शुक्रवार, मई 22, 2009

सम्मान देते हो तो जीने क्यों नही देते

जब भी कोई विमर्श खड़ा होता है तो कुछ समय मे उसके अपनी असल ज़मीन से भटक जाने की बहुत सम्भावनाएँ रहती हैं या कम से कम भटका दिए जाने की मंशा से समाज का एक ज़हीन वर्ग हमेशा अपने भीतर रखता है।मै बात करना चाहती हूँ पेज 3 की उन महिलाओं की जिनकी प्रसन्नमुख तस्वीरें देखने के बाद अनिल कांत को यह भ्रम हुआ कि यह स्त्री सशक्तीकरण का सही प्रोजेक्शन नही हो सकता।वे सही हैं। ऐसा दर असल है भी नही । वहाँ कहीं भी नही लिखा रहता कि वे सशक्त महिलाएँ हैं और हम सभी की आदर्श होनी चाहिए।उनके साथ कुछ पुरुष भी होते हैं।वे सशक्त ही हैं।एक झोंपड़ी के भीतर भी यदि स्त्री सामने हो तो पुरुष सशक्त ही होता है।

पेज थ्री का मकसद सशक्त स्त्री को दिखाना है भी नही।उसका मकसद केवल एक शहर , मेट्रो सिटी की पार्टीज़ या हैपनिंग्स को दिखाना भर है जो ग्लैमर से भरपूर हैं।पेज थ्री की दुनिया आम इनसान की दुनिया नही है यह साफ दिखाई देता है। वह उथले लोगों की ऐसी दुनिया है जो अपने मुँह से हमेशा पॉलीटीकली करेक्ट होने की कोशिश करते हैं और उन्हें छापने वाला अखबार भी यह नही दिखा पाता कि ऐसा दर असल है या नही।पेज थ्री कोई समाजिक कमेंट नही करता । और इस लिहाज़ से उस एलियनेटिड दुनिया को असल ज़मीनी मुद्दों के बीच ले आना और उस पर
बहसियाना दर असल अपनी ही विमर्श क्षमता को व्यर्थ करना है।

खैर, यह एक अलग बात है कि पेज थ्री महिलाएँ अमीर बाप की औलाद होकर ,समृद्ध-साधन सम्पन्न होकर भी अपनी स्वतंत्र पहचान से रूबरू हैं भी या नही।उसके लिए अन्य विकल्प खुले हैं भी या नहीं।या वे भी मीडिया वालों के सामने बिन्दास महिला होने का भ्रम पैदा करती हुई भीतर से कुढती हुईं अधकचरी औरतें हैं , शायद लाल्टू की इस कविता की तरह -

उनके बारे में कइयों का कहना है
वे बड़ी आधुनिक हैं उनके रस्म
पश्चिमी ढंग के हैं
दरअसल बड़े शहर की लड़कियाँ
औरत होने का अधकचरा अहसास
किसी के साथ साझा नहीं कर सकतीं
इसलिए बहुत रोया करती हैं
उतना ही
जितना छोटे शहर की लड़कियाँ
रोती हैं

उन स्त्रियों पर बात नही की जा सकती जो पहले से ही मुख्य धारा का हिस्सा हैं और हाशिए के दर्द से उबरने के बाद या उसे कभी न झेल पाने की खुशकिस्मती के बाद निर्णायक पदों पर आसीन हैं।वे कितनी संख्या मे हैं यह छिपी हुई बात नही है।जो मुक्त हैं वे भी कितनी मुक्त हैं यह एक अलहदा सवाल है , बड़ा सवाल है।
विकल्पों से परे की दुनिया मे जीतीं लड़कियों के साथ साथ इस दुनिया मे उन लड़कियों की सिसकियाँ भी शामिल हैं जिन्हें जन्म लेने का ही हक नही है कहने को तो हर धर्म स्त्री को सम्मान देता है पर जीने नही देता।इस विडम्बना से उबर पाने के लिए धर्म से टकराना स्त्री के लिए कितना अहम है यह पहले भी हम कई बार कह चुके।

उस वक्त को याद करो जब बेटियों से यह पूछा जाएगा कि किस बिना पर तुम पेट में ही पहचान कर मार डाली गयी। आप ही बताएँ कि उस लड़की का क्या जवाब होगा? कहीं वह यह तो नहीं कहेगी-

ओरे विधाता, बिनती करुँ, परुँ पइयाँ बारम्बार

अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो, चाहे नरक में दीजो डार

मुझे उम्मीद है कि इस जवाब का प्रतिरोध करने मे हम ब्लॉग पर महिलाएँ पीछे नही रहेंगी ,हम क्यों न हों अगले जनम में भी बिटिया?ज़रूर होंना चाहेंगी !लेकिन किसी दूर दराज़ के गाँव की कोई फूलन देवी भी जब कभी ऐसा कह पाएगी तो वही हमारे लिए आदर्श दिन होगा।


सुजाता

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12 टिप्‍पणियां:

  1. aapne yah mudda yahan uthaya uske liye shukriya
    kam se kam kuchh vichar to samne nikal kar aayenge

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  2. प्रासंगिक चर्चा । मन से पढ़ा ।

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  3. पेज थ्री कोई सामाजिक सन्देश देने वाला पृष्ठ नहीं है,, नारी सशक्तिकरण दरअसल समाज सशक्तिकरण से ही आएगा.. पुरानी रुढियों के खोखले ढाँचे तोड़ कर यदि समाज नयी करवट ले तभी कोई क्रांति होगी.. मगर ऐसा संभव नहीं है.. मुझे नहीं लगता की मेरे जीते जी इंसान अपने मन से पुत्र मोह निकाल पायेगा.. शिक्षा जब तक नहीं मिलती है ना नारी सशक्त है ना पुरुष.. यदि समाज शिक्षित हो तो नारी सशक्तिकरण जैसे शब्दों की अहमियत नहीं रहेगी.. पर समस्या यही तो है कि सांप तो होता नहीं है और हम लकीर पीटते रहते है..

