गुरुवार, मार्च 08, 2007

चिट्ठा चर्चा : अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

साथियों, मै आपका दोस्त जीतेन्द्र चौधरी फिर से हाजिर हूँ, बुधवार यानि 7 फरवरी, 2007 के सभी चिट्ठो की चर्चा करने के लिए। बुधवार को काफी चिट्ठे लिखे गए, जो यहाँ पर देखे जा सकते है। संजय भाई ने एक मध्यांह चर्चा भी कर दी है, उनका बहुत बहुत धन्यवाद। जो चिट्ठे बच गए है मै उनकी चर्चा करता हूँ।

सबसे पहले तो स्वागत कीजिए नए हिन्दी चिट्ठाकारो का :


(इसमे बेजी का नया चिट्ठा दृष्टिकोण भी शामिल है। )

आज(8 मार्च) अंतराष्ट्रीय महिला दिवस है इसलिए सभी महिला चिट्ठाकारों( प्रत्यक्षा, मानोशी, रचना, प्रेमलता, पूनम, रन्जना, भावना, नीलिमा,दूसरी नीलिमा, बेजी, मान्या, मुक्ता और घुघूती-बासूती,अनुपमा, सोनल, जो छूट गयी है, बिना डांटे,कमेन्ट मे लिखें) को चिट्ठा चर्चा की तरफ़ से हार्दिक शुभकामनाएं और मिमोसा फूल का गुलदस्ता । आज सबसे पहले महिलाओं के चिट्ठों की बात होगी। सबसे पहले शुरु करते है बेजी से, बेजी कहती है:

अभिव्यक्ति और चयन की आज़ादी विरासत में मिली । कोई भी घर का काम लिंग से नहीं जुड़ा था । घर एक इकाई था और जो जिस काम को बेहतर कर सकता था वह काम उसके जिम्मे था । पर इसका मतलब यह नहीं था कि दूसरे बाकी काम नहीं सीखे....हर किसी को हर काम सीख तैयार रखा जाता था । जरूरत के समय सभी तैयार ।कभी सोचती अपनी बिटिया को क्या सीख दूँ । अपनी पहचान ढूँढो.....और जब हासिल करने वाली हो....तब अपने बच्चों की पहचान में योगदान दो ।

पुरुष ने नारी को शायद ही कभी बाँधा है......बेडियाँ एक नारी ने ही अक्सर दूसरे पर डाली है......नारी को ही पहल कर इन्हे खोलना होगा । आज़ाद होना होगा ।
क्यूँ कोख में जन्म देते ही कुचली जाती हैं लड़कियाँ ??
भविष्य में सुरक्षा प्रदान करने का वादा न कर पाने की वजह से ।
बदल दो विचारधारा.....सास और माँ दोनो को सहेजो......
क्यूँ दहेज में जलाई जाती हैं अब तक लड़कियाँ ?
अपने पुत्र के लिए मत माँगो दहेज !
क्यूँ लड़की महज पिता या पति के पहचान के पीछे रहे ?
अपनी बिटिया को आत्मविश्वास दो....पहचान दो...!!
समर्थन पुरुष से नहीं....स्त्री से चाहिये...


मान्या सवाल उठाती है, हाँ नारी हूँ मै, पर क्या है मेरा स्वरुप?

आज भी गर्भ में मेरी आहट या मेरा जन्म विचलित कर देता है मेरे जनक को... आज भी घिरी हूं अशिक्षा के अंधकार से.... जाने कितनी बार जली हूं अग्नि में जीवित या जलायी गई .. कभी 'दहेज की बलि वेदी' पर कभी 'सती' बनाकर... बस सौदर्य की उपमा या भोग की वस्तु ही माना गया मुझे.... तस्वीरों में उकेरी मेरी देह की कलाकृतियाओं पर मंत्रमुग्ध हैं सब... पर जब भी मैने अपने अस्तित्व के लिये नियम तोङे मेरे चरित्र पर सवाल उठाया गया... मेरी तस्वीरों का ModernArt पसंद है .. मेरा पाश्चात्यानुकरण अश्लील माना गया....आज भी बाज़ार गर्म है मेरी देह के क्रय-विक्रय का...


रचना जी, आज महिला दिवस पर बेचारे पुरुष की व्यथा कथा कह रही है,(वैसे तरीका अच्छा लगा) सुनिए आप भी :

हालातों का मारा-मारा
मै तो हूँ आदमी बेचारा!

तुम तो पूजी जाती जग में,
इस धरती पर और अँबर में,
मैं भी बनना चाहूँ तारा!
मैं….

