मंगलवार, अगस्त 26, 2008

संयोग आपकी पोस्ट दिख जाये ऐन चर्चा करते समय

एहसास

सुरेशचिपलूनकर ने अपनी बात कही अनिल रघुराज की पोस्ट पर- नरेन्द्र मोदी नाम का “पेट दर्द” और ब्लॉग में “टैग” का बहाना… स्वभाविक रूप से बात जुतियाने वगैरह की भी हुयी। लेकिन जूतों की बात बहुत पुराने अंदाज में वही मखमली और सीधे वाले अंदाज में हुई। सुरेश ने बात रागदरबारी के छोटे पहलवान वाले अन्दाज में की लेकिन रागदरबारी की जूतम पैजार वाली उपमायें नदारद हैं। अनिल रघुराज ने बताया कि उनकी पत्नी गुजरात की हैं। अब संजय बेंगाणी का फ़र्ज बनता है कि अनिल रघुराज की पोस्टें अदब से पढ़ें और नियमित टिपियायें।

दिनेश द्विवेदी जी की एक पोस्ट के जबाब में पति-पत्नी और परिवार की पोस्ट आयी है। निष्कर्ष निकालने के लिये करमचंद जासूस का दिमाग चाहिये। मेरा तो मानना है अवांछनीय टिप्पणियों से बचने के लिये टिप्पणी माडरेशन लगायें। वर्ना तो यही होगा कि लोग जो मन आयेगा टिपियायेंगे आप उसका रोना रोयेंगे। गाना गायेंगे। लोग अगली पेशकश का इंतजार करेंगे।

शिवकुमार मिश्र की कुश के साथ मुलाकात मैंने कल ही पढ़ी। कुश की प्रस्तुति हमेशा की तरह जानदार रही। शिवकुमार के जबाब पढ़कर मैं पुलकित व किलकित हो गया। विस्मित , चकित भी हुआ लेकिन ऊ कहेंगे नहीं लेकिन अगर हैट धारण करते होते तो कलैहैं शिवकुमार को आफ़ कर देते।



फितरत ज़माने की , जो ना बदली तो क्या बदला!
ज़मीं बदली ज़हॉं बदला,ना हम बदले तो क्या बदला!


ये पंचलाइन है बिरादर जीतेंन्द्र भगत की। लेकिन काम सब वही किये जो होते हैं-जिन्दगी के लगभग 20 साल हॉस्टल में बिताने के बाद जैसे उम्रकैद से छूटा और बाहर निकलते ही सबसे पहले शादी की। बता रे बिरादर तू बदला क्या? जो येतारलौकिक संचार माध्यम से पर्व मनाने की बात कर रहा है!

झेलते बहुत दिन से आ रहे होंगे लेकिन काम कैसे करता है लोकतंत्र येदेखिये प्रमोदजी के ब्लाग पर।

पारुल की ये पोस्ट अधूरी है जब तक ये उसे ध्वनिकास्ट नहीं करतीं।

डाक्टर टंडन काम की जानकारी दे रहे हैं- होम्योपैथिक साफ़्टवेएर- "होम्पैथ-९ " का हिन्दी संस्करण

पठनीय लेख: क्या इतना बुरा हूँ मैं माँ?

मौजै मौज है जी मग्गा बाबा के यहां: शनिदेव के ख़िलाफ़ नारदमुनी का षडयंत्र

नये ब्लागर


साठ साल के मंसूरली हासमी साठ किलो के हैं। नये ब्लागर हैं। देखिये उनके जलवे। टिपियाइये।

अलोका बिहार में सामाजिक जागरूकता, प्रजातंत्र , कला और शोध पर लिखती हैं। हौसला बढ़ाइये।


एक लाइना



क्यों नहीं लिखते एक ऐसी नज़्म.. : ध्यान से उतर गया माफ़ करें! अभी लिख के लाते हैं।

तोलमोल के बोल-छटांक भर की कविताएं : आजकल छटांक का बांट कहां मिलता है जी ?

जीना सीख लिया है मेरी बेटी ने : अब हम भी उससे सीख लेंगे।

"मोहल्ला" के अविनाश (नए ब्लागर्स के पालनहार): पालन करवाने के लिये अविनाश के मन के अनुसार चलना जरूरी।

ईश्वर ही ईश्वर को जला रहा है: लोहा ही लोहे को काटता है जी।

स्टिंग आपरेशन और न्याय-व्यवस्था - एक री-ठेल पोस्ट : टिप्पणी जो न करवाये।

नंगे पिता-पुत्र को हिरासत में लेना भारी पड़ा :नंगई की बात ही कुछ और है यार!

