बुधवार, मार्च 25, 2009

बिना ऊंट के रेगिस्तान मुकम्मल नहीं होता

कल रात को पोस्ट लिखी। अब सुबह-सुबह फ़िर बोर करना क्या ठीक होगा। लेकिन हम कहे भी थे कि कल मुलाकात होगी। वादा किया है वो निभाना पड़ेगा इसलिये लिख ही देते हैं। जो होगा देखा जायेगा।

आप ब्लाग क्यों लिखते हैं? जबाब आप सोचें लेकिन हम यह नहीं कह रहे हैं कि आप हमें बतायें ही। हम तो आपको विकास की बात बता रहे हैं जो कहते हैं-
कविता लिखना क्या है? कहानी लिखने का क्या प्रयोजन? क्या जो मैं लिखता हूँ उससे किसी का कुछ भी भला हुआ है आजतक? मेरा भी? फिर मैं क्यूँ लिखता हूँ? फिर इतने सारे लोग क्यूँ लिखते हैं? क्यूँ लिखते रहे आज तक? कब तक लिखते रहेंगे? रोज सुनता हूँ की १५ नए हिन्दी ब्लॉग बन गए - इतना लेखन क्या भी पढा जा सकेगा? जो पढा नही जा सके, उसे क्यूँ लिखना? इतने सारे विचार हैं - उनका क्या करें? लिख फेकें? 'लिख फेंकना' क्या सही प्रयोग है? क्या आजकल हर कोई अपना विचार फेंकने को लिखता है?

आप शायद सोच में पड़ गये कि आप क्यों लिखते हैं। आगे विकास कहते हैं-
कोई अंग्रेज़ी में कह रहा था कि "पीपुल दीज़ डेज़ यूज़ दियर ब्लॉग एज इमोशनल डस्टबीन"। तो क्या हम भी एक कचरे के डब्बे में अपना मुंह मार रहे हैं? जो महान लेखक लोग हैं, वो लिखते वक्त क्या जानते थे कि वो महान सा कुछ लिख रहे हैं? 'हाँ' - तो कैसे? 'नहीं' - तो क्यूँ लिखा फिर? फिर क्या हमें भी महान होने की संभावना को ध्यान में रखकर लिखते रहना चाहिए?


ब्लाग को लोग भावनात्मक कूड़ादान की तरह प्रयोग करते हैं! क्या आप इस बात से सहमत हैं? या कुछ और कहना चाहते हैं।

अहमदाबाद के जिग्नाशा पटेल प्यार के बारे में क्या कहते हैं यह पढ़ने से पहले जान लें कि जिग्नाशा पटेल हैं कौन?पटेल जी कहते हैं:
मैं उस वक्त भी आपको दिल से प्यार करता था और आज भी सिर्फ़ और सिर्फ़ दिल से प्यार करता हु नाही उस वक्त मैंने आपके शरीर को निगाहें उठा के देखा था और नाही आज भी मुझे तो सिर्फ़ आपकी सादगी(own simple style) और आपका बहोत ही सुंदर सुंदर स्वभाव(nature) पसंद था और मैं आपके अंदर से मिली वही दो बातो से atract हुआ था

आगे शायद और कुछ पता चले!

अपने गणित वाले अभिषेक बाबू अब प्रोफ़ेशनल खतरा मैनेजर हो गये हैं।

अपनी व्यथाकथा सुना रहे हैं अभिषेक। सुन लीजिये दुख बंट जायेगा:
बाकी जो भी हो इनके कस्टमर केयर वाले बड़े सहनशील लोग है इन्हें हमारी भाषा में 'थेथर' कहा जाता है अर्थात बेशर्म. ये खुद फैसला करते हैं की इनकी सर्विस कितनी अच्छी है. आपके मत पर बिलकुल ध्यान नहीं देते. मैंने इन्हें हड़काते हुए बड़ी कड़वी मेल लिखी. पर इन्हें काहे की शरम... आप भी देखिये इनकी रिप्लाई. बड़े भले लोग हैं. जिस दिन साले डूबेंगे मैं मिठाई बाटूंगा.


नीरज रो्हिल्ला दौड़ते भागते रहते हैं। अब अच्छे खासे जवान भी हो गये हैं। ब्लागर तो हैं ही हिन्दी के सो मौका और दस्तूर के अनुसार वे एडल्ट ह्यूमर और हिन्दी ब्लाग जगत !!! लिख मारे। आप इसे बांचिये और नीरज के हुनर की तारीफ़ कर ही डालिये। इससे नीरज का हौसला बढ़ेगा, मंजिल का फ़ासला कम होगा।

