रविवार, मार्च 11, 2007

मुझको तुम उड़ने देना वापस लौट सकूँ जब चाहूँ


जिया खान


आज की चर्चा की शुरुआत साहित्य समाचार से। प्रख्यात कश्मीरी कवि रहमान राठी को वर्ष २००४ का ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा की गयी है। ८२ वर्षीय राठी कश्मीरी भाषा के सर्वाधिक मशहूर कवियों में से एक हैं। उनको १९६१ में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है।

रमनकौल से गुजारिश है कि वे रहमान राठी के बारे में जानकारी देते हुये एक लेख लिखने का प्रयास करें।

आज दिल्ली में चिट्ठाकार मिलन होने वाला है। शायद इसी लिये देबाशीष ने अपना कैमरा बेचने का प्रस्ताव रखा! उधर दिल्ली से कुछ दूर प्रतीक पाण्डेय अपना जन्मदिन मना रहे हैं। नौजवान प्रतीक ने अपने जन्मदिवस की पूर्व सन्ध्या पर जिया खान के फोटो देखते-दिखाते हुये अपने के जीवन की दशा-दिशा और रुचि का इशारा किया।

दो दिन ब्लागिंग जगत में बड़ा हल्ला मचा रहा। आरोप-प्रत्यारोप के बाद लोगों ने अपनी तलवारें म्यान में रख लीं। कुछ ने अपनी पोस्टें हटा लीं कुछ ने टिप्पणियां पोंछ लीं। संजय ने समय को बलवान बताया तो सागर बोले यहां कोई बुजुर्ग क्यों नहीं आया। उनको ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा यहां ज्ञानवृद्ध सृजन शिल्पी ने पूरी बुजुर्गियत के साथ बजरिये स्वामी विवेकानंद झगड़ा निपटाने और सहयोग बढ़ाने की आचार संहिता पेश कर दी। हम खाली समीरलाल ने बशीर बद्र (बशीर बद्र भी कानपुर में पैदा हुये हैं इसीलिये इतना ऊंचा शेर कह गये) का जो शेर उन्होंने अपने इंटरव्यू में पढ़ा वही दोहराते हैं-दुश्मनी जम कर करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे/फिर कभी जब दोस्त बन जायें तो शर्मिंदा न हों।

ई-झगड़ा पुराण के बाद आओ जरा चिट्ठाजगत में भी टहल लें। ये भैया लक्ष्मी गुप्ता जी आल्हा प्रेम बरकरार है। आज एक
मुर्गभक्षी बछड़ा के बारे में बताते हुये बोलते भये-
इक किसान के मुर्गी मुर्गा, कोई जानवर रह्यो चबाय।
एक महीने के अन्दर माँ, अड़तालीस मुर्ग खपि जायँ।।
एक रात का पहरा लागा, बछवा चिकेनकूप तन जाय।
पकरि के मुर्गा को थूथुन ते, अंखा पंखा दियो गिराय।।
एक मिनट के भीतर भीतर, वहि मुर्गा का गयो चबाय।
या गति देखी जब किसान ने, मन माँ गयो सनाका खाय।।


उन्मुक्तजी गोवा तट पर परशुराम की शान्ति खोजते हुये उसके नामकरण के बारे में जानकारी देते हुये बताते हैं कि
क्रोधित परशुराम को, भगवान ने शान्ति पाने के लिये तपस्या का मार्ग सुझाया और कहा कि जहां तीर गिरे, वहीं तपस्या करो। तीर तो अरब की खाड़ी में गिरा। समुद्र देव ने वहां से पानी हटा कर जमीन उन्हें सौंप दी। परशुराम, गौमाता के साथ वहां तपस्या करने पहुंचे इसलिये उसका जगह का नाम गोवा पड़ा।

आगे वे कुछ फोटो भी दिखायेंगे बशर्ते लोग उनसे नाराज होकर उनका बहिष्कार न करने का वायदा करें।

