्य है. अगर हम यहाँ अंश दे दें तो वहाँ जाकर क्या पढ़ेंगे, थोड़ी छोटी है न इसलिये!! वहीं जाकर पढ़िये प्लीज!!

गीत कविता की बात चले और राकेश भाई का दरवाजा न खटखटकायें, यह कम से कम हम से नहीं हो पायेगा. जिनसे हो पाये वो करे.. :)

तो गीत कलश पर पढ़ें ढाई अक्षर दूर :


भटक गया हरकारा बादल, भ्रमित कहाँ, मैं सोच रहा
मेरे घर से ढाई अक्षर दूर तुम्हारा गांव है

मेघदूत को बाँधा है मैने कुछ नूतन अनुबन्धों में
और पठाये हैं सन्देशे सब, बून्दों वाले छंदों में
जो मधुपों ने कहे कली से उसकी पहली अँगड़ाई पर,
वे सबके सब शब्द पिरो कर भेजे मैने सौगंधों में

किन्तु गगन के गलियारे में नीरवता फ़ैली मीलों तक
नहीं दिखाई दे बादल की मुट्ठी भर भी छांव है........


फिर अगले मुलाकाती मोहिन्द्र भाई बिन पंख उड़ते मिले. अच्छा संदेश देती एक अच्छी रचना लिये:


जिसे आज हम गा रहे हैं
हम से भी अधिक
ऊंचे स्वर में


वैसे अगर आपको कविता में दिलचस्पी न भी हो तो भी आप मोहिन्द्र भाई के ब्लाग दिल का दर्पण-परावर्तन पर जायें और विश्व कप क्रिकेट का स्कोर कार्ड देखें.

इसी तरह के स्कोर कार्ड और विश्व कप क्रिकेट का हाल बताने का प्रबंध तरकश पर भी किया गया है. अब जब तरकश पर जायेंगे ही तो फुरसतिया जी की पॉडकास्ट पर हुई परेड और खुशी का बेहतरीन अंदाज भी सुन आईयेगा और मिडिया मंत्र कॉलम में पंकज द्वारा दिये गये विज्ञापनों को भी देखें.

अरे, कविता की चर्चा चलते चलते ये कहाँ आ गये. चलिये वापस चलें:

फिर गये हिन्द-युग्म पर. अबकी मोहिन्द्र भी मिले, कविता भी दूसरी थी संस्कृति पलायन. समस्या वही पहले वाली. तो मोहिन्द्र की यह वाली कविता ज्यादा मूल्यवान कहलाई क्योंकि यह चोरों से बचाई गई है.

शब्दायन पर दीपक सुनाये प्यार और विश्वास और रवीश भाई के कस्बा में अन्य अनेकों आलेखों जिनमें से कुछ तो वापस भी ले लिये गये हैं, के अलावा मंगलेश डबराल की कविता पागलों का एक वर्णन पढ़े:


पागल होने का कोई नियम नहीं है
इसलिए तमाम पागल अपने अद्वितीय तरीके से पागल होते हैं
स्वभाव में एक दूसरे से अलग
व्यवहार में अकसर एक दूसरे से विपरीत
समांतर रेखाओं जैसे फैलते हैं उनके संसार
वे भूल चुके होते हैं कि पागल होने से
बचे रहने के कई नियम हैं....


फिर जगदीश भाटिया जी के आईना मे झांके तो आनन्द ही आ गया. अमृता प्रीतम जी की कुछ कवितायें पढ़वाई गईं हैं. बहुत साधूवाद जगदीश भाई का:


एक मुलाकात
मैं चुप शान्त और अडोल खड़ी थी
सिर्फ पास बहते समुन्द्र में तूफान था……
फिर समुन्द्र को खुदा जाने
क्या ख्याल आया
उसने तूफान की एक पोटली सी बांधी
मेरे हाथों में थमाई
और हंस कर कुछ दूर हो गया
हैरान थी….
पर उसका चमत्कार ले लिया
पता था कि इस प्रकार की घटना
कभी सदियों में होती है…..


जब अमृता प्रीतम जी की बात चली है तो उनके कथा संग्रह में से एक कहानी दो खिड़कियाँ की समीक्षा सुनिये अपने मनीष भाई की रोचक जुबानी.

इतना घूमते फिरते पढ़ते अब थक से गये तो एक पुराना मनोहर श्याम जोशी जी (जोशी जी ब्लागर नहीं थे :))का जुमला याद आया:

पहिले उदर पूजा-फिर काम दूजा!!

तो चल पड़े प्रत्यक्षा जी के द्वार. बहुत लज़ीज व्यंजन लेकर इंतजार कर रही थीं और साथ साथ थोड़ा थोड़ा खाती भी जा रहीं थी. हमने भी उन्हीं की तरह थोड़ा उदरस्त किया, धन्यवाद ज्ञापन की टिप्पणी की और आगे चल पड़े. आप भी पहूँचे-सिद्धांत वही पुराना-आमंत्रण का काल तब तक, उपलब्ध है माल जब तक!! जल्दी जाओ फिर आगे की कथा सुनना.