जिसकी रही प्रतीक्षा, केवल आई नहीं वही : ये साजिशन है या रंजिशन जांच जारी है।

कैनिडियन पंडित-विदेशी ब्राह्मण!!! : और एक किस!

जागता शहर....मीडिया की ताजा अंगड़ाई: अब बिस्तर छोड़ भी दो भाई!

पति के लिए, अपनी पत्नी को, कुछ परिस्थितियों में पीटना तर्कसंगत : सर्वे कराओ मन चाहे परिणाम पाओ!

क्या तू मनुष्य है! : या कोई अनाम ब्लागर!

एक कमाण्डो से बातचीत : ब्लागिंग जो न कराये!

ध्यान रखने योग्य कुछ सरल सूत्र :रोना-धोना X बेवफाई X पारिवारिक षडयंत्र X बदले की आग = आपकी मम्मी का फेवरेट सीरियल

ख़ालीपन को निराश करने के कुछ निजी टोटके: ये खालीपन किस दुकान में मिलेगा जी?

कि हमारे मन जगें ... : मुंह धो लें, ब्रश कर लें, चाय तैयार है!

कलंदर का कमाल : आऒ इधर भी चौपट करो हाल!

आगे भगवान मालिक है... : बहुत काम है भगवान के पास, सबका मालिक बनना पड़ता है।

ल्युनिग का लात खाया लोकतंत्र.. : देखिये फ़िर तलियाइये। लोकतंत्र को या ल्यूनिक को। अजदक का इसमें कोई दोष नहीं है।

भिड़ गए नवाज़ और ज़रदारी: पाकिस्तान के साथ यही मुसीबत है- अफ़वाहें अक्सर सच हो जाती हैं।

संयोग : आपकी नयी पोस्ट दिख जाये ऐन चर्चा करते समय।

इस बार के नाटक का टॉपिक क्या हो... : नाटक शुरू करो, टापिक में क्या रखा है!

मैं तुम्हारा आख़िरी ख़त : इसे फ़ाड़कर फ़ेकना मत!

फ़िल्में, बचपन और छोटू उस्ताद : रविरतलामी आप और हम!

तसव्वुरात की परछाइयां उभरती है . : रंजू भाटिया के ब्लाग पर!

मैंने किसी की माँ की... किसी की पत्नी की... नहीं की है। : तो अब कर लो यार! किसकी हिम्मत जो रोके!

क्या इसे धर्मनिरपेक्षता की मिसाल मान सकते हैं? इसके लिये तो हाईपावर कमेटी बैठानी पड़ेगी।

अकेली लड़की खुली तिजोरी की तरह होती है: एटीएम का जमाना है कार्ड डालो पैसा निकालो!

लकड़ी का रावण नहीं रबड़ का गुड्डा :न आर्मी, न अमरीका, न अवाम, साथ छोड़ गए तमाम।


कुछ ऐसे ही बिखरा हुआ सा : समेट के ब्लाग पर पोस्ट कर दिया।

कब छोड़ेगे मूर्खता और अन्धविश्वास का साथ: कब्बी नई! साथ जियेंगे साथ मरेंगे।

मेरी पसन्द


भय बिन होय न प्रीत
के भय्या भय बिन होये न प्रीत,
हमका कौन्हों दे बताये
प्रीत के कैसन रीत ई भय्या
कि भय बिन होये न प्रीत?

लैइके लाठी सरि पै बैठो
धमकावो- दुत्कारौ-पीटौ
दाँत पीसि कै खूब असीसौ
नेह लगाय के गल्ती किन्हौ
पुनि पुनि दुहिरावौ के भय्या,
प्रीत के ऐसन रीत है भय्या
भय बिन होय न प्रीत--

हमका तुमसे प्रेम अकिंचन
राधा कीनहिन स्याम से जैसन
इधर-उधर ना आउर निहारौ
अब तुम अहिका कर्ज उतारौ
गाँठ बान्धि कै धयि लयो आज,
प्रीत के ऐसन रीत है भय्या
भय बिन होये न प्रीत--

