मंगलवार, मार्च 13, 2007

टपक रही है पिघल चाँदनी

आज तमाशा नया दिखायें चलिये बायस्कोप देखिये
ब्लागिंग युग की कौन प्रियतमा और वाद संवाद देखिये

कबीरा चला साइलेंटली, मौज में करता सैर
राह बीच दंगल घिरे, नहीं किसी की खैर


गडमड हिन्दी देखें पहले और जुगाड़ी लिन्क बाद में
पैसा हुआ कमाना, किस किस के जी का जंजाल देखिये

पत्थर है प्रोफ़ाईल वाला, दिल्ली का इक और नजरिया
न समझे तो मिट जाओगे, लाये पंकज एक खबरिया
कस्बागत के उत्पादों का विवरण यहाँ देख पायेंगे
ई-पंडित जी लिये प्रश्न कूछ खड़े हुए हैं बीच बजरिया

वर्ष गाँठ है दस्तक की हैं हिन्द युग्म पर कुछ कुछ बातें
लाये खबर सैफ़ रोजा की अब प्रतीक ले खुफ़िया बातें
कॄष्णार्जुन या हिन्दू देखें लेकिन बटुवा आप संभालें
आसमान से क्या विस्थापित कौन लगाता किस पर घातें

गीत कलश पर ढाई अक्षर की दूरी का नया माप है
चिट्ठों का उन्माद देखिये, गौतम गुरु का ज्ञान देखिये
अर्जी देखो बात बात में, महशक्ति का है इन्टर्व्यू
रवि रतलामी, निदा फ़ाज़ली की गज़लों के साथ देखिये

उड़नतश्तरी के संग चुप है खड़ा हुआ कबिरा बेचारा
अन्तर्दॄष्टि देखाती बेजी, अंतस्रिक्ष में दूर सितारा


बिछ रही हैं पंथ में दरियां नये आमंत्रणों की
वाटिकाओं ने मधुप के साथ जो भेजे कणों की
टेरती है गुनगुनी सी धूप बासंती बहारें
झील को दर्पण बना कर रूप को अपने निहारें--


एक नजरिया, एक मोहल्ला, एक मीडिया, एक रिदम है
दिल का दर्पण और साथ में जन परिषद का नूतन नारा

गीतकार की कलम ने लिखे महिला दिन के चित्र अनूठे
तीन दिवस चर्चाकारों से न जाने वे कैसे छूटे
छिड़ी बाँसुरी एक रात की, मौसम का ले रंग बदलता
और कामना है अब रागों से न कोई चर्चा छूटे

समय नहीं आता बतलाकर अच्छा हो या भले बुरा हो
कुछ विचार पर जश्न मौत का धन्यवाद देते अनाम हैं
चलें समय हो रहा अधिक अब, घड़ी तकाजा करती जाती
इस चर्चा को इसी जगह पर ,देते बस इक अल्पविराम हैं

अब जो लोग पढ़ें चर्चा को उन सबको तो धन्यवाद है
बाकी सब के लिये भेंट में पढ़ने का यह इन्तजाम है


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4 टिप्‍पणियां:

  1. सही कह रहे हैं, मैं खुद भी सोच रहा था कि गीतकार हर रोज ही क्यूँ छूट जा रहे हैं.

    -अच्छी चर्चा रही, राकेश भाई. बधाई!!

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  2. वाह, अच्छा है। आपने पुलकोट का इंतजाम अच्छा किया। बधाई!

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  3. अच्‍छा लिखा है, हिन्‍द युग्‍म का लिंक गलत है।

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  4. धन्यवाद जो गलत लिंक की ओर आपने ध्यान दिलाया
    आप ध्यान से चर्चा पढ़ते इसका भी अहसास दिलाया
    हिन्द-युग्म हो, उड़नतश्तरी ! दस्तक होती हर चिट्ठे पर
    यह शाश्वत है सत्य, जिसे न पल भर भी हमने बिसराया :-)

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