परशुराम की शान्ति के साथ ही आप सुन लीजिये मनोजय से अशान्ति की बात जब वे कहते हैं-हमारे पास सुखपूर्वक जीने का बस एक ही तरीका बचता है -अशांती का उत्तम प्रबंधन.
अपने निठल्ले चिंतन में तरुण महिला दिवस को
महिलाऒं को दिया एक झुनझुना बताते हुये साल भर महिला दिवस मनाने का प्रस्ताव रखते हैं।

अमित वीर योद्धाऒं के देश में गये थे दोस्तों के साथ। जनवरी में। वहां की घुमक्कड़ी और खरीदारी के किस्से फोटो समेत वो आपको सुना रहे हैं। उधर लखनवी अतुल ने मौका ताड़कर वानरतंत्र कथा सुना डाली। वानर तंत्र के साथ जनतंत्र का भी किस्सा है जिसे सुना रहे हैं बजार में खडे़ हुये प्रदीप सिंह। चुनाव चर्चा करते हुये वे कहते हैं-
राजनेताओं के लिए वोट भले ही शून्य से शिखर तक पहुचाने का साधन हो , जनता के लिए यह हथियार नही बल्कि पाँच बार मे एक बार छला जाने वाला अवसर मात्र है . आम चुनाव के बाद जनता वही की वहीं पड़ी रहेगी .


अभय तिवारी रूमी की सबसे महत्वपूर्ण किताब की जानकारी देते हुये बताते हैं-
रूमी की सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध रचना मसनवी का पूरा नाम मसनवी ए मानवी है। मानवी एक अरबी शब्द है जिसके मायने है आध्यात्मिक या असल..और मसनवी एक दूसरे अरबी शब्द मसनवा से निकल रहा है जो के एक प्रकार के दो पंक्तियों के छ्न्द का नाम है जिसमें दोनों मिसरे तुक में होते हैं। तो हमारी भाषा में इसका अर्थ होगा आध्यात्मिक छ्न्द। मसनवी में कुल छै किताबें हैं और तक़रीबन ३५०० छ्न्द।

अपने दूसरे ब्लाग निर्मल आनन्द में अभय तिवारी ने घुघूती बासती के ब्लाग पर हुये शर्मनाक टिप्पणी युद्ध के लिये खेद प्रकट करते हुये अपनी मां श्रीमती विमला तिवारी जी की कविता पोस्ट की-
जब मै चाहूँ पंख पसारूं
मुझको तुम उड़ने देना
वापस लौट सकूँ जब चाहूँ
द्वार खुला रहने देना

कैनवस खुला हो मन का
मुझे तूलिका तुम देना
कैसे रंग भरूँ उत्सव का
मुझे बताते तुम रहना

छू लेते हो छप जाती हूँ
क्या कहते हो सुन लेती हूँ

इस पोस्ट पर घुघूती बासाती की भावुक टिप्पणी भी पठनीय है।

पंडितजी ने अपनी चार दिन की आफ लाइन कैद की रिपोर्ट पेश की तो गुरनाम सिंह सोढी जिनका दावा है कि उनको लिखना नहीं आती एक तिहाई महीना बीतने के बाद मार्च की सुबह के बारे में कविता लिखते हैं-
क्या कहूँ हाथ पैर कैसे लग रहे थे
दिल के घरौदें बस ढह रहे थे
वो चुप थी, मुस्कुरा रही थी
मानो एक साथ कई बिजलियाँ गिरा रही थी


आगे वे बयान करते हैं-
इस नभ के नीचे प्यार का एक फूल खिला
इस टूटे दिल को एक प्यार भरा दिल मिला
सुरमई शाम का असर बस छाने को था
बाहों का हार मेरे गले मे आने को था


रचनाकार में आज आप पढ़िये अन्तरा करवड़े की लघुकथायें जिनकी भूमिका लिखते हुये उन्होंने लिखा-
कुछ चुभन और कुछ अच्छाई के खारे और मीठे आँसू मिलकर चंद बिडंबनाओं के नाम पर बहते जाते है। शायद कोई इस प्रवाह को मोड़ते हुए अपने आप तक पहुँच पाए।


