शुक्रवार, अगस्त 08, 2008

अगले जनम मोहे बेटवा न कीजो. भले ही मौसी बनैयो प्रभुजी।

जगर मगर शाम  जगर मगर शाम


ई फोटो प्रमोद सिंह जी बनाइन हैं। कहते हैं-
बहुत सोचकर खुद को दु:खी और हमें शर्मिंदा मत कीजियेगा, स्‍केच के अंदर भी उतना ही है जितना बाहर प्रकट आंखों को दिख रहा है. पोस्‍ट का शीर्षक महज़ अकुलाये मन के मोह के लिहाज में चिपकाया है..
अब हम उनको क्या शर्मिंदा करेंगे। हम अभी तक उनका फ़ुटानी बाज गीत सुन ही न पाये हैं- खुदै शर्मिदिगी मोड में हैं।

अनामदास जब लिखते हैं बेचैन सा कर देते हैं। आज वे कहते हैं:
ग़ुस्से में की गई एक फ़िज़ूल हरकत का मलाल, किसी बड़ी ज़रूरत के बिना एक घटिया आदमी से की गई मिन्नत का अफ़सोस, कुछ न कर पाने का दुख, कुछ अनचाहा कर डालने का पछतावा, किसी से मिला छोटा सा छलावा, किसी को दिया एक बड़ा भुलावा, कुछ न कर सकने की खीस, कर सकने के बावजूद न करने की टीस...इन सब बातों की मुड़ी-तुड़ी रसीदें और पर्चियाँ मन के फाँकों-कोनों में दबी हैं. उन्हें किस कूड़ेदान में डाल दूँ.


दो बेटियाँ प्लस तीन अबोर्शन में मनविन्दरजी ने अनचाहे गर्भपात पर चिंता व्यक्त की है:
समाज में औरत के स्वास्थ्य के साथ इतना बड़ा खिलवाड़ हो रहा है और कोई उस पर मुंह खोलने को तैयार नहीं है, आखिर क्यों?क्यों हम केवल इस बात पर जोर दे रहे हैं कि कन्य भू्रण हत्या बंद हो, क्यों हम यह नहीं कह रहे हैं कि गर्भपात पर भी चैक लगे। ठीक है, गर्भपात अब कानून के घेरे से निकल चुका है लेकिन समाज की आधी आबादी के स्वास्थ्य के लिये चिंता क्यों नहीं पैदा हो रही है? बेवजह गर्भपात क्यों?

चीजें कहां से कहां जाती हैं। अपने आर्कुट खाते से पता चला कि आज भड़ासी यशवंत सिंह का जन्मदिन है। वहां प्रवीन त्रिवेदी यशवंत सिंह को जन्मदिन की बधाई देते हुये रचनाबजाज की कविता पंक्तियां पेश कीं:

यशवंत सिंह यशवंत सिंह
हर नये दिन, नई उमंग के साथ,
एक नई जिन्दगी का कर आगाज़!
आसमाँ को न देख हसरत से,
उड! के तुझमे ताकत-ए-परवाज़!!


यशवंत का पिछला साल हलचल/कठिनाइयों भरा रहा। तमाम विवादों में नाम उछला। आज के मौके पर मैं शुभकामनायें देता हूं कि उनका जीवन सुखमय हो। वे अपनी धनात्मक ताकतों के बल पर तमाम अच्छे काम कर सकें।

आशा जोगलकर जी लिखती हैं:
दीदी को होना है डॉक्टर
मुझे पढना है कम्प्यूटर
और गुडिया को बनना है रिपोर्टर
बाबूजी की सीमित आय
और हमारे हौसले
क्या होंगे सपने पूरे
जब तौले जायेंगे वे भाई के सपनों से
पर हम तीनों हैं एक साथ
करेंगे मदद एक दूजे की और पायेंगे मंजिल अपनी अपनी


इस पर अनूप भार्गव ने लिखा -
’चोखेर बाली’ की सोच शायद इस कविता से कुछ सीख सकती है।


इस पर सुजाता का सवाल है:
समझ नही आता कि हर कोई चोखेर बाली की सोच बदलने को क्यों उद्यत है ! क्या चोखेर बाली की बातें आपका हाज़मा खराब करती हैं ?लगता है स्त्री को "सिखाने" का लोभ संवरण कभी नही किया जा सकता ।हर पोस्ट पर बहस का रुख इसलिए भ्रमित होता है कि स्वयम को हमेशा सही मान कर "सीख , नसीहत , चेतावनी" देने का पुनीत कर्तव्य किया जाता है ।


