शुक्रवार, मार्च 27, 2009

कलमबंद , लामबंद , कामबंद : ब्लॉगिग शुरू


प्रमोद जी की पोस्ट आज ब्लॉगवाणी पर दूसरे स्थान पर सजी हुई है ! उन्हें जबजब भी पढती हूं आंखों के आगे उनके खींचे चित्रों को उतारने की कोशिश करती हूं ! वे गूढ लिखते हैं एक बार में पकड में न आने वाला ! आसानी से साधारणीकृत न होने वाला ! उनके भीतर का चिट्ठाकार कवि , चित्रकार एक साथ है ! वह जीवन का खोजी , दार्शनिक ,चिंतक जैसी कोई शख्सियत है जिसे पहचान पाना समझ पाना सहज नहीं है ! कई बार लगता है कि उनका लिखा एक बार में हाथ नहीं आया दोबारा - तिबारा पढते हुए अर्थ के कई- कई लेयर दिखते हैं ओझल होते हैं ! भाव, कल्पना , यथार्थ , इतिहास वर्तमान और भविष्य - एक ही साथ एक पोस्ट में अपने रेशे परस्पर उलझाए हुए ! एक उत्कृष्ट कोलाज या एक मार्डन कलाकृति ! उनकी आज की पोस्ट स्टिल लाइफ पढकर आप स्वयं जानिए -

घोड़े घोड़े होंगे इशारा पाते ही दौड़ने लगेंगे, क्‍योंकि वही किया होगा उन्‍होंने उम्रभर, इशारों की राह तकते दौड़ने की थोड़ी सी ज़मीनों की पहचान करते, उनपर अपनी दुलकियों की पिटी हुई चार बाई चार और सात गुणे तीन की मापवाले कलमकारी सजा आने की सिद्धहस्‍तता को कलमबंद करते. इस पहचानी हुई ज्‍यूगराफ़ि‍या की कलामंदी से बाहर मन और दिमाग़ की सारी अलामतें घोड़ों के लिए दुनिया में कृषि के अविष्‍कार से पहले का ‘हंटर-गेदरर्स’ का पथरीला घिसा संसार होगा, माने अभी हाल अट्ठाहरवीं सदी तक का किसानी से वंचित ऑस्‍ट्रेलिया होगा. कागज़ पर सुघड़ लिखायी की उसमें कला न होगी, सारंगी की मार्मिकताओं की उसमें रुला न होगी, घोड़ा अदद घोड़ा बना होगा, अपनी ‘ये है रेशमी जुल्‍फ़ों का अंधेरा’ की ऐंठ में घना सरपट-सरपट, माने तलछट की पानियों में महज़ आयतन का घना हो

प्रमोद जी के लेखन में एक पोस्टकार और एक साहित्यकार एक साथ क्रियाशील रहता है !उनकी महीन बुनावट वाली ब्लॉगिंग के लिए खास सब्र, बौद्धिक सक्रियता और गहरी संवेदना की दरकार होती है ! उनकी पोस्ट पर तनु शर्मा जोशी जी टिप्पणी करती हैं -

जब भी लिखते हैं...बहुत गूढ़ लिखते हैं...कई बार मैं समझ नहीं पाती हूं...लेकिन समझने की समझदारी करती रहती हूं..यूं ही नहीं छोड़ना चाहती...इस गहरे अर्थ को...कई बार यूंही हंस-हंस के पागल हो जाती हूं...पढ़ती हूं बारंबार...हंसते भी...समझते भी...और कई बार उदास भी हो जाती हूं.

इसपर प्रमोद जी का जवाब देते हैं -

@तनुजी शर्माजी जोशीजी,
खामख़्वाह भाव दे रही हैं. बहुत क्‍या, गूढ़ जैसा भी कुछ नहीं होता.. और होता है तो उतना ही होता है जैसे ज़ि‍न्‍दगी होती है. समझ में नहीं आता तो इसलिए कि लिखते-लिखते मैं भी समझ बनाने की कोशिश ही करता रहता हूं, सब जाने रहने की गुरुवायी नहीं.. आप आकर पढ़ जाती हैं, इसका शुक्रिया.

यहाँ लिखते लिखते समझ बनाना ,खुद और दुनिया को आडे तिरछे एंगिलों से तलाशना –परखना परंपरा की लीक से हटकर  लेखन चिट्ठाकारी की खासियत है जिसे हिंदी ब्लॉगिंग का यू. एस .पी कहा जा सकता है ,प्रमोद जी के ब्लॉग पर सबसे ज़्यादा दिखाई देता है ! वे सबसे अधिक समर्पित हैं प्रयोगशीलता को ! एक समय में उनके द्वारा चलाया गया पतनशील साहित्य का टैग ब्लॉग जगत का सबसे ज़्यादा इलास्टिसिटी वाले और संभावनापूर्ण शब्द के रूप में इस्तेमाल हुआ था ! प्रमोद जी की रचनात्मकता और प्रयोगशीलता के लिए समर्पण भावना और और उसका चुपचाप चलते रहना वाला प्रयास सराहनीय है ! उनका ब्लॉग "अजदक " , ब्लॉग जगत को उथलों , भडासियों ,और खाजखायों के लेबल से मुक्ति दिलवाने वाले श्रेष्ठ ब्लॉगों में से एक है !

आज नारी ब्लॉग के जन्मदिवस के मौके पर बधाईयों का तांता लगा हुआ है ! आपने न दी हो दे आएं ! मेरी ओर से भी ढेरों शुभकामनाएं ! नैनो से नैन मटक्का वाली कई पोस्टों की भीड कई दिनों से हिट लिस्ट में दिख रही हैं ! नैनो के बाजार में आने भर से ब्लॉगर इतने शुख हैं तो उसके घर मॆं आ जाने की खुशी क्या होगी ! ऎसे दीवानेपन में शेफाली पांडे की कविता आंखॆ खोलती है

पैर रखने की यहाँ जगह नहीं
पैदल चलने में होती टक्कर
जाम में पैदा होते बच्चे
मौत भी होती जाम में फंसकर

सिग्नल में ही पौ फटती है
सिग्नल में ही गुज़रे शाम
ऐसे देश में नैनो प्यारी 
बोलो तुम्हारा है क्या काम

परिकल्पना ब्लॉग पर बहुत अच्छी व्यंग्य करती कविता "इलेक्सन के घाट पर भई नेतन की भीड " अवश्य पढिए ! आधुनिक श्रवण कुमार की कथा की चर्चा करते हुए एक गंभीर सामाजिक मसले को घुघूती जी उठाया है ! अपनी से दुगुनी उम्र की स्त्री से विवाह करने वाले मातृप्रेमी युवक की कहानी से हमारी सामाजिक व्यवस्था पर कई सवाल उठते हैं !

-आज के वन लाइनर

कसम तोड देता मैं  तोड डालिए इसमें हमें क्या बताना

लोकतंत्र पुख्ता होता जाएगा पुख्ता पुख्ता पुख्ता आपको अगर इतना ही विश्वास था तो तीन तीन बार पुख्ताने की का जरूरत थी ?

जवाब चाहिए ब्लॉगिंग बेमकसद का काम है या कुछ और  पहले ई बताओ सच- सच बतलाना है या कि आपका दिल बहलाना है ?

सामने उनके जुबां ये कुछ भी नहीं कह पाती ज़ुबा नहीं खुलती तो इशारों के काम लीजिए :)

मौका है तो बदल डालो अब नहीं तो कब पहले आप , पहले आप !

उफ मुक्केबाज नहीं बल्कि कवि होना  हाउ ट्रेजिक ! ईश्वर आपको हौसला दे !!

इस दलदल में प्रेम क्रीडा करो प्रिये   डर्टी जाब्स

आज का चित्र बामुलाहिजा से

[cartoon02.JPG]

आप सब का शुक्रिया ! शुक्रिया कि आपने ढेर सारी पोस्टें लिखीं ! शुक्रिया कि आपने ये चिट्ठाचर्चा पढी/देखी ! शुक्रिया ( ऎडवांस में )कि आपने टिप्पणी करी !