आपने हैट्रिक सुनी होगी, तीन टांग की रेस सुनी होगी लेकिन दवाई की तिकड़ी नहीं सुनी होगी। लीजिये पके होम्योपैथिक डाक्टर टंडन आपको दवाऒं की तिकड़ी के बारे में बता रहे हैं। तिकड़ी के बाद आप देखिये नितिन का जादू।

अफलातूनजी इस बात से बड़ा व्यथित हैं कि लोग हल्की-फुल्की चीजें बांचने के चक्कर में काम की बातें छोड़ देते हैं। सच्चिदानन्द सिन्हा के लेख की कड़ी में वे आज संग्रह की प्रवृत्ति और कामगारों में समता बन्धुव के लोप के बारे मेंबताते हैं-
धर्म नहीं , जैसा मार्क्स ने कहा था , आधुनिक युग की अफ़ीम तो उपभोक्तावादी हवस है । इस हवस के अधीन होने पर वस्तुओं को पाने की कल्पना में मजदूर भी अपनी सामाजिक स्थिति भूल जाता है और अपने वर्ग स्वार्थ की रक्षा के लिए शोषक वर्ग से संघर्ष करने के बजाय उस वर्ग की जीवन पद्धति की ओर ललचायी दृष्टि से देखने लगता है , और एक हद तक उसका प्रशंसक बनकर उसके मूल्यों को आत्मसात कर लेता है । पश्चिमी दुनिया में इस हवस के कारण समाज परिवर्तन की शक्ति बनने के बजाय , उपभोक्तावादी मूल्यों का शिकार मजदूर अब पूँजीवादी व्यवस्था का जबरदस्त स्तम्भ बन गया है ।


इस लेख के अंत में अमिताभ त्रिपाठी की टिप्पणी रोचक है जिसमें वे सर्कुलर वारन्ट की कामना करते हैं।

लोकमंच पर प्रकाशित स्तम्भो के बारे में अपनी शशि सिंहजानकारी देते हैं मुम्बई ब्लाग में अपनी मोहनी मुस्कान वाली फोटो के साथ। इन समाचारों मेंलस्सी कथा है,स्वास्थ्य चर्चा है, शाही इमाम पर मुकदमा है और हनुमान गढ़ी की भिडंत भी है। और भी बहुत कुछ है आप देखिये तो सही लोकमंच।

मुंबई के बगलै में है पूना। वहीं से देबाशीष भेज हैं स्वादिष्ट पुस्तचिन्ह। मजा लीजिये स्वाद बताइये।

अनुराग मिश्र ने भारत पुनर्निमाण दल के लोगों का साक्षात्कार लिया था। उसका विवरण देते हुये वे रवि ने दल के नाम का मतलब बताते हुये बताया-
"राजनीति में आने के लिए प्रेरित होना मुश्किल नहीं है... प्रेरणा बड़ी आसानी से आ जाती है। हमारे देश की जनसंख्या १ अरब है, और ज़रा सदन में बैठे ५४३ लोगों को देखो या किसी भी राज्य कि सदन में बैठे लोगों का विश्लेषण करो। अपने आप को ये समझाना बड़ा आसान है कि हम इनसे बहुत बेहतर नेता दे सकते हैं"
लेख के अंत में प्रेमेंन्द्र की सहज टिप्पणी बताती है कि देश का आम युवा राजनीति के बारे में क्या सोचता है।

बात पते की आज बनारस के मिजाज के बारे में बताते हैं प्रियदर्शन।-
वाराणसी ने अपने आगे सभ्यताओं का बनना बिगड़ना देखा है। दुनिया के इस सबसे पुराने शहर ने नफरत भी देखी है मोहब्बत भी। छोटापन भी देखा है, बड़प्पन भी। कबीर नाम का जुलाहा इसी शहर का था जिसकी देह मौत के बाद फूलों में बदल गई थी जिसे हिंदू और मुसलमान आपस में बांट ले गए। यहीं तुलसीदास हुए जिनकी रामचरित मानस के खिलाफ पंडित खड़े हो गए। कहते हैं, तुलसी की पोथी बाबा विश्वनाथ के मंदिर में रखी गई जहां रात को महादेव ने अपने दस्तखत कर इसे मंजूरी दिलाई।


