गुरुवार, सितंबर 28, 2006

जहां नामालूम तरीके से नहीं आता है वसंतोत्सव

नारद ने गारद किया, सब चिट्ठों का कारोबार
ठहरे से सबके ब्लाग हैं, है बोझिल सन्नाटे की मार
है बोझिल सन्नाटे की मार कि सबने लिखना छो़ड़ दिया
लिखना छूटा,पढ़ना भूला,तारीफौ से नाता तोