सोमवार, सितंबर 18, 2006

समाज सेवा के बहाने व्यावसायिकता?


उन्मुक्त की प्रविष्टि नई नहीं है, परंतु उन्होंने अपने सारे चिट्ठों को एक स्थल पर पढ़ने के लिए संजोया है, वहां पर वह नई बात बता रहे हैं कि इस पेज पर नयी प्रविष्टियां कैसे देखें.

"यह बहुत आसान है। आप अपने ब्राउज़र के edit मेन्यू में जायें और Find में नयी तारीख - उदाहरण के लिए 17 sep लिख दें। फिर Find Next करते जाएँ. बस आप उस तारीख की प्रविष्टियों पर पहुंचते जायेंगे। आप को पूरे पेज पर सारे चिट्ठों को देखने की जरूरत नहीं है. "


यह चिट्ठा-चर्चा प्रविष्टि इस युक्ति के सहयोग से ही लिखी गई है.

नितिन बागला ब्लॉस्ट्रीट के सूचनार्थ उसकी कड़ी चिपकाते हैं, परंतु शायद उन्हें यह कार्य चिट्ठा प्रविष्टि में नहीं, बल्कि बाजू-पट्टी में करना चाहिए. ई-छत्तीसगढ़ में - जिया कुरैशी बताते हैं कि साप्ताहिक आउटलुक ने छत्तीसगढ़ के प्रख्यात साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल को हिंदी के दस शीर्षस्थ रचनाकारों में से एक चुना है। श्री शुक्ल के अलावा कृष्णा सोबती, कमलेश्वर, केदारनाथ सिंह, कुवंर नारायण, श्रीलाल शुक्ल, असगर वजाहत, मंगलेश डबराल, उदय प्रकाश और विष्णु नागर को भी शामिल किया है। आउटलुक ने उनकी रचना ‘पेड़ पर कमरा' भी प्रकाशित किया है. रा. च. मिश्र अपने हिन्दी ब्लॉग पर सचिन का शतक वीडियो दिखा रहे हैं. सचिन को एक और शतक बनाते देखना किसे अच्छा नहीं लगेगा? शायद सौरव को. डी एल एफ़ कप मे वेस्ट इंडीज के विरुद्ध सचिन के नाबाद १४१ की एक झलक (यू ट्यूब पर ६१ सेकेंड) तो वाकई दर्शनीय है.


काव्य कला - के लक्ष्मी ना गुप्त को छाते का आविष्कार के बारे में बताने का खयाल उस वक्त आया जब तीन दिन से लगातार बारिश ने उन्हें परेशान किया. वैसे, मेरी भी स्वीकारोक्ति है कि मुझे भी छाते के आविष्कार के बारे में पता ही नहीं था और कभी मैंने भी कोशिश नहीं की थी जानने की. मेरा खयाल है कि छाते के आविष्कार के बारे में जानने न जानने से छाते के द्वारा भारी बारिश में भीगने की कोशिश और भीग नहीं पाने में असफल होने में कोई सम्बन्ध नहीं है. मगर, फिर भी, आविष्कार की कहानी रोचक है.

"आज तीन दिन से बारिस हो रही है। छाता लगा कर सबेरे ८ बजे की क्लास पढ़ाने जा रहा था तो सोचने लगा कि क्या आजकल के नवजवान हिन्दीब्लागरों को यह पता है कि छाते का आविष्कार किसने किया था। मैंने अनुमान लगाया कि शायद नहीं। मैं समाजसेवा का ऐसा सुनहरा मौका हाथ से नहीं निकलने देना चाहता था इसलिये यह प्रविष्टि पेश कर रहा हूँ। यह तो अन्दाज़ा लगा ही लिया होगा कि विश्व की अधिकांश बेहतरीन चीज़ों की तरह यह आविष्कार भारत में ही हुआ होगा। हाँ जी, हमारे पुराणों के अनुसार यह बिलकुल सत्य है।"


उन्मुक्त अपने दूसरे चिट्ठे पर - मुझे पता नहीं कि वे कितने चिट्ठे लिखते हैं - क्या उन्मुक्त को खुद पता भी है कि वे कितने चिट्ठे लिखते हैं? तो, उन्मुक्त अपने दूसरे चिट्ठे - या शायद तीसरे चिट्ठे पर - मां तुझे सलाम यानी कि - वंदेमातरम का इतिहास बता रहे हैं -

"आधुनिक युग में बंगला साहित्य का उत्थान उन्नीसवीं सदी के मध्य से शुरु हुआ। इसमें राजा राम मोहन राय, ईशवर चन्द्र विद्यासागर, परिचन्द्र मित्रा, माईकल मदसूदन दत्त, बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय, रवीन्द्र नाथ टेगोर ने अग्रणी भूमिका निभायी। इसके पहले बंगाल के साहित्यकार बंगला की जगह संस्कृत या अंग्रेजी में लिखना पसन्द करते थे। बंगला साहित्य में जनमानस तक पैंठ बनाने वालों मे शायद बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय पहले साहित्यकार थे..."