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23 टिप्‍पणियां:

  1. "कई बार लगता है कि उनका लिखा एक बार में हाथ नहीं आया दोबारा - तिबारा पढते हुए अर्थ के कई- कई लेयर दिखते हैं ओझल होते हैं "

    आप के सब्र की दाद देते हैं॥

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  2. महज़ तीन ब्लॉग ???बेचारे बाकी बेकार कलम घिस रहे है ?

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  3. नीलिमा जी आप ने नारी ब्लॉग को याद रखा इसके लिये थैंक्स

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  4. शुक्रिया आपको भी इस बढ़िया चर्चा के लिए।

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  5. सहमत हूँ, नीलिमा ! ऎसा लेखन जो आपको सोचने को बाध्य करे.. मन से बरबस ही न जाये ... मुझे भी सुहाता है ! फ़ुरसतिया शैली की तरह यहाँ ' अज़दकीय लेखन ' भी एक विश्लेषण बन गया है.. ! यह विशिष्टता ही यूँ ही नहीं आती है !
    सबसे बड़ी बात कि उन्होंने जनता , ब्लागिंग और टिप्पणी की माँग पर अपने लेखन में बदलाव नहीं लाया ! उनके व्यक्तित्व के अन्य जो भी पहलू हों.. पर बतौर पाठक मुझे उससे अलग ही रहना चाहिये !
    नटखट बच्चे.. कई चिट्ठे समेटने से बेहतर है.. किन्हीं चुनींदा चिट्ठों की की समीक्षा !

    पोस्ट को सहलाना भी समय की माँग हो सकती है.. पर बखिया उधेड़ने से लेखक और पाठक दोनों को दिशा मिलने की संभावना बनती है ! प्रमोद जी को लेकर तुमसे सहमत हूँ, नीलिमा ! धन्यवाद !

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  6. ओहो, ओवरबोर्डी तारीफ़ में इस तरह पतनशील लदबद-लदबद अच्‍छी बात है? मेरा अलदोपहर इस तरह गदगद-गदगद?
    डाक् साहब सही ही कह रहे हैं, समय की मांग हो न हो, मैं ऑलमोस्‍ट सहल-सहल-सा ही गया हूं. आमतौर पर दहले रहनेवाले के लिए पता नहीं कितनी प्रीतिकर स्थिति है.
    आनेवाले दो-तीन दिनों रात को दु:स्‍वप्‍न न आये तो ज़ि‍म्‍मेदारी सौ फीसदी आपकी और आपकी ही होगी..

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  7. ham nahi tipiyayenge ji.. phir kahe ka advance me shukriya?
    aila.. ye kya hua? ham to isi bahane tipiya diye.. :(
    chaliye koi bat nahi.. insano se hi to galti hoti hai.. :)

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  8. वे वोट काट रहे हैं

    आप पोस्‍टें काट रहे हैं

    काटने वाले टिप्‍पणियां बांट रहे हैं

    जिनका जिक्र नहीं कर रहे आप

    वे अपनी पोस्‍टों को तर कर रहे हैं

    बेहतर तरबतर कर रहे हैं।


    और टिप्‍पणी की वन लाइना :-

    जहां नहीं नैनो
    वहां नहीं रहनो।

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  9. आपने एडवांस में शुक्रिया अदा कर दिया तो टिपियाना तो पड़ेगा ही। प्रमोद जी का लेखन तो उसमें डूबकर ही पढ़ा जा सकता है और इसका अपना ही मजा है।

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  10. प्रमोद जी, का लेखन श्रेष्ठ है। लेकिन पाठक में भी वैसी ही श्रेष्ठता आवश्यक है। वह जटिल गणितीय समीकरणों और आधुनिक चित्रकारों के चित्रों जैसा है। जिसे समझने में दिमाग खर्च करना जरूरी है। अब अपना तो रोज का कोटा का 99% तो मुवक्किलों और जजों पर खर्च हो जाता है। बचा जो ब्लागिंग में। प्रमोद जी की पोस्ट सर से गुजर जाती है।

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  11. यहां प्रमोद जी की टिप्पणी भी देखिये, उनकी पहचान ।

