गुरुवार, अगस्त 06, 2009

तुम अब तो अरहर की दाल हो गए

"भ्रष्टाचार हमारी परम्परा है. हमारी संस्कृति है. हमारी आदत है. हमारा व्यवहार है. हमारे रहने और जीने का ढंग है. बेशक हम भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हों, पर जिन्दा हैं. भ्रष्टाचार हमें सहज बनाता है. हम हर कहीं भ्रष्टाचार में संलिप्त रहते हैं. पर हमारे चेहरे मासूम हैं....."

अंशुमाली रस्तोगी जी के लेख की पंक्तियाँ हैं. अंशु जी के अनुसार हमें भ्रष्टाचार से नहीं, ईमानदार से ज्यादा खतरा है. इस लिहाज से हम बहुत आगे निकल लिए. कभी तो कोई समय रहा होगा जब हमें भ्रष्टाचारियों से खतरा होता होगा. लेकिन कहते हैं समय पलटते देर नहीं लगती. समय पलट गया है.

आप अंशु जी का यह लेख पढिये और जानिए कि हमें ईमानदारों से खतरा क्यों हैं. या फिर ईमानदार आदमी खतरनाक क्यों हो गया है. यहाँ क्लिकियाईये, लेख पर पहुंच जायेंगे.

अब भ्रष्टचार पर गद्य पढ़ लिया हो तो पद्य भी पढ़ लिया जाय. किशोर पारीक 'किशोर' की रचना पढिये. किशोर जी लिखते हैं;

"उनके घर फूलों की बरसा‍ मेरे घर में बिखरे खार
मेरा बेली तो ईश्‍वर है, उनका बेली भ्रष्‍टाचार
लोकतंत्र से तंत्र लुप्‍त है, खुशबू के बिन गजरे हों
हर दफ्तर का मंजर, लाशों पर गद्दों की नजरें हों
निकल खजाने से रुपया, जब नीचे लुढ़का आता है
घिसते-घिसते केवल पैसा, पन्‍द्रह ही रह जाता है
समरथ टुकड़े काट-काट कर, रुपये को ही खाता है
जिसके लिये चली थी मुद्रा, वह रोता रह जाता है
चमचों और दलालों का तो, दृढतम यही सहारा है
यही जिलाता दुर्जनता को, सज्‍जनता को मोरा है
पन्द्रह पैसे का विकास ही, बस जनता का तो आधार
मेरा बेली तो ईश्‍वर है, उनका बेली भ्रष्‍टाचार"

पूरा गीत आप किशोर जी के ब्लॉग पढिये और उन्हें इतने अच्छे गीत के लिए साधुवाद और बधाई दीजिये.


राखी का भविष्य क्या है?

आज घुघूती जी ने इस सवाल का जवाब ढूढने की कोशिश की है. भाई और बहन के रिश्ते के बारे में घुघूती जी लिखती हैं;

"यह रिश्ता सबसे अधिक मधुर इसलिए कहलाता था क्योंकि बहन को परिवार की जमीन जायदाद से कोई हिस्सा नहीं मिलता था। उसके हाथ यदि कुछ आता था तो यह मधुर रिश्ता ही। भाई जायदाद को लेकर लड़ लेते थे, बहन को तो बस यही चिन्ता रहती थी कि माता पिता के बाद उसका मायका बना रहे और वह मायका भाइयों के कारण ही बना रहता था और भाई भी यह जानते थे कि बहन को अपने जन्म के परिवार से केवल और केवल स्नेह ही मिलना है और कुछ नेग और कुछ नहीं।"


राखी को एक अलग नजरिये से देखा है घुघूती जी ने.

पढने में आया हैं कि आमिर अजमल कसाब के दिल में तमन्ना जाग उठी है;

"कि काश उसके हाथ में भी कोई राखी बांधता. सुनवाई के बाद उसने अपनी इच्छा अपने वकील को भी बताई."

यह बात विस्फोट पर उजागर हुई है.

कसाब बाबू को भारतीय परम्पराओं और त्यौहारों से लगाव हो रहा है. यह लगाव किसी लॉन्ग टर्म प्लानिंग के तहत तो नहीं उपजा है?

सत्ता की राजनीति होती है. राष्ट्रीय राजनीति होती है. अन्तराष्ट्रीय राजनीति होती है.....हिंदी की राजनीति भी होती है.

आज बालेन्दु शर्मा दाधीच जी ने इसी हिंदी की राजनीति पर अपने विचार रखे हैं. मामला अशोक चक्रधर जी को लेकर है जो हाल ही में हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष बने हैं. बालेन्दु जी लिखते हैं;

"दुर्भाग्य से, हिंदी की राजनीति में विभाजन किसी एक मुद्दे पर नहीं है। वहां विभाजनों की दर्जनों धाराएं और उपधाराएं विद्यमान हैं। कहीं यह टकराव वाम और दक्षिण के बीच में है, कहीं उच्च-साहित्य और निम्न-साहित्य के बीच में है, कहीं पुस्तकीय और मंचीय रचनाधर्मिता के बीच में तो कहीं साहित्यिक हिंदी-सेवा और असाहित्यिक हिंदी-सेवा के बीच में। और तो और विभिन्न विधाओं का प्रतिनिधित्व करने वालों के बीच भी द्वंद्व, अंतद्वंद्व और प्रतिद्वंद्व हैं। फिर वाम में भी अति-वाम और मॉडरेट-वाम का टकराव मौजूद है। अशोक चक्रधर की नियुक्ति के बाद एक बार फिर इस टकराव की बानगी दिखाई दे गई है."