प्रभात गोपाल का मानना है कि नेताओं को माइक पर हुंकारने के बजाय आपने-सामने बहस करने चाहिये। वे कहते हैं:
उदारीकरण का दौर है। प्रतिस्पर्द्धा का युग है, तो नेताओं को प्रोफेशनल होना होगा। इन्हें भी टारगेट ओरिएंटेड माइंड सेट के साथ जनता के दरबार में जाना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि हम इतने सालों में, इतने समय में और इतनी लागत में आपका ये काम कर देंगे। विकास का इतने साल बाद ये पैमाना होगा। पूरी गणितीय प्रणाली पर बहस करें ये दल। भावना में बहा-बहाकर कितने दिनों तक वोट लेते रहेंगे, पता नहीं।


अनिल पुसदकर ब्लाग लिखाई में जित्ता माउस और की बोर्ड का इस्तेमाल करते हैं। ब्लाग जगत के साथियों के अप्रत्याशित फोन से उल्लिसत होकर यह पोस्ट लिखी है उन्होंने! पीडी से बतियाने के बाद उन्होंने लिखा:
पीडी पता नही कैसा होगा लेकिन बातचीत मे एकदम खरा सोना।उससे बात करते समय एक पल के लिये भी नही लगा कि उससे पहली बार बात हो रही है। ऐसा लगा कि अपने किसी बाल सखा से सालो बिछड़ने के बाद बात हो रही हो।शुद्ध और एकदम शुद्ध प्यार छलक रहा था पीडी की आवाज मे।कंही कोई बनावट नही,कंही कोई स्वार्थ नही,कंही कोई दिखावा नही और कंही कोई छल-कपट-प्रपंच नही।खालिस ईमानदार बातचीत।


अब आप बोलेगे कि पीडी कौन? तो भैया ये है पीडी बोले तो प्रशान्त का ब्लाग। खिचड़ी एक्स्पर्ट हैं। आज रेसिपी भी बताये हैं। अपने जोखिम पर बनाये।
अब गद्य पढ़ते-पढ़ते भन्ना गये होंगे। तो लीजिये एक झन्नाटे दार कवि सम्मेलन सुन लीजिये। हिंदी ब्लाग जगत के तमाम अमेरिकी खलीफ़ा यहां आपको कवितागिरी करते दिख जायेंगे। सबसे पहले अनूप भार्गव को सुन लीजिये वे कहते हैं:
शादी के बाद वे कुछ बदल से गये हैं,
पहले थे महाकव्य अब क्षणिका रह गये हैं।


कोचीन के यहूदियों के बारे में जानने के लिये यहां पर आयें।

एक लाईना



  1. मीठी खिचड़ी का रहस्य(बनाने की विधि के साथ) : किसी को खिलाने के पहले शरीर का तोड़-फ़ोड़ जोखिम बीमा करवायें

  2. फतेहपुर:दिन में तीन बार शिवलिंग का रंग परिवर्तित होता है यहाँ :बड़े रंगबाज हैं फ़तेहपुर के शंकरजी

  3. कवि की कमज़ोरी :कबाड़खाने में दिखी

  4. उसके चहरे का संतोष लोगों को खलता है.. :क्योंकि वह आज भी पांच रूपये में दुनिया बदलने का हौसला रखता है

  5. ताऊ बना हनुमान :वुधवार को? ताऊ कभी लेट लतीफ़ी से बाज न आयेगा

  6. रिंग टोन में गुम भगतसिंह:वतन पर मरने वालों का बाकी यही निशां होगा

  7. कुत्ते की याद में: एक भावुक पोस्ट

  8. अगले जन्म मोहे ब्लोगर का पति ना कीजो .....:ब्लागर पत्नी बना दिया जाये?

  9. बिना ऊंट के रेगिस्तान मुकम्मल नहीं होता :बिना दाद के कोई खाकसार मुकम्मल नहीं होता

  10. तुम ही तो हो :जो कब्भी मेरे ब्लाग पर टिपियाते नहीं!

  11. श्रीगंगानगर में ओले पड़े :वो तो भला हो कि सर नहीं मुड़वाये थे



मेरी पसन्द


वो,
जब मुँह अंधेरे निकलते हैं
बाहर घर से
साथ होती है उम्मीदों भरी झोली
जिसमें कैद करने हैं
सारे सपनें और रोटी भी
कचरे के साथ

वो,
इस उम्र में भी सीख लेते हैं
वो सब और उन चीजों के बारे में
सभी कुछ
जिनके बारे में हमें बतियाते
अक्सर शर्म आती है

वो,
जब बिनते हैं कचरा
तो छांटते है, पहले
प्लास्टिक एकदम पहली पसंद पर
फिर पन्नियाँ / लोहा या और कुछ
इसी दौरान
उनके हाथ लगते हैं
इस्तेमाल के बाद फेंके हुये कण्डोम
कचरे के ढेर में
शायद पहली बार ठिठके होंगे
उनके हाथ उठाते हुये /
या कौतुहलवश छुआ होगा

बस,
यहीं से वो बच्चे सीखते है
कण्डोम, क्या होता है /
क्या काम आता है /
फिर वो सीखते है इस्तेमाल करना
और संस्कार हस्तांतरित होते हैं

