बुधवार, सितंबर 27, 2006

तुम मेरे साथ रहो...

थोडे से मिल पाये हैं, फिर से चिठ्ठे आज
गली गली मे घूमते, हम तो थे दिन रात.
हम तो थे दिन रात कि बिल्कुल सो न पाये
जहां जहां भी पहुँचे, वहां इतिहास ही पाये.
कहे समीर कि नारद जब से साथ हैं छोडे
पढने के लिये चिठ्ठे भी, रह गये हैं थोडे.

--समीर लाल 'समीर'

सुबह सुबह ही सागर भाई ने एक दुखद समाचार दिया.

'मीरा बाई के भजन के नाम से लिखने वाली चिट्ठाकार और मेरी पत्नी श्रीमती निर्मला सागर की बुवा की १६ वर्षीय पुत्री निशा का आज सुबह सूरत में प्रात: १०.०० बजे निधन हो गया।
समस्त चिठ्ठा परिवार की ओर से हम परम पिता परमेश्वर से मृत आत्मा की शान्ति हेतु तथा सब परिजनों को इस दुखद घडी को सहने की शक्ति प्रदान करने के लिये प्रार्थना करते हैं .

आगे बढे तो नितिन बगला अपनी इन्द्र धनुषी खानपान की व्यथा कथा लिये पूरी रसोई बिगराये बैठे थे और एक से एक व्यंजनो की याद मे आंसू बहा रहे थे:

'और हाँ, कुछ चीजें जिनकी खूब याद आती है..गरमागरम पोहा-जलेबी, दाल-बाटी, सादा रोटी-सब्जी '
आधा दर्जन से भी दो अधिक ज्यादा लोग उन्हे ढाढस बंधाते नजर आये.

अब खाने की बात चली, तो लक्ष्मी जी भी पालक के बिछोह मे टेसू बहाते नजर आये:

धोने से नहीं धुलता है,
उबालने से नहीं उबलता है,
अजर अमर यह बैक्टीरिया
हमें बीमार करता है।
पालक प्रेमियों पर आफ़त आई है।


खैर हम तो खुश हैं, इसी बहाने पालक से बचे, नही तो हरी सब्जी की दुहाई देकर बनाने मे सबसे सरल आईटम हफ्ते मे दो बार तो टिकाया ही जा रहा था हमारे घर पर.

उधर उन्मुक्त जी अपने वही शिगुफाई अंदाज मे आवाज लगाते दिखे:

The week मनोरमा ग्रुप के द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी की पत्रिका है। इसके सबसे नये अंक (सितम्बर २५ – अक्टूबर १) के अंक में ब्लौगिंग के ऊपर लेख blogger's park निकला है। इसमें इस बात की चर्चा है कि हिन्दुस्तान में अंग्रेजी में चिट्ठे लिखने वाले कैसे पैसा कमा रहें हैं। क्या हिन्दी चिट्ठेकारों के भी दिन फिरेंगे।

अब अभी तो फिरे नही हैं, जब फिर जायें तो आप तो हईये हैं बताने के लिये, तब हम भी लाईन मे लग जायेंगे. तब तक जैसा चल रहा है वैसे ही हांके हुये हैं.

रास्ते मे ही जीतू भाई जुगाड लिंक मे एक ठो जुगाड लिये खडे थे, बिल्कुल सरकारी हिसाब किताब सा, एक जुगाड बताने के लिये एक पूरा पन्ना निपटा दिये. उससे ज्यादा तो उसे यहां कवर करने को लिखना पड रहा है. खैर, छोडा जाता है क्योंकि जुगाड है बेहतरीन.

शैलेष भारतवासी पता नही क्या क्या नाप रहे थे, आप खुद ही देखें:

सागर की सीमा
आकाश की ऊँचाई
और पाताल की गहराई
भी नापी जा सकती है


सुनील दीपक जी सबके सामने बडी गहरी बात करते हुये मिले:

बहुत साल पहले अभिनेत्री नीना गुप्ता ने अपने बिन ब्याही माँ होने की बात को खुले आम स्वीकार किया था. केवल किसी एक के कहने से, सब के सामने खुल कर आने से समाज नहीं बदलता, पर शायद उससे बहुत से लोग जो उस स्थिति में छुप कर रह रहे हैं, उन्हें थोड़ा सहारा मिल जाता है कि वह अकेले नहीं.

अनुभूति कलश पर डा.रमा द्विवेदी गीत गा रही हैं:

तुम मेरे साथ रहो घर में उजाला बनकर,
यूं मुझे दर्द न दो दिल का अंधेरा बनकर.


