मंगलवार, दिसंबर 02, 2008

जो अंधेरों से उठे तो फिर उजाला बन गये



फ़ूल


मुंबई में हुआ आतंकवादी हमला ब्लाग जगत की मुख्य चर्चा विषय बना हुआ है। कल इसमें पाकिस्तान रेडियो की हास्यास्पद क्लिपिंगस भी जुड़ गयीं। पाकिस्तान टी.वी. ने यह साबित करने में बहुत मेहनत की सारा किया धरा भारत के लोगों का है।

इसी सिलसिले में ताऊ ने बताया:
मुम्बई में चले ६० घंटे के तांडव के सम्बन्ध में एक जनहित याचिका समाजसेवी और न्यायिक विशेषज्ञ श्री सतपाल आनंद ने लगाई है ! गृह सचिव, गृह मंत्री , प्रधान मंत्री और सोनिया गांधी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया है !


मेजर संदीप उन्नीकृष्नन के पिता ने केरल के मुख्यमंत्री से मिलने से इंकार कर दिया यह कहते हुये
"मेरा बेटा देश के लिये मरा हैं , केरल के लिये नहीं मरा हैं । मेरे बेटे की मौत पर राजनीति मत करो । "


इस पर मास्टर साहब ने उनको जुतियाने का आवाहन किया है। कार्यक्रम की सफ़लता के लिये जूते साथ में मुहैया करवाये हैं! इसी पोस्ट में घुघुती बासूती जी की समझाइस है कि
देखिए, आपका नाराज होना समझ में आता है परन्तु इस सारे घटनाक्रम व लेख में दो गलत बातें हुईं । एक तो कुत्तों का अनादर दूसरा इतने बढ़िया जूतों का ! शहीद का अनादर करने वाला तो कोई पैदा ही नहीं हुआ । चाँद पर थूकने से वह वापिस अपने चेहरे पर ही गिरता है जैसा की मंत्री जी के साथ हुआ । सो निश्चिन्त रहिए, शहीद का अनादर करना मंत्री जी के वश की बात नहीं है ।


घुघुतीजी समस्या से निपटने के लिये सुझाव भी देती हैं।

कारगिल हमले के बाद हम लोग बहुत दिन तक इस बात का प्रचार करते रहे कि पाकिस्तानी सैनिको को उनके देशवाले छोड़कर भाग गये और फ़िर हमने उनको दफ़नाया। लेकिन आतंकवादियों को यह दफ़न सुविधा देने के मूड में नहीं हैं क्योंकि:
मुंबई के हमलों के बाद हुई मुठभेड़ में मारे गए नौ चरमपंथियों को मुंबई के मुसलमानों ने कब्रिस्तान में दफ़न करने से मना कर दिया है.


इसी लिये सतीश सक्सेनाजी लिखते हैं:

जब मौत तुम्हारी आएगी, तब बात शहादत की छोडो
मय्यत में कन्धा देने को, अब्बू तक पास न आयेंगे !


सीमा जी कहतीं हैं
सरहदें इश्क़ की न ठहराएँ
इश्क़ से काइनात हारी है ....


प्रीति बड़्थ्वाल का दर्द है:
जिन्दगी अब मुझे,
यूं भाती नहीं,
कितना भी आंसुओं को रोक लें,
हंसी आती नहीं,


मानसी ने शायद शहीदों के बारे में सोचते हुये लिखा जो अपनी शहादत से चमकते सितारे बन गये हैं:
जो अंधेरों से उठे तो फिर उजाला बन गये
क्या हुआ 'गर जुगनु थे कल, अब सितारा बन गये

जब उठा तूफ़ां तो हम सैलाब से बहने लगे
डूबना था हम को देखो पर किनारा बन गये


नीरज गोस्वामीजी ने कल अपनी सौवीं पोस्ट लिखी। उनको बधाई! वे लिखते हैं:
इतना भी कट कर रहो मत, दोस्तों से दोस्त मेरे
कुछ न कुछ होता है हासिल, हर किसी की दोस्ती से

दोस्त,अंधिआरा भी होना चाहिए, कुछ जिंदगी में
तंग पड़ जाओगे वरना, रौशनी ही रौशनी से