आगे देखें तो मसिजीवी बड़ी सालिड चीज लाये हैं कि आइए रचें हिंदी का मौलिक चिट्ठाशास्त्र बातें आचार संहिता से लेकर निति निर्धारण तक की है और निर्णय है कि इसमें समय लगेगा तो ठीक है, लगने दें मगर तब तक एक सुझाव देना चाहूँगा:


अगर किसी ब्लाग पर एक दिन में एक या दो पोस्ट से ज्यादा आने वाली है तो थोड़ा धीरज धर लें और सबको एक ही पोस्ट में आज की पोस्टें टाइप में एक साथ पोस्ट करें ताकि अन्य लोगों को भी कुछ देर मुख्य पृष्ठ पर बने रहने का मौका मिला. दिन भर एक एक करके पोस्ट करते रहने से एक ही ब्लाग की खूब सारी पोस्ट आ जाती है प्रथम पृष्ठ पर..और बाकि सब खिसक जाती हैं दूसरे पर..फिर सबसे नजर अंदाज हो जाती हैं, यहाँ तक की चिट्ठाचर्चक भी भ्रमित हो उन्हें भूल जाता है. शायद सब इस बात को समझेंगे.


खैर, यह सब तो आपसी समझबूझ की बात हो गई. अब देखें अंतरा करवड़े की ५२ लघूकथायें ..एक ही पोस्ट के माध्यम से रवि रतलामी रचनाकार के चिट्ठे पर...कुछ सिखो, अगर यह भी तुम्हारी तरह ५२ एक एक करके १० रोज की दर पर पोस्ट करते तो सब कई दिनों तक धुले रहते...यही यही दिखते, हाँ. बस यही अंतर हो जाता है जो मैं उपर समझाना चाह रहा था.

हमारे पंडित जी श्रीश भाई हमेशा की तरह आज जो क्लास लगाये, उसमें सिखा रहे है कि कैसे पीडीएफ को अन्य डॉक्यूमेंट फॉर्मेट में बदलें और नितीन भाई ने कम्प्यूटर के फंडामेंटल बताये. रवि भाई काहे पीछे छूटें, यह लो उनकी भी ज्ञानवार्ता : संपूर्ण ऑनलाइन शब्द संसाधक अब इसके बाद भी वर्तनी की गल्ती करोगे तो रवि भाई डाटेंगे तो हमारा डांट खाना तो तय है..खा लेंगे भाई का प्रसाद समझ कर.

हमारे आज के पुनः सुपर स्टार पोस्टकर्ता फुरसतिया जी लेकर आये हैं: कह रहे हैं कि अपनी फोटो भेजिये न!! हम तो फोटो खिंचवा भी आये फिर लेख पढ़े तब बहुत दुख हुआ कि यह हमसे नहीं मांगे हैं.


जोशी जी ने मेरी तमाम बेजा तारीफ़ के बाद मुझसे मेरी स्वहस्ताक्षरित फोटो मांगी थी यह कहते हुये -
जब मैं इतना बूढ़ा हो जाउंगा कि सपने देखने लायक न रहूं तो आपकी फोटो मेरे लिये एक खुशनुमा यादगार के रूप में रहेगी। आप अपना ख्याल रखें। आदर सहित आपका संजय कुमार जोशी,
17A,जदुलाल मलिक रोड, कोलकता-6, भारत।


खैर, हमसे तो मांगी नहीं गई तो हम काहे चिंता करें.

आगे बताते हैं जलनियाते हुये कि :


हमें लगा कि सेंसर विभाग ब्लाग की आचार संहिता बनाने का काम जीतू के हाथ सौपकर खर्राटे भरने चला गया। उस पोस्ट में जीतू ने तमाम पाठकों के द्वारा पूछे गये सवालों के जवाब भी दिये थे। उन सवालों को देखकर हमें जीतू से जलन भी हुयी थी कि मातायें-बहने सारे सवाल जीतेंदर से ही काहे पूछती हैं। और यह जलन आज तक बरकरार है जब हमसे कोई कुछ्छ नहीं पूछता। सब सवाल जीतेंन्द्र से पूछते हैं। ये भी पट्ठा हम लोगों से ही पूछ उनको बता देता है और वे लोग समझती हैं कि सब कुछ जैसे यही जानते हैं।


पूरा आलेख पढ़े, बड़े मजेदार वाकिये हैं. इस पोस्ट की एक और खासियत है कि इसमें फुरसतिया जी ने जो मेरी पसंद के तहत विनोद श्रीवास्तव जी जो कविता दी है, उसे सुना और डाउन लोड भी किया जा सकता है. आजकल फुरसतिया जी बड़े टेक्निकल टाइप के होते जा रहे हैं जब से अपनी पॉडकास्ट पर भाभी और खुशी के कारण अतिशय तारीफ के पूल बंधे हैं उसी पर दौड़ रहे हैं.

