रविवार, अगस्त 31, 2008

बेट्टा, ब्लागिंग छोड़ो ,मौज से रहो

लैपटाप या कुर्सी

आज इतवार है। चर्चा करने में टाल-मटोल कर रहा है मुआ मन। ई-स्वामी ने लगता है मेरी मन:स्थिति भांप कर ही ये लेख लिखा है। स्वामीजी बताते हैं कि भारतीय लोग आमतौर पर कामटालू होते हैं:
अधिकतर भारतीय न्यूनाधिक रूप से इस समस्या के शिकार हैं, कुछ जानते हैं और इसके पाश से मुक्त होना चाहते हैं और दूसरों के लिये तो जैसा की कहा, यह जीवनशैली ही है. स्वयं उसे अपनी इस जीवनशैली से मुक्त होने में बहुत ज़ोर और मेहनत लगी.

<- बगल की फोटो में देखिये लैपटाप का कैसे उपयोग किया जा सकता है।
नेस्बी के लिये अपनी पहली पोस्ट लिखते हुये पल्लवी त्रिवेदी ने अपने काम से जुड़े कुछ अनुभव बताये। पुलिस की नौकरी में होने के बावजूद उनकी संवेदनशीलता और ईमानदारी ने पाठकों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। श्रीमानव्यंगेश्वर कथा सुनाकर पल्लवी ने बताया कि कैसे समाज की विसंगतियां एक व्यंग्यकार के लिये बेहद जरूरी हैं।

प्रत्यक्षाजी आजकल यात्रा वृत्तान्त बता लिख रही हैं। औरत हैट और तैमूर में वे पत्तियों में कोई इमेज देखती हैं, लैंडस्केप देखती हैं, ठंडे फर्श पर पट लेटे गाल सटाये आँखें मून्दे मैं सिल्वियो को सुनती हैं, भरोसा करना चाहती हैं पता नहीं किस पर ? शायद खुद पर!

प्रत्यक्षाजी की खास मांग पर बेताल शिखर से ली फाक की कहानी "जादूगरनी का शाप" पेश होती है।

अमृताप्रीतम के जन्मदिन के खास मौके पर उनकी याद में ब्लाग शुरू करके उनको जन्मदिन की मुबारकबाद दी गयी।

जीतेंद्र चौधरी काफ़ी दिन बाद सक्रिय हुये। मछली पकड़ने वालोंझेलाये और अपने सिन्धी ब्लाग पर भी पोस्ट ठेल दिये।

एक हिन्दुस्तानी ने भगवान का अर्थ बताया -पति यानी शौहर! द्विवेदीजी ने सही अर्थ बताया। सुधीजनो ने द्विवेदीजी को साधु-साधु कहा और हिन्दुस्तानी को धत-धत!

अभय तिवारी वाल-ई में हॉलीवुडीय कचड़ा के बारे में मजेदार जानकारी देते हैं। वे फ़िल्म के माध्यम से बताते हैं:
एक्सिऑम पर मनुष्य हैं जो पृथ्वी के नष्ट हो जाने के बाद से हज़ारों साल से किसी ऐसे ग्रह की तलाश में हैं जिस पर रहा जा सके। इस यात्रा का उनकी बोन डेन्सिटी पर इतना अधिक दुष्प्रभाव पड़ा है कि वे खड़े तक नहीं हो सकते और अपने सभी कामों के लिए रोबोट पर निर्भर हैं। अमरीकी जीवन(और धीरे-धीरे शेष दुनिया) जिस बीमारी की चपेट में फूलता जा रहा है उस मैक्डॉनाल्ड संस्कृति की एक भयावह तस्वीर दिखती है यहाँ.. जो मशीनीकरण और बाज़ारीकरण की एक अच्छी टीप है।


मुकेश खन्ना की जबानी आप आगे की कहानी सुनिये।:
लेकिन भीष्म पितामह की आत्मा से अगर मुझे किसीने मिलाया तो वे पँडित नरेन्द्र शर्मा ही थे !उनके पास मैँ जितनी बार बैठा, कुछ ज्ञान अर्जित करके ही उठा ।