लोग सोचते होंगे कमांडो किस तरह काम करते हैं, किस मिट्टी के बने होते हैं कि ऐसे आपरेशन पर चंद मिनटों की नोटिस पर चल देते हैं। कबाड़खाने की इस पोस्ट से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कैसे काम करते हैं कमांडो। आपरेशन टारनेडो की कमान संभालने वाले कमांडो के बारे में उनके मित्र लिखते हैं:
मैं गुजरा वक्त याद करते हुए लब्बू के बारे में सोच रहा हूं। लेकिन मेरी सोच में कुछ फर्क आ गया है। यह निकर पहनकर स्कूल जाने के दिनों, कॉलिज में लड़कियों से चक्कर चलाने के किस्सों, अकैडमी में कड़ी ट्रेनिंग के बीच खास किस्म के रोमांच और फिर विवाहित होने के बाद सपरिवार किसी रेस्ट्रॉन्ट में खाना खाने का सुकून देने वाली दोस्ती ही नहीं रह गई थी, बल्कि अब मेरे मन में उसके लिए बेहिसाब सम्मान का भाव भी आ गया है। मैं सोच रहा हूं कि वह लौटकर आएगा तो उसे जरूर सैल्यूट मारूंगा और पूछूंगा - यार, तुम कमांडो आखिर किस मिट्टी के बने होते हो?


मुंबई पर हुये आतंकी हमलों के दौरान तमाम लोगों ने आवाहन किया था कि हमें तुरंत हमला कर देना चाहिये। ज्ञानजी सवाल पूछते हैं:
मंदी के इस दौर में देश एक फुल स्केल के युद्ध का खर्च और तनाव झेल सकता है?


एक अनुमान के अनुसार दिन की आमने-सामने की लड़ाई में करीब एक हजार करोड़ रुपये लगते हैं। बोलिये है लड़ने का मन!

पंगेबाज धंधे की बात करते हैं।द्विवेदी कहते हैं:
पस्तहिम्मत न हो कर बैठो अभी से
और भी सख़्त है आगे रात यारो


कंचन कहती हैं:
किसको अश्रु दिखाए, किस से कहे कहानी आज
दुनिया भर में अचरज बन फिर ताज खड़ा है आज।


लेकिन बालकिशन का दर्द सबसे जुदा है वे कहते हैं:
लोडशेडिंग हो गई. दूकान पर कैंडल नहीं मिली.
स्साले सारी मोमबत्तियां खरीद ले गए. कह रहे थे आतंकवाद से जंग लडेंगे.
आतंकवाद से जंग!
माय फुट.


आलोक पुराणिक कभी-कभी काम के सुझाव भी दे जाते हैं तो तुरंत अमलात्मक होते हैं:
लोकसभा चैनल को कार्टून नेटवर्क के साथ मिला देना चाहिए। नेतागण जब राष्ट्रहित की बात करते हैं, तो हंसी आती है। जब हो हो खाऊं खाऊं करते हैं, तो एकैदम नैचुरल लगते हैं। देखना अच्छा लगता है। पर उन्हे देखने में कार्टून नेटवर्क के प्रोग्राम मिस हो जाते हैं। कार्टून नेटवर्क और लोकसभा चैनल एक साथ मिल जायें, तो प्रोग्राम मिस नहीं होंगे।


राहुल उपाध्याय स्व.प्रदीप जी से क्षमा मांगते हुये गीत सुनाते हैं:
जब भी आतंकवादी हाथ में आया
जात-देश उसकी पूछते हैं
'गर अपने ही देश का निकले
तो बगले झांकने लगते हैं
'गर निकले वो पड़ोसी देश का
तो अनाप-शनाप उन्हें फिर बकते हैं


और अंत में



दो घंटे हड़बड़ चर्चा के बाद इत्ती ही पोस्ट कर पाये। क्लास का टाइम हो गया। केतली की चाय खलास! दिन में भी ब्लाग देखने का समय नहीं मिल पाता सो इत्ता ही।

