सोमवार, मई 11, 2009

मातृ दिवस और आईपीएल के जलवे

कल मातृ दिवस था। यह एक ऐसा दिवस है जो हमारे बचपन में नहीं था। अब कब से जुड़ा पता ही नहीं है मुझे कुछ इसका इतिहास भूगोल। लेकिन इसी बहाने तमाम लोगों ने अपनी भावनायें व्यक्त कीं। कल के अधिकतर लेख मां पर केंद्रित थे। विनीत कुमार ने अपनी मां के द्वारा प्रयोग किये जाने वाले मुहावरों और शब्द समूहों को याद किया है।
मर्द नहीं मौगा या मौगमेहरा होनाः औरतों की बातों में रुचि लेना- मां इसे बहुत बड़ा अवगुण मानती है,मेरे एक फूफा का उदाहरण देकर हुए कहती है- वो मर्द नहीं मौगा हैं।
आगे वे कहते हैं:
अब ये कहना कि मां याद आती है बकवास बात होगी। ऐसा कौन सा दिन होता है जब मां याद नहीं आती या फिर ऐसा कौन सा दिन होता है जिस दिन बात नहीं होती। लेकिन इस विशेष मौके पर मैं उसे याद करने से ज्यादा उसके शब्दों को, उसकी अभिव्यक्ति को याद करता हूं जो मुझे अक्सर एहसास कराती है कि हमसे दूर होने पर तुम पूरे एक शब्दकोश से महरुम रहते हो।


अनिल पुसदकर का लेख पढ़कर अपने समाज के छ्द्म सामने दिखते हैं। उनके लेख का शीर्षक ही उनकी बात कह देता है-भैया प्लीज़ कोई अच्छी सी मां का पता चले तो बताना,सम्मान करना है,आज मदर्स डे है ना! बकिया आप उनका लेख बांचेंगे ही।

विश्वदीपक’तन्हा’ मां के बारे में लिखते हैं:
आँखों की नींद-सी,
हिंदी-सी , हिंद-सी,
माँ की जाँ है,
चक्की की कील है,
मांझा है, ढील है,
माँ तो माँ है।
चढती संझा, चुल्हे की धाह है,
उठती सुबह,फूर्त्ति की थाह है।

कविता पढ़कर यह आश्वस्ति सी होती है कि अगले कुछ मातृदिवस तक मां , मां के सिवा और सब कुछ हो जायेगी।

समीरलाल जी ने अपने ब्लाग की 300 वीं पोस्ट लिखी। उनको हमारी बधाई।

आजकल आईपीएल के जलवे हैं। आईपीएल के मैच और उससे जुडी खबरें बताने का काम आईपीएल खबर डाट काम से बखूबी हो रहा है। हर मैच का स्कोर, खबरें, बयानबाजी और शगूफ़े सब कुछ इसमें शामिल है। मैच जैसे ही खत्म हुआ, कप्तानों के बयान, मैन आफ़ द मैच की बतकही और एक्स्पर्ट कमेंट सब कुछ इसमें मौजूद है। यह काम हमारे ब्लागर साथी प्रतीक पाण्डेय और (???) बड़ी खूबसूरती से कर रहे हैं। इस साइट की चपल गति सराहनीय है। प्रतीक हिन्दी ब्लाग जगत के अन्डरडाग हैं। बिना शोर शराबा किये महत्वपूर्ण काम करते रहते हैं। उनको मेरी बधाइयां और शुभकामनायें।

आठ मई को इलाहाबाद में हुये ब्लागर समागम और भाषणबाजी के किस्से तो अभी आने बाकी हैं। लेकिन जो साथी फोटो देखने से चूक गये हों वे यहां नजर दौड़ा लें।

अभिषेक ओझा ब्लागिंग के खतरे बताये जा रहे हैं। आज इसकी तीसरी कड़ी में वे लिखते हैं:

छोटे रिस्क में एक और है... असामाजिकता. आप कहेंगे ब्लॉग्गिंग से सोशल नेट्वर्किंग होती है. हाँ वो तो सही है... पर ऐसा भी होता है: दिल्ली, कलकत्ता और लन्दन, न्युयोर्क में बैठे लोगों को पता होता है कि आज मुंबई की ब्लोगर मैडम एक्स के घर क्या बना है. लेकिन पड़ोसियों को नहीं पता होता !


फ़िलहाल इतना ही। बाकी फ़िर कभी। जल्द ही।

सप्ताह के शानदार शुरुआत की आपको मंगलकामनायें।

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18 टिप्‍पणियां:

  1. प्रतिक जी का जिक्र पढ़ अच्छा लगा... वो काम करते रहते है... और पता भी नहीं चलता.... बधाई उन्हे... 1plkhabhar.com के लिये...