द्विवेदीजी की पोस्टों के शीर्षक जित्ते लम्बे होते हैं उत्ते में हमारे आदि चिट्ठाकार आलोक कुछ पोस्टें लिखते हैं/थे। द्विवेदीजी की आज की पोस्ट का शीर्षक है- 'तीसरा खंबा' का अभियान रंग लाया............... न्यायिक सुधार बनेंगे आगामी चुनावों का केन्द्रीय मुद्दा

फ़ुरसतिया ने खराब लिखने के फ़ायदे बताने की कोशिश की तो इस पर डा.अरविन्द मिश्र का कहना था:
आपके आज तक के लेखन का सबसे घटिया /खराब आलेख ..अब आप चुक रहे हैं शुक्ल जी !सच काहा आपने जो शीर्ष पर पहुंचे हुए होते हैं उन्हें दुश्चिंताएं घेरे रहती हैं -लुढ़क जानें की …..घबराएं नहीं मैं अब टीपता रहूंगा आप को जमींदोज होने से बचाने के लिए —त्रिशंकु तो बनही रहेंगे हमारे टिप्पणी बल से …..अब आपण तेज संभालो आपही -दूसरों को टिप्पणी बल देने का समय अब खत्म हुआ आपका -अपनी गद्दी बचाईये !
अनूप शुक्ल अपनी गद्दी की चिंता करते इसके पहले ही उनको अपने समर्थन में खड़े ब्लागर हर्षित गुप्ता दिख गये। जो कहते हैं:
Actually, मैं ये सोच नहीं सकता था कि कोई इतने मजेदार तरीके से ख़राब लिखने के फायदे यानी benefits of writing bad, बता सकता है। ऊपर से इस subject पे एक blog भी बना सकता है।
अनूप शुक्ल खुश हो गये। लेकिन खुशी के गुब्बारे में जी.विश्वनाथजी ने पिन चुभा दिया और ब्लाग न लिखने के २१ फ़ायदे गिना दिये। मतलब बुजुर्गाना सलाह दी कि बेट्टा, ब्लागिंग छोड़ो ,मौज से रहो।

ऊह आह आई

आलोक पुराणिक कहते हैं- कमीशन वाले ’पे’ की चिंता नहीं करते और ’पे’ वालों को कमीशन मिलता नहीं। छ्ठा वेतन आयोग उनके सामने एक्सरे करवाने आया तो उन्होंने नतीजे निकाल दिये:
संभव है कि आने वाले कुछ सालों में वेतन आयोग की प्रासंगिकता ही खत्म हो जाये। सरकार में रोजगार इतने कम हो जायें, कि वेतन आयोग का रोल ही बहुत कम हो जाये। वेतन आयोग से बाहर के असंगठित श्रमिकों के मसले इतने बड़े और इतने उलझे हैं कि वह एकाध आयोग के नहीं, कई आयोगों के दायरे में समायेंगे। पर उनकी चिंता करने की जरुरत आम तौर पर समझी नहीं जाती, क्योंकि वे सब के सब भारत के बंगलादेश या युगांडा में रहते हैं।

एक लाइना


  • आखिर मैं एक इंसान हूं : भ्रम की दवा हकीम लुकमान के पास भी नहीं होती

  • :यार क्या मस्त टांगे हैंउन टांगों की चप्पलें दिख ही नहीं रहीं

  • इन मुई गोलियों का कोई मजहब नही होता : इसीलिये इनमें आपस में कोई दंगा नहीं होता

  • दस्तक :फ़िर किसी तूफ़ान की

  • मुझे क्या मिलेगा: चंद हसीन टिप्पणियां

  • ख्बाब ख्बाब था, उसका क्या है : हां जो ’था’ अब उसका’है’ क्या होगा?

  • समय जिसे न बांध सके : उसे हम क्या बांधे? जाने दो यार!

  • प्रधानमंत्री जी, “राष्ट्रीय शर्म” और भी हैं… हिन्दी ब्लॉगरों से सुनिये: और टिपियाइये कैसी रही राष्ट्रीय शर्म!

  • जूनून-ए-इश्क: सच्चा है तो फिर हारा नहीं करता

  • सरकार की शह पर गुंडागर्दी को सहन नहीं किया जाएगा- : गुंडागर्दी हम अपने बल बूते करेंगे किसी की शह पर नहीं

  • blogvani मे दोष:ब्लोगवाडी जीन्दा बाद

  • सिक्का: कहीं ढ़ला, कहीं चला ये मुआ है बड़ा मनचला

  • हमरी अटरिया पर आजा रे सांवरिया ! : देखा-देखी तनिक हुई जाए

  • डूबता सूरज लखनऊ शताब्दी से : उगते के लिये गोमती पकड़ें?

