बुधवार, अगस्त 20, 2008

यार ये भाषा तुम अपने ब्लौग के लिये ही बचा कर रखा करो.

चिट्ठाचर्चा में कुश भी जुड़ गये हैं। कल उन्होंने धांसू च फ़ांसू शुरुआत की। पंगेबाज भी जल्दी ही जलवा बिखेरने के लिये सज-धज रहे हैं। पुराने चर्चाकार भी आने के लिये मन बनायें। समीरलालजी से खासतौर से कहना है कि वे आलस्य का परित्याग करें। ब्लागजगत के बापू आशाराम बन के चिट्ठाचर्चा रोज करने का खाली-मूली उपदेश देने की बजाय कुछ नियमित मेहनत करने की सोंचे। मेहनत से जी चुराना अच्छी बात नहीं है जी।

मुशर्रफ़मुशर्रफ़
मियां मुशर्रफ़ शायद अपनी ज्यादा फ़जाहत न कराना चाह रहे हों इसलिये उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। इस पर कार्टूनियाते हुये अभिषेक ने लिखा: मुशर्रफ़! कैसे फ़ौजी हो?बिना लड़े ही हथियार डाल दिये। (देखें बगल का कार्टून)

ज्ञानजी बीमार थे इस लिये ब्लागिंग से दूर थे लेकिन भाभीजी उनके बारे में बेहतर जानती हैं। उन्होंने समझाया- ब्लागिंग से दूर हैं इसलिये तबियत नासाज है। मनचाही सलाह मिलते ही ज्ञानजी रागदरबारी गाने लगे:-
गालियां इमोशंस को बेहतर अभिव्यक्त करती हैं। गालियां बुद्धि की नहीं रक्त की भाषा बोलती हैं। बुद्धि का आटा ज्यादा गूंथने से अगर अवसाद हो रहा हो तो कुछ गालियां सीख लेनी चाहियें - यह सलाह आपको नहीं, अपने आप को दे रहा हूं। यद्यपि मैं जानता हूं कि शायद ही अमल करूं, अपने टैबूज़ (taboo - वर्जना) के चलते!


ज्ञानजी को गालियों के सामाजिक महत्व पर और चिन्तन करना चाहिये। अस्वस्थता में चिन्तन अच्छी दवा साबित होती है।

रक्षंदा शबेबरात की जानकारी देते हुये बताती हैं :

शब-ऐ-बारात बहुत ही ख़ास दिन है. जो परसों मनाया गया.
ये इमाम-ऐ-ज़माना (12th इमाम) हजरत मेहदी आखिर-उज़-जमां अलाहिस्सलाम की पैदाइश का मुबारक दिन है. जो निहाइत ख़ुशी का दिन है.
इस मौके को दीवाली की तरह मनाते हैं. वैसे ही घरों को मोम बत्तियों से सजाया जाता है. पटाखे आतश बाज़िओं से माहौल चरागाँ सा हो जाता है. कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं. जिन में तीन चार तरह के हलवे, जैसे चने कि दाल का हलवा, सूजी का हलवा, मैदे और मूंग दाल का हलवा, पूरी पराठे, चिकन पुलाव खीर बनायीं जाती है. फिर नज़र दिया जाता है.


जो दुआ पढी जाती है इस दिन उसका मतलब होता है:
ऐ इमाम-ऐ-ज़माना मेरे मुल्क के लोगों को हर आफत और मुसीबत से दूर रखियेगा. इस मुल्क में सुकून और खुशियाँ हों, तरक्की के साथ साथ मेरे देश के लोगों को बे राह रवी और बुराइयों से दूर रखियेगा(आमीन)




पल्लवी एक बेहतरीन गजल पेश करती हैं:
बंद कमरे बताएँगे हकीकत उनकी
जो हैं दुनिया में फरिश्तों की तरह

पल में ग़म भूल खिलखिलाते हैं
खुदा,कर दो मुझे बच्चों की तरह


रश्मि प्रभा का कहना है:
कॉफी और मौसम तो बस बहाना है-
साथ बैठने का,
रिश्तों की खोई गर्मी को लौटाने का.........
बादल तो फिर चले जायेंगे,
बिजलियों की कड़क,
बारिश की फुहारें थम जाएँगी,
मुमकिन है कॉफी ठंडी हो जाए!
पर अगर हाथ थाम लो
तो जीवन की राहें आसान हो जाएँ
और कॉफी की खुशबू साथ हो जाए....


