शुक्रवार, सितंबर 01, 2006

तुम मिलो या न मिलो, तेरी याद मेरे दिल में है

आजकल दुनिया का सारा काम ठेके पर हो रहा है। अवैध अतिक्रमण ठेके पर,पढ़ाई ठेके पर, चुनाव खूबसूरती के ठेके पर यहाँ तक कि दुनिया की कोतवाली भी ठेके पर। ठेका राग अलापते हुये बिहारी बाबू
बताते हैं:-

दुनिया के अमन-चैन की स्वघोषित ठेकेदारी अमेरिका के पास है। परिणाम देखिए कि पूरा विश्व अशांत है। हालत ई है कि कोतवाली करते-करते कोतवाल सनकी हो गया है। कहियो यहां बम फोड़ने की पलानिंग करता है, तो कहियो वहां। स्थिति उसकी खराब है औरो परेशान बेचारा एशियाई दिखने वाला लोग हो रहा है। सोचिए, अगर अमन-चैन की ठेकेदारी उसके पास नहीं होती, तो विश्व कितना अमन-चैन से रहता।


जगदीश भाटिया ने पहले तो जीवन बीमा के बारे में बताया फिर सीधे मुन्ना भाई से बतियाते हुये उनको चिट्ठों के बारे में बताने लगे। अब मुन्ना भाई को चिट्ठे की क्या समझ!वो क्या समझा ये आप खुद देखिये अपने आईने में-ई-झप्पी के साथ।

डा.प्रभात टण्डन ने वायरल संक्रमण तथा होम्योपैथी लेख श्रंखला में डेंगू बोले तो हड्डी तोड़ बुखार तथा इन्फ्लुएन्जा के बारे में बहुत सरल भाषा में जानकारीदी है तथा उनके इलाज बताये हैं।

वायरल संक्रमण का भले इलाज हो लेकिन कविता संक्रमण लाइलाज है। देखिये इधर रजनीभार्गव जी ने लिखा:-

जब आँखों से ओझल होता है वो कोना,
तुम उस मोड़ पर नज़र आते हो.
जब बहुत याद आते हो तुम,
सन्नाटे के शोर में गूँजते नज़र आते हो.


इस रजनीगंधा में अगरबत्ती का धुँआ गूंथते हुये अनूप भार्गव कहने लगे:-
तुम सिर्फ़ एक पँक्ति में कुछ इस तरह समाती हो
स्वयं अगरबत्ती सी सुलगती हो मुझ को महकाती हो ।


मियाँ-बीबी का कविता युद्ध होता देख उनके पारिवारिक मित्र राकेश खण्डेलवाल बीच-बचाव सा करने लगे:-

तुम प्रिये आ सामने कुछ इस तरह मेरे खड़ी हो
जिल्द में साकेत के कामायनी जैसे खड़ी हो
मीत मेरे प्राण में तुम इस तरह से हो समाई
घुल गई हो जाम में खैय्याम की जैसे रुबाई


जब उधर अमेरिका में यह सब हो रहा था तब इधर भारत में रमा द्विवेदी जीगुनगुना रहीं थीं:-

तुम मिलो या न मिलो,तेरी याद मेरे दिल में है ।
दिल मेरा बेचैन है क्यों आके बहलाते नहीं…
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं॥

तेरी आंखों में भी हमने प्यार का समन्दर।
कौन सा वो राज़ है जो हमको बतलाते नहीं…
याद करते हैं तुम्हे,बस भूल हम पाते नहीं॥

क्या करें?कैसे करें?तेरे प्यार से शिकवा सनम।
दिल ने है सोचा बहुत पर कुछ भी कह पाते नहीं…
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं॥

तुमको चाहा,तुमको पूजा,क्या खता हमसे हुई?
ऐसा मेरा प्यार है,भगवान भी पाते नहीं…
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं॥


प्रत्यक्षा जी ने अपने बचपन में जो पेंटिंग सीखी वह अब दिखा रही हैं। पेंटिंग के साथ-साथ मास्टर जी का स्केच बहुत अच्छा खींचा है। कविता साथ में है:-

सृजन का ये पहला रंग
हर बार पीडा देता है
और खुशी भी, जैसे
गर्भस्थ शिशु की
पहली चीख , माँ के कानों में,
इस दुनिया में आने पर….