    चर्चा के लिये धन्यवाद ।

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  12. "सबसे बड़ी बात कि उन्होंने जनता , ब्लागिंग और टिप्पणी की माँग पर अपने लेखन में बदलाव नहीं लाया "इस कथन से सौ प्रतिशत सहमत हूँ ...उनकी उर्जा ,निरंतरता हैरान करती है ओर उनका बिंदासपन उनका कायल भी ....हिंदी ब्लोगिंग के ऐसे ब्लोगर्स है जिनकी अपनी शैली है ओर एक ख़ास गुणवत्ता ..निसंदेह वे ख़ास है

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  13. ये क्या निलिमा जी, अब अपना शुक्रिया मुफ्त में तो ले नहीं सकते। टिपियाकर कमाना पड़ रहा है।
    आपने मेरा एक कष्ट दूर कर दिया। मुझे लगता था कि भौतिकी के किसी अध्याय की तरह केवल मुझे ही अज़दक को बारम्बार पढ़ना पड़ता है। अपना ही ऊपर का माला कमजोर है। मैं अकेली नहीं हूँ जानकर वैसी ही प्रसन्नता हुई जैसी किसी अन्य ग्रह में भी प्राणी है जानकर नासा के वैज्ञानिकों को होगी।
    घुघूती बासूती

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  14. प्रमोद जी के लेखन के क़ायल तो हम तब से हैं जब से उन्होंने अपनी शुरूआती पोस्टों में बकरी की लेंडी के ऊपर कविता लिख मारी, और उस पर टिप्पणियों के माध्यम से सार्थक विचार-विमर्श भी हुआ. हिन्दी चिट्ठाकारी की प्रयोगशीलता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है भला?

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  15. बढ़िया चर्चा। आज की चर्चा तो प्रमोदजी पर केंद्रित रही। प्रमोदजी की पोस्टें पढ़ने के लिये थोड़ा धैर्य चाहिये। समझने के लिये और अधिक धैर्य। लेकिन मुझे जो कमी अखरती है प्रमोदजी की कि वे अब अपने पात्रों की चिट्ठियां नहीं पढ़वाते, अपनी आवाज में पाडकास्ट नहीं सुनवाते और स्केच के मामले में कंजूस से हो गये हैं।

    हिंदी ब्लागिंग की अभी भी शुरुआत ही है। ब्लाग पोस्ट पर सामान्य टिप्पणियों के अलावा भाषा, लेखन के अंदाज और अन्य कोणों से विचार का चलन नहीं है। आगे शायद कभी कोई ब्लागरों की सामर्थ्य और सीमाओं पर बातचीत करने का चलन शुरू हो!

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  16. अनूप जी,
    ब्लॊग जगत् में ऐसा चलन शुरु होने के आसार न के बराबर हैं। अभी हिन्दी साहित्य ही में यह चलन शुरु नहीं हुआ कि कोई समीक्षा ( सम्यक् ईक्षा)करे. आलोचना के नाम पर प्रायोजित व प्रशंसात्मक लेखन का चलना है, या उठापटक के लिए निन्दा और व्याज स्तुति का। सब एक तयशुदा कारक के चलाए चलने वाला( यह कारक पार्टी, दोस्ती,जाति,क्षेत्र,भाषा,कौन कब मेरे-तेरे काम आ सकता है/या नहीं आ सकता है,किसकी रेखा बड़ी या छोटे करने से किसको लाभ या हानि पहुँचाई जा सकती है आदि जैसा कुछ भी हो सकता है} उस पर यदि किसी के विरुद्ध बिना किसी स्वार्थ को केन्द्र में रखे कोई दो शब्द विरोध के कह दे तो उसकी दुर्गत करने के ऐसे ऐसे भयंकर तरीके हैं लेखकों(?) के पास कि जीना मुश्किल हो जाए। आलोचना व समीक्षा के नाम पर लोग बाग केवल आत्मप्रशंसा ही सुनना चाहते हैं. ब्लॊग जगत् तो आत्ममुग्धों का संसार है हर कोई अपने को ही सर्वश्रेष्ठ समझता है।
    वैसे आपके स्वप्न के साकार होने की शुभकामना करती हूँ।

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  17. @ डाक्टर कविता जी
    वैसे तो यह अच्छा लग रहा है, कि आज सभी इस बिन्दु पर चिन्तित और एकजुट हैं..
    पर " आलोचना व समीक्षा के नाम पर लोग बाग केवल आत्मप्रशंसा ही सुनना चाहते हैं. "
    यह उक्ति अपने पर विपरीत बैठने से ही तो न निकस पड़ी ?
    मेरा आशय आपको आहत करना नहीं है.. यह सामान्य मनोविज्ञान है..
    और चारणत्व को पोसना एक विकृत स्थिति है.. तो क्या असामान्य सोव का ही बहुमत बनता है ?