मानसी आजकल फ़ुरसत में हैं। तभी वे लड्ड बांट रही हैं, सजी-धजी सुन्दर शाम को देखकर गुनगुना रही हैं, और कुछ नहीं मिल रहा है तो भटकाव का शिकार हो रही हैं:
कई परत गहराई से उठ कर
छलावे के ही पास भटकी
संसार छोड़ संसार पा लेने
किसी अनजाने अधर अटकी
खुशी अपनी सीमा आँकने
मचल पड़ी


मननीय पोस्ट
: 2012 में प्रलय होना असंभव

विचारणीय पोस्ट: अँग्रेज भगवान

सुन्दर सलाह: अपने ब्लॉग को और बेहतर बनायें

बधाई: कबाड़खाना की पांच सौवीं पोस्ट पर।

अब कुछ एक लाइना


एक चिट्ठी शिवजी के नाम : फ़ोकट का टाइम वेस्ट!

इश्क -मुश्क आग का दरिया ओर छापामार सेना ... : का संयुक्त हमला डा.अनुराग पर।

त्राहि माम गुरुदेव समीर जी मैं आयन्दा ब्लागरी नही करूंगा !

कैसे-कैसे नर्क...? ...पुराण चर्चा : पढ़ के अपना नर्क अपने आप चुनिये।

3भाई~ 3गीत : बच गये कौरव चले गये। वे होते तो १०० भाई ~ गीत होता।

ये रहे अहमदाबाद विस्फ़ोटों के गद्दार: पहचान में नहीं आ रहे! इससे ज्यादा आसानी से हम अनाम ब्लागर पहचान लेते हैं।

हे भगवान! तुम पर लानत है:तुमने अपना ब्लाग तक नहीं बनाया!

महान पंगेबाज की अंतिम यात्रा : पहला रिहर्सल शुरु!


है राम के वजूद पे हिन्दुस्तां को नाज़ : वाह भई मियां हिन्दुस्तान ये तो बड़ा नेक जज्बा है। बनाये रखो।

बस उस से कुछ ज़्यादा "इंसान" होता: फ़िर तो ऐश कटती गुरू।

अब सवाल नहीं केवल जबाब चाहिये।

मुसलमानों को घर क्यों नहीं मिलता? आरोप चेप देना आसान होता है।

बादल ले रहे अंगड़ाई : जरा धीरे से मेरे भाई!

ये कोई ब्लौगर मीट नहीं, बस यारों की महफ़िल थी : अच्छा तो क्या महफ़िल में रतजगा भी हुआ था?


शबाना जी, तेरा मेरा दर्द ना जाने कोई : आइये हम एक-दूजे का दर्द पढें , आगे बढें।

सहजता,कहीं मोल मिलती है क्या?: मिले तो हमारे लिये भी तौला लेना भैया किलो-दो किलो।


भगवान्" का शाब्दिक अर्थ क्या है?: बताओ अगर कोई भगवान का आदमी मौजूद हो तो।

भविष्यद्रष्टा : एक चिरकुट सी परचून की दुकान पर।

सस्ते में टपकाना :हो आलोक पुराणिक से सम्पर्क करिये। उचित दाम, बाजिब काम- मोबाइल नं:98100-18799

2012 में प्रलय होना असंभव : इसलिये मस्त रहें तथा चैनलों व अखबारों की प्रलय भरी बेवकूफियों का आनंद लें।

ज़रूरी है नापजोख और मापतौल... : इंचीटेप और बांट बेचने वालों के पेट पालने के लिये।

"महान पंगेबाज की अंतिम यात्रा " सुदामा की डायरी से : ई ससुर रोज अंतिम यात्रा करता है।

क्षणिकायें: अच्छा!! दिखाओ!