हिरनिन ऐसन तुम्हरे नैन
कोयल जैसन तुम्हरे बैन
बतियाओ तो फूल झरैं
मुस्काओ तो कंवल खिलैं
ई सब हमरि भयि जागीर
सोवत जागत धरिहौ ध्यान,
प्रीत के ऐसन रीत है भय्या
भय बिन होये न प्रीत …

पारुल

अपनी बात


कल की चर्चा पर ज्ञानजी बोलते भये: मैं पुन: यह कह दूं कि आपकी ब्लॉगूर्जा (ब्लॉग ऊर्जा) से इम्प्रेस्ड हूं - अत्यधिक।

डा.अमर ने तुरंत संशोधन किया:
आप शीघ्र स्वस्थ हों....
परमपिता ब्लागजगत को ऎसी बेमन की चिट्ठाचर्चा सहने की शक्ति प्रदान करे


दोनों महानुभावों का मतलब यही है कि ठीक है मेहनत बहुत कर रहे हो लेकिन कायदे की बात नहीं करते। डा.अमर कुमार के झन्नाटेदार कमेंट ब्लाग जगत की निधि हैं। पढ़कर मजा आ जाता है।

चर्चा में किसी को छोड़ने या लेने का मेरा कोई मन्तव्य नहीं होता। जो दिख गया उसे शामिल कर लिया। गुट-फ़ुट का कोई हिसाब नहीं लेकिन जिनसे परिचय है और जिनके बारे में मैं लगता है कि वे मेरे लिखे का बुरा नहीं मानेगे उनकी पोस्ट शामिल करने का प्रयास करता हूं।

चर्चा करने में कोई गलतफ़हमी नहीं। अपनी खुशी के लिये करता हूं:

बचपन में पढ़ा था:

न वा अरे मैत्रेयी पुत्रस्य कामाय पुत्रम प्रियम भवति
आत्मनस्तु वै कामाय सर्वम प्रियम भवति।

अरे मैत्रेयी पुत्र की कामना के लिये पुत्र प्रिय नहीं होता। अपनी ही कामना के लिये सब कुछ प्रिय होता। -याज्ञवल्य

इति श्री चर्चा पुरा आजस्य अध्याय समाप्त:

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16 टिप्‍पणियां:

  1. .

    लो भाई, लगता है कि पहली टिप्पणी देने का कलंk आज मुझे ही मिलने वाला है...
    सो, पब्लिक आपसे हिसाब माँगती है कि..
    * आपको यह क्यों लगता है कि जो लोग आपके लिखे का बुरा मानेंगे, उनको बख़्स दिया जाये ?
    * यह कम से कम यह मेरे तो समझ के ख़िलाफ़ है
    अउर जरा ई बताओ कि ' हमार कोऊ का करिहे.. ' वाले अनूप छुट्टी पर चल रहे हैं, कूटनीति पढ़ रहे हैं या वाकई अस्वस्थ हैं ?

    भाई, हम नवा भले हन, लेकिन हमरी ब्लागिंग संहिता में तो..जिसने की शरम... उसके फूटे करम

    सज्जनता से संक्रमित लिखें तो..
    या भदेस लिखें तो..
    पूर्वग्रसित गरियाईहें सो गरियाईहें

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  2. चर्चा करो तो ये नहीं चलेगा कि जो बन पड़े वह कर दिया। चिट्ठा चर्चा भी लेखक की रचना है। उसे उस की रचना जैसा ही होना चाहिए। समीक्षा और आलोचना का महत्व कम नहीं होता। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को उन की आलोचना की वजह से जाना जाता है न कि उन की अन्य स्वतंत्र रचनाओं के लिए।

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  3. जमाए रहें...सबका अपना अपना मत है, प्रकट कर रहे है. आप अपनी धून में रहें.

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  4. चर्चा तो सटीक रही.. हमेशा की तरह..
    और ये एक लाईना भी मस्त रही.. क्यों नहीं लिखते एक ऐसी नज़्म.. : ध्यान से उतर गया माफ़ करें! अभी लिख के लाते हैं।

    सोच रहे है.. कल की चर्चा हम कर डाले

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  5. कुश, सोचिये और कल की चर्चा आप करिये। हमेशा करिये वुधवार को या किसी और दिन (शनिवार छोड़कर उस दिन निठल्ले तरुण का है) तो और बढ़िया। जिस दिन करें बता दें ताकि जनता जम के आये। आपने पिछली बार चर्चा की तो लोगों की आमद और टिप्पणियां दोगुनी हो गयी थी।

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  6. मुझे गलत टैग किया जा रहा है डाक्टर साहब के साथ। मैं प्रभावित हूं आपकी उत्कृष्टता से और ईर्ष्याग्रस्त भी।
    आप क्या चाहते हैं - मैं जेण्टलमैन की सनद आपको लिखा कर भिजवा दूं! :-)

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  7. anuup ji podcast laga diya hai...ab sun ney vaaley aapkey risk per suney :)
    saadar
    parul

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  8. .