    पेज थ्री में नज़र आने वाली लड़किया चिल्ला चिल्लाकर खुद को सशक्त नहीं कहती .. फिर उन्हें क्यों दोष दिया जा रहा है?
    जो लोग उन्हें ऐसे कहते है दोषी तो वे है..

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  4. "उस एलियनेटिड दुनिया को असल ज़मीनी मुद्दों के बीच ले आना और उस पर
    बहसियाना दर असल अपनी ही विमर्श क्षमता को व्यर्थ करना है।"
    बिलकुल सही.

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  5. यह ‘पेज थ्री’ है क्या बला?:)

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  6. सी एम परशाद जी ,
    पेज थ्री अब एक सिम्बॉलिक , प्रतीकात्मक टर्म है।सम्भ्रांत वर्ग की पार्टीज़ मे बिखरे ग्लैमर को कवर करने वाला अखबार का एक पृष्ठ।आप चाहें तो हिन्दुस्तान टाइम्स {अंग्रेज़ी}का एच टी सिटी उठा कर देख सकते हैं , वहाँ तीसरे पेज पर आपको इसका नमूना मिल जाएगा।

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  7. राख के नीचे आग सुलगती है
    जरा इसे कुरेद कर तो देखिए।

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  8. राख को राख रहने दो भई, क्यों उसे कुरेद रहे हो।

    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  9. सुन्दर चर्चा। पेज थ्री की चर्चा के बहाने अपनी बात अच्छी तरह से रखी। सबसे अच्छा यह लगा कि चर्चा सुबह-सबेरे ही दिख गयी।

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  10. हम तो ‘पेज थ्री’ को वो पेज समझ रहे थे जो ‘सम्भ्रांत’ लोगों के पढ़ने के लिए नहीं है!!!!!!!!!! जानकारी में इज़ाफ़ा हुआ:)

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  11. तू वो ज़ुल्‍फ़-ए-शाना परवर जिसे ख़ौफ़ है हवा का
    मैं वो काकुल-ए-परेशां जो संवर गयी हवा से
    ज़मील मज़हरी

    न तो एक आम आदमी की प्राथिमकता पेज़ थ्री होती है, और न ही पेज़ थ्री के कालमनिस्ट को यह ख़बर भी होती है, कि इस देश में आम आदमी भी हुआ करता है । पेज़ थ्री एक तरह से व्यवसायिक, प्रायोजित एवँ चाटुकारिक पत्रकारिता है ।

    ऎसा कुछ दूसरे जन भी सोचते होंगे, उनका सवाल है कि,
    " कहां रहती है, इन की न्यूज़-सैंस... " " एक तरफ़ हो ...संजय दत्त –मान्यता द्वारा अपनी शादी की अर्ज़ी वापिस लेने की खबर और दूसरी तरफ़ यह खबर हो कि मध्य-प्रदेश और झारखंड से आ रहे 16मज़दूर ट्रैक पर चलते हुये पीछे से आती हुई ट्रेन की चपेट में आने से कुचले गये(जिसे 9वें पन्ने पर छापा गया है)......तो, किसी दूसरी कक्षा में पढ़ रहे बच्चे से पूछते हैं कि कौन सी खबर बड़ी है या कौन सी खबर अखबार के पहले पन्ने पर छपनी चाहिए थी। ...........हां, हां, मैं भी यही सोच रहा हूं कि ये मज़दूरों के कुचले जाने वाली खबर पहले पेज पर न सिर्फ़ छपनी ही चाहिए थी , वह तो उस पन्ने पर सब से ऊपर भी छपनी चाहिए थी। लेकिन पता नहीं जो अंग्रेज़ी अखबार मैं पढ़ रहा हूं इस में न्यूज़-सेलेक्शन करने वालों को क्या हो रहा है......क्या हो रहा है इन की न्यूज़-सैंस को जो इन की न्यूज़-वैल्यू को सही ढंग से देख नहीं पा रहे हैं या यह सब कुछ जान-बूझ कर होता है...........जिस के कारण हम सब अच्छी तरह से जानते हैं, लेकिन फिर भी यह सब कुछ हो रहा है। पेज थ्री जर्नलिज्म खूब ज़ोरों से पनप रहा है और आने वाले समय में तो और भी पल्लवित-पुष्पित होगा। "
    " और जरा राजीवकुमार की भी सुनी जाये .. " " व्यावसायिक पत्रकारिता कैटवॉक करती आ रही है। यह तो सभी जानते हैं। हां उसमें कुछ लोग ऐसे भी हमेशा से रहे हैं, जो ऐसा करने से मना भी करते रहे हैं और विरोध के साथ विकल्प भी तलाशते रहे हैं। सवाल सिर्फ इतना है कि जो छिपा था, या फिर जो अंतःपुर में होता था, वह सब मंच पर बिना फैंटेसी के या कहें नग्न रूप में यथार्थ हमारे सामने आ गया। अब जो इसका विरोध करने वाले हैं, वो तो अपनी भूमिका निभाएंगे। वो निभा भी रहे हैं। सवाल यह है कि कहां पर यह भूमिका निभाई जा रही है? यह भूमिका ब्लॉग की ही दुनिया में संभव हो पा रहा है। "

    अनूप सर को भले भा गयी हो, पर कुल मिला कर निराश कर रही है, आज की चर्चा । शायद इसीलिये आज टिप्पणी करने का मन भी नहीं बन पा रहा था !

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