बुधवार, मई 20, 2009

हँसता खिलखिलाता बचपन हो













चित्र साभार विद्युत


कई महीनों से सफ़र में खानाबदोश से घूम रहे हैं.....दो तीन दिन में इस शहर को भी छोड़ना होगा....दूसरे शहर रवानगी है...इस दौरान वक्त गुज़ारने के लिए पुराने एलबम देखना हमे बहुत भाता है....बच्चों की पुरानी तस्वीरों में उनके भोले बचपन को देख कर अचानक ख्याल आया कि क्यों न आज खिलखिलाते बच्चों के मासूम बचपन पर चर्चा की जाए....


नन्हा सा मन ब्लॉगजगत लगा तलाशने नन्हे मुन्नों के ब्लॉग ....डॉ अमरकुमार तो हरफनमौला है, उन्हे खोजते खोजते सीमा सचदेव मिल गई...महीनों को कविता के सुन्दर रूप में देखा तो हम भी गुनगुनाने लगे.....

मई महीना आया जब
अन्दर घुस के बैठे सब
कडी धूप गर्मी का मौसम
पंखे चलते रहते हरदम

वहीं से नन्हें बचपन की खुशबू से भरपूर सरस पायस में प्रवेश किया तो जाना कि रावेन्द्रकुमार रवि जी ने बड़े प्यार से बच्चों की बगिया को सजाया है... उन्हीं के माध्यम से ही कई और ऐसी ही रंगबिरंगी महकती बगिया और उनके मालियों से परिचय हुआ.......


डॉ हेमंत के क्रीएटिव कोने में ---

एक बचपन मांगता है रोबोट राकेट सुबह सुबह दूसरा रोटी।

उन्हीं की फुलबगिया में भी प्यारे प्यारे फूल महक रहे हैं...


बाल सजग नाम का ब्लॉग बच्चों को सजग करते हुए उन्हे साथ लेकर नई दिशा की ओर बढ़ रहा है... छठी कक्षा के सम्पादक अशोक कुमार तो अपनी उम्र से अधिक परिपक्व लगते हैं.......

सम्पादकीय में लिखते हैं.......

प्यारे दोस्तों, .. हमारा बाल सजग अच्छे से चल रहा है. ४ मई को हिंदुस्तान दैनिक अख़बार ने भी अपने ब्लॉग की चर्चा अपने अख़बार में करके हमारा हौसला अफजाई किया है... साथियों अभी लोकसभा का चुनाव ख़त्म हुआ है, देखना है कि कौन सी पार्टी या निर्दलीय नेता चुनकर लोकसभा में जाते है, और देश तथा लोगों कि भलाई के लिए क्या काम करते है... (इतनी छोटी उम्र में बच्चे अगर राजनीति के बारे मे चर्चा करते है तो खुशी के साथ हैरानी भी होगी )


अपने देश के पिंटू जैसे बच्चे अपनी उम्र से पहले ही अपना बचपन खो बैठते हैं.... रंजनाजी लिखती है

पिंटू यही गांव के करीब एक ढाबा था वहाँ काम करता था ...पढने का बेहद शौक था ..पर जिस परिवार में जन्म लिया था वहाँ काम ही पढ़ाई थी। बीमार माँ का इलाज ..शराबी बाप का कहर बचपन को कहीं वक्त से पहले ही अलविदा कह गया था।


अक्सर यह देखने में आता है कि नवीन प्रवेश होने पर या तो 1-2 दिन कक्षा में रोते हैं या घर जाने की रट लगाये रहते हैं। लेकिन एक बालक दूसरे बालकों से मिन्न प्रवृत्ति का था... डॉ रूपचन्द इच्छा करते हैं.... काश हर बालक ऐसा ही होता....


हिन्दयुग्म का बाल उद्यान में आज सुराही की विशेषता बताई गई है कि कैसे उसमें पानी ठंडा होता है... इतना जान लीजिए कि अगर आप बच्चों को फ्रिज के पानी की बजाए सुराही की विशेषता बताते हुए पानी पीने को देंगे तो उत्साहित होकर इस नए प्रयोग को पसन्द करेंगे.....


ज़ाकिर अली रज़नीश और उनके साथ साथ और भी कई बाल मन का बखान अपनी लेखनी से बखूबी कर रहे हैं...विदेशों में नन्हें मुन्नों के लिए राजभाटियाजी का यह रूप तो पहली बार देखा...विदेशों में अपने देश के मूल्यों को बच्चों में जीवित रखने के लिए कुछ आरतियों का संग्रह देखकर सुनने का मोह न रोक पाए..... कविताजी की बाल सभा में पहली बार गए.... रश्मिप्रभाजी का खिलौने वाला घर भी मन भाया.... मानसी की परी कथाएँ तो कल्पना के सुन्दर लोक मे ले जाती हैं...