जन्म भी देती, तुम्ही पालती,
संस्कारों में तुम्ही ढालती,
मैं तो हूँ बस एक सहारा!
मैं……

तुम्ही नदी हो, तुम्ही हो धरती,
इस जग को लेकर तुम चलती,
मैं तो हूँ एक बहती धारा!
मैं……
अनुपमा चौहान (हिन्द युग्म पर) लिखती है :

रूप धरा जोगन का मैंने
मीरा हूँ प्रेम से न वंचित कर
तेरे नाम से जहर भी पी जाऊँगी
घुँघरू का झंकार से नाता
मौजों का सागर से नाता
ऐसा नाता तेरा मुझसे है..


सोनल की पनघट की कविता पढिए:
कल मैं भी जाऊँगी छोड़कर इस पनघट का साथ
जो मुझे मिला हर सूना दिन और हर तन्हा रात
कल यहाँ आएँगी फ़िरसे कोई राधा या बेला
फ़िरसे छोड़ जाएँगी इस पनघट को अकेला


नीलिमा नारद मामा(?) से मुखातिब है (अक्सर नारद जी को पकड़ती है ये), इनका कहना है :

भाई हम तो अब वो बोलते बोलते थकाए गए है'जो हमसे बुलवाया जाता रहा है अब तक ।अब वो बोलना है जो हम बोलना चाहते हैं और बाकसम वही बोलेंगें भी ।चुपाए चुपाए बडे दिन हो लिए बातें भी एसी कि किससे कहें कोई तो मिले दिलदार सुननेवाला ।ये क्या कि पहले तो मुहं खोलिबे की हिम्मत न हो ,जैसे तैसे जुटाए रहें तो सैन-बैन, तीर तरकस ,तलवारन से लैस जन आजू- बाजू आ खडे हों ।अरे कुछ हम कहें कुछ तुम कहो बातन-बातन में नेक तो काम का विचारो -करो ।ये क्या कि दिल की दिल में र्रखे बैठे रहें,ऊपर ऊपर से मुंडी हिलाए -हिलाए हामी भरे- से दीखते रहें तुम्हारी कही पे ।वैसे बडी गजब सोच दीखे कुछेअक की-आचारसंहिता उचारसंहिता को लेकर कसम से ।अब कौन बनाएगा ये कौन के पास इत्ती सोच -बुद्धि रखी धरी है जरा हमें भी तो कराओ ओके दरसन....


रंजू जी, लिखती है

तुम याद आए आज फिर_
सुबह उठते ही गरम चIय के साथ,
जब जीभ जल गयी थी,
पेपरवाले ने ज़ोर से फेंका अख़बार जब,
मुह्न पर आकर लगा था ज़ोर से,
बाथरूम मैं जाते वक़्त,
जब मेरा पैर भी दरवाज़े से उलझ गया था,

तुम याद आए______________
हर चुभन के साथ.....
हर टूटन के साथ...........
हर चोट के साथ...........
दे गये ना जाने कितने और ज़ख़्म

नोटपैड पर देखिए, शोहरत, पैसे और चकाचौध का आत्महन्ता पहलू
सुषमा कौल के विचार जानिए (ये पोस्ट अंग्रेजी मे है, आशा है वे हिन्दी मे लगातार लिखेंगी)

आइए अब पुरुष चिट्ठाकारों पर भी (संक्षिप्त ही सही) नज़र डाल ली जाए। गिरीश सिंह क्रिकेट विश्वकप के कार्यक्रम का लेखा जोखा दे रहे है। सलीमा वाले पूछ रहे है ये स्क्रीन प्ले किस चिडिया का नाम है? ।पेशे से पत्रकार राहुल अपने किस्से सुना रहे है, और हाँ राहुल को ब्लॉगस्पाट मे थोड़ी दिक्कत आ रही है, कोई साथी इनकी मदद करिएगा। प्रियदर्शन नक्सलवाद पर सवाल उठा रहे है, एक अच्छा लेख, जरुर पढिएगा। अकेले प्रियदर्शन ही नही है सवाल उठाने वाले, बहुत है लगता है आज सवाल पूछने का ही दिन है, देखिए जरा :
अविनाश पूछते है, रंग कितने रंग होते है? (अमां होली वाले दिन तो आफिस मे बैठे थे, अब होली निकल जाने के बाद रंग खेलने का बहाना ढूंढ रहे हो)
नीलिमा पहले ही पूछे थी, नारद मामा का करें, भेजा शोर करता है? (गाना पूरा सुनो, आगे था, भेजे की सुनेगा तो मरेगा कल्लू... कोई भी कल्लू/जुम्मन नही मरना चाहिए,बाकी जो मन मे आए लिखो, ब्लॉग तुम्हारा, हमसे काहे पूछती हो।)
सृजन शिल्पी पूछते है आखिर सरकार ने अपना दृष्टिकोण क्यों बदला? ( आपका लेख नही पढा था उन्होने पहले, अब पढ लिया बदल लिया)
टैली सहायता वाले पूछते है आखिर कहाँ गया मेरा पैसा? (टैली खरीदा था, उसमे चला गया, अब पैसे ही नही बचे)
संजय बेंगानी पूछते है मैने प्रस्ताव क्यों रखा था? (हमसे का पूछते हो, अपने आप से पूछो)