  • टाल-मटोल का मनोविज्ञान: मैं ऐसा क्यूं हूं.. मैं ऐसा क्यूं हूं?: आगे लिखने की बात टाल दी

  • खराब लिखने के फ़ायदे :अनगिनत हैं बस आप खराब लिखना शुरू कर ही दीजिये

  • औरत हैट और तैमूर : सब मिलेगा इस पोस्ट में जी

  • और तुम्हारी याद इस तरह जैसे के धूप का टुकडा . :पसरकर रोशन कर दे इस पोस्ट को

  • लैपटॉप का सदुपयोग कैसे करें उसकी ऐसी-तैसी करके

  • और पकड़ो मछली! अब झेलो जीतेंद्र चौधरी की पोस्ट

  • सिक्स पे कमीशन और बाबु की व्यथा : रिश्वत की दरों का कोई जिक्र नहीं हुआ


  • मेरी पसंद


    वह फुटबॉल का खिलाड़ी है
    गेंद को किक मारता है हर रोज़
    एक रोज़

    उसने किक मारकर प्‍यार को ऊपर आसमान में पहुंचा दिया
    वह वहीं रह गया
    चूंकि वह कभी नीचे नहीं आया
    लोगों को लगा यह सूरज है
    या चांद या फिर कोई नया सितारा

    मेरे भीतर एक गेंद है
    जो कभी नीचे नहीं आती
    लटकी रहती है आसमान के बीचोबीच
    आप देख सकते हैं उसे लपट बनते हुए
    प्‍यार या सितारा बनते हुए

    काजुको शिराइशी गीत चतुर्वेदी के सौजन्य से

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    9 टिप्‍पणियां:

    1. .



      अरे ददू, आपने तो मरवा ही दिया,
      मेरे दमदार पोस्ट का दम निकवा दिया, वह भी मेरे ही हाथों..
      और आज की नामुराद सुबह ’ मैं ऎसा क्यूँ हूँ ... ’ पढ़ लिया
      सो अपनी पोस्ट छोड़-छाड़ यहाँ विंडो पीपिंग में टाइम खोटी
      कर रैया हूँ ।

      बलिहारी गुरु आपनो...पोस्टिंग दियो छोड़ाय !

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    2. लिंक वाले ब्लॉग पर झांक लिया; नहीं तो चक्कर में थे कि जीर्ण शीर्ण कानपुरिया स्टेशन इतना चमकौआ कैसे हो गया; जैसा फोटो में है।
      चिठ्ठा चर्चा पर हर्ष और उस लैपटॉप पर तरस के भाव हैं!:)

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    3. अच्छी बात है आप सावधान हो गए ...विश्वनाथ जी की बात पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं है वे ब्लॉग विरोधी खेमें के हैं !

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    4. शानदार आलोचना लगी। अब तो कई बार यहीं से आज के मुख्‍य ब्‍लॉग पढ लि‍या करता हूँ।

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    5. .


      यहाँ दुबारा टिप्पणी करने की होती है ?
      ज़ाहिर सी बात है, मामू की सुबह तो यहीं होती है, सो..
      बासी माल फिर से पढ़ रहा था, अलाय बलाय पढ़ने से तो बेहतर ही है
      और बेहतर रहा भी.. अब उस्ताद को भी बताना ज़रूरी है, सो..
      एक ज्ञान की प्राप्ति हो गयी

      यह ज़नाब, जो देखने में बेपेंदी के भले लगते हों
      एक संदेश दे रहे हैं .. इस मशीनी गुलामी के दौर में भी..
      कम्प्यूटरवा रखो पेंदे के नीचे..
      किताब और किताबत मत भूलो

      मानो या न मानो, भाई मैंने तो कह दिया !

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    6. आपने चिठ्ठाचर्चा पर "मुकेश खन्ना की महाभारत " सीरीज़ से जुडी यादोँ की कडी को जगह दीँ हैँ
      उसके लिये आभार !

      स स्नेह,
      - लावण्या

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