मन की बात पर शरद ऋतु का आन्न्द और हर्षोल्लास मिला:

सच में शरद उल्लास का समय है। त्योहारों और उत्सवों की रौनक़ मन -हंस को भू-सरोवर में प्रकृति के सुंदर दृश्य रुपी मोती चुगवाती है।

जन्म दिन मनाने का एक और नजरिया देखने को मिला क्षितिज कुलश्रेष्ठ से:

काश २४ या २५ साल की उम्र के बाद ये बढ़ना रुक जाए तो कितना अच्छा हो। उससे पहले मैं जल्दी बड़ा होना चाहता था। अब २७ के साथ लगता है कि ३० कितना करीब है।

राज वाकई एक अकेला इस शहर मे लगने लगे हैं, और बारीश के चक्कर मे पडे हैं और लगे गाना सुनाने.

गरम चाय के साथ लुत्फ उठाया गया पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ की किताब पर बातचीत करते हुये:

"क्या राष्ट्रपति को ऎसे राष्ट्रीय रहस्यों का खुलासा करने का अधिकार है जो कानूनन 30 वर्षों तक बाहर नहीं लाए जा सकते? जाहिर है, उनकी बातें एकपक्षीय होंगी और जिन बातों के बारे में उन्होंने लिखा है वे पुख्ता सबूत तथा दस्तावेजों के अभाव में विवाद को जन्म देंगीं।"

और यात्रा की अंत मे हितेन्द्र ने तिरछी नजरिया से कुछ जानी मानी हिन्दी कवितायें सुनाई.


आज की टिप्पणी:
रवि रतलामी--> छुटपुट पर:

दरअसल, मैंने जो कुछ भी नया प्रयोग अपने चिट्ठे में पैसे कमाने हेतु - बड़े ही एग्रेसिव अंदाज में विज्ञापनों को चिपकाने का किया है जिससे कई चिट्ठाकार बंधु इत्तेफ़ाक नहीं रखते, अमित अग्रवाल की साइट से प्रेरणा लेकर तथा उसमें दिए गए युक्तियों के आधार पर ही किया है.
हाँ, सामग्री की बात है, तो वह धीरे से आएगी. और यह भी तय है कि आपकी सामग्री अगर ठीक नहीं होगी तो पाठक बेवकूफ़ नहीं है जो आपको पढ़ने के लिए दोबारा आएगा.
मेरी कोशिश जारी है….

संजय बैगाणी इसी को आगे बढाते हैं:

पैसा कमाने के लिए पहले इस क्षेत्र को थोड़ा विकसित भी करना होगा. बीजो की बुवाई करो, सिंचाई करो फिर काटो वाला सिद्धांत यहाँ भी लागु होता हैं.

आज का चित्र:

पुनः सुनील दीपक, छाया चित्रकार की डायरी से:


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4 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया चर्चा की है आपने समीरलालजी.आप अपनी कुंडलियों में दिन पर दिन माहिर होते जा रहे हैं और अब तो एकदम्मै उस्ताद टाइप हो गये हैं.लगे रहो समीर भाई.

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  2. बुधवार की चिट्ठाचर्चा की जिम्मेदारी समीरलालजी कि है, यह बराबर याद रहता हैं क्योंकि शुरूआत में ही गर्मागरम जलेबी (कुण्डली शब्द का स्वादिष्ट विकल्प) खाने को मिल जाती हैं.
    समिक्षा की आपकी इस्टाइल के हम कायल हैं.

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  3. आप कुंडलीयाँ हर विषय पर कैसे जोड लेते हैं? मैने तो कुण्डलियाँ जैसी चीज होती भी है यह भी यहीं से सिखा.

    खैर ढुंढ-ढुंढकर चिट्ठो की खबर देने के लिए बहुत धन्यवाद

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  4. समीर जी, आप ही से प्रेरणा लेकर आप सब 'चिट्ठा- चर्चा'लिखने वाले लेखकों के लिये ये पन्क्तियाँ लिखी हैं--"रात को चिट्ठा लिखकर के, सुबह यहाँ वो आये,
    ये चर्चा देखे बिना उससे रहा न जाए,
    अपनी चर्चा देखकर मंद-मंद मुस्काए,
    पढकर फिर चलता बने,
    टीप्पणी से कतराए!!
    आप सब का धन्यवाद,सुरूचिपूर्ण प्रस्तुति के लिये..

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