हमेशा की तरह सुनील - स्वच्छ और निर्मल शब्दों में ‘दिल्ली का दिल' बता रहे हैं जो अस्वच्छ और दूषित सा है -

"बचपन में घर में दूसरे शहरों से मेहमान आते तो कहते, "बाप से बाप, यहाँ दिल्ली में रहना क्या आसान है!"

लखनऊ अधिक सभ्य है, हैदराबाद में लोग कितनी इज़्ज़त से बात करते हैं, बम्बई में यातायात किस तरह नियमों का पालन करते हुए चलता है जैसी बहुत सी बातें सुनने को मिलतीं, यह बतलाने के लिए कि उनके मुकाबले दिल्ली वाले सभ्यताविहीन थे, उनके बात करने में लड़ाकापन था, उनके यातायात में कोई नियम न पालन करने का ही नियम था.

"दिल्ली के लोग या तो पंजाब से आये शरणार्थी हैं जिनका सब कुछ पाकिस्तान में रह गया और सब कुछ खोने के बाद जिन्होंने जीने के लिए लड़ लड़ कर अपने जीने की जगह बनाई है, उनसे सभ्यता की आकाँक्षा रखना बेकार है. दूसरे दिल्ली के रहने वाले देश भर से आये बाबू लोग हैं जो सरकारी दफ्तरों में काम करते हैं, उन्हें दिल्ली अपना शहर ही नहीं लगता, उनके घर तो अन्य प्रदेशों में हैं जहाँ से वे आये हैं, उन्हें इसलिए दिल्ली की कुछ परवाह नहीं है....""


प्रभाकरगोपालपुरिया ने इस दफ़ा ‘ब्राह्मण' को अपने व्यंग्यात्मक कविता का शिकार बनाया है और क्या खूब बनाया है. बानगी देखिए -

"देख ! इसे अब मत छूना,मैं ब्राह्मण हूँ.
आओ बैठो पैर दबाओ,थोड़ा ठंडा तेल लगाओ,
करो धीरे-धीरे मालिश,दूँगा तूझे ढेर आशीष,
पर तुम मुझको छूना नहीं,अपवित्र हो जाऊँगा.
ब्राह्मण हूँ...."


भारतीय सिनेमा में - जी.के. अवधिया सुभाष घई के नए प्रयोग के बारे में चर्चा कर रहे हैं. यहाँ वे जैकी श्राफ के भाई-पने को बताना नहीं भूले. रीतेश गुप्ता की भावनाएँ कल आनंद में थी, आज उनकी कविता परवान चढ़ रही है .

"एक उभरते कवि ने एक कविता गढ़ी ।
बदले मैं उसे एक प्रतिक्रिया कुछ यूं मिली ।
कृपया अपनी कविता का स्तर उठाइये ।
और साथ-साथ उसका वजन भी बड़ाइये ।
सम्मान पूर्वक कवि ने उत्तर दिया ।
श्रीमान आपने स्थिति को बिलकुल सही पढ़ा है ।
किन्तु यह कवि कुछ दिनों से ही कविता से जुड़ा है ।"


लखनवी ‘अतुल श्रीवास्तव' एक नए अंदाज की हृदय स्पर्शी कहानी सुना रहे हैं -

"अब भला नीरज कैसे चुप रहता? उसने भी अपने दिल की बात खोल दी, "अबे आमिर तो लड़की लगता है. मैं तो सलमान या संजय दत्त बनूँगा. बॉडी देखी है अपुन के भाई की? दाँयी बगल में श श शाहरुख और बायीं बगल में आमिर को दबा कर उनका भरता बना दे." अब तक तो सूखी घास में आग पूरी तरह से लग चुकी थी - मैं ह्रितिक, मैं अभिषेक और बीच बीच में मैं सचिन और मैं द्रविड़ की आवाजें भी आयीं.

पाँडे जी ने बच्चों से मिलने का अपना विचार फटे हुये कच्छे की तरह त्याग दिया और निराशा में मुंडी हिलाते हुये वापस पलट लिये. अभी कुछ ही कदम आगे बढ़े थे कि शोर शराबे और चिल्ल-पों के बीच में से एक मिमियाती हुई सी आवाज सुनायी दी, "मैं बड़ा होकर अशोक बनूंगा." खीज खाये हुये पाँडे जी ने झुँझलाते हुये पूछा, "अब ये अशोक ससुरा कौन है? पहले तो इसका नाम कभी नहीं सुना." एक बार फिर से मिमियाती हुई आवाज सुनाई दी, ................"

कहानी का क्लाइमेक्स तो, वास्तव में मजेदार है - हृदय में गुदगुदी मचाने वाला है. क्लाइमेक्स के लिए चिट्ठा पढ़ें

रविरतलामी गूगल के ‘समाज सुधार में व्यावसायिकता' को हिन्दी चिट्ठाकारिता से जोड़कर देखने की कोशिश कर रहे हैं तो मन की बात में नियम संयम की बातें हो रही हैं. जरा देखें क्या बातें हो रही हैं?

"सारी सृष्टि को इतना छेड़ते हो।
सब कुछ कर दिया है बेलगाम,
जैसे प्रकृति हो तुम्हारी ग़ुलाम।
पर तुम्हारा यह अहं ठीक नहीं,
नयों के लिए कोई सीख नहीं।
मत रखो नियमों को ताक पर,
मत काटो बैठे हो जिस शाख पर।
वरना स्वयं तो अंगभंग हो जाओगे,"

और, अरे! यहाँ तो टिप्पणी में रुपए, डॉलर और यूरो की बातें हो रही हैं!

रजनीश मंगला की टिप्पणी है...

भाया, आपकी ये कविता मैंने अपनी छोटी सी साप्ताहिक मुफ़्त बँटने वाली पत्रिका बसेरा के ग्याहरवें अँक में डाली है। उम्मीद है कि आपको कोई आपत्ती नहीं होगी। साथ में एक और प्रयोग भी करने जा रहा हूँ। अब से लेकर हर सप्ताह चुनी गईं ब्लाग प्रविष्टियों के लिए मैं छोटे से उपहार के रूप में एक एक यूरो (लगभग 55 - 58 रुपए) देना चाहता हूँ। अगर आप ये उपहार कबूल करते हैं तो कृपया मुझे भारत में अपने किसी बैंक खाते का विवरण rajneesh_mangla@yahoo.com पर भेजें। धन्यवाद

और, इस टिप्पणी पर व्यावसायिकता की ओर भाग रहे रविरतलामी को जरा सी व्यावसायिकता क्या दिखाई दी दौड़ पड़े अपनी टिप्पणी जड़ने -

7:59 AM

रविरतलामी की टिप्पणी है...

वाह भाई रजनीश . कभी मेरे ब्लॉग भी छाप देना . मुझे भी यूरो कोई खराब नहीं लगते हैं :)

5:08 PM

और, नियम संयम के साथ चिट्ठे की प्रकृति से मेल खाता प्रकृति का यह चित्र तो दर्शनीय है ही
नियम संयम का चित्र

**-**

अंत में, फ़रमाइशी व्यंज़ल. चहुँ ओर व्यावसायिकता के चर्चे हैं, परिचर्चाएँ हैं. चलिए आज इसी को चुनते हैं.

हमने जरा सी बात की व्यावसायिकता की
उन्होंने दुकानें सज़ा लीं व्यावसायिकता की

मुँह मोड़ लिए हैं ‘लंगोटिया यारों' ने यारों
जुर्म है
क्या बातें करना व्यावसायिकता की

मत करो शिकवा अपने काम में वज़न की
डालकर देखो जरा वज़न व्यावसायिकता की

लोग असफल हो गए, शायद उन्हें नहीं पता
मुहब्बत में भी जरूरी है व्यावसायिकता की

रवि भी चल पड़ा है अब दीवानों के रास्ते
हयात में देखे संभावना व्यावसायिकता की

**-**

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4 टिप्‍पणियां:

  1. रवि रतलामीजी की व्यंजलमय चर्चा बहुत अच्छी रही .उन्मुक्त जी के चिट्ठे की लिस्ट कभी काम करती है कभी नहीं. बहरहाल प्रयास के लिये सलाम आपने कर ही दिया.बधाई.आशा है आगे सोमवारी चर्चा आपके व्यंजलों सहित आती रहेगी.

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  2. बहुत सही रही यह व्यंजल मे तेरती चर्चा. अब तो हर हफ़्ते पढ़ने मिलती रहेंगी ऎसी ही बेहतरीन व्यंजली चर्चाऎं.

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  3. "क्या उन्मुक्त को खुद पता भी है कि वे कितने चिट्ठे लिखते हैं?"
    :-) शायद नहीं। पर हो सकता है कि मैं एक चिट्ठा और शुरु करूं।
    मेरे कंप्यूटर गुरु का कहना है कि नारद जैसी सेवा निःशुूल्क शुरु की जा सकती है। यदि वे कुछ कर सके फिर तो शुरु करना पड़ेगा।

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  4. ...मेरे कंप्यूटर गुरु का कहना है कि नारद जैसी सेवा निःशुूल्क शुरु की जा सकती है। यदि वे कुछ कर सके फिर तो शुरु करना पड़ेगा।,,,

    अवश्य शुरू करें. विकल्प हमेशा उपयोगी होता है. यह बात मैंने अमित को भी कहा था.

    दूसरा यह कि अभी का आपका ब्लॉग एग्रीगेटर ब्लॉगर पर है - क्या इसे आपने वर्ड प्रेस पर चलाकर देखा? यदि यह उसमें नहीं चलता है, तो मेरा एक सुझाव है कि इसके चार हिस्से कर दें. अभी सारे चिट्ठों को मिला कर एक पृष्ठ करीब एक मेगाबाइट का होता है जो डाउनलोड होने में बहुत देर लगाता है. यही वजह है इसके धीमा होने या न चलने का. इसे वर्णानुक्रम में बांट दें और चार हिस्से कर दें. जब तक नारद नहीं प्रकट होता है, यह एक अच्छा विकल्प तो है ही.

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