औरत होने की सज़ा क्या है ?:देखिये, आपके सामने कच्चा माल ही हाज़िर है!


तू जिस रोज उसे समझ जाएगा।: बहुत पछतायेगा, सर सजदे में झुक जायेगा।

क्या शामें भी उदास होती हैं? :यार ये भाषा तुम अपने ब्लौग के लिये ही बचा कर रखा करो..

क्षमा : मांगकर शर्मिन्दा न करें , लिखती रहें।

बढती हुई यौनिक गंदगी! : से बचने के लिये शास्त्रीजी से परामर्श लें।

कैलाश पर निर्माण पूर्णता की और !: अपने लिये जगह बुक करायें, पहले आयें-पहले पायें।

पत्रकारों की फौज करेगी मौज : फ़ौज ज्वाइन करिये।

छत पर खेले : अरे वाह, अले लेले।

टापलैस बाइक परेड को मिली हरी झंडी : टापलेस लेकिन हेलमेट लगा के।

ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत होती है..:एक कातिल हसीना की तरह|

देवताओं का नगर--रॉक गार्डन:घूमिये रंजना के साथ|

मेरी पसन्द


नष्ट कुछ भी नहीं होता,
धूल का एक कण भी नहीं,
जल की एक बूंद भी नहीं
बस सब बदल लेते हैं रूप

उम्र की भारी चट्टान के नीचे
प्रेम बचा रहता है थोड़ा सा पानी बनकर
और अनुभव के खारे समंदर में
घृणा बची रहती है राख की तरह

गुस्सा तरह-तरह के चेहरे ओढ़ता है,
बात-बात पर चला आता है,
दुख अतल में छुपा रहता है,
बहुत छेड़ने से नहीं,
हल्के से छू लेने से बाहर आता है,

याद बादल बनकर आती है
जिसमें तैरता है बीते हुए समय का इंद्रधनुष
डर अंधेरा बनकर आता है
जिसमें टहलती हैं हमारी गोपन इच्छाओं की छायाएं

कभी-कभी सुख भी चला आता है
अचरज के कपड़े पहन कर
कि सबकुछ के बावजूद अजब-अनूठी है ज़िंदगी
क्योंकि नष्ट कुछ भी नहीं होता
धूल भी नहीं, जल भी नहीं,
जीवन भी नहीं
मृत्यु के बावजूद

प्रियदर्शन

आज की तस्वीरें:


फ़ूलफ़ूल

पल में ग़म भूल खिलखिलाते हैं
खुदा,कर दो मुझे बच्चों की तरह

शाम आई धीरे से...शाम आई धीरे से...
सजधज सुंदर संध्या आई,और गुनगुना उठा समां से

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19 टिप्‍पणियां:

  1. चिठ्ठा-चर्चा तो बेहतरीन ब्लॉग्स का ब्लॉगरोल बन गया है। यहीं से सभी अच्छे पन्नों पर जाने की राह मिल जा रही है। एग्रीगेटर खोलने की जरूरत ही नहीं।...जमाए रहिए जी। साधुवाद।

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  2. अभी हम नरक टाईम्स की साज सज्जा मे वयस्त है , काफ़ी सारे ब्लोगर्स आने वाले है ना यहा पर , जल्द ही आपको भी बुलाते है यही से करेगे चर्चा :)

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  3. .

