सोमवार, अगस्त 04, 2008

ए टी एम बोले तो एनी टाइम मगज मारी

मित्रता दिवस  मित्रता दिवस

कल मित्रता दिवस था। सिद्धेश्वर जी ने इस मौके पर मौजूं काम किया और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का निबन्ध मित्रता पेश किया। शुक्लजी मित्र के कर्तव्य बताते हुये कहते हैं:
मित्र का कर्त्तव्य इस प्रकार बताया गया है-"उच्च और महान कार्य में इस प्रकार सहायता देना, मन बढ़ाना और साहस दिलाना कि तुम अपनी निज की सामर्थ्य से बाहर का काम कर जाओ।" यह कर्त्तव्य उस से पूरा होगा जो द्रढ़-चित और सत्य-संकल्प का हो। इससे हमें ऎसे ही मित्रों की खोज में रहना चाहिए। जिनमें हमसे अधिक आत्मबल हो। हमें उनका पल्ला उसी तरह पकड़ना चाहिए जिस तरह सुग्रीव ने राम का पल्ला पकड़ा था। मित्र हों तो प्रतिष्ठित और शुद्ध ह्रदय के हो। म्रदुल और पुरूषार्थी हों, शिष्ट और सत्यनिष्ठ हों, जिससे हम अपने को उनके भरोसे पर छोड़ सकें, और यह विश्वास कर सके कि उनसे किसी प्रकार का धोखा न होगा।


इसी मित्र भाव के चलते शायद अभय तिवारी ने अकेले में ज्ञान जी को कुछ सलाह दी होगी। लेकिन ज्ञानजी उस सलाह को जनता जनार्दन के सामने ले गये। और सफ़ाई पेश की। अभी मामला माननीय जनता जनार्दन के यहां पेश है। शाम तक निर्णय आयेगा। तब तक ज्ञानजी अपनी पुरानी पोस्ट देख लें जिसमें उन्होंने लिखा था-
मैने विचार किया। पर्सनल ई-मेल/चैट या फोन की बातचीत का नेट पर सार्वजनिक किया जाना ठीक नहीं है; भले ही वह निरीह सी बात हो। आप सामुहिक रूप से जो व्यवहार करते हैं, वह लिखा या चर्चा किया जा सकता है। यह आत्मानुशासन ई-मेल द्वारा (तकनीकी कारणों से ब्लॉग पर सीधे टिप्पणी न कर पाने के एवज में) पोस्ट पर भेजी टिप्पणी पर लागू नहीं होता; बशर्ते यह स्पष्ट हो कि वह टिप्पणी प्रकाशनार्थ है। मुझे नहीं लगता कि मैने इस आत्मानुशासन का विखण्डन किया है। पर भविष्य में यह दृढ़ता से लागू होगा; यह मैं कह सकता हूं।
अब ज्ञानजी चिन्तन करें और जानकारी दें। हम पूछ रहे हैं क्या हुआ आपका वादा? :)


मित्रता दिवस एक पिछलग्गू पन के भाव से अपने यहां मनाया जाता है। इस पर स्वामीजी फ़िरंट हो लिये। वे कहते हैं:

फ़्रैंडशिप डे मनाने वालों, तुम लोग इतना पाजीपन कैसे अफ़्फ़ोर्ड कर लेते हो यार? नहीं सच्ची, बताओ ना प्लीज़!


रवीश कुमार इंडिया टू डे पत्रिका के शीर्षक पर जायज सवाल पूछते हैं।
इस बार के इंडिया टुडे का शीर्षक है यह। पत्रिका ने धीरज खोते हुए लिख दिया है कि इंडिया नपुंसक है। लेकिन शीर्षक व्यापक बहस की मांग करती है।


आगे उनका कहना है:
रही बात इंडिया के नपुंसकता की तो नपुंसक कौन है। क्या भारत के लोग नपुंसक हैं। या फिर सरकार नपुंसक है या फिर वो जनता नपुंसक है जो ऐसी सरकार चुनती है या फिर नपुंसक जनता ने तो मोदी की सरकार भी चुना। जो एलान करते रहे कि गुजरात से आंतकवाद का नामोनिशान मिटा दिया। आतंकवाद के नाम पर खास समुदाय को आतंकवाद समर्थक बता कर ज़लील करते रहे। और जब दुखद घटना हुई तो वहीं के अखबारों ने लिखना शुरु कर दिया कि बम निरोधक दस्ते से लेकर खुफिया एजेंसियों तक में लोग नहीं हैं। न अफसर न जासूस। तो फिर मोदी किस तैयारी के दम पर कह रहे थे कि उन्होंने आतंकवाद को मिटा दिया।


चंद्रास्वामी कथा में हर्षवर्धन का सवाल बहुत सरल है। वे पूछते हैं- घूरा बनने में कितना दिन लगता है? दिन तो पता नहीं लेकिन भैया कहावत है- घूरे के दिन भी बहुरते हैं।

अब कुछ एक लाइना:

ए टी एम बोले तो एनी टाइम मगज मारी । ये हमारी नहीं डा. प्रवीन चोपड़ा का कहना है। आप खुद देखिये वे और क्या-क्या कहते हैं।

संगीत की दुनियाँ के दो महारती : महारती बोले तो महारथी।

फिर जिंदा हुया, रिटायरमेंट की उम्र 62 साल करने का प्रस्ताव : अपनी मौत मरेगा।

मैं जिनके लिए नहीं लिखता, वे मुझ पर अपना वक़्त बर्बाद न करें: ओवर स्टेटमेंट की भरमार है इसमें लेकिन मैं इसे अपने आत्मसम्मान को परिभाषित करना मानता हूं।

किशोर कुमार अपने जन्‍मदिन पर कुछ कह रहे हैं : आप सुन रहे हैं न!