    सही एतराज़ है, टिप्पणी क्रमांक 7 में...
    अपुन तो विद्वता ताक पर रख कर, ब्लागर पर आयेला है..
    वहाँ मुद्रित साहित्य के संपादकगण, लेख का संशोधन करवा करवा कर मेरा ' स्व ' तो अपनी दराज़ में रख लेते हैं ।
    यहाँ उस अपमान से मुक्त तो हूँ, मारकेटिंग विभाग , पब्लिक टेस्ट या संपादकीय पूर्वाग्रह के समझौतों से स्वतंत्र तो हूँ ।
    अतएव यह केवल आग्रह ही है कि, मुझे स्वनामधन्य विद्वानों के साथ टैग न किया जाये ।
    मेरा यहाँ एक ही टैग रहने दें.. 'बिहारी.. बैसवारी.. उलटखोपड़ी इत्यादि इत्यादि '
    खेद तो मुझे भी है, कि टैग की विसंगति तो क्या पहले मुझे कोई टैग ही न दिखा,
    इतनी लायकियत ही नहीं हैं । अब क्लिनिक से लौट कर अपने टैग टटोलूँगा ।

    यह टिप्पणी अपने द्रोणाचार्य को एकलव्य की ओर से अर्पित,
    किंतु मैं अपना अँगूठा ही दे देने वाले शिष्यों में नहीं हूँ ।
    और.. उनमें रहना भी नहीं चाहता !

    उधर जाऊँ तो स्वामी मारे, इधर आऊँ तो ज्ञान को पाऊँ ।
    हो रब्बा, मैं की कराँ ..

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  9. आज तो हम भी डा अमर कुमार जी से सहमत है जी, अनूप जी जबरिया लिखें तो अच्छे लगते हैं
    "चर्चा में किसी को छोड़ने या लेने का मेरा कोई मन्तव्य नहीं होता। जो दिख गया उसे शामिल कर लिया। गुट-फ़ुट का कोई हिसाब नहीं लेकिन जिनसे परिचय है और जिनके बारे में मैं लगता है कि वे मेरे लिखे का बुरा नहीं मानेगे उनकी पोस्ट शामिल करने का प्रयास करता हूं। "
    ऐसी सफ़ाई देने की क्या जरुरत्।
    आप की ब्लोग ऊर्जा के तो हम भी कायल हैं। चिठ्ठाचर्चा का रंग भी फ़ुर्सतिया हो जाए तो मजा आ जाये

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  10. हमेशा की तरह ही शानदार । आपकी पसंद भी अच्छी रही ...

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  11. आज की चर्चा और टिपणी पढ़ कर लग गया है की
    आगे आगे और रंग जमेगा ! भविष्य के लछ्छन हमें दिखाई दे गए है ! अग्रिम धन्यवाद !

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  12. जबरदस्ती परेशान न होकर अपना नियमित लेखन का कार्य यथावत जारी रखें और हमारी शुभकामनाऐं एवं हार्दिक बधाई निरन्तर आपके साथ हैं.

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  13. ब्लॉग जगत में मुझे लगता है सर्वश्रेठ टिप्पणियों के लिए भी आपको लिखना चाहिए ....ये ओर बात है की उस पर एकाधिकार डॉ अमर कुमार का ही रहेगा........क्या कहते है अनूप जी......
    ओर हाँ एक लाइन मस्त है .....

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  14. "चर्चा करने में कोई गलतफ़हमी नहीं। अपनी खुशी के लिये करता हूं" भगवान् आपकी खुशी बढाए... और आपको अपनी खुशी बढाते रहने का यूँही मन करता रहे बस... खूब खुशी बढाइये !

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  15. हमारी दो चर्चा के बराबर की एक चर्चा लिख दी आपने, इत्ते ज्यादा लिंक दिये हैं, उत्ी ज्यादा वन लाईना फिर भी कोई कुछ कहता है तो अब क्या कहूँ एक फिल्म थी, दुनिया मेरी जेब

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