कल्पना लोक से सीधे उतरे धरती पर...... जहाँ अमलेन्दु अस्थाना ऐसे बच्चों से परिचय करवाते हैं जिनके नन्हे नन्हे पंख ऊँची उड़ान की चाहत में फड़फड़ाते है......मीना खन्ना को नतमस्तक प्रणाम... न जाने ऐसे कितने लोग नींव की ईंट बनकर समाज की इमारत मज़बूत करने मे लगे हैं....

अपने को तो सब संवारते हैं, खुद के लिए तो सभी जीते हैं। दूसरों के लिए जीने का हौसला कोई-कोई ही रखता है। मीना खन्ना एक ऐसी ही महिला है। एक रिक्शा चालक की बेटी होने और घरों में आया का काम करने के बावजूद मीना आज झुग्गी झोपड़ी के नन्हें पंखों को संवारने में जुटी है। वह कहती है कि खुद ज्यादा न पढ़ सकी तो क्या इन बच्चों को उनका आकाश ढूंढने में जरूर मदद करेगी।

बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए शिक्षा से बढ़कर कोई प्रकाश पुंज नहीं....





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25 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे ख़ुशी है लोग इतने सजग हैं और कुछ सार्थक कर रहें हैं

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  2. बहुत बढ़िया चर्चा की है..चुनिंदा चयन है विषय विशेष बना कर.

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  3. ले, भैणजी दाँ गल्लाँ सुण लै !
    अभी बहुतेरे मौला ब्लागजगत में टहल रहे हैं !
    असली वाले " हरफ़नमौला " तो न जाने कब अपनी सभी पोस्ट डिलीट करके,
    नोयडा में अपना ’ आँचल ’ सँभाल रहे हैं !
    मैं कहाँ का मौला..

    वैसे धन्यवाद तो ले ही लीजिये !

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  4. सुबह-सुबह मन खुश हो गया चर्चा देखकर! जय हो!

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  5. बाल-रचनाओं पर केन्द्रित चिट्ठों की चर्चा की सोच कितनी प्यारी रही होगी । जाहिराना तौर पर और कौन करता ऐसी चर्चा ? आभार ।

    अमर जी तो खैर धीरे-धीरे अच्छे लगने लगे हैं-बहुत अच्छे ।
    सच कहूँ तो मैंने तो उन्हें ’नकार’ से ही उपलब्ध किया है - "ना ना करते..."।

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  6. इस बालक को भी चर्चा बहुत अच्छी लगी ! धन्यवाद !

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  7. वाह !! सचमुच हंसते खिलखिलाते बचपन की चिट्ठा चर्चा खुश कर गयी।

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  8. alag alag vishayo ko le kar charcha karane ka aap ka ye andaaz nirala hai

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  9. aap har baar alag alag vishay par charcha karti hain ...ye achchha lagta hai

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  10. विषय की सुंदर चर्चा, धन्यवाद.

    रामराम.

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  11. a child is alive in every adult and in very child lies the future of any society / genration / country

    good collection of links all at one place serves a good purpose

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  12. बचपन के दिन भी क्या दिन थे...........बचपन की याद दिला दी बूढे को:)

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  13. एक खिलौना जोगी से खो गया था बचपन में
    ढूंढता फिर उसको वो नगर -नगर तनहा
    - जावेद अख्तर

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  14. अच्‍छी कंपाइलिंग। सफल प्रयास। शुक्रिया।

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  15. बच्चों को विशेष रूप से दी गयी तवज्जो...............बच्चों की लिए विशेष अंक सा लग रहा है आपका ब्लॉग आज.........

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  16. अलग सी चर्चा अलग ही लगी जी। बढ़िया।

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  17. bachchon ke liye sochane ki fursat hai?
    Unake liye kuchh SARTHAK likhane ki fursat hai?
    Unake vikas ka aadhar taiyaar karne ki fursat hai?
    sochiye.......kaise KHILKHILAAYE BACHAPAN???

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  18. बहुत बढ़िया लगी यह चर्चा .एक ही विषय पर वो भी बच्चो के लेखन पर .बहुत बढ़िया आइडिया लगा यह

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  19. लेखन बालकों के लिए
    सब खनकदार है जमा

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  20. जितनी अधिक देर बाद यहाँ पहुँच पाया,
    उतनी ही अधिक ख़ुशी मिली!
    बहुत महत्वपूर्ण और सार्थक चर्चा हुई है यहाँ!
    चर्चाकार को धन्यवाद,
    बधाई, शुभकामनाएँ और वह सब,
    जो उन्हें दिया जा सकता है -
    इस अनूठे कार्य करने के लिए!

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