शनिवार, दिसंबर 06, 2008

क्या आप सांपों से चम्पी कराना चाहेंगे

फ़ूल

आज ६ दिसम्बर है। भारतीय राजनीति में आज का दिन बड़ी उथल-पुथल के दिन के रूप में जाना जाता है। ताऊ के मुंह से ही सुनिये तो अच्छा रहेगा:
आज का दिन बाबरी मस्जिद काण्ड के नाम से याद किया जाता है ! पर मै उससे भी कई साल पहले ६ दिसम्बर १९** को हुए एक काण्ड को राजी या बिना राजी याद भी करता हूँ और मनाता भी हूँ ! आज के दिन मेरे लिए ताई नाम का काण्ड पैदा हुवा था ! सही में कुछ दिन इतिहास में दर्ज होने के लिए ही याद किए जाते हैं ! जन्म दिन की बधाई तो देनी ही पड़ती है !


सो आज की चर्चा की शुरुआत ताई को जन्मदिन की बधाई के साथ।

ताई के जन्मदिन के अवसर पर ऊपर लगी फोटॊ को आप ताई की फोटो समझना चाहते हैं तो हम आपको मना नहीं करेंगे लेकिन यह ताई की फोटॊ अभी नहीं है। यह फोटो उस कन्या की फोटो जैसी ही जो नीरज रोहिल्ला से ऎक्स्प्रेस लेन में भेंटियायी थी। नीरज से उस बाला की काम भर की गिटपिट भी हुई। क्या हुआ वह सब आप उसी के मुंह से सुन लीजिये!

आज का दिन डा. अम्बेदकर की पुण्य तिथि के रूप में भी मनाया जाता है। इस मौके पर अम्बेदकरजी के बारे में जानकारी दे रहे हैं राम शिवमूर्ति यादव ने अपने आलेख दमित आन्‍दोलन को दी नई दिशाः डॉ0 अम्‍बेडकर में। वे कहते हैं:

वस्‍तुतः डॉ अम्‍बेडकर यह अच्‍छी तरह समझते थे कि जाति व्‍यवस्‍था ही भारत में सभी कुरीतियों की जड़ है एवं बिना इसके उन्‍मूलन के देश और समाज का सतत्‌ विकास सम्‍भव नहीं। यही कारण था कि जहाँ दलितों के उद्धार का दम्‍भ भरने वाले तमाम लोगों का प्रथम एजेण्‍डा औपनिवेशिक साम्राज्‍यशाही के खिलाफ युद्ध रहा और उनकी मान्‍यता थी कि स्‍वतंत्रता पश्‍चात कानून बनाकर न केवल छुआछूत को खत्‍म किया जा सकता है अपितु दलितों को कानूनी तौर पर अधिकार देकर उन्‍हें आगे भी बढ़ाया जा सकता है पर डॉ0 अम्‍बेडकर इन सवर्ण नेताओं की बातों पर विश्‍वास नहीं करते थे वरन्‌ दलितों का सामाजिक और राजनैतिक व्‍यवस्‍था में तत्‍काल समुचित प्रतिनिधित्‍व सुनिश्‍चित करना चाहते थे।


धोती सर्वे के बहाने अशोक पाण्डेय गांव के बदलते परिवेश की तरफ़ इशारा करते हैं:
भारतीय गांव की यह परंपरागत छवि अब स्‍मृतियों में सिमटती जा रही है। न पहले जैसा लोकजीवन में रंग व रस रहा, न ही फसलों में वैविध्‍य। भूमंडलीकरण और बढ़ते भ्रष्‍टाचार ने गांवों का समूचा ताना-बाना ही नष्‍ट-भ्रष्‍ट कर दिया। आचार-विचार, रहन-सहन सब कुछ बदलते जा रहा है।


सुहेल सेठ बताते हैं कि नरेन्द्र मोदी ही उनकी पसंद क्यों हैं?:
यह मोदी का वह आभामंडल था जिसमें गुजरात का विकास और राज्य के लोगों के जीवन स्तर को बेहतर करने की दृढ़ता दिखाई दे रही थी। सच भी है। आज सिंगापुर में गुजरात का दूध बिकता है। अफगानी खाते हैं गुजराती टमाटर। कनाडा में भरा पड़ा है गुजरात का पैदा किया हुआ आलू। यह सब विकास की हार्दिक कामना व कोशिश के बिना संभव नहीं । मोदी ने संभव कर दिखाया है।


बदलाव का काम बड़े सस्ते में हो सकता है। वकील साहब द्विवेदी जी कहते हैं:
मेरे विचार में हमें करना सिर्फ इतना है कि हम अपने अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से करते हुए सजग रहें कि जाने या अनजाने शत्रु को किसी प्रकार की सुविधा तो प्रदान नहीं कर रहे हैं।



प्रमोदजी मुंहदेखी तारीफ़ कम करते हैं। लेकिन वे दिबाकर को शाबासी देते हैं। काहे के लिये ऊ त आप उनकी पोस्ट पढ़के ही समझिये।

पता नहीं है कि यह कहानी है कि हकीकत लेकिन है रोचक यह बालक-बालिका संवाद। :
लड़की: जिसे जानती नहीं, उससे शादी कैसे कर लूँ? सब कुछ, सब लोग बनावटी लगते हैं. ये सब मेरी समझ से बाहर है और इसमें मैं बिलकुल नहीं पड़ना चाहती. आप बताओ ना.
लड़का: मैं क्या करूँगा? वही रूटीन लाइफ़. औफिस, घर,औफ़िस. द विसीयस सर्कल.
लड़की: चलो, आई फ़ील दिस इज द बेस्ट. बिजी रहना. बाकी चीजों में मुझे नहीं पड़ना.


रामप्रकाश द्विवेदी लिखते हैं:
फिर
उधर
धरती की देह पर बादल बरसे
इधर तुम
सराबोर सृष्टि
भर उठी अनूठी गंध से।


मानोशी अपनी ब्लागिग के बीते हुये दिनों को याद करती हैं।
उस वक्त ब्लाग सिर्फ़ चंद लोग लिखते थे। जीतू, अनूप शुक्ल, ई-स्वामी, रमन कौल, प्रत्यक्षा, अनूप भार्गव आदि। छोटी सी ब्लागिंग की दुनिया, एक परिवार जैसा हो गया था। सभी से बातचीत होती थी, और सब अपने ही लगते थे। अच्छे लोग, पारिवारिक संबंध। सुनील दीपक के पोस्ट्स भी बहुत अच्छे होते थे ( अभी भी)।


आशीष-निवेदिता परिणय में भी ब्लागिंग का हाथ रहा। मानसी के सवाल- ब्लागिंग के ज़रिये हीपरिचय...अमेज़िंग...शादी के बाद क्या हुआ आशीष? ब्लागिंग बंद? का जबाब निवेदिता अस्वीकरण के रूप में देती हैं ताकि दोषी उनको न माना जाये:
अस्वीकरण :- हम यहां बता देते है कि आशीष आजकल लिखते नही है इसका कारण हम नही है! शादी के पहले कन्या पुराण लिखते थे , अब लिखने को बचा क्या है ?
घर मे दाना पानी जो बंद नही हो जायेगा।


अल्लेव हम अभी देखे कि निवेदिता अंगूर के पत्तों के पकौड़े बनाना भी जानती हैं। न सिर्फ़ जानती हैं बल्कि बता भी रही हैं।

इधर ज्ञानजी अपनी ठेलमठेल में जुटे हैं। सवाल करते हैं कौन रहा ओरिजिनल ठेलक?। लिखने से ज्यादा उनका ध्यान उसकी चर्चा में है:
कल चिठ्ठाचर्चा कौन कर रहा है जी? फुरसतिया लौटे कि नाहीं पहाड़ से? शिवकुमार मिसिर से हीहीही कर लो फोन पर। अपनी अण्टशण्टात्मक पोस्ट की बात कर लो। क्या पता एक आध लिंक दे ही दे छोटा भाई हमारी पोस्ट का। मसिजीवी कर रहे हों चिठ्ठा-चर्चा तो अपनी पोस्ट तो उभरती ही नहीं जी। पर भैया पोस्ट क मसलवइ न होये त कौन लिंक-हाइपर लिंक? कौन सुकुल और कौन मसिजीवी?


अजित जी के साथ आप कोठी से कुटुम्ब तक का सफ़र कीजिये न! बिना टिकट!
घट में जल व्याप्त है। पहाड़ों के बीच स्थिर जलराशि को प्रकृति का घड़ा भी कह सकते हैं और कुण्ड भी


आपने नाईयों से चम्पी करवाना सुना होगा। लेकिन उन्मुक्तजी सवाल पूछते हैं-क्या आप सांपों से चम्पी कराना चाहेंगे । बताइये क्या कहेंगे आप?

नजर-नजर का फ़ेर होता है। जिसे लोग दस्तखत के रूप में जानते हैं उसमें हिमांशु पूरा अक्स देख लेते हैं:
एक कागज़
तुम्हारे दस्तख़त का
मैंने चुरा लिया था ,

मैंने देखा कि
उस दस्तख़त में
तुम्हारा पूरा अक्स है ।


पूजा उपाध्याय अपने मन की बातें करती हैं:

कहीं भी जाने का मन नहीं करता
दिन भर टीवी नहीं खोलती हूँ
सुबह अखबार नहीं पढ़ती
और जब तक तुम वापस नहीं आ जाते
डरती रहती हूँ हर आहट पर
हर घंटे तुम्हें फ़ोन नहीं करती
पर सोचती हूँ कि कर लूँ
निश्चिंत तो हो जाउंगी


और आलोक पुराणिक अंतत: सारी जिम्मेदारी पब्लिक पर ही डाल देते हैं:
जी सच में जिम्मेदार तो पब्लिक है, जो स्टेशन पर थी। होटलों में थीं। अस्पतालों में थी। यहां ना जाये, तो पब्लिक कहां जाये, लोकल में, वहां भी यही सब हो चुका है। ना जी, पब्लिक कहीं जाये ही क्यों। घर में नहीं ना बैठ सकती। पर तब रोजगार कैसे चलेगा। ना, यह सवाल पाटिलद्वय से ना पूछिये, वो इस चक्कर में बेरोजगार हो चुके हैं।


मेरी पसंद



उन्माद कभी ज्यादा देर तक नहीं
ठहरता ,
यही है लक्षण उन्माद का ।

बीजों में , पेड़ों में , पत्तों में नहीं होता
उन्माद
आँधी में होता है
पर वह भी ठहरती नहीं
ज्यादा देर तक


जब हम होते हैं उन्माद में
देख नहीं पाते फूलों के रंग
जैसे कि वे हैं ।

उतर जाता उन्माद नदी का भी
पर जो देखता है नदी का उन्माद भी
वह उन्माद में नहीं होता ।

उन्माद सागर का होता है
पर वह भी नहीं रहता
उन्माद में बराबर ।

सूर्य और चन्द्र में तो होता ही
नहीं उन्माद ,
होता भी है तो ग्रहण

जो हैं उन्माद में
उन्हें आएँगी ही
नहीं समझ में यह पंक्तियाँ
प्रतीक्षा में रहेगी
कविता यह
उन्माद के उतरने की ।
प्रयाग शुक्ल

और अंत में



कल मसिजीवी ने चिट्ठों कि देखन-सुनी चर्चा पेश की। हर बार एक अलग अंदाज में चर्चा करने का उनका प्रयास काबिले तारीफ़ है। वे लिखते हैं:
चिट्ठाचर्चा दिनोंदिन चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। अनूप न जाने कैसे इस निबाहे ले जाते हैं हम तो हर चर्चा के बाद चर्चा किए गए चिट्ठों से ज्‍यादा चर्चा से छूट गए चिट्ठों की चिंता में बुरा महसूस करते हैं। ये गनीमत है कि अब रोजाना छप रहे बहुत से चिट्ठों के चलते ये उम्‍मीद कोई नहीं करता कि सारे चिट्ठे चर्चा में आएं ही वरना पहले तो कागज पर सारे चिट्ठों की सूची बनानी होती थी कि कोई छूट न जाए। हम अब ये तरीका अपनाते हैं कि जितने पढे जा सकें उनमें से जो चर्चा लायक लगें उनकी चर्चा करें जिस नए तरीके से हो सके उस तरीके से।


हम सभी लोग शायद चर्चा इसी अंदाज में करते हैं। जो चर्चा लायक लगें उनको शामिल कर लिया जाये। बाकी जो मसिजीवी कहते हैं कि अनूप न जाने कैसे इसे निबाहे ले जाते हैं
तो हमें खुद नहीं पता कि कैसे निभ जाता है। आज सुबह उठने का मन नहीं किया। लेकिन कई करवटे बदलने और कई दो मिनट बाद के बाद उठ ही गये और खुटुर-पुटुर शुरू कर दिये।

जो हुआ सो आपके सामने है। जो नहीं हुआ वह भी आप समझ ही सकते हैं।

आपका दिन शुभ हो। आप मुस्कराते रहें। बस्स। बाकी काम अपने-आप हो जायेगा।

नीचे आज की तस्वीर प्रेम पुनेठा के सौजन्य से। भारतीय बच्चों के दो चेहरे।

फ़ूल

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23 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया खुटुर-पुटुर !!!!

    aur

    शुरुआत ताई को जन्मदिन की बधाई!!!

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  2. "उन्माद कभी ज्यादा देर तक नहीं
    ठहरता ,
    यही है लक्षण उन्माद का ।"

    पसंद!!!! पर समसामयिक!!!!

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  3. आज की चिट्ठा चर्चा में आप की पसंद का चित्र और कविता वही हैं जो कल मुझे सब से अच्छे लगे थे।

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  4. दिनेशराय द्विवेदी> आज की चिट्ठा चर्चा में आप की पसंद का चित्र और कविता वही हैं जो कल मुझे सब से अच्छे लगे थे।
    -------
    ये पता चली बात - घोस्ट राइटिंग द्विवेदी जी से कराते हैं आप। पर द्विवेदी जी इतने सीनियर मनई, कर देते हैं आपके लिये! :-)

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  5. ज्ञान जी ब्लाग मठाधीश हैं ,ठेलुआ तोढाई आखर ब्लाग का जानने वाला होगा ,अजीत भाई की सार्थक टिप्पणी । वहाँ मेरी टीप पहुंची नहीं सो यही सही । आप का चिट्ठा ऐसे ही जगमग बनाए रखें ब्लाग जगत को ,शुभकामनाओं के साथ ताई को भी जन्म दिन की शुभकामनाएँ ।

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  6. बहुत लाजवाब चर्चा पर अभी मन नही भरा ! शायद एक एपिसोड शाम को देंगे क्या ? एक लाईना का ! :) बहुत मजेदार रही ये चर्चा !

    रामराम !

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  7. यह फोटो उस कन्या की फोटो जैसी ही जो नीरज रोहिल्ला से ऎक्स्प्रेस लेन में भेंटियायी थी। नीरज से उस बाला की काम भी की गिटपिट भी हुई। क्या हुआ वह सब आप उसी के मुंह से सुन लीजिये!



    नीरज रोहिला अपनी ब्लॉग पोस्ट जिस मे अपना एक पर्सनल अनुभव लिख रहे हैं और एक महिला का चित्र लगा रहे हैं . जिसके लिये वह कह रहे हैं "डिस्क्लेमर: इस कन्या का चित्र इंटरनेट से उठाया है लेकिन उस कन्या ने भी कुछ कुछ ऐसा ही कोट (असल में Pea coat) पहना हुआ था :-) " .
    आप चिट्ठा चर्चा के मंच पर उस चित्र का सार्वजनिक सिर्कुलेशन कर रहे हैं . अफ़सोस हुआ की आप जैसे परिपक्व उम्र के ब्लॉगर को इसमे कुछ भी गलत नहीं लगा . चिट्ठा चर्चा मंच आप लोगो ने किस मकसद से बनाया हैं ? मुझे आपति हैं किसी भी महिला के चित्र को इस प्रकार से इस मंच पर लगाने से और मे अपनी आपति दर्ज करना चाहती हूँ .
    आज समाज मे जितनी भी विद्रूपता बढ़ रही हैं कही न कहीं हम सब उसके लिये जिम्मेदार हैं और मेरा निवेदन हैं की अपनी अपनी ज़िम्मेदारी हम सब निभाए .