बालेन्दु जी का पूरा लेख पढिये और अपने विचार व्यक्त कीजिये.

वाहिद अली 'वाहिद' की गजल पढिये. जाकिर अली 'रजनीश' जी ने प्रस्तुत किया है. वाहिद साहब लिखते हैं;

चले आओ कि ये तन्हाइयाँ आवाज़ देती हैं।
भरी आँखों की वो रानाइयाँ1 आवाज़ देती हैं।

वो जीने से उतरती चूडियों की हल्की आवाज़ें,
वो आधी रात की रूसवाइयाँ आवाज़ देती हैं।

तुम्हारा देर तक झूले पे ठहरा ग़मज़दा चेहरा,
हज़ारों दर्द की शहनाइयाँ आवाज़ देती हैं।

वही मधुवन, वही झूले, वही सावन, वही बारिश,
तुम्हारी याद की पुरवाइयाँ आवाज़ देती हैं।

मुझे हर बार लगता है बिछड़ के अब नहीं मिलना,
मगर फिर प्यार की परछाइयाँ आवाज़ देती हैं।


ताऊ जी के साथ रंजन जी की तीन-पांच पढिये. परिचयनामा में आज जानिए रंजन जी को. इस परिचयनामा की भूमिका बांधते हुए ताऊ जी ने लिखा;

"पिछले दो सप्ताह से कुछ पेशेगत व्यस्तता ऐसी रही कि ब्लागिंग को जितना समय देते आये थे उतना नही दे पाये. इसी चक्कर मे कुछ समय के लिये परिचयनामा को भी क्षमायाचना सहित विराम दे रहे हैं. जैसे ही आये हुये साक्षात्कार हम पुर्ण कर लेंगे, उनका प्रकाशन होता रहेगा.

इसी व्य्स्तता के बीच एक रोज श्री रंजन का फ़ोन आया कि - ताऊ मेरा हैप्पी वाला बड्डे है आप आजावो. उनके निमंत्रण मे ऐसी कशिश थी कि हम दौड पडे. और उनका हैप्पी बड्डे मनाया. यहां तक तो सब ठीक था. पर आपने देखा होगा कि खुजली वाला कुत्ता जब तक अपने शरीर को खुजा नही लेता उसको चैन नही पडता. वैसे ही ताऊ भी किसी से मिले और इंटर्व्यु ना ले तब तक ताऊ को भी चैन नही पडता. सो हमने श्री रंजन को ही पकड कर इंटर्व्यु लेना शुरु कर दिया."


अब इंटरव्यू के सवाल और जवाब आप ताऊ जी के ब्लॉग पर पढिये. रंजन जी का इंटरव्यू बहुत बढ़िया हुआ है.

न्यूज चैनल वाले राखी की बात पर क्या कर बैठे, यह बताया है कीर्तिश भट्ट जी ने. देखिये;

मंहगाई केवल अर्थशास्त्रियों को ही व्यस्त नहीं रखती. कवि और शायर भी व्यस्त हो जाते हैं. एम वर्मा जी की गजल इस बात को दर्शाती है. वे लिखते हैं;

दुर्लभ काले घोड़े की नाल हो गए
तुम अब तो अरहर की दाल हो गए

वर्मा जी का ब्लॉग सुरक्षित है. ऐसे में आप पूरी गजल उनके ब्लॉग पर ही पढें. यहाँ क्लिकियायें. वहां पहुँच जायेंगे.


आज के लिए बस इतना ही.

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14 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा चुनाव रहा.. मस्त चर्चा.. बधाई

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  2. "भाई भी यह जानते थे कि बहन को अपने जन्म के परिवार से केवल और केवल स्नेह ही मिलना है और कुछ नेग और कुछ नहीं।" आज के ज़माने में स्नेह और नेग भी मिल गया तो गनीमत है!


    दुर्लभ काले घोड़े की नाल हो गए
    तुम अब तो अरहर की दाल हो गए
    पहले राखी सावंत थे, अब टेड़ी चाल हो गए:)

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  3. मस्त चर्चा स्वस्थ चर्चा
    ---
    'विज्ञान' पर पढ़िए: शैवाल ही भविष्य का ईंधन है!

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  4. तुम तो अब अरहर की दाल हो गए।
    नेता और व्यापारी माला-माल हो गये।।

    सब्जी आसमान को छूती,दाल हो गयी बन्द।
    खाने वाले दाल-भात को, हो गये मूसरचन्द।।

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  5. वाह लाजवाब चर्चा. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  6. vaise toh main tippani nahin karta hoon,

    par aaj ye kahna hi hoga ki aapne anya charchakaron ko

    aaj ki charcha ke dvara peechhe chhod diya.

    शुभकामनाएं.

    :)

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  7. अरे!
    इस चर्चा मे मेरी भी गज़ल ने स्थान पाया. धन्य हुआ

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  8. वाह भई वाह!
    अरहर की दाल,
    अब करती है कमाल
    एक भाई ने राखी के उपहार में
    दस किलो अता किए
    अरहर की दाल
    बहन हो गयी निहाल

    बोलो, अरहर महादेव।

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  9. जय हो। कर दिये न शानदार चर्चा।

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