१८-०३-२००७

ये भी सच है कि मोहब्बत में नहीं मैं मजबूर

अइयो अम चेन्नई से आशीष आज चिठठा चर्चा कर रहा है जे। अमारा हिन्दी वोतना अच्छा नई है जे। वो तो अम अमना मेल देख रहा था जे , फुरसतिया जे अमको बोला कि तुम काल का चिठ्ठा चर्चा करना। अम अब बचके किदर जाता। एक बार पहले बी उनने अमको पकड़ा था जे,अम उस दिन बाम्बे बाग गया था। इस बार अमारे पास कोई चान्स नई था जे और अम ये चिठ्ठा चार्चा कर रहा है जे।

अब सुक्लाजे को मालूम नई कि अमको चिठ्ठा चर्चा करने के लिये बोलना पाप है। अमारा अबी अबी एक लड़्की से शादी का बात चल रहा जे, अमने आज उसको फोन बी नई किया और ये चिठठा लिक रहा है। भाई लोगो इन को तोड़ा समजाओ जे।
मनोजय जे थोड़ा कनफुज हो रहा है, उनको समज मे नई आ रहा कि ये मानव शब्द किदर से आया।अपन तो अब भाषा शास्त्री है नई, किसी को मालुम हो तो मनोजय जी को बताइये न जे। वो बोलता कि
तो, कहां से आया 'मानव'? स्पष्ट है - 'मन' से. मन की इच्छा अनुसार जिसकी उपज हो वह मानव कहलाया. पूरी जिंदगी मन के अनुसार, (ना कि पूरी तरह निसर्ग अनुसार) गुजारने की क्षमता जिस में है, वह मानव कहलाया. समस्त प्राणिजगत में यही तो मानव की खासियत है.
भूपेन जी बेलुर मठ मे रम गया है, वो गा रहा है
भले ही कोई योद्धा पुकार ले उन्हें
वो हमेशा हाशिए पर मिलेंगे रणभूमि के
अनाम दासजी ने अभय तिवारी जी को कनफुज कर दिया हैजे। आत्मा परमात्मा , डायनासोर की खीचड़ी बना रहा है जे, अमको कुछ भी समज मे नई आ रहा है। आपके समज मे आये तो अमको भी समजाना ! अम सई बोलता जे, अमको रसम सांब्र और भात अच्छा लगता जे , खिचड़ी अम को नही भाता जे।

अपने आगमन के साथ ही बहुत सारे सवाल खड़े कर देने वाले अनामदास..और मैं... लगता है
हम एक ही राह के मुसाफ़िर हैं.. आपने जो बाते कहीं हैं.. वो मेरे भी दिमाग़ को चकराती रही हैं.. "लेकिन एक बात जो समझ में नहीं आई कि अगर आत्मा न पैदा होती है न मरती है तो दुनिया की आबादी कैसे बढ़ रही है? क्या भगवान के पास आत्माओं का स्टॉक है जो वह वक़्त ज़रूरत के हिसाब से रिलीज़ करता रहता है, क्या उसने तय किया है चीन और भारत
के लिए सबसे अधिक आत्माएँ एलोकेट की जानी चाहिए?" अनामदास का सवाल सोचने लायक है.. आत्मा होती है तो क्या होती है.. क्या हर शरीर की आत्मा अलग होती है.. जैसे उसके कपड़े.. एक के कपड़ों की तरह उसकी आत्मा भी दूसरा नहीं पहन सकता... या कपड़ों ही की तरह कोई भी पहन सकता है.. बस लिहाज़ में नहीं पहनता... या ये कोई स्कूलनुमा
सिस्टम है जहां आप चौरासी लाख योनियों में से गुज़र कर आखिर में महाबोध हासिल करके डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजे जाते हैं..