धुरविरोधी पूछते है याहू नहीं, वेबदुनियां नहीं तो कौन दोषी है? (अमां हमे का पता, हमने तो कुछ नही किया माईबाप)

मनीश क्यों पीछे रहे, वो भी पूछते है कौन होगा सरताज गीत? (अबे इत्ते गाने सुना सुना के पका दिए, तब नही पूछा, आखिरी वाले मे भाव काहे खा रहे हो, जल्दी बता दो ना)

ईस्वामी ने भरवां ऊँट की लजीज डिश बनायी है खाए बिना मत जाइएगा। (बशर्ते समीरलाल और अमित गुप्ता आपसे पहले पत्तल ना लगा लें, फिर आपको गुरद्वारे ही जाना पड़ेगा)

आज का चित्र : छायाचित्रकार से



पिछले साल इसी हफ़्ते के चिट्ठे यहाँ रहे। पुरुष चिट्ठाकार आज अपनी पत्नी/गर्लफ्रेन्ड को डिनर( अपने खर्चे पर) पर ले जाएं। अच्छा अब हम निकलते है, हमे सब्जी लाने बाजार जाना है, फिर खाना भी बनाना है, महिला दिवस जो है, इसलिए आज खाना हम ही बनाएंगे। ( ये खाना हमसे बनवाने का आइडिया, एक ब्लॉगर की पत्नी की देखा देखी मे आया था, जब पिछली बार ब्लॉगर से फोन पर बात हुई थी तो वो रोटियां के लिए आटा गूंथते हुए पाए गए थे,उनकी पत्नी मोहल्ले मे कंही गयी हुई थी। आप लोग ब्लॉगर के नाम का अन्दाजा स्वयं लगाइए)

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9 टिप्‍पणियां:

  1. जीतू भाई,
    इसबार तो कमाल कर दिया…
    चर्चा बढ़ी धांसू रही…महिलाओं के विचार को जिस प्रकार एक साथ प्रस्तुत किया है वह बहुत पसंद आया…"महिला दिवस पर मेरी भी सभी महिला मित्रों को शुभकामनाएँ"

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  2. संजय बेंगाणीमार्च 08, 2007 2:37 pm

    मजेदार...
    एक साथ इतने सवाल? मुझसे तो अनजाने में हुआ :)

    महिलाओं को बधाई. आशा है ऐसे दिन जल्दी ही बनाने बन्द होंगे. महिलाएं इतनी सश्क्त हो जाएंगी, भई.

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  3. " ऊन्मुक्त " उन्मुक्त ही हैं इसलिए नए नहीं हैं।

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  4. सही है। आज की चर्चा महिला चिट्ठाचर्चा रही!

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  5. जतेन्द्र जी, बहुत बढिया लिखा है आज का चिट्ठा

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  6. बहुत सही, जीतू भाई!!

    --महिला दिवस पर हमारी बधाई भी स्विकार की जाये!

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  7. शुक्रिया जीतू जी आपकी शुभकाम्नाओं का और चिट्ठा़चर्चा को महिला दिवस के रंग में रंगने का .. दिल्चस्प थी आपकी ये चर्चा ..

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  8. यह तो बहुत मुश्किल हो गयी।
    अरे अफलातून जी यह " ऊन्मुक्त" उन्मुक्त होंगे पर यह " ऊन्मुक्त " "उन्मुक्त" नहीं हैं यानि कि मैं नहीं हूं। और यह "ऊन्मुक्त" वास्तव में नये ही हैं।

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  9. जीतू जी अगर टैली मे पैसा गया है तो चैगुना हो कर निकलेगा, अगर यकीन न हो तो आजमा कर देख लो।वैसे टिप्पणी के लिए धन्यवाद।

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