शुक्रवार, सितंबर 22, 2006

समझ कर चाँद जिसको आसमाँ ने दिल मे रखा है

जरा इस समीकरण को समझा जाये
समीकरण १: जो ज्यादा खर्च करे वह दिल वाला
समीकरण २: बेदिल दिल्ली
समीकरण ३: दिल्ली वाले सबसे खर्चीले

अब निष्कर्ष निकालिये कि बेदिल दिल्ली के बाशिंदे दिलवाले हुये कि नही?
देश के दूसरे शहरों के मुकाबले यहां के लोग ज्यादा खर्चीले हैं. यां यूं कहें कि यहां के लोग शॉपिंग के साथ-साथ दूसरी चीजों पर दिल खोल कर खर्च करते हैं. पिछले कुछ सालों के मुकाबले लोगों की आय में भी कुछ इजाफा हुआ


ताऊ जीतू चौधरी का दिल कोई पाकिस्तानी सरहद पार ले गई, अब ताऊ को सब सरहद पार सब कुछ हरा दिक्खे है। अभी तो संगीतज्ञ चोक्खे दिखते हैं। आगे आगे देखो क्या दिखेगा!
कहते है संगीत सरहदे नही जानता, सीमाए नही मानता। अच्छा संगीत भाषाओं के बन्धनों को भी नही मानता। एकदम सही है यह। यदि ऐसा ना होता तो हम अंग्रेजी, अरबी,स्पैनिश और ना जाने किस किस भाषा के संगीत को पसन्द ना करते होते। लेकिन जनाब, हमारी सीमा पार पाकिस्तान मे तो संगीत प्रतिभाओं का खजाना है।


यह गाना सुना है?
समझ कर चाँद जिसको आसमाँ ने दिल मे रखा है
मेरे महबूब की टूटी हुई चूड़ी का टुकड़ा है

नही तो रोशनी के घेरे मे जायें, याद आ जायेगा

चूड़ियों के इन्द्रधनुषी रंगो से सजा कल्पनालोक, उनकी मधुर खनक, चूड़ी वाले की टेर पर चूड़ी खरीदने घर से बाहर की ओर दौड़ती स्त्रियां, छोटी बच्चियों जैसे उत्साह के साथ रंग पसंद करती और तरह-तरह की चूड़ियों की तुलना करती स्त्रियां - ये सारे चित्र इस कविता के साथ मानो सजीव हो जाते हैं और कानों में गूँज उठते हैं मोलभाव में लगे उत्साहित मधुर स्वर. भारत के शहरों, गाँवों और आस-पड़ोस में यह दृश्य आम है. एक दृश्य, जिसकी कल्पना मात्र से ही मन भाव-विभोर हो उठता है. कितना अद्भुत है न, चूड़ी जैसी साधारण वस्तु कैसी प्रसन्नता का कारण बनती है!


वाशिंगटन मे कोई कितना अकेला है?


रचना जी को किसी ने भ्रामक सूचना दी है कि उनका चिठ्ठा नारद जी कविता के खाते में डाल देंगे। अजी वही कविता जिसका फातिहा स्वामी पढ़ चुके हैं और जिससे जीतू चिढ़ते हैं । इन अफवाहो से घबरा कर रचना जी गयी योग की शरण मे पर रंगो ने पीछा न छोड़ा। टिप्णीकार फिर भी हौसला बढ़ाने में लगे हैं।

घर और मकान में परिभाषायी दुविधा की झमेले में नोस्टालजिया रहे समीर जी ने नेताओं को धो डाला।


आज की टिप्पणी
है अमेरीका तो आपको भी अमरीकी होना होगा
दो पल हंसने के लिए दो पल रोना होगा
काहे बात मन पे लगाके लालाजी और दुःख हो
मकान हो तो वही सही.. बस अब ठुक लो


पँकज

आज का चित्रः



छायाचित्रकार के सौजन्य से

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2 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन चर्चा.बधाई.
    अरे भाई, इन नेताओं को पहले भी कई बार धोया है, मगर इतना पक्का रंग है, कि साफ ही नही होता है. खैर, कोशिश करना हमारा धर्म है, सो निभा रहे हैं. :)

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  2. अतुल जी मेरे भ्रम और ध्यान की चर्चा करते हुए आपने स्वामी जी के कविता के 'फातिहे' की जो लिन्क दी है उसके लिये विशेष धन्यवाद कहना चाहती हूँ..
    rachana

    उत्तर देंहटाएं

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