इदर आत्मा परमात्मा की बाता चलता, उदर रवीश कुमार भविष्य मे जा कर पता नई क्या क्या खुरापात करता जे।

आज अमको फुरसतिया जे ने चिठ्ठा चर्चा करने फसांया तो सब लोगोने अमको परेशान करने को पता नही क्या कया लिक डाला अब ये देको ना अम अभी आत्मापरमात्मा से परेशान था, वहां से निकला तो रवीश कुमार ने अमको भविष्य मे भेजा, अब रचनाकार मे उत्तम पटेल जी ने उत्तर आधुनिकता के बारे मे क्या क्या लिक डाला । अब आप इसको पढो, नई अमको इसका मतबल नई समजाना।
उत्तर आधुनिकता विचार या दर्शन से अधिक एक प्रवृत्ति का नाम है। यह बीसवीं शताब्दी की मूल धारा है। यह संपूर्ण आधुनिक यूरोपीय दर्शन के प्रति एक तीव्र प्रतिक्रिया है-देकार्त, सार्त्र एवम् जर्मन चिंतकों के प्रति। पाउलोस मार ग्रगोरिओस के मतानुसार उत्तर आधुनिकता एक विचारधारा या लक्ष्य केंद्रित या नियम अनुशासित आंदोलन न होकर पश्चिमी मानवतावाद की दुर्दशा है। यह लक्ष्यों, नियमों, सरल रेखाओं तथा साधारण विचारों पर विचार नहीं करती। यह आधुनिक पाश्चात्य मानवतावाद की अग्रचेतना की एक स्थिति है। ल्योतार, रोर्टी, फूको एवम् देरिदा आदि के दर्शन मुख्य रूप से हेगल के प्रत्ययवादी (Idealist) विचारों की चेतन प्रतिक्रिया के रूप में विकसित हुए
हैं।
सुरेश चिपलुणकर वातावरण की चिंता करता है जे, वो सई बोलता है जे।
"हमें प्रकृति से वही लेना चाहिये जो वह हमें गर्व से और सहर्ष दे, यदि आप जोर-जबर्दस्ती से कुछ छीनना चाहेंगे तो प्रकृति स्वयं की संपूर्ति और आपकी आपूर्ति नहीं कर सकती" ।
इस बात मे बौत दम है जे, तोडा विचार करना जे।

रवि रतलामी जी मतबल की अमारा होनेवाला मामा ससुरजी ब्लागर और एजेक्स के बारे मे सबको बता ता है जे।

राजसमन्द वालो को एक चिठ्ठी मीला है जे, और वो सबको बता रहा है जे, आप बी उनका चिठ्ठी पढो़ जे
हर व्यक्ती दोडा जा रहा है एक प्रकार की अन्धी दौड में, जाने कहां ये रास्ता पहुंच रहा है, किसी को पता नहीं, हर कोई चरम पर जाना चाहता है, पर क्या कोई पहुंच पाया है। बहुत बडी माया है पेसे की, कहते है ना बाप बडा ना भईया, सबसे बडा रुपईया । वेसे देस की रोटी जेसे टापिक पर तो हम एक बडी सी कोपी भर सकते हें । एसी ही वेराग्य की फालतु बातें फिर कभी सहीं। क्यों ना नाम फिल्म से पंकज उधास का गाया हुआ वह प्रसिद् गीत सुना जाए "चिट्ठी आयी है" । आंखों से आंसु छलक ना पडे तो कहना ।
प्रतिक बाबू के पास बौत समय जे, ये जब देको तब सुंदर सुंदर लड़की का फोटो दिकाता केलोगो को बीगाड़्ता जे, अब ये पता नई किदर से १०० हाथ और १००० आंख लेके आया है जे।
पंकज पराशर जी आज फिराक गोरखपूरी को याद करता जे
ये भी सच है कि मोहब्बत में नहीं मैं मजबूर
ये भी सच है कि तेरा हुश्न कुछ ऐसा भी नहीं
दिल की गिनती न यगानों में न बेगानों में
लेकिन इस जल्वागाह-ए-नाज से उठता भी नहीं
आज का सबसे अच्छा चिठ्ठा अमको ये लगा जे, पंकज पराशर जी अमको बताया प्यार पहली नजर मे होता है। अम इसको पूरा सपोर्ट करता जे। अमारे साथ बी ऐसाच हुआ।अमने बी पहलीच बार मे लड़्की पसंद किया जे।
इस शोध करने वालों में से एक प्रोफ़ेसर आर्टिमियो रामिरेज़ कहते हैं, "हम सब किसी भी व्यक्ति को देखते ही सोच लेते हैं कि हम उससे किस तरह का रिश्ता रखना चाहते हैं. इससे पता चलता है कि हम वो रिश्ता बनाने के लिए कितना प्रयास करना चाहते हैं."
सागर जी सई बोलता जी, चिठ्ठा चर्चा करना आसान काम नई जी, बौत मेहनत का काम है जे।