यह,
सब सीखने के बाद
वह सीखते है कि
विकास के इस तेज दौर में भी
अभी नही ईजाद हुआ है तरीका
कण्डोम को इस्तेमाल बाद
डिस्पोज करने का

कण्डोम,
अब भी
रातों के अंधेरे में फेंके जाते है
कुछ इस तरह
जैसे कोई बच्चा उछाल देता है
पत्थर हवा में बिना किसी बात के
और यह भी नही सोचता कि
जिस आँगन में गिरेगा
वहां भी कोई बच्चा होगा
या कोई बस यूँ ही बहा देता है
फ्लश में और वह चोक किये होता है
ड्रेनेज घर से अगले मोड़ पर
या, यदि फेंका गया सड़क के उस पार
तो कचराघर को बदल देगा
जिन्दगी की पाठशाला में
और,
सीखने में मदद करेगा उन ब्च्चों की
जिनके घर नही होते
समय के पहले ही
कण्डोम क्या होता है

मुकेश कुमार तिवारी

और अंत में


कल रात आपको चर्चा पढ़वाई। अब सुबह फ़िर। सो नया कुछ नहीं है। वैसे आपको बता दें कि पाबलाजी ने ब्लागरों की एकता का आवाह्नन किया है। आगे की कहानी उनके ब्लाग पर देख लीजिये।

फ़िलहाल इत्ता ही। आपका दिन शुभ हो। आप खुश रहें। मुस्करायें और हो सके तो खिलखिलायें भी। सब कुछ मुफ़्त है आज के दिन।

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19 टिप्‍पणियां:

  1. "पीपुल दीज़ डेज़ यूज़ दियर ब्लॉग एज इमोशनल डस्टबीन" आई अग्री जी.-:)

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  2. आपसे भी पहली बार बात करने पर ऐसा ही लगा था।तब लेकिन पोस्ट नही लिख पाया। और भी बहुत से साथी है जिनसे बात करना अच्छा लगता है। आप तो हमको पसंद है ही मगर आपसे, आपकी पसंद ज्यादा पसंद है।

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  3. "पीपुल दीज़ डेज़ यूज़ दियर ब्लॉग एज इमोशनल डस्टबीन" वाली लाइन बड़ी सही रही :)

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  4. वो,
    इस उम्र में भी सीख लेते हैं
    वो सब और उन चीजों के बारे में
    सभी कुछ
    जिनके बारे में हमें बतियाते
    अक्सर शर्म आती है


    बहुत मार्मिक रचना.

    सूबह २ ही शानदार चर्चा. लगता है दिन अच्छा जायेगा.:)

    रामराम.

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  5. वाह-वाह बड़ी शानदार चर्चा की आपने , दिल गार्डन-गार्डन हो गया .

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  6. हमेशा की तरह बढ़िया ।

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  7. बहुत बढ़िया रही आज की चर्चा ...शुक्रिया

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  8. ऊँट हाज़िर है, श्रीमान जी !
    पण, रेगिस्तान में भी बाढ़ आने के आसार हैं, श्रीमान जी !
    पण, इधर कूँ जीरा भी अप्राप्य होता जा रहा है, श्रीमान जी !
    जीरे का बिलैक हो रिया है इधर, हर नर्मदेश्वर बोलिये, श्रीमान जी !
    ऊँट के मुँह में जीरा टुँगाने वाले शिरिमान भी सोये परैले हैं, श्रीमान जी !

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  9. आदरणीय अनूप जी
    बहुत बढ़िया रही कहा तक शर्म करियेगा आज के समय की मज्बूरी है !

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  10. " शादी के बाद वे कुछ बदल से गये हैं,
    पहले थे महाकव्य अब क्षणिका रह गये हैं।"-अनूप भार्गव
    अभी हाल ही में श्रीमती रजनी भार्गव जी का जन्मदिन मनाया- इसीलिए
    अब क्षणिका से हाइकू हो गए:)

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  11. सदाबहार चर्चा !!

    अब यह आप जानें कि रेगिस्तान का क्या होगा, अगर सदा ही बहार रहेगी तो।

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  12. तभी मैं कहूं की आजकल थोक के भाव में इमोशन किधर से आ रहा है :-)

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  13. आप को चर्चा रोकनी पड़ी। कविता जी की चर्चा के लिए। हम ने क्लिक किया तो खाली पन्ना मिला।
    चर्चा अच्छी लगी। कविता जी की गरिष्ठ चर्चा के बाद हलका फुलका जरूरी भी था।

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  14. बढि़या चर्चा। चयन भी शानदार है। संजीदगी और सहज हास्‍य का यह मेल ही तो चर्चा की खूबी है।

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  15. तुम ही तो हो -जो कब्भी मेरे ब्लाग पर टिपियाते नहीं!
    १००/१००

    कविता जी ने तो खैर एक ऐतिहासिक दस्तावेज ही दे दिया है जो अनमोल है

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