    चिच पढ़िये,, काम पर चलिये
    सो अभी तो.. चलने दो गुरु ..
    कमेन्ट बाद में .... अभी उसे सुधारने का वक़्त नहीं हैं ।





    वइसे कमेन्ट अगर हाज़िरी लगाने के लिये होती हो...
    तो वह लगा तो दिया ही...
    आज फिर.. मोटे ताज़े समीर जी को परोसे भये हो..
    मुँह में पानी आ रहा है.. बड़ी लज़ीज़ चीज हैं... लालच लग रही है..
    लेकिन.. हा विधना..
    कमेन्ट पोस्ट पर भारी नहीं पड़नी चाहिये..
    यह ज्ञानोदय करावा गवा है, सो...
    स्वामी-संहिता की प्रतीक्षा में..
    अबहिन जाय रहे हैं..
    इति चिच पठन

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  4. यह एक अच्छी खबर है कि कुछ और लोग भी इस चिट्ठा चर्चा को संभालने का मन बना रहे हैं।

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  5. नरक टाइम्स की चर्चा?? मामला कुछ गड़बड़ लगता है.. ओह अच्छा पंगेबाज जी है क्या. फिर तो गड़बड़ होगी ही.. खैर हम तो दरी पे बैठ जाते है इस से पहले की समीर जी आकर पूरी दरी पर क़ब्ज़ा कर ले..

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  6. आपने लिखा: "बढती हुई यौनिक गंदगी! : से बचने के लिये शास्त्रीजी से परामर्श लें।"

    अब पता भी नोट कर लें: Shastri@sarathi.info !!!

    पहला पत्र आप ही क्यों न भेज दें!!

    चिट्ठा-चर्चा में आप जिस उत्साह से लिखते हैं उसके लिये मेरी बधाई स्वीकार करें!!

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  7. चिटठा चर्चा खूब लोकप्रिय हो रहा है...

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  8. बढ़िया चिच है! यह लीजिये चट्रे से (चलती ट्रेन से) टिप्पणी!

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  9. शानदार प्रस्‍तुति।
    चिट्ठा चर्चा हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत की हलचलों को हम तक पहुंचानेवाला बेजोड़ व दिलचस्‍प माध्‍यम साबित हो रहा है।

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  10. प्रवचन माला का अंक भी जारी रहने दो भक्त!! बाकी बाबा लोगों से नहीं कह पाते कि काहे खाली मूली प्रवचन दे रहे हो. :) थोड़ा तो आलस भी करने तो इस काया को. जारी रहें नियमित!! :)

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  11. बस यूँही... सारांश मिलता रहे !

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  12. ये तो अति सुन्दरतम आइडिया है !
    पहली बार यहाँ तक पता नही कैसे
    आ गया ! मुझे इसके बारे में पता
    ही नही था की ऐसे हीरा भी है !
    अब एक घंटे से यहीं घूम
    रहे हैं ! और अब आपकी पाठशाला
    में हमारा भी नाम लिख लीजिये !
    रोज हाजिरी लगाने वालों में !
    बहुत बहुत शुभकामनाए !

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  13. हमारी फ़ुरसत को क्यों नज़र लगा रहे हैं अनूप जी? बस ५-१० दिन और उसके बाद तो फिर वही काम शुरु ...

    चिट्ठाचर्चा बहुत अच्छा लिखते हैं आप। मेरी तस्वीर को अपनी पसंद में डालने का शुक्रिया।

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  14. निकल पड़े पंगेबाज जी...सही जा रहे हैं...

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  15. कुश जी की चिठ्ठाचर्चा बहुत लाजवाब लगी, टी वी का नया चैनल शुरु हो गया लगता है, प्रियदर्शन जी की कविता भी बड़िया है लेकिन एक बात बताइए, ये प्रियदर्शन जी फ़ीजिक्स में बी एस सी किए है क्या?

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  16. "महान पंगेबाज की अंतिम यात्रा " सुदामा की डायरी से : ई ससुर रोज अंतिम यात्रा करता है।
    kya baat hai...sahi charcha hai chitthon ki!

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  17. बहुत आगे बढेगा चीट्ठा। भवीसय का ईंतजार करें ।

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