मोहल्ले में पंकज पचौरी क्रिकेट विश्वकप को आर्थिक खुर्दबीन सेदेख रहे हैं-
2003 के विश्व कप में क्रिकेट के सिर्फ 227 विज्ञापन थे। अब 324 हैं। चार साल पहले अपनी टीम पर विज्ञापनकर्ताओं ने 320 करोड़ रुपये लगाये थे। आज अपनी टीम पर नौ सौ करोड़ रुपये लगे हुए हैं। हर दिन पांच से छह
हज़ार सैटेलाइट डिश बिक रहे हैं।


प्रख्यात लेखक सआदत हसन मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह आजादी की त्रासदी को केन्द्र में रखते हुये मानवीय संवेदना की उत्कॄष्टतम कथा के रूप में जाना जाता है। पंकज परासर इसे पाठ्कों के लिये उपलब्ध कराया। शायद यह कहानी उनको मन्टो की और कालजयी कहानियां पढ़ने के लिये उकसाये।

एक तरफ़ जहां गिरीन्द्र नाथ झा उम्रदराज वेश्याऒं का दर्दबयान कर रहे हैं तो दूसरी तरफ़ पंकज बेंगाणी विकास के चित्र दिखा रहे हैं। अनुराग मिश्र फिर सेआरक्षण की बात कह रहे हैं। आखीर में राहुल पाश की कविता पेश करते हैं-
मैं अब विदा लेता हूं
मेरी दोस्त , मैं अब विदा लेता हूं
मैने एक कविता लिखनी चाही थी
सारी उम्र जिसे तुम पढ़ती रह सकतीं

उस कविता में
महकते हुए धनिए का ज़िक्र होना था
ईख की सरसराहत का ज़िक्र होना था
उस कविता मे वृक्षों से चूती ओस
और बाल्टी मे चोए दूध पर गाती झाग का ज़िक्र होना था
और जो भी कुछ
मैने तुम्हारे जिस्म में देखा
उस सबकुछ का ज़िक्र होना था


तो यह रही आज की चिट्ठाचर्चा। आज के सारे चिट्ठों की सूची देखने के लिये यहां देखें। कल आपके साथ होंगे रवि रतलामीजी। दो दिन मामला अस्तव्यस्त रहा। शुक्रवार को गिरिराज बिना सूचना गोल हो गये। कल देबाशीष के कम्प्यूटर का भूगोल गड़बड़ा गया। आज जब मैं यह चर्चा पूरी करके पोस्ट कर रहा हूं तो दिल्ली में ब्लागर मीट शुरू हो चुकी होगी।उसके बारे में देखिये कौन सबसे पहले छापता है।

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5 टिप्‍पणियां:

  1. आज कुछ देर पहले गिरीराज जोशी जी से फोन पर बात हुई दरअसल वे पिछले तीन दिनों से, ईपण्डित श्रीष जी की तरह ओफलाईन कैद में है और शायद एकाद दिन और लग जायें उनको छुटकारा पाने में।

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  2. इतनी विस्तृत चर्चा के लिए धन्यवाद साथ ही प्रतीक को जन्मदिन की ढ़ेर सारी मुबारकबाद। मुझे लगता है कि चिट्ठाजगत व्यर्थ के वाद प्रतिवाद में कुछ ज्यादा ही उलझने लगा है । वैसे कल मैंने भी अपनी गीतमाला की समाप्ति पर पर एक प्रविष्टि लिखी थी अपने प्रथम गीत के बारे में ।

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  3. प्रतीकवा को हमरी ओर से भी बधाई, टिका लयो भाया!! :)

    और अनूप जी, ई तो बताए नहीं कि आज का चित्र मा ऊ बाला कौन है और कहाँ से ऊ फोटू मारा(मतबल लिया) है आपने?? ;)

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  4. प्रतीक को जन्म दिवस की बहुत शुभकामनायें.

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  5. अमित जी, ऒ लगती तो निशब्द की कन्या है.बच्चन
    जी को तलाशने कॊ भागती सी...

    चर्चा के लिये आभार और प्रतीक के सुखमय जन्म दिवस पर प्रभु से प्रार्थना....
    महेन्द्र

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