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  18. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  19. अमर कुमार जी,
    आपका आशय भले ही जो भी हो, उससे अन्तर नहीं पड़ता।
    और रही, किस पर कितना लागू होती है, तो बन्धु आपने सम्भवत: साहित्य के अखाड़े का प्रकार्यात्मक अनुभव नहीं लिया है।
    इसमें छिपाने वाली कोई बात ही नहीं है, मैं अपने सहित २५ और ऐसे नाम आपको तत्क्षण गिना सकती हूँ,जिन्होंने दो टूक बात कहने के भयंकरतम खामियाजे भुगते हैं। इतने नीच लोग बाग भी हैं कि किसी भी तरह का प्रतिकार लेने में कतई कोताही नहीं करते।
    आपका यह सब कहने का उद्देश्य अगर किसी के व्यक्तिगत जीवन में झाँकना या उस से अनुभव उगलवाना- मात्र है, तो आपको निराशा होगी, क्योंकि इससे आगे की डिटेल सार्वजनिक मंचों पर बाँटते रहने में मेरी कोई रुचि या आस्था नहीं है। न ही किसी के उकसाने पर उलटी ( विरेचन) कर देने का कोई औचित्य। लेखक होने का यह लाभ तो अवश्य उठाना चाहिए कि विरेचन हो तो सर्जनात्मक हो,परिपाक के बाद।

    वैसे जब तथ्यों की बात होती है तो मुद्दा तात्विकता का होता है,निष्कर्षों का, न कि घटनाओं व कब किसने किसके साथ कैसे बदला लिया, बरता, बोला, या शत्रुता निभाई आदि का। अत: ऐसे व्यक्तिगत नामोल्लेख या पिनडाऊन करने वाले विषय टेस्ट में रुचते नहीं। क्षमा करें। दूसरों को ज़लील करना, कलई खोलना या उनकी व्यक्तिगतता का उल्लंघन क्यों करूँ?

    आप इस पर भी एक नया तर्क ला सकते हैं, लाएँगे,परन्तु इस बहसबाजी या सिरकुटाई से दूर रहना चाह्ती हूँ। माफ़ करें।
    मुझे अपनी बात जो उचित लगी, कह दी, आपको पसन्द न आए तो न सही, छोड़ दीजिए। मैंने कब कहा कि सब सर्वसम्मति से इसे मानें?
    मत मानिए। परन्तु यह भी छूट लेने का अधिकार अनावश्यक है कि कब क्या हुआ, क्यों हुआ, किस प्रसंग में हुआ, किस पुस्तक या किस लेख की समीक्षा पर, किस किस की, किस किस ने, ऐसी तैसी की।

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  20. इतने विस्तृत उत्तर से टिप्पणी का संज्ञान लेने का आभार..
    शतप्रतिशत सहमत हूँ..
    ' भयंकरतम खामियाजे ' के पंक को समझौतों से ढाँप कर ही युगदृष्टा सृजनात्मक सत्साहित्य रचा जा सकता होगा ..
    असहमत होने का अब कोई कारण ही नहीं है !
    देखिये यह चीनी भाई साहब मध्यस्थ बन आ खड़े हुये हैं.. सो Cease Fire की घोषणा होजाये ?

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  21. कुछ और भी चिट्ठे शामिल कर लिये जाते तो पढ़ने में और भी मजा आता!

    बाप रे, फेंग साहब ने कितनी भारी-भरकम टिप्पणी छोड़ी है!!! लगता है अब एक चौथी भाषा भी सीखनी पड़ेगी!

    उत्तर देंहटाएं

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