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  8. कोई भी जो ये तर्क दे की "सब चलता हैं " और ये चित्र हमने नेट से लिया या महिला ने ये चित्र नेट पर क्यों डाला एक बार जरुर सोचे की अगर ये चित्र उनके परिवार की किसी युवती का होता किसी ब्लॉग पर , किसी प्रोफाइल पर तो क्या आप उसको यहाँ पसंद करते

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  9. बेहतरीन चर्चा.. माहौल बनाने में कामयाम शुकुल और जो खुटुर पुटुर में जो नहीं हुआ.. उसी पर केन्द्रित पाठक ?
    अनोखा ब्लागर-बैंड .. और नित नये हिट और फ़िट चर्चा-एल्बम !
    पर पता नहीं, पब्लिकिया क्या चाहती है ?
    लगे रहो अनूप भाई !

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  10. रचनाजी,
    आपने मेरी पोस्ट में चित्र पर आपत्ति जताई है । असल में जब मैने चित्र खोजा था तो इस चित्र को इसलिये लिया था कि ये एक विज्ञापन का चित्र था । लेकिन इतना काफ़ी नहीं है, रचना जी की बात से सहमति है और इसके लिये चित्र के स्थान पर उस चित्र का कार्टून प्रयोग कर रहा हूँ । मैने अपनी पोस्ट पर चित्र बदल दिया है ।

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  11. अच्छी चिट्ठा चर्चा। हमेशा की तरह उम्दा पसंद आपकी- कविता उन्माद।

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  12. नीरज आप ने विषय की गंभीरता को समझा इसके लिये आप प्रशंसा के पात्र हैं

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  13. एक कागज़
    तुम्हारे दस्तख़त का
    मैंने चुरा लिया था ,

    मैंने देखा कि
    उस दस्तख़त में
    तुम्हारा पूरा अक्स है ।
    " निशब्द हूँ "

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  14. चर्चा बढ़िया रही.. बदली हुई फोटो देखकर अच्छा लगा..

    चर्चा को ऐसे ही जागरूक पाठक चाहिए.. जो सिर्फ़ वाह वाह ही ना करे बल्कि ग़लती होने पर भी बताए..

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  15. ताई का आना और बाबरी का जाना- वाह क्या इत्तेफाक है!! एक साथ बधाई और मौन-:)
    >सिंगापुर में गुजराती दूध के सही हकदार तो कुरियन हों - मोदी कैसे?
    >द्विवेदीजी, कृपया यह बताएं कि ईमानदारी कानून के किस दफे के तहत आती है?
    > हां मनोषीजी, अब तो ‘अपने हुए पराए’। हम नए, हम क्या जाने!!

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  16. अशोक जी के धोती सर्वे से पूरा इत्तेफाक रखता हूँ. इस पूरी चिटठा चर्चा के लिए आपका धन्यवाद. ज्ञान जी को समझना चाहिए कि उनकी पोस्ट का मसाला कौन छीन सकता है उनसे. वो तो किसी भी चिटठा चर्चा के सम्पुट हैं.
    पूरी चर्चा में पूजा जी की कविता ने बहुत महसूसियत दी. कविता को चर्चा में शामिल करने के लिए धन्यवाद .

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  17. ज्ञानजी के बहाने से हम ताऊ से तो मिल लिये थे पर अपने ब्लागरोल में नहीं ला पाए थे। आज आपके बहाने से ताऊ-ताई को नमन भी कर आए । ताऊ का आशीर्वाद भी ले आए।
    चिट्ठाचर्चा को नित नूतन देख कर हैरत भरी प्रसन्नता होती है। यूंही फले फूले यह ब्लाग मंडली।

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  18. chittha charcha karne me wakai kitna waqt lagta hoga, main bhi soch nahin paati hun ki aap kaise kar lete hain. jaane kitne padh kar kuch ko hamare saamne rakhna. ek tasveer ban jaati hai ki blog par aajkal kya chal raha hai. bahut hi accha prayas hai, aajkal main bhi aksar vakt milne par padh leti hun. acchi rahi kitir pitir aapki

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  19. आपसे ही जानकारी मिली - ताई के जन्‍म दिन की । हमारी बधाई उन तक पहुंचाने का काम भी आप ही कीजिएगा । कीजिए छिमा ।

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  20. मेरे ब्लोग को यहाँ घुसाने के लिये आभार. :)

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