बहस आगे भी दूर तलक जायेगी। देखियेगा उधर ही।

समीरलालजी में नारी ब्लाग की तर्ज पर मुंडा ब्लाग बनने की संभावनायें दिख रही हैं। वे अपने दर्द को उजागर करते हुये कहते हैं:
अगर लड़की होऊँ तो कुछ भी लिखूँ, डर नहीं रहेगा. अभी तो नारी शब्द लिखने में हाथ काँप जाते हैं. की-बोर्ड थरथरा जाता है. हार्ड डिस्क हैंग हो जाती है कि कहीं ऐसा वैसा न लिख जाये कि सब महिला ब्लॉगर तलवार खींच कर चली आयें. हालात ऐसे हो गये हैं कि नारियल तक लिखने में घबराहट होती है कि कहीं नारियल का ’यल’ पढ़ने से रह गया, तो लेने के देने पड़ जायेंगे. इस चक्कर में कई खराब नारियल खा गये मगर शिकायत नहीं लिखी अपने ब्लॉग पर.


और कुछ देखने के पहले बेजी का गांव देखिये। उनकी आखों से। अद्भुत नजर है।

अब चंद एकलाइना:



अगले जनम मोहे बेटवा न कीजो... : भले ही मौसी बनैयो प्रभुजी।

गड़बड़झाला : ये तो होता ही रहता है लाला!

मुड़ी-तुड़ी पर्चियाँ मन के कोनों में दबी हुईं : बाहर निकाल के ब्लाग पर फ़ेंक दीं।

स्वार्थ-लोक के नागरिक :आगे चलकर सी ए बनेंगे।

ट्रेफिक जाम में पृथ्वीराज चौहान : संयोगिता हलकान! बेचारी का मेकअप बिगड़ा जाये।

सबसे बुरी गाली: नेता कहीं का।

आम इंसान की जिंदगी:जीने का मजा ही कुछ और है।

लेटा हूं, सुनता हूं: सो जाता हूं।

घर में पीजै, मीर को पढि़ए, वहीं सो जाइए : लेकिन अगले दिन उठना तो पडे़गा न!

कालपात्र और हमारी ब्लोगिंग : दोनों पंगाग्रस्त हैं।

चलो चाँद की आज शादी रचायें : दुल्हन तो बतायें, कुंडली तो मिलायें।

क्या धर्म निरपेक्ष होने का मतलब देशद्रोही होना है...: ये किसने कहा जी, दोनों काम एक साथ किये जा सकते हैं।

किस्सा -ए -होस्टल ( भाग २) :सचमुच यार सुन्दर होना भी एक मुसीबत है!


एक डायरी नोट के साये में सहमा बचपन : और उसके संवेदनशीन पिताश्री।

जन्मदिन के बीते पांच साल : एक पोस्ट में समा गये।

तीसरा खंबा पर कानूनी सलाह..... कोर्ट मैरिज या आर्यसमाजी विवाह?: दोनो बारी -बारी से करके बतायें।


मुझे मत जलाओ: हमारा बर्नाल खतम हो गया है।

दड़ी का छेत्रफल, परसुराम और मांबदौतल : सबका हिसाब लपूझन्ना के पास है।

...और मैं कुछ ऐसे सफ़ल हुआ :सात ठो टिप्पणियां पाने में।

मेरी पसंद


इवन गॉड कान्ट हेल्प साला
फिर चिंता किसको है साला
ये हालत हुई तो किस तरह
क्या और कैसा सवाल साला
होगा ये देश किसी और का
न तो मेरा न तेरा है साला
पता है कुछ हो नहीं सकता
सपना क्यों देखता है साला
पैदा तो रवि भी देशभक्त था
वो भी पूरा बदल गया साला

रवि रतलामी

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10 टिप्‍पणियां:

  1. काहे मागते हैल्प साला ?
    रोज डूबते उठाके प्याला
    सरकार क्या है तुम्हारी खाला
    अब भी वक्त है उठालो भाला
    या मागो तुम भी एक बम
    भारत हिरोशिमा बन जाये साला
    शायद फ़िर से खडे हो सके हम
    हम भी जापान बन जाये लाला.

