रविवार, सितंबर 03, 2006

तरकश के नये तीर

कल का दिन हिंदी ब्लाग जगत में एक नई शुरूआत का रहा। तरकश ने अपने सामूहिक ब्लाग की अभिनव शुरूआत की। इसमें समीर,निधि,रवि कामदार, सागर चंद नाहर, संजय बेंगानी तथा पंकज बेंगानी जैसे धुरंधर लेखक शामिल हैं। जीतेंद्र, ई-स्वामी देबाशीष तथा विशाल पाहूजा के सहयोग से तैयार तरकश के सारे तीर प्रभावशाली हैं। तरकश की पूरी टीम को नयी शुरुआत के लिये बधाई!

समीरजी जहाँ तरकश में सजनियाँ बुढ़ाय गयली हमार जैसा मारक व्यंग्य लिख रहे हैं वहीं कुंडलिया लिखते लिखते हायकू पर भी उड़नतश्तरी घुमाना शुरू कर दिया:-
शर्तों की बुनियाद कभी भी, रिश्तों का आधार नही है
खुद की हस्ती बेच बेच कर, उसको साथ निभाते देखा.

वाह रे देश
गरीबी पाती भूख
मूर्ति को दूध.

बाढ़ का नाच
लाशों की बिछी सेज
नेता की ऎश.

इंटरनेट को गावों तक पहुँचा रहे हैं अनुनाद सिंह तो लालू की लीला दिखा रहेहैंडा.प्रभात टंडन।

नामचीन लेखक मोहनदास नैमिशराय द्वारा संपादित पत्रिका का हाल बयान कर रहे हैं रवि रतलामी जो कि रचनाकार में प्रख्यात कवि-पत्रकार स्व.रघुवीर सहाय की प्रसिद्ध कविता हंसो-हंसो जल्दी हंसो पढ्वा रहे हैं:-
हँसो तुम पर निगाह रखी जा रही है
हँसो अपने पर न हँसना
क्योंकि उसकी कड़वाहट पकड़ ली जाएगी
और तुम मारे जाओगे
ऐसे हँसो कि बहुत खुश न मालूम हो
वरना शक होगा
कि यह शख्स शर्म में शामिल नहीं
और मारे जाओगे हँसते हँसते।

विजय वाडनेरे अपने दोस्तों के लिये कुलबुला रहे हैं तो उधर डा.सुनील दीपक सांस्कृतिक विभिन्नता का जायजा ले रहे हैं।
प्रियंकर अपनी कविता में अपनी जरूरतें बताते हुये लिखते हैं:-

पैंट के साथ कमीज़ चाहिए
कमीज़ के साथ शमीज़
आकाश को मापने का हौसला चाहिए
इस महामंडी में मिल सके तो
चाहिए पृथ्वी पर मनुष्य की तरह
रहने की थोड़ी-बहुत तमीज़

नितिन बागला पूछते हैं आप कैसे जीते हैं तो
उधर शोयेब सी.डी.वगैरह को अलविदा कर देते हैं।
प्रभाकर पाण्डेय महापुरुषों की बातें बताते हुये कहते हैं:-

बिना बैल के खेती करना,
बिना वर देखे लड़की की
शादी करना,अपना धन दूसरे
के हाथ में देना अच्छा नहीं होता.

सृजन शिल्पी जी ने अनुवाद करने के गुर बताते हुये सबसे महत्वपूर्ण जानकारी देते हुये बताया:-
सबसे अच्छा अनुवाद वह है जिसमें अनुवाद की गंध तक नहीं हो ताकि पाठक को ऐसा लगे कि वह मूल कृति ही पढ़ रहा है।