इधर इंडिया गेट पर महामृत्युंजय जाप की तैयारियाँ चल रहीं हैं उधर भारतीय क्रिकेट टीम का लुढ़काऊ कैंप। चैपलासुर पर प्रतिबंध तथावाह रे फैशन
पर लगता है नारद जी का प्रतिबंध लगा है,खुला ही नहीं। राजदीप सरदेसाई की जल्दबाजी के बारे में कुछ जानना हो तो आपको कुछ गपशपसुननी पड़ेगी।वंदे मातरम पर हुई ज्ञानचर्चा लगता है कुछ गंभीर हो गयी है।
संगीता मनराल ने ब्लाग-बेचैनी का जिक्र किया है विचारों को खरगोश मानते हुये।उधर अतुल शर्मा ने स्त्री स्वतंत्रता पर अपना नजरिया बताया है।इसी क्रम में जानिये नये तीर्थ दीदी माँ के बारे में।

सागर चंद नाहर निधि के झांसे में आ गये और मित्र से मिले चित्रों को निधि के सहयोग से दिखाते हुये बोले कि देखिये पति कितने मासूम होते हैं। अब कहीं इन चित्रों पर किसी कानूनची की निगाह पड़ गयी तो कहीं इनपर बाल-विवाह को प्रोत्साहित करने का मुकदमा न ठोंक दे!

वंदे मातरम पर रविरतलामी का मत देखिये तथा क्षितिज कुलश्रेष्ठ का नजरिया भी। नजरिया में वंदेमातरम का भूतपूर्व सांसद आरिफ मोहम्मद खान द्वारा उर्दू किया अनुवाद भी देखिये।

समय के साथ व्यक्ति की रुचियाँ बदलती हैं। अपनी बदलती रुचियों के बारे में बात कर रहे हैं डा.सुनील दीपक:-
अँग्रेजी की पत्रिकाएँ आऊटलुक और द वीक जिन्हें भारत में पढ़ना अच्छा लगता था, कोशिश करता हूँ कि उन्हें पढ़ने के लिए समय नियमित रुप से निकाला जाये, पर समय चिट्ठों मे निकलने की वजह से कभी कभी उन्हे पढ़े भी हफ्ते हो जाते हैं.


दीपक गुप्ता ने अपना ब्लाग समन्वय इसी माह शुरू किया है। मैंने आज पहली बार देखा। केवल दो पोस्टों से ही उनकी सोच,रुझान का पता चलता है । हृषिकेश मुकर्जी के महत्व के बारेमें लिखते हुये वे आधुनिक जीवन के बारे में लिखते हैं:-


आज के अनियंत्रित व्यक्तिवाद ने क्षणिक आनन्द को भले ही बढा दिया हो परंतु जीवन को जैसे पॉपकोर्न बना दिया है । आज हल्ला ज्यादा हो गया है और रुमानियत कम ।


अपने इस बेहतरीन लेख के अंत में वे कहते हैं:-

समय को गढ़ने और प्रभावित करने के लिये अपने समाज की समझ, और उसका हिस्सा होने की अनुभूति चाहिये, फार्म हाउसों में कहानियाँ लिखने वाले करन जौहर नहीं, जो अपने कृत्रिम सच (विकृति) समाज पर थोप रहे हों !


आशा है कि दीपक नियमित लिखेंगे और अपने ब्लाग का शीर्षक समन्वय देवनागरी में करने पर विचार करेंगे।

आज की टिप्पणी:-



1.विचारों को 'सिगरेट के धूयें' की तरह 'अपनी गन्ध छोङ जाते' को छोड़ कर, गुलाब की महक बिखेरने की तरह सोचें - खरगोश तुरन्त दिखायी पड़ेंगे।-उन्मुक्त
2. थोड़ा जल्दी ढूँढें खरगोश को.इंतजार है.
-समीर लाल

3.कैनवस पर टँगा था क्षितिज सामने
रंग की प्यलियां भी भरी थीं रखी
तूलिका थी प्रतीक्षित मिलें उंगलियां
सांझ के चित्र मे रंग जो भर सकें

राकेश खंडेलवाल

आज का फोटो:-



यह फोटो प्रत्यक्षाजी की पोस्ट मास्टर जी से लिया गया है। स्केच पर पडे़ शायद चाय के निशान बताते हैं कि कितने कायदे से इस स्केच पर समय ने अपने हस्ताक्षर किये हैं।

अनामिका
अनामिका

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1 टिप्पणी:

  1. "आज की टिप्पणी" देना बहुत अच्छा विचार है, यह दिखाता है कि टिप्पणियों का भी महत्व है।

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