    मेरी भी आज की पसंद नोट की जाये :)

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  2. आपने कहा और मैने मजे भी ले लिये, अभी सभी चिट्ठो पर टिप्पणी देना बाकी है वो शाम तक के स्थगित कर दिया गया है... :)

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  3. व्यंजल और प्रतिव्यंजल मजेदार रही. एक लाइना कुरकुरी थी. मजा आया.

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  4. सबेरे सबेरे, ई कउन कविता पढ़वा रहे हो, गुरु ?
    हम क्या समझें, यह भी तो बताय देयो.. ..

    रवि रतलामी नहीं रहे
    देशभक्त रवि रतलामी नहीं रहे ,
    रवि रतलामी देशभक्तै नहीं रहे
    काहे कि..
    "..पैदा तो रवि भी देशभक्त था
    वो भी पूरा बदल गया साला.."

    सुप्रीम कोर्ट कानून में जकड़ा हुआ बुक्का फाड़ पड़ा
    इस देश को भगवान भी नहीं बचा सकता, अपनी जगह पर,
    लेकिन..यहाँ भी डिक्लेयर हो रहा है, कि..
    वो भी बदल गया साला
    ताली तो बज चुकी रवि साहब,
    अब बताया जाय कि..
    बदल के का बन गये रवि भईय्या ?

    ब्लागर पर ऎसे ही रोना-धोना प्रचुर हो रहा है..
    बात समझ में आती है, ई तो दो साल का बच्चा भी समझता है, कि..
    रोओ तो सब दौड़े चले आते हैं, दू शब्द पुचकार के टहल लेते हैं
    हताश क्यों रहते हो का कउनो जापानी तेल तलाशो
    देश को मर्दानगी पैदा करे वाले ई तेल की ज़रूरत है, भाई
    नहीं तो, एक आसान नुस्ख़ा है, भाई लोग गौर फ़रमायें.
    बाज़ार में ढाई गज़ की रस्सी है, ना
    अउर घर में पंखा भी टँगा होगा ?
    नहीं समझे ?
    तो, फिर गाते रहो.. ना समझे..वो अनाड़ी हैऽ ..ऽ

    अउर सुनो.. ई मेरा कहा-सुना भी लेते जाओ !

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  5. .

    भाई, आदमी अपनों से ही हारा है..
    ईहाँ भी वही हुई रहा है..

    दउड़ के गये, कि..ऎई, चलो देखो..एक टिप्पणी ठेला है
    सोचा..सरदार खुस होगा, सबाशी देगा

    ईहाँ हमरी पंडिताइन मूड़ पर ज़ूता लिये खड़ी हैं..
    चलो माफ़ी माँगो..
    इतनी तल्ख़ टोका-टाकी ठीक नहीं !

    सो, हम वापस लेय रहे हैं, भाई
    ससुर घरे में सेंसर मौज़ूद है
    हमार रस चूस के, ज़रूर यही..
    हमका ज़नखा बनाय के रक्खिस है

    हम तो रस्सी ढूँढे जाय रहे,
    आप भाई ईहाँ बइठो..
    .. अउर खुल्ला मौज़ लेयो

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  6. मेरा वन लाईनर :
    आपका क्या कहना है? - अजी बहुत कुछ कहना है जी.. मौका तो दिजिये.. :)

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  7. बहुत खूब.
    शानदार और जानदार चिटठा चर्चा है.
    आभार एवेम बधाई ग्रहण करें.

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  8. फ़ुल्लटूस मौज है जी।
    मुझे मत जलाओ: हमारा बर्नाल खतम हो गया है।

    बहुत उम्दा

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  9. अब मौसी बनें कि बुआ-बस बेटवा न बनें--हा हा!! बहुत सही चर्चा-जारी रहें ऐसे ही नियमित-अच्छा लगता है. :)

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  10. आम इंसान की जिंदगी:जीने का मजा ही कुछ और है।
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    पुन: आभार !!
    ~~ आप सभी को देख लेते हैँ ये काबिले तारीफ है अनूप जी :)
    चिठ्ठा -चर्चा यूँ ही चलती रहे ..
    हिन्दी ब्लोग जगत का कल्याण हो !
    - लावण्या

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