शुक्रवार, अगस्त 07, 2009

राखी का भविष्य क्या होगा ?

अभी हाल फिलहाल ही राखी का स्वयम्वर निबटा है, मीडिया-पुत्री की स्गाई और स्वयम्वर पार्ट टू की खबरों के बीच एक राखी और आ गयी।इसलिए हमने यह सोचा ही न था कि जब घुघुती जी राखी के भविष्य की बात कह रही हैं तो यह कौन सी वाली राखी है? दोनो ही का भविष्य हमारे लिए दिलचस्प है!

आर अनुराधा के राखी , माने रक्षाबन्धन की ज़रूरत और बदलते सम्बन्धो पर ध्यान दिलाने के बाद , घुघुती जी ने इसका एक अन्य व्यावहारिक पक्ष भी दिखाया।इसे निभाया ही कितना जाता है?

मौसेरे, ममेरे,चचेरे भाइयों को राखी भेजना या बाँधना भी एक विकल्प है किन्तु कितने कम उम्र भाई अपनी दूर की बहनों की यत्न से भेजी राखी का जवाब भी देते हैं? ऐसे में यह सिलसिला एक ना एक दिन टूट ही जाता है। जो बच्चे साथ पले बढ़े नहीं उनपर जबर्दस्ती स्नेह थोपा नहीं जा सकता। जैसे जैसे परिवार दूर दराज के शहरों में जाकर बसेंगे इन रिश्तों की गर्माई अगली पीढ़ी तक रख पाना कठिन तो होता ही जाएगा। या फिर एक विकल्प दिनेश द्विवेदी जी का दिया हुआ है कि इसे विश्च बंधुत्व का रूप दे दिया जाए।

फिर भी बड़ों की तरह तरह की बातों और विमर्शों की गहमागहमी से दूर छोटे बच्चे इसका मज़ा ले ही लेते हैं।जैसे इन छोटे नवाब ने लिया।इन्हे न रक्शा का मतलब पता है न बन्धन के मायने :) इन्हे तो सीधा बैठाना ही अभी मुश्किल है!देखिए फिर भी जनाब का अपना चिट्ठा है।

छोटे मियाँ को कहा जाए कि इतना बढिया पत्र लिखने वाली अपनी दीदी का भी वे ब्लॉग बनवा दें !


अपने बचपन की एक बात पीडी की पोस्ट से याद आ गयी।गयी।जब 5 साल की ही थी।दीदी को बुखार था और उसका मन कैम्पा पीने का हुआ(तब इसी नाम से कोला मशहूर थी)।हम जा पहुँचे।दूकानदार जानता था सभी परिवार वालों को।मुझसे पूछा -तुम किसकी बहन हो ? (अब हमें सिखाया गया था कि जिसे जानते नही उसे अपनी सूचनाएँ नही दिया करते) हम मुश्किल मे पड़ गए।वह अजनबी भी नही था और हम उसे जानते भी नही थे।सो हमने अपनी अक्ल के घोड़े दौड़ाए और जवाब दिया -"अपनी बहन की बहन हूँ" । हम होशियारी मे फूलते हुए घर वापस आए लेकिन बाद मे यह किसा मशहूर हो गया । पीडी की पोस्ट भी ऐसा ही एक किसा कहती है -
दीदी कि छोटी बिटिया, अपूर्वा जो लगभग ढ़ाई साल की है, से ये कुछ सवाल मैंने अलग-अलग तरीके से किये तो मुझे अलग-अलग तरह के जवाब भी मिले.. पहला जवाब आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं.. दुबारा पूछने पर यह जवाब मिला..

- अप्पू, तुम्हारा नाम क्या है?

- अप्पू..

- पापा का क्या नाम है?

- पापा..

- मम्मी का क्या नाम है?

- मम्मी..

- दीदी का क्या नाम है?

- दीदी..

_____________
आवेश कहते हैं - "स्वतंत्रता और निजता दोनों साथ साथ नहीं रह सकते" न केवल यह वाक्य व्याख्या सापेक्ष है वरन यह पोस्ट भी बेहद बहस तलब है।लिंक देकर इस पोस्ट की चर्चा को आगे बढाना चाहिए।ताकि भ्रम न बना रहे किसी भी मुद्दे पर क्योंकि ब्लॉगजगत मे प्रश्नचिह्नित पोस्टस
की संख्या बढती जा रही है ।
आफ्टर ऑल ,हर शख्स इस शहर मे परेशाँ सा क्यों है ?
देखिए -





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13 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर। राखी के बहाने अच्छी चर्चा की। बहुत दिन से नोटपैड पर कोई पोस्ट नहीं दिखी! ऐसा क्यों? नोटपैड पर भी लिखना जारी रहे।

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  2. सुन्दर! राखी के बहाने राखी को याद कर लिया पर याद रहे कि अब उसका मंगेतर भी साथ है:)

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  3. बहुत सुन्दर चर्चा..

    अनुप जी के साथ मेरी भी request है.. नोटपैड हमें भी बहुत अच्छा लगता है..

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  4. बहुत सुन्दर चर्चा।क्या खूब...।

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  5. बहुत दिनों बाद नोटपैड का प्रकटन हुया। चर्चा रही अच्छी

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  6. अहम राष्ट्रीय व साँस्कृतिक मुद्दे हैं.. दोनों राखियाँ !
    इस पर शायद ही कोई बहस करना चाहे... क्योंकि परिवर्तन के बहाव को हम स्वयँ ही दिशा नहीं दे पा रहे हैं.. या कहिये कि दिशा देना ही नहीं चाहते । पर, अहम राष्ट्रीय व साँस्कृतिक मुद्दे हैं.. दोनों राखियाँ ! दोनों में ही उपभोक्ता कहीं कोने में छिपा हुआ है ... उसको खुले में लाने की चाह, जो न करवा दे !

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  7. संक्षिप्त लेकिन अच्छी और सुंदर चर्चा।

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  8. आपकी चर्चा हमेशा संक्षिप्त और संतुलित होती है -नोटपैड का पेज है न आखिर !

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  9. सुन्दर चर्चा के लिए साधुवाद. :)

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  10. अमर कुमार जी का कहना " दोनों में ही उपभोक्ता कहीं कोने में छिपा हुआ है ." गहरा अर्थ रखता है .मैंने घघूति जी की पोस्ट अभी पढ़ी नहीं है पर एक बात जो मैंने दो दिन पहले महसूस करी वो ये की हिन्दू धर्म में रिश्तो की अहमियत ओर प्यार को स्नेह से बंधने के लिए जिस तरह से ये त्यौहार है दुनिया के दूसरे देस्शो में कम मिलते है ये बात ओर है की हम इंसानों ने इन रिश्तो में अपने मतलब के लिए घुसपैठ कर ली है ..पर एक बार ठंडे दिमाग से ओर सच्चे मन से देखे तो कितना प्यारा त्यौहार है .हम भाई तो आपस में ईष्या करते है की भाई के लिए कोई त्यौहार क्यों नहीं है .वैसे भी अब जरूर हिन्दुस्तानी घरो में "आई लव यू "कहा जाने लगा पर बीसियों साल पहले तो कोई कहता नहीं था .भाई बहन ओर पिता से भी नहीं ...कई गहरो में तो अब तक नहीं कहा जाता .ऐसे में ऐसे त्यौहार कितने अच्छे है ..इनके पीछे कई कांसेप्ट है ..कभी भारतेंदु हरिश्चंद ने भारत के हर त्यौहार के पीछे के साईंनटीफिक कांसेप्ट बताये थे .मसलन दीवाली के बहाने ..घर की सफाई ..रामायण के बहाने बच्चो को नैतिक शिक्षा ....ससुराल में पहुँच कर लड़की को ऐसा न लगे की वो अकेली है...उसका मायका उसे भूल गया ...ओर पहले हिन्दू जायदाद में लड़की को कुछ नहीं मिलता था .इस बहाने अनेक त्यौहार ...
    खैर .....

    दूसरी राखी .राखी सावंत का मुझे इसलिए दुःख है क्यूंकि इसमें वो चैनल शामिल है जिसे मै थोडा बेहतर समझता था ..सरोकार पीछे छूट रहे है .ओर खबरों में वे लोग आ रहे है जो वाहियात किस्म के लोग है .....

    आखिर में अनूप जी की बात पर गौर फरमाए ....

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