मसिजीवी ने दिल्ली में ब्लागर मीट की सूचना दी थी अब उसके विवरण का इंतजार है तो लीजिये हाजिर है विवरणइंडिया गेटपर बीजेपी की नयी पौध दिख रही है तो उधर मेहरौली में सदियों से मौसम का मुकाबला करता खडा जंग रहित इतिहास का गवाह:लौह स्तम्भ । सागर चंद नाहर परिचय देते हैं एक और गुमनाम से हो गये ऐतिहासिक व्यक्तित्व जयकृष्ण इन्द्रजी ठाकर का तथा बताते हैं हिंदी के कुछ उपयोगी जुगाड़ी लिंक
मुन्ना भाई के बाद उसकी दूसरी फ़िल्म भी जानदार है यह जानकारी देते हैं नितिन बागला तथा निठल्ले चिंतन वाले साथी । इधर बात फ़िल्मों की हो रही थी उधर लोग गपशप करते हुये प्रभात डबराल
के घर पहुंच गये।
रत्नाजी अपनी नयी कविता में लिखती हैं:-

तपती धूप जो सह न पाए
वो क्या साथ निभाएगा
रूप-रंग है चार रोज़ का
सब दिन गुण काम आएगा।।


रवि रतलामी को नया कैमरा क्या मिला वे राम-रावण का फ़र्क ही मिटाने पर तुल गये । आशीष गुप्ता
चंदामामा के बहाने बचपन में पढी गयी पत्रिकाऒं को याद करने लगे तो अतुल गूगल मैप में कानपुर तलाशते पाये गये। छायाजी
बिना यह बताये कि वे कहां थे तथा कहां जा रहे हैं अपने प्रस्थान सूचना जारी कर दी ।

अपने भ्रमण अभियान के दुखद अंत के बारे में बताते हुये अमित ने अपनी अति उत्साही मित्र को खो देने का मार्मिक
विवरण किया है-बादलों के उस पार में.
पति एक आइटम होता है बताते हुये फ़ुरसतिया कहते हैं:-

सुरुचि पूर्ण तथा सौंदर्य प्रेमी पत्नियों के पति की हालत तो अमेरिका के हत्थे चढ़ गये सद्दाम हुसैन की तरह होती है। वे उसके बाल खींचते हुये काढ़ती हैं, पाउडर इस तरह लगाती हैं जैसे अमेरिका में भारतीयों की जामा तलाशी होती है। पहने हुये कपड़े उतरवा कर दूसरे पहनाने के बाद इससे अच्छे तो वही पहन लो की प्रक्रिया अक्सर दोहराती हैं। सफेद होते बालों वाले पति की पत्नियाँ तो शायद यमराज को भी डाँट के भगा दें कि अभी रुको उनके बाल डाई करके तैयार कर दें तब ले जाना । ऐसे बिना तैयार हुये इनको कैसे भेज दें ।


नये ब्लाग:- प्योली ने हिंदी में लिखना शुरू किया है। पहली कविता की कुछ पंक्तियां है:-
सूरज से अब तो
सारी उम्र का करार है
मन्ज़िल मिले ना मिले
सफर से मुझे प्यार है


सागरजी ने अपना ब्लाग शुरु करते हुये लिखा:-
भाषा की आक्रामकता अपनी व्‍यक्‍तित्‍वहीनता को छुपाने की कोशिश है।


इसके पहले से ही लिखना शुरू कर चुके ,प्रख्यात पत्रकार नचिकेता जी ने अपने संस्मरण हिंदी में लिखना शुरू किया है.आशा है कि सागर जी ,नचिकेता जी तथा स्वाती हिंदी में नियमित लिखती रहेंगे.


आज की टिप्पणी

:-
गुरुदेव,

आपके इस लेख में हास्य व्यंग्य और सामाजिक सरोकारों पर आपके विचार सबकुछ संतुलत है! मजेदार तो है ही! लेकिन बस एक बात ने कुछ भावुक कर दिया है.