दिप्ती पंत जी ने अपना नया चिठ्ठा बनाया है जे , सब भाई लोगो से अम निवेदन करता है जे उनका उतसाह बढाने का। वैसे अमको ये रालीभा का मतबल नई समजा।

कमल शर्मा जी झुमरी तलैया के लोगो को याद करता जे।

हिन्दूस्तान टाइम्स मे हिन्दी ब्लाग के बारे मे खबर छपा है जे। सब लोग इस के बारेमे लिका है। सब लोगो को इस खबर मे नारद के बारे मे नई छापने का दूख है। रविजी, संजय जी, धूरविरोधी जी सब इस बारे मे एक एक चिठ्ठा छापा है जे। आप बी खबर पढो जे।

शैलेश भारतवासी आप लोगो से एक निवेदन कर रहा है जे और योगेश जी आपसेकुछ मन की बात करना चाहता जे। योगेश जी चिठठा जगत के विवाद सेतोड़ा दूःखी है जे, उनको जा कर तोड़ा समजाने का जे।
मोहल्ला मे नया लफड़ा हो गया जे। मनीषा जी अमिताभ के बारे मे कुछ बोलता है, आप बी पढो जे। अम इदर साउथ मे तो अपना रजनीकांत और विजयकांत को भगवान मानता है जे।
उस देश में प्रतिभा और कलाकार की परिभाषा तय करने और उसे सम्‍मान देने का है, जहां कोई असगरी बाई का नाम भी नहीं जानता, बिस्मिल्‍ला खां बनारस की तंग गलियों में पूरा जीवन गुजार कर चले जाते हैं और कल के लौंडों को बाज़ार हमारे सामने खड़ा करके कहता है, ये हैं हमारे इंडियन आइडल, और देश की जनता आइडल के पीछे दीवानी हुई जाती है,यूथ पगला गया है। अभिजीत सावंत इज आवर आइडल।


सुनिल दीपकजी परदे के पिछे ताका झांकी करता जे, इनको तोड़ा समझाओ जे। इनके चिठ्ठे मे कमीलाह जानन रशीद बोलता है जे
अगर मैं कहती हूँ कि मैं हिजाब पहन कर भी मजे में हूँ और कोई बँधन नहीं महसूस करती, तो आप मुझसे इस तरह क्यों बात करने लगते हैं मानो कि मैं कोई बच्ची हूँ? आप मुझे यह यकीन क्यों दिलाना चाहते हें कि नहीं मैं धोखे में जी रही हूँ, ऐसा धोखा जिसमें मुझे स्वतंत्रा और दमन में अंतर समझ नहीं आता? सवाल यह कभी नहीं होता कि "कमीलाह का दमन हो रहा है?", क्योंकि मुझे मालूम है कि यह प्रश्न मेरे भले बुरे को सोच कर नहीं
पूछा जा रहा...


