गुरुवार, अगस्त 14, 2008

मचा रहे कोहराम ये है इंडिया मेरी जान।

मोनिका  मोनिका
अभिनव बिंद्रा ने सोना जीता। सारे देश में हल्ला हो गया। इस हल्ले से कुछ ही दिन पहले एक हादसा हुआ था। भारोत्तोलक मोनिका के साथ अजीब मजाक किया गया। उसे पहले डोप टेस्ट में अयोग्य करार किया गया और बाद में बरी किया गया लेकिन तब तक उसके लिये देर हो चुकी थी। सलाम सिंह लिखते हैं:
मोनिका का आरोप है कि आंध्र प्रदेश की भारोत्तोलक शैलजा को बेजिंग में आगे करने के मकसद से आंध्र प्रदेश के ही आरके नायडू ने मोनिका की जांच प्रक्रिया में गड़बड़ी की है। नई दिल्ली में बैठे नौकरशाहों की इसी तरह की गलतियों की वजह से पूर्वोत्तर अलगाववाद की आग में जल रहा है और उनकी ऐसी हरकतों से अलगाववादी संगठनों को भारत विरोधी फसल उगाने का आधार लि जाता है। पिछले राष्टीय खेलों में स्वर्ण पदक जीत कर एशियाई रेकार्ड तोड़ने वाली भारोत्तोलक मणिपुर की मणि मोनिका देवी के साथ किए गए नायडू के प्रपंच और छल की वजह से मणिपुर के साथ संपूर्ण पूर्वोत्तर भारत के लोग यह महसूस कर रहे हैं कि नई दिल्ली हर मामले में पूर्वोत्तर के साथ भेदभाव करता है।


इस शर्मनाक घटना से हम भी बहुत आहत हैं।

मनीष के ब्लाग पर न जाने कितने मोती बिखरे हैं। आज पढ़ा:
मैं घर से तेरी तमन्ना पहन के जब निकलूँ
बरहना शहर में कोई नज़र ना आए मुझे

वो मेरा दोस्त है सारे ज़हाँ को है मालूम
दगा करे वो किसी से तो शर्म आए मुझे

वो मेहरबाँ है तो इक़रार क्यूं नहीं करता
वो बदगुमाँ है तो सौ बार आज़माए मुझे


उनकी पसंद भी गजब की है:

मैं अपने पाँव तले रौंदता हूँ साये को
बदन मेरा ही सही, दोपहर ना भाये मुझे


और उनके मित्र ध्यान रखें :)

वही तो सबसे ज्यादा है नुक़्ताचीं मेरा
जो मुस्कुरा के हमेशा गले लगाए मुझे


रचना बजाज आपसे जानना चाहती हैं कि आप अपनी बोली में ये कैसे बोलेंगे:
आप सब कैसे हैं? सब ठीक है ना?
आज मै तुम्हे एक कहानी सुनाने वाली हूँ…राम और सीता पति पत्नी थे


बताइये-बताइये। अपनी बोली में बोलने का मजा कुछ और है।

एक सवालिया पोस्ट: रूपा नाम है उसका...

एक लाइना


बंटवारे का दंश झेला, फिर भी बंटवारे की राजनीति!! : एक सच्चा राजनेता अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित होता है।

कहाँ कहाँ न खुशी को ढूँढा... : ठीक से रखना चाहिये चीजें।

चाभी:तुम्हारे पास रह गई है फ़ेंक देना उसे।

भाषा तो भाषा ही रहेगी ....इसे बच्चों को बच्चों की भाषा में पढाएं : तब सीखेंगे बच्चे भी और आप भी।

बोहत दिनों के बाद: सोते-सोते जागे।

मैं कोई ब्‍लॉगर नहीं, एक मामूली फेरीवाला हूँ !: हमसे मत घबराओ हम कमेंट न मांगेगे।

मेरे तजुर्बे बड़े है मेरी उम्र से : आजादी ने बहुत कुछ बदल दिया है.....पर कुछ अब भी वैसा ही है।

मैं हूँ असली मनोज बाजपेयी : हर निठल्ला अपने को मनोज बाजपेयी बता रहा है।

कहाँ हो भाई ?: मर गये क्या?

आज कश्मीर को आजाद कर देना चाहिए : बहुत बबाल करता है।

एक पंथ, नो काज : कहते हैं आलोक पुराणिक महाराज!

कई रोगों की एक दवा है...चक्काजाम!: चक्काजाम करिये, रोग जड़ से गायब।

उसकी मुस्कान भूलती नहीं : क्या जरूरत है भुलाने की!

मैं इमरान हाशमी बनना चाहता हूँ लड़कियों को घुमाना चाहता हूं।

कविता क्रिकेट की गेंद नहीं : जिस पर चौके-छक्के लगा सकें।

औरतें बेवकूफ़ होती हैं : उदाहरण सहित सिद्ध करिये।

मचा रहे कोहराम : ये है इंडिया मेरी जान।

हरे सांप की कविता : सांप झूम रहा है, कविता निकल रही है।

जरूरत एक कोप भवन की: केकैयी फ़िर रोना चाहती है।

कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाने को मजबूर हैं यवतमाल के किसान: कहां का किसान अपने पैसे से बच्चे पढ़ा पा रहा है?

क्टघरे का न्याय:
तो ऐसा ही होगा जी।

वो पैरों से नहीं हौसलों से चलता है ! उसे हर मदद एक बार और अपाहिज बना देती है।

तुमने, मुझे थाम लिया है।: वर्ना अब तक हम निकल लिये होते।

देखना चाहेगे संसद के नोट कांड की सीडी: का करेंगे देखकर पंगेबाजजी, हम तो जिंदा टेलीकास्ट देखे हैं।

थाने में खड़ी लड़कियाँ : न जाने कब तक खड़ी रहेंगी!