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  2. "....आज मुंबई की ब्लोगर मैडम एक्स के घर क्या बना है. लेकिन पड़ोसियों को नहीं पता होता ! " हां भई, मसाले जो महंगे हो गए हैं... महक नहीं उठी तो नहीं उठी:)

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  3. ये लो य क्या हुआ? आज एकता कपूर की आत्मा आ गई क्या? शुरु करने के पहले ही ब्रेक?

    रामराम.

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  4. समीरलाल जी ने अपने ब्लाग की 300 वीं पोस्ट लिखी। उनको हमारी बधाई।

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  5. चर्चा उत्तम रही..बधाई लाया हूँ बंटवा दीजियेगा सबमे.. प्रतिक के बारे में आज ही जाना है.. उत्तम!

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  6. "कल मातृ दिवस था। यह एक ऐसा दिवस है जो हमारे बचपन में नहीं था। ..."
    सही लिखा है...हम तो माँ से रोज़ पिटते थे, रोज़ सहलाए जाते थे. रोज़ कुड़ते थे. हर रोज़ उसी का होता था. पता ही नहीं था कि माँ को भी एक दिन की ज़रुरत अलग से दरकार होगी...

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  7. आपसे पूरी तरह सहमत हूं।सच तो यही है कि अधिकांश लोगो ने बचपन मे ऐसा कोई दिवस नही देखा।पहले तो घर मे सुबह-शाम पूजा मे सब बच्चे शामिल रहते थे और पूजा समाप्त होते ही मां के चरण स्पर्श कर दिन शुरू करते थे।पूजा तो अब भी सुबह-शाम होती ही है मगर बच्चे बडे होकर काम पर चले जाते है मां अकेली पूरे परिवार के लिये भगवान से प्रार्थना करती रहती है।बच्चे भी आश्वस्त रहते है मां तो है ना भगवान से वो बात कर लेगी।हां एक गाना अक्सर याद आता है,

    उसको नही देखा हमने कभी,
    पर उसकी ज़रूरत क्या होगी,
    ऐ मां,ऐ मां तेरी सूरत से अलग,
    भगवान की सूरत क्या होगी,क्या होगी।
    उसको नही देखा हमने कभी………………

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  8. अच्छी चिट्ठा चर्चा । धन्यवाद ।

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  9. यहॉं भी आईपीएल, देखो कब तक इसे झेलना पडेगा।

    -जाकिर अली रजनीश
    ----------
    SBAI / TSALIIM

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  10. अच्छा है आपका चिट्ठा चर्चा..........

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  11. बढिया चर्चा। मातृ दिवस वाकई नहीं था जब तक माँ के पास थे। बड़ा ऊलजलूल मामला है। माँ को याद करने को भी साल में एक दिन की जरूरत है।

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  12. मे के महीना बड़ा उदार है .अपने कई दिन इसने दे रखे है .मजदूर दिवस से लेकर क्रांति दिवस ओर मदर्स डे ...चुनाव दिवस ओर आई पी एल तो खैर है ही.....आज मंटो का जन्मदिन भी है...कौन मंटो ?अफसानानिगार मंटो जिसे अश्लील ओर पागल कह ज़माने ने गाली दी....ओर उसने हमें बाबा टेक सिंह से लेकर "खोल दो "जैसी खून ज़माने वाली कहानी दी.....ओर ठंडा गोश्त जैसी ..अपने ज़माने से सालो पहले की कहानी....पढ़ कर लगता है ..इस अंदाज़ में सच बोलने के लिए कितनी हिम्मत चाहिए .....
    विश्व दीपक की कविता लाज़वाब है .....उन्हें तीन सालो से ऑरकुट के जरिये जानता हूँ....लाज़वाब लिखते है हमेशा ...
    ओर हाँ कल की रवि रतलामी जी चर्चा पढ़ी .एक दम धाँसू .....

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  13. बहुत बढ़िया चर्चा. आभार बधाई के लिए. :)

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  14. प्रतीक तो आईपीएल मय हैं आजकल। सुन्दर चेहरे वाली मेहरारुयें भी देखने को मिलती हैं उनकी ब्लॉग फीड में। और हिन्दी की जगह अंग्रेजी मिलती है।
    बालक का विवाह हो गया कि अभी मार्केट में है?

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  15. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  16. तुझको नहीं देखा कभी
    मैंने कभी पर
    तेरी सूरत से अलग
    भगवान की सूरत क्‍या होगी
    ऐ मां

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