कुछ और आधुनिक वर-पिता सारा पैसा एक साथ न लेकर किस्तों में भुगतान पसंद करते हैं। समझदार होने के नाते वे ऐसी बहू के रूप में ऐसी मुर्गी लेना पसंद करते हैं जो ताजिंदगी निरंतर बड़े होते अंडे देती रहे। ऐसी मुर्गी को लोग काम-काज वाली बहू तथा पति नामक प्राणी ‘वर्किंग वूमैन’ कहते हैं।

एक बार जीतू नें आत्मनिर्भर पत्नी की चाह को “खुद तो गुरद्वारे का लंगर खा आना मेरे लिए भी बंधवा लाना” टाईप कुछ करार दिया था. इस बार मैंने आपके लेख में आत्मनिर्भर पत्नी की चाह पर ‘कमाऊ मुर्गी’ से विवाह करने की समझदारी का दर्शन देखा. कई श्याने लोगों पर फ़िट भी होता होगा ये, लेकिन ब्लाग पर लिखने के बजाए यहीं कुछ शेयर करता हूं -

हम सब अपने अनुभवों और भयों के बने होते हैं. मैं बहुत छोटा था - मेरी मौसीजी का शादी के कुछ समय बाद ही तलाक हुआ और उन्हें फ़टाफ़ट अपने पैरों पर खडा होना पडा - ३ माह का बच्चा था गोद में. वे किस अज़ाब से गुज़रीं अपने आप को स्थापित करने में मैने देखा था. आज अपने भूतपूर्व पति से ज्यादा सफ़ल और सक्षम होंगी.

कुछ वर्ष पूर्व मेरी बहुत पढीलिखी कज़िन के पति (जो एक सफ़ल व्यवसायी इंजीनियर थे) एक कार दुर्घटना में चल बसे. कज़िन विवाहपूर्व काम करती थी. उसी एक्सिडेंट में टूटी अपनी टांग पर लैब्स में घंटो खडे रह कर काम करती अब वो एक मल्टीनेशनल कंपनी में वैज्ञानिक के पद पर आसीन है - मेरे जिजाजी के देहांत के समय कज़िन की बिटिया २ बरस की थी. विवाह के पश्चात कज़िन ने काम करना बंद कर दिया था - उसने कहा काश मैं विवाह के बाद भी काम करना ज़ारी रखती तो नौकरी ढूंढने में दिक्कत ना होती. अगर वो विवाहपूर्व काम ना कर रही होती तो उसे मौसी के समान कितनी समस्या आती अपने पैरों पर खडे होने में!

इन दोनों केस में माता-पिताओं के पास किसी चीज की कमी नही थीं - लेकिन इनका आत्मसम्मान आत्मनिर्भरता चाहता है और उन में हमेशा सम्मान से जीने का बौद्धिक और भावनात्मक दम देखकर उन पर असीम गर्व महसूस करता हूं!

मेरी पत्नी विवाह पूर्व काम करती थी. विवाह के बाद हमारी यायावरी के चलते काम नही किया. फ़िर कुछ वर्ष पश्चात अब दोबारा कार्यरत है. उसके लिए काम करने की वजह पैसा कतई नही है. अपनी उच्च शिक्षा का सदुपयोग और बौद्धिक कार्य करने का सुख पाना है. लेकिन अपने अनुभवों और भयों का गढा मैं इसे किसी और वजह से सही मानता हूं. पति अच्छा हो या बुरा दोनो केस में पत्नी को आत्मनिर्भर होना चाहिए!

फ़िर सोसाईटी देखिए आप देस की! बालीवुड की फ़िल्मों की कसम, अपनी सोच है की पति के असमय मरने पर ६६ बरस का लाला नवविधवा को मदर इंडिया स्टाईल में “रानी बना के रखुंगा” टाईप डाईलाग ना मार सके इसलिए और वो अपनी जिंदगी मनपसंद तरीके से चला सके इसलिए ही सही पत्नी को काम करना चाहिए - चाहे पति करोडपति हो. ये सीधे आत्मनिर्भरता और घर से निकल कर समाज में रोज़ उठने बैठने से आए आत्मविश्वास का मामला है. जैसा की मैने कहा - इसे मेरा भय कह लें या अनुभवों से जला छांछ भी फ़ूंक कर पीता है वो केस - मज़ाक तो किसी भी चीज का बनाया जा सकता है लेकिन किसी ना कमाने वाली विधवा के लिए स्तिथितों की भयावहता क्या हो सकती है उसका अंदाजा भी हमारे समाज को करना चाहिए!

राजीवजी के निधन के बाद सोनियाजी और लालूजी के आरामकाल के दौरान राबडीजी को अचानक ‘वर्किंग वुमन’ हो चुकने में कितनी दिक्कतें आईं! इंदिराजी के समान शुरु से प्रेक्टिस रहती तो आसानी होती ना राज करने मे भी! साला बुरा वक्त कह कर नही आता और ये सोच कर ही मुझ जैसे लोग आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी साथी चाहते हैं - उसकी कमाई के लिए नहीं!
ई-स्वामी

आज का फ़ोटो


आज का फ़ोटो अमित की ब्लागपोस्ट बाद्लों के उस पार भाग-३ से साभार.
मंदाकिनी
गंगा तेरा पानी अमृत

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6 टिप्‍पणियां:

  1. तरकश की साइट पर कोई समस्या नहीं थी. पता नही आपको कैसे समस्या हुई. जो भी हो मुझे खेद हैं. आशा हैं अब आप तरकश के ब्लोगो पर जा पा रहे होगें.

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  2. क्या खूब मजाक की, सागर चन्द जैसे धुरन्धर लेखक......? हा हा हा

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  3. अच्छा मजाक किया आपने,
    इन धुरंधरों की श्रेणी में मुझे भी रख दिया :) बस हम तो तुक्का बाजी करते रहते हैं, इन लेखकों से अभी बहुत कुछ सीखना है, इसी वजह से मैं इस टीम में शामिल हुआ हुँ।

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  4. हां,अब सारे ब्लाग खुल रहे हैं। सबेरे खुल नहीं रहे थे। मुझे समस्या कोई नहीं हुई। मैं कल ही इसे देख चुका था। एक बार फिर से आप लोगों को इसके लिये बधाई!

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  5. पंडित जी ,
    कविता मन से नहीं पढ़ी . अदबदा कर एक लाइन की टिप्पणी दे मारी . दरअसल यह कविता 'चाहिए' के ही तो खिलाफ़ है .चाहिए के साथ संयुक्त हो कर बहुत कुछ अनचाहा भी मिलता है . यह एक युग्म है . एक को चुनने के बाद आप दूसरे को न चुनने के लिए स्वतंत्र नहीं रह जाते . यही तो बौद्ध दर्शन का प्रतीत्य समुत्पाद कहता है . बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा प्रायोजित उपभोक्तावाद और सांस्कृतिक प्रदूषण को प्रतीत्य समुत्पाद के माध्यम से ही समझा जा सकता है.
    जानता हूं आपको समय की कमी रहती है पर कविता गद्य से थोड़ा अधिक समय और अवधान चाहती है.
    वैसे आपने नज़र डाली इसके लिए आभार .

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  6. प्रियंकरजी,
    आपकी टिप्पणी पढ़ी। आपकी बात सही है। ऐसा नहीं है कि आपकी कविता का मंतव्य नहीं समझा था या हड़बड़ी में लिखा । चिट्ठाचर्चा में मेरा प्रयास यही रहता है कि लोग आपके चिट्ठे को पढ़ें। इसीलिये कविता का जो सबसे आकर्षक समझ में आने वाला हिस्सा है वह लेकर उसके बारे में जानकारी दे दी। कविता का कड़ी भी है। इसके बाद यह माना जाता है कि पाठक आपकी कविता पढ़ेगा। अपनी धारणा बनायेगा। वैसे भी कविता के बारे में रमानाथ अवस्थी जी ने लिखा है:-
    मेरी कविता के अर्थ अनेकों हैं,
    तुमसे जो लग जाये लगा लेना।

    तो आपकी कविता का जितना अर्थ मुझे समझ में आया उतना लगा दिया। बाकी का पाठक के लिये छोड़ दिया। उसके बाद आप तो हैं ही हड़काने के लिये। बहरहाल आगे प्रयास किया जायेगा आपकी कविता का अर्थ समझने में कुछ और सजगता बरती जाये।

    अनूप शुक्ला

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