मेरे वालिद कहा करते थे कि बेटा इश्क करो: वर्ना ब्लागर बन के रह जाओगे।

मेरी भाषा ही ऐसी है, क्या करें : चुनचुने लग जाने का अर्थ बताते हुये वाक्य प्रयोग करें।

महिला काजी ने पढ़ाया निकाह! :सईदा को सलाम! |

क्यों सर! : क्या सोच रहे हैं -टिपियायेंगे नहीं?

मेरी पसन्द


प्रीती  प्रीती

तुम मेरे पास ही हो,
ये एहसास है मुझे,
कि अपने हाथों से,
तुमने, मुझे थाम लिया है,

जब भी डरता हूं,
तुम्हारी गोद में आ जाता हूं,
और अपनी आंखों को,
नन्हें हाथों से बंद कर लेता हूं,

मेरा रोना, तुम्हें,
बेचैन-सा कर देता है,
और एक शरारत,
मुस्कान-सी भर देता है,

मेरी तोतली बोली को,
बङे ध्यान से सुनते हो,
और बेतुके सवालों का,
तुम जवाब भी देते हो,

तुम मेरे पास ही हो,
ये एहसास है मुझे।

प्रीती बङथ्वाल "तारिका"

आज की तस्वीर



मुस्कान मुस्कान
किसी अच्छे घर का बच्चा लग रहा था..... टी शर्ट उसकी साफ सुथरी थी.... सलीके से अखबारों का बंडल उठा रखा था लेकिन हाथ के नाखून कटे होने पर भी एक दो उंगलियों के नाखूनों में मैल थी...... जो भी हो उसके चेहरे पर छाई उस मुस्कान ने बाँध लिया था.....सूझा ही नहीं कि जल्दी से एक अखबार खरीद लेती ..... उसे भी जैसे कोई ज़रूरत नहीं थी अखबार बेचने की.... जितनी देर लाल बत्ती रही उतनी देर हम उस बच्चे में अपने देश के हज़ारों बच्चों का मुस्कुराता अक्स देखते रहे .मीनाक्षी
तजुर्बातजुर्बा

ऐ साहब झंडा लो न....१० -१२ साल का लड़का .बैनर को पढने की फ़िर एक कोशिश...साहेब लो न...मै .गाड़ी में लगायूँ ....कहते कहते उसने लगा दिया .एक ओर दे ...मै उससे मांगता हूँ....पीछे गाडियों का हार्न बज रहा है...कितने का है एक ?मै पूछ रहा है ...एक रुपये का.....गाड़ी में चिल्लर ढूंढता हूँ ...एक पाँच का सिक्का हाथ में आता है....उसे दे देता हूँ....गाड़ी आगे बढाई है ...कुछ दूर चलने पर फ़िर गाड़ी रूकती है...शीशा खटक रहा है....साहेब ....बाकी के झंडे।
उसने हथेली मेरे दोस्त के आगे फैला दी "साहेब आपके बाकी पैसे "। डा.अनुराग

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10 टिप्‍पणियां:

  1. मैं हूँ असली मनोज बाजपेयी : हर निठल्ला अपने को मनोज बाजपेयी बता रहा है।
    ये बहुत बढ़िया रहा...
    और आज की जो दो तस्वीरे आपने दी है.. वो वाकई मेरी भी पसंदीदा तस्वीरे रही.. माँ गये आपकी चर्चा को.. बहुत खूब

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  2. आपको क़तील शिफ़ाई की ग़जलें पसंद आई जान कर खुशी हुई।
    आज की तसवीर और उसके साथ का संदर्भ दिल को छू गया।

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  3. मेरी कविता को पसन्द करने के लिए शुक्रिया।
    एक लाइन आपकी कमाल की है पढकर मज़ा आजाता है।

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  4. की गई मेहनत साफ झलकती है. खुब रही चर्चा.

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  5. मोनिका और मणिपुर रहातियों के लिए दु:ख बंटाना है.

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  6. लगता है सुबह सुबह मेहनत करने लग जाते है ,वाकई ....
    ये लाइने रोज खीच लाती है...


    ओर हाँ शुक्रिया.........

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  7. बिना हमारी नई पोस्ट http://udantashtari.blogspot.com/2008/08/blog-post_14.html बारिशों का मौसम की चर्चा किये भी चिट्ठा चर्चा बेहतरीन बन पड़ी है. बहुत खूब. नियमित जारी रखिये. अच्छा लगता है.

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  8. हमारा यही कहना है कि समीरलाल जैसे एक आम अदना से ब्लॉगर को किसी चर्चा की दरकार नहीं। वो खुद चर्चित होने के सारे तरीके जानते हैं। जैसे यहां किया। थमा दिया लिंक। लेकिन इसी बहाने टिप्पणी में कुछ बदलाव तो आया।

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  9. कतील शफ़ाई के शेर हमें भी बहुत पसंद आये और आप की वन लाइनर की रोज रोज तारिफ़ करने में बहुत एनर्जी लगती है जी तो आज एक साथ ही पूरे साल के लिए कह देते हैं कि वन लाइनर गजब हैं हमें मालूम है उनका तीखापन बना रहेगा। ये जो बच्चा बाकी के पैसे लौटाने आया उसके लिए कहेगे जी बस ईमानदारी आजकल वही तक बाकी है, नायडू तक आते आते चुक जाती है, भारत का कौन सा राज्य है एक दिल्ली को छोड़ कर जिसे सरकार सौतेली नही लगती।
    मोनिका के लिए हमें भी अफ़सोस है

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