कल द्विवेदीजी की टिप्पणी थी:
यह चर्चा भी मुंबई हमले की प्रतिक्रियाओं पर केंद्रित हो गई। जब कि इसे चिट्ठा केन्द्रित होना था।


इस पर अन्य लोगों के अलावा ज्ञानजी ने लिखा है:

चर्चा तो वही होगी जो परिदृष्य में चल रहा होगा। बहुत सटीक और श्रमसाध्य चर्चा की है आपने। साधुवाद।


कविताजी द्विवेदीजी की बात अपना पक्ष रखते हुये लिखा है:

द्विवेदी जी,मैंने अपनी ओर से यहाँ कुछ प्रत्यारोपित नहीं किया है,हमलों की प्रतिक्रिया की सारी सामग्री चिट्ठों के लिंक सहित दी गई है अत: यह चिट्ठा - चर्चा नहीं है ऐसा कहना कदापि उचित नहीं है। वैसे ‘चर्चाकार किन-किन चिट्ठों की चर्चा करें’ - इसके लिए यदि कोई आचार संहिता हो तो कृपया अनूप जी मुझे अवश्य बताएँ ताकि भविष्य़ में नियम का अनुपालन हो सके।


मुझसे पूछा है तो मैं यही कहना चाहता हूं कि पाठक की हैसियत से द्विवेदीजी को अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने का पूरा हक है सो उन्होंने किया जैसा उनको लगा। लेकिन यह भी सच है कि चर्चा में वही तो शामिल होगा जो चिट्ठों में होगा। यह कविता जी ने लिखा भी। बाकी मेरी समझ में चर्चाकार पर इस बात की कोई बंदिश नहीं है न होनी चाहिये कि वह क्या चर्चा करे और क्या नहीं। उसकी अपनी सुविधा/रुचि/मन/मूड पर निर्भर है कि किसे वह चर्चा के उपयुक्त पाता है किसे नहीं। मेरी समझ में चर्चाकार को किसी नियम के दायरे में बांधना सही नहीं है।

बाकी संतजन बतायेंगे।

हम चले कक्षा की ओर! आप मजे करिये!

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20 टिप्‍पणियां:


  1. सही है, इस चोट कि बिलबिलाहट के आगे ग़म के तराने भी फ़ीके हैं,
    चर्चा वही.. जो चर्चाकार मन भाये, फिर यह तो दुखती रग है.. इस कराह और क्रोध को न कुचलो !

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  2. abhi tak man se hadse ka gubbar nahi nikla hai.....chacha sarthak hai

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  3. बहुत सामयीक चर्चा ! चर्चाकार को पूरी स्वतंत्रता दी जानी चाहिए ! चर्चाकार को जो चिठ्ठो में दिखेगा वही लिखेगा और और इस माहोल में इस आक्रोश के अलावा है ही क्या ? मुझे नही लगता की कोई निरर्थक चर्चा अभी तक रही हो ! पर ठीक है बात सभी रख सकते हैं ! अपनी अपनी सोच है सबकी !

    रामराम !

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  4. जब मौत तुम्हारी आएगी, तब बात शहादत की छोडो
    मय्यत में कन्धा देने को, अब्बू तक पास न आयेंगे !

    " सभी के मन मे आक्रोश है , और कुछ न कर पाने का एक मलाल और मजबूरी भी .... क्या कहें अब"

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  5. कविता जी के विविध आयामीय ब्लॉग मैने देखे हैं। कोई एक-दो ब्लॉग अपने फीड रीडर में चुन नहीं पाया हूं - लिहाजा पठन/टिप्पणी नहीं कर पाता; पर उनकी चिठ्ठा-चर्चा के माध्यम से ज्ञात प्रतिभा का कायल अवश्य हो गया हूं।
    और आपसे तो पूछना ही है - इतने कम समय में इतनी चर्चा कैसे कर लेते हैं? कितने घोस्ट-चर्चक हैं आपके पास?

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  6. aise samay me chittha jagat ki sakriyata dekh kar sabit hota hai ki ham yaha.n sirf apna time pass karne nahi baithe hai.n.. balki har vyavasths se hamaara seedha sarokaar hai.

    salaam is jazbe ko..!