अमरीका पर मुकदमा चलाओ: कौन सी अदालत में?

मेरी स्वरचित कविता: पढियेगा क्या?

अच्छे दोस्त, पति-पत्नी नहीं रहे : हाई प्रोफ़ाइल दम्पति का ऐसाइच होता है जी!

काम, क्रोध और लोभ तीन नरक के द्वार: तीनों खुले हैं जिससे मन आये घुसें!

होठों पे उगती रही प्यास भी : होंठ कोई गमला है क्या जी?

तू तो हर रोज़ ही देर से आता था: तेरा हाजिरी रजिस्टर मेरे पास है।

कैसी कैसी ईमेल भेज देते है ? : जाने कैसे कैसे उसको छाप भी देते हैं।

पीढी-दर-पीढी नाचोगे जैसा वो नचाएंगे?: क्योंकि सब कहते हैं डांसिग इज ए गुड एक्सरसाइज!

साइकिल पे आइये तब कुछ जानकारी मिल पायेगी : साइकिल की हवा देखदाख के आइयेगा यहां पंचर की दुकान नहीं है।

जूनियर बनाम सीनियर : में कल जंग हुई थी।

रामराज में पीडब्लूडी: अफ़सर थे आलोक पुराणिक

दुनिया को बेहतर बनने के लिए प्यार का दामन पकड़िए: ऐसा कस कर पकड़िये कि छूटे न!


उफ ये औरतें !:बीबी की आंखें भर आती है.. चुंबन.. आंसू में

छोटी रेलयात्रा, बड़े अचरज: सुरक्षा का भी इंतजाम साथ लेकर चलना होगा।

जो वादा किया..: वो निभा दिया न!

कबूतर से कूरियर तक : यात्रा कैसी रही?

ये इश्क इश्क है इश्क इश्क...: इसमें से कौन सा इश्क काम करेगा?

कृपया लट्टू बंद कर दें!! कर दीजिये न जब इत्ते मन से कह रहा है कोई!

क्या भारत नपुंसक हैं: क्या इसका इलाज दीवान हरवंश करेंगे?



मेरी पसंद

ख़ाक होने लगी ज़िंदगी है
जीती भी जा रही ज़िंदगी है

साल के कुछ बढ़ें हैं उमर के
आज भी पर वही ज़िंदगी है

उसकी बातों में कुछ यूँ असर है
ख़्वाब सीने लगी ज़िंदगी है

ख़ास भी हों मगर कुछ नहीं हो
ऐसे रिश्तों से भी ज़िंदगी है

मेरे ग़म के जो परदे उठा दे
दूर से ही भली ज़िंदगी है

दोस्ती के भरम में अभी तक
दोस्ती जी रही ज़िंदगी है

मुश्किलों में जो हँसना सिखा दे
एक ऐसी परी ज़िंदगी है

मानसी

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8 टिप्‍पणियां:

  1. अब ज्ञानजी चिन्तन करें और जानकारी दें। हम पूछ रहे हैं क्या हुआ आपका वादा?
    :(
    सही कह रहे हैं चूक हो ही गयी।

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  2. फ़िर कहेंगे .एक बार आपकी लाइने कमाल की है हर बार की तरह

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  3. सधी हुई चर्चा और वन लाईनर...बहुत आनन्द आया. कल फिर इन्तजार करेंगे. :)

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  4. इस मौज के खेल में आप का और ज्ञान जी का मुकाबला बराबरी का नहीं। आप ने खुद कहा था उनको मौज लेना नहीं आता, जब कि आप तो ठहरे मौज सम्राट। ज्ञान जी के ब्लोग पर अभी अभी अभय जी की बातों का जिक्र देख कर आ रही हूँ जिसकी चर्चा आप ने यहां की है। अब तो भैया ये इच्छा है कि एक मुकाबला अनूप और अभय का भी देख लें , दोनों ठहरे कनपुरिये तो मुकाबला बराबर की टक्कर का होगा। क्या कहते हैं आप दोनों जी, हम टिकट ले कर बैठ जाएं दर्शकों की कतार में।
    वैसे वन लाइनर गजब के हैं हमेशा की तरह, …।
    सगींत के दो महारथी ……क्यों जी महारती भी तो हो सकती हैं रथी ही क्यों हों?…।:)

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. "कृपया लट्टू बंद कर दें!! कर दीजिये न जब इत्ते मन से कह रहा है कोई!"

    कर दिया. आब बाकियों से करवाने की कोशिश चल रही है!!

    उत्तर देंहटाएं

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