आज अमित भी पत्रकार और पत्रकारिता पर , हर नागरिक की हो रही झूंझलाहट जिस पर अधिकतर चुप रह जाते हैं, अपने अनोखे अंदाज पर बेबाकी से बोले: समाज के सर्वज्ञ


लेकिन अपने सीमित अनुभव के कारण यह भी जानता हूँ कि पत्रकार नामक दयनीय जन्तु के कान पर जूँ भी न रेंगेगी और वह अपनी टुच्ची मानसिकता, संकीर्ण दृष्टिकोण के साथ इस हीन कार्य में लगा रहेगा।


सुनील दीपक जी अपने छायाचित्र लेकर आये और गणेश यादव जी ने सिखाय थ्रीडी चित्र बनाना

हमारे पाण्डेय जी १८५७ के १५०वीं सालगिरह पर सुभद्रा कुमारी चौहान की झांसी की रानी कविता पढ़वा रहे हैं.


सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में थी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


होली बीते तो समय हो गया मगर इतना भी नहीं कि अनुराग न बता पाये कि कैसे मनायी उन्होंने होली जबकि देबाशीष उससे भी पुरानी ब्लागर मीट की तस्वीरें लिये खड़े हैं. आशीष की अंतरीक्ष सिरीज़ जारी है और अफलातून जी हिन्दू बनाम हिन्दू लेकर आये.जब सबकी सुनी तो मनीषा की भी सुनो कि आई आई टी मुंबई में इंटरनेट पर रोक लगी

उन्मुक्त जी ने आधुनिक दुर्गा की कहानी कही, जीतू के उकसाने पर. इसे पढ़ने के बाद फिर मोहल्ला, कस्बा, अजदक, मिडिया युग वाह मनी, अनामदास का चिट्ठा, निर्मल आनन्द और लाल्टू एवं ज्ञानदत्त पांडेय जी मानसिक हलचल को भी पढ़ना न भूलें.

आज का चित्र:

सुनील जी के ब्लाग से:





अब आज की लंबी चर्चा समाप्त. बहुत लंबी हो गई मगर क्या करें, अब भी अगर कोई छूट गया हो तो क्षमा करना भाई, टिप्पणी में छोड़ देना लोग देख लेंगे और कल कवर लिया जायेगा जैसे कि हमारा चिट्ठा कबीरा चला साईलेंटली जो कि राकेश भाई ने कवर किया मगर लोगों ने ध्यान नहीं दिया...
अरे अरे दिया मगर सबने नहीं, उसमें तो हमने ये वाली मुंडली भी लिखी थी जो कि हम यहाँ नहीं भी बतायें तो भी आप वहाँ जाकर पढ़ सकते हैं:


कबीरा चला साइलेंटली, मौज में करता सैर
राह बीच दंगल घिरे, नहीं किसी की खैर...
नहीं किसी की खैर, महौल तो रहा बिगड़ता
गाली पे गाली चली, आपस में गुत्थम गुत्था.
कहे समीर कवि कि हमें न तुक है बनता
लोग लगे हैं पूछने कि काहे को चुप हैं संता.


सभी चिट्ठाकार अति उत्साहित हैं और वो ज्यादा जरुरी भी है कि वो लिखें भले ही चर्चा कितनी भी लंबी हो जाये.

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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत मेहनत से बहुत अच्छी तरह चर्चा करी। यह काम कम से कम तीन पोस्टों के बराबर है। बेहतरीन, बधाई। मसिजीवी और अमित की पोस्ट आजकी उपलब्धि मानी जानी चाहिये।

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  2. समीर जी दो खिड़कियाँ अमृता प्रीतम के कहानी संग्रह का नाम है । इस कथा संग्रह की पहली कहानी का नाम भी दो खिड़कियाँ हैं जबकि बाकी छः कहानियों में हर एक का नाम दो औरतें हैं। मेरी समीक्षा पूरी पुस्तक पर है ना कि उस की एक कहानी पर ।

    मसिजीवी वाला सुझाव एक दिन में एक से ज्यादा प्रविष्टि पर रोक ताकि बाकी लोगों की प्रविष्टियाँ मुख्य पेज पर बनीं रहें मैंने नये नारद के बनते समय रखा था पर उस वक्त अमित और जीतू भाई इस बात से सहमत नहीं थे ।

    आपकी चर्चा हमेशा ही विस्तृत रहती है। धन्यवाद अच्छी चर्चा के लिए !

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  3. सिवा आपके लिख सकता था नहीं और कोई यह चर्चा
    पोस्ट नित्य बढ़ती जाती हैं, ये खुशियों से भरी बात है
    किन्तु समय तो है उतना ही, सहमत मैं भी हूँ मनीश से
    छपे पॄष्ठ पहले पर वह भी, हर चिट्ठे को अहम बात है

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