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  7. बढ़िया... चिट्ठो का अर्क पिला दिया.

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  8. अनूप जी पूरी चर्चा सही और सार्थक है।
    ये नेता अपनी राजनीति से कभी भी बाज नहीं आते। कोई बतायेगा इन्हे कि आम आदमी ने ही इसे नेता बनाया है। जो ऊपर उठा सकते हैं वो गिरा भी सकते हैं।

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  9. चर्चा वर्तमान परिदृश्य पर होनी ही चाहिए... दिनेश जी स्वयं ब्लास्ट वाले दिन लोगो को छोटी बहर की ग़ज़ल सुना रहे थे.. शायद इसलिए उन्हे लगा हो की दूसरो को भी ऐसा ही करना चाहिए..

    मैं ये नही कह रहा हू की उन्होने कुछ ग़लत किया.. उनका निजी ब्लॉग है जो मर्ज़ी आए करे.. परंतु दूसरे चर्चाकार की भी अपनी स्वतंत्रता है की वो अपने हिसाब से चर्चा करे..

    मेरे शब्द कड़वे लग सकते है.. पर टिप्‍पणी का असली अर्थ यही है.. वो सकारात्मक और नकारात्मक कुछ भी हो सकती है..

    चर्चकारो की मेहनत के लिए उन्हे बधाई..

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  10. बढिया चर्चा के साथ चिट्ठाकारों को मार्गदर्शन भी। वैसे, हर लेखक को अपनी बात अपने तरीके से कहने का हक तो मिलना ही चाहिए। पाठक की पसंद-नापसंद तो लेखक के ध्यान में रहती ही है\
    >मेजर संदीप के पिता ने केरल के मुख्यमंत्री को पास नहीं आने दिया तो झल्ला कर आज नेताजी ने कह दिया- अगर उन्नीकृष्णन का घर यहां न होता तो कुत्ता भी वहां नहीं जाता। यह है हमारे नेताओं की श्रद्धा का नमूना हमारे शहीदों के प्रति।

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  11. चर्चा चिट्ठों के परिदृश्य में होनी चाहिए... सारे चिट्ठे इसी घटना से रंगे हुए हैं तो चर्चा में वही आयेंगे ये स्वाभाविक ही है.

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  12. बहुत सामयीक चर्चा !!!!!


    "हम चले कक्षा की ओर! आप मजे करिये!"

    कहाँ निकल लिए ???? मास्टर कक्षा में इंतजार कर रहा है????

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  13. आप की बात बिलकुल सही है चर्चा को किसी नियम में बांधना ठीक नहीं। मेरा सोचना था कि कुछ इतर विषयों पर लिखे को भी स्थान दिया जा सकता था। इस से एकरसता टूटती। मेरे विचार में यह जरूरी है। मुम्बई हमले पर आवश्यकता से अधिक और अनावश्यक तक लिखा जा चुका है। यह भी लिखा जा सकता था कि इस माहौल में भी कुछ लोग इतर विषयों पर क्या लिख रहे थे।

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  14. शायद द्विवेदी जी चिट्ठाकार चर्चा कराना चाहते हैं प्रकारांतर से ! कविता जी ने बहुत जिम्मेदारी और जनभावनाओं के अनुकूल और पूरी वस्तुनिष्ठता से चर्चा की है - लोग अभी भी रास रंग में डूबे हैं ! दाद देनी होगी उनकी सहन शक्ति की !

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  15. पस्तहिम्मत न हो कर बैठो अभी से
    और भी सख़्त है आगे रात यारो

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  16. अमर शहीदोँ को हमारी श्रध्धाँजलि
    अब भी वक्त है सम्हलने का शहीदोँ का खून सस्ता नहीँ है -
    उन्नीकृषणन की माँ के आँसू देखिये

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  17. http://rupeenews.com/

    kripya is link par gaur farmayein...yahan par mahatma gandhi, nehru aur indira gandhi k baare me kuch articles hain.....jo mujhe bahut hi kharab lage aur maine socha k mere aur doston ko bhi is iska pata chale k hamare mahatma k baare me ye sab kya kaha jaa raha hai.

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