रंजु जी का हालत बी अमारे जैसा है जे। अम उनके दिल की बात समझता जे। वो अपना कविता मे अमारे दिल की बात करता जे
देखती रहूं उसे में यूँ ही ,जब तक जब तक ना हो मौत का सवेरा
तेरी बाहों में मरने को इस मौसम में दिल चाहता है अब यह मेरा
प्रमोद जी आज सलीमा मे शरीर की रचना के बारे मे बताता जे।
शायद हमें ‘रामचरितमानस’ की उक्ति याद आए – ‘छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित यह अधम सरीरा।।‘ पर यह पदार्थ (द्रव्य) (matter) की भिन्न अवस्‍थाओं (state)या लक्षणों का वर्णन है। ‘क्षिति’ से अभिप्राय ठोस पदार्थ (solid) है, ‘जल’ से द्रव (liquid),‘समीर’ से गैस, ‘पावक’ से ऊर्जा (energy) और ‘गगन’(space) से शून्यता । शरीर इन सभी से बना है। ये रासायनिक मूल तत्व (chemical elements) नहीं हैं।
ज्ञानदत्त पाण्डेय पांडे जी आपको अवसाद को दूर कर हंसने को बोलता जे, हंसो ना जे , कुल के हसंने का।

बस अब खत्म जे। कल का कहानी रविरतलामीजी बोले तो हमारा मामा सुसुर सुनायेगा!हमारा लीखने का तारीफ़ बी करेगा वो देख लेना! :)
आजका फोटो :इदर देको जी बौत बौत अच्छा है जे
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12 टिप्पणियाँ:

Amit on March 18, 2007 4:00 AM ने कहा…

खूब, अमको पड़ के बोत मजा आया जे। :)

Udan Tashtari on March 18, 2007 8:15 AM ने कहा…

वाकई, आशीष, तुमको पढ़ कर आनन्द आ गया. और रवि रतलामी जी को जहाँ भांजी की सगाई के लिये बधाई वहीं तुमको भी थोड़ी बहुत बधाई तो दी ही जा सकती है. बाकि तो कार्ड का इंतजार रहेगा फिर हम डिसाईड करेंगे कि लड़के की तरफ से आये हैं कि लड़की वालों की तरफ से. :)

अनूप शुक्ला on March 18, 2007 8:30 AM ने कहा…

अच्चा लीखा। भौत मजा आया सब कुछ को पढ़कर। ये तो जरूरी था कि तुम चर्चा करो। चर्चा नहीं करते तो इधर-उधर फोन करते। होने वाला बीबी को डिस्टर्ब करते। उसका एक्जाम खराब होता। अब हम खुश हैं।

अभय तिवारी on March 18, 2007 9:29 AM ने कहा…

क्यों करते हैं आप लोग इस तरह की चर्चा.. मुझे समझ नहीं आया आज तक.. सामान्य भाषा में की गई चर्चा भी बेमतलब ही लगती थी.. इस फूहड़ मद्रासी में इस का स्तर शक्ति कपूर के हास्य जैसा हो गया है.. आप सब लोग धुरन्धर लोग हैं.. मैं नया हूँ..हो सकता है आपकी परिपाटियों और परम्पराओं से अपरिचित हूँ.. लेकिन जिस तरह से मेरे गम्भीर लेख का भद्दा मजाक यहां बनाया गया वो आप सब को पढ़ने में बड़ा मज़ा आया .. ये जानकर थोड़ी हैरत हुई ..इस बातपर नहीं कि गम्भीर का मज़ाक बनाया गया.. मज़ाक हमेशा गम्भीर का बनता रहा है.. उसमें कोई हैरानी नहीं..मगर जिस मंच से बना.. और पीठ ठोंकने वाले उड़नतश्तरी और अनूप शुक्ला जैसे शालीन छवि के लोग हैं.. ये अच्छा नहीं लगा.. हो सकता है अब कई लोग कहें कि अरे भाई आप तो झुट्ठे बुरा मान गये.. अरे ये तो हलका फुलका मजाक रहा.. आप हमारे लिखे को खिचड़ी कहिये और हम आप के लिखे को गू कहें.. आपने तो खिचड़ी खा के हग दिया.. तो कैसा रहे.. तब अभद्र हो जायेगा.. कौन तय करेगा अभद्रता की सीमायें... हो सकता है मैं जबरिया भावुक हो रहा हूँ अपने लिखे पर..जैसा भी है.. समझे आप लोग.. मुझे जो लगा मैंने लिखा..

अनूप शुक्ला on March 18, 2007 12:40 PM ने कहा…

भाई अभय तिवारी, आपका लेख अभी पढ़ा। यह लेख गम्भीर और चर्चा हल्की-फुल्की है। इससे आपके बुरा लगा इसका हमें अफसोस है। लेकिन हमको आशीष की हल्का-फुल्का अन्दाज अच्छा लगा इसलिये तारीफ़ की। आपने जैसा समझा वैसा लिख दिया यह अच्छी बात है। हम कोई बहाना नहीं बना रहे कि आप इसे मजाक में लें या आप बुरा न माने। लेकिन आप इस बार पर फिर से विचार करियेगा कि जिस खिचड़ा भाषा के लिये नाराजगी जाहिर की उससे और आगे के शब्द इस्तेमाल किये जो कि गैरजरूरी थे। उनके बिना आपका आक्रोश बेहतर तरीके से जाहिर हो रहा था। बहरहाल, आपको जो कष्ट हुआ इस चर्चा की खिचड़ी भाषा से, जो कि हमें पसंद आई, इसके लिये अफसोस है। यह हमारे लिये उपलब्धि है कि चिट्ठाचर्चा में अब मुंहदेखी तारीफ़ें ही नहीं बल्कि कमियों की तरफ़ भी इशारा होने लगा है भले ही भावुकता में हो और भाषा की शुद्धता की बातें करते-करते भाषा में खिचड़ी भाषा के आगे के, निपटाने वाले शब्द, शामिल हो गये।

Raviratlami on March 18, 2007 1:27 PM ने कहा…

बोले तो झकास!

भाई, हमें तो बहुतेइच मजा आया. अभय जी भी मजे लेंगे - चिट्ठाजगत् में साल भर गुजारलेने के बाद!

Beji on March 18, 2007 2:46 PM ने कहा…

ऐसी भाषा में चर्चा पढ़कर दुख हुआ । भाषा तो स्वयं में सक्षम है कि अपने व्याकरण और उच्चारण में रह कर भी हास्यापद हो सकती है । कभी चिट्ठों पर ऐसी भाषा देखने को मिलती है...जो फिर भी स्वीकार्य हो सकती है....क्यूँकि यह व्यक्ति विशेष की अभिव्यक्ति है । पर चर्चा में सही भाषा का उपयोग ही सही है।

Shrish on March 18, 2007 3:11 PM ने कहा…

मैं रवि जी से सहमत हूँ, अभय जी कुछ महीनों बाद आप ये बात न कह सकेंगे।

Sagar Chand Nahar on March 18, 2007 3:13 PM ने कहा…

इतनी बुरी भी नहीं यह चर्चा कि अभय जी और बेजी जी को पसन्द ना आई खैर यह तो व्यक्तिगत विचार है उनके।
नये चर्चाकार पहली बार चर्चा करते हैं तब हो सकता है कि कुछ गलतियाँ हो जाये इसके लिये बताना भी चाहिये पर नये चर्चाकार को समय मिलना चाहिये ताकि वह अपनी गलती ना दोहराए।
और रही बात भाषा की तो आशीष भाई ध्यान रखेंगे कि अगली बार यह भाषा प्रयोग ना करें।
वैसे मुझे चर्चा पसन्द आई

Udan Tashtari on March 18, 2007 6:49 PM ने कहा…

अभय भाई

आपका आभार कि आपने इस ओर हम लोगों का ध्यान आकर्षित किया. कभी लगता है कि यूँ ही आपा-धापी और भाग-दौड़ भरे जीवन में कुछ हल्का फुल्का हास्य भी मिल जाये तो ठीक. अक्सर देखा गया है कि जहाँ हास्य लेखन (आशीष ने इस भाषा का इस्तेमाल शायद इसीलिये किया है, वरना तो आप उनका चिट्ठा पढ़ें, बहुत अच्छी हिन्दी लिखते हैं) अधिकतर लोगों को उमंगित करता है निश्चित तौर पर किसी को ठेस भी पहुँचाता है मगर शुद्ध हिन्दी में लिखी अव्यवाहरिक बातें तो सभी को ठेस पहुँचाती हैं जो कि आप स्वभाविक भावावेष में लिख गये. मैं कदाचित आपको गलत या आशीष को सही या कम गलत नहीं ठहरा रहा हूँ. मुझे लगता है कि चर्चा को मनोरंजक बनाने के लिये हर चर्चाकार अपने अनुरुप पूर्ण प्रयास करता है अन्यथा तो इतनी सारी पोस्टों पर एक सिरियस मोड में रोज दर रोज बात करना तो लिखने और पढ़ने दोनों वर्गों के लिये उबाऊ सा हो जायेगा. चर्चाकार कभी मुन्ना भाई बन जाता है तो कभी मद्रासी तो कभी कुछ और-ऐसे वक्त भाषा से ज्यादा आवश्यक यह हो जाता है कि उसने जो भी पात्र सोचा है उसे निभा पाया कि नहीं. फिर भी आपका सुझाव अच्छा है. प्रयास किये जायेंगे कि जब हास्य व्यंग्य की बात चले तो या तो गंभीर मुद्दों को न कवर जाये और या तो अलग से लिंक देकर काम चला दिया जाये. रही बात पीठ ठोकने की तो वो तो हम उनकी मेहनत, लगन और कल्पनाशीलता को देखकर और भविष्य में ऐसा ही उत्साह वो दिखाते रहें, इसलिये भी करते हैं, उसका अन्य कोई अर्थ न लें.

बाकि तो हमारे वरिष्ठ फुरसतिया जी अपनी बात कह ही चुके हैं. पुनः आपका आभार और आपको पहुँची ठेस के लिये हम क्षमाप्रार्थी हैं.

आशीष श्रीवास्तव on March 18, 2007 11:07 PM ने कहा…

अभय जी,
आपकी आलोचना के लिये धन्यवाद! जब मैने यह चर्चा की थी, तबसे मुझे आलोचना की पूरी उम्मीद थी।
आपको मेरी भाषा ठेस से लगी जिसके लिये मुझे खेद है।
मै गंभीर विषय विशेषतः आत्मा, परमात्मा, धर्म , अध्यातम जैसे विषयो का ज्ञान नही रखता हूं। आज की चर्चा मे ऐसे विषय कुछ ज्यादा आ गये थे।
रहा सवाल मद्रासी लहजे का, वह मैने हल्के फुल्के अंदाज मे चर्चा के लिये प्रयोग किया था। मेरी हिन्दी इतनी अच्छी तो नही लेकिन बूरी भी नही है। मै चेन्नई मे पिछले पांच साल से हूं और अपने तमील दोस्तो से इसी तरह की हिन्दी मे वार्तालाप करता हूं। मेरे कीसी भी दोस्त ने कभी इसे दिल से नही लिया, उल्टे वे इसका आनंद उठाते है।

आपकी भावनाओ को ठेस पहुचाने के लिये क्षमाप्रार्थी हूं।
आशीष

अभय तिवारी on March 19, 2007 8:23 AM ने कहा…

मैंने किसी क्षमा की उम्मीद से अपनी बात नहीं लिखी थी..एक भावावेश था..सबके सामने आ गया..किसी को ठेस पहुँचाने की भी नीयत नहीं थी..आप सब की बातें पढ़ने के बाद मेरे दिल में किसी के लिये कोई कलुष नहीं..आशीष को मेरा शुभाशीष.. और आगामी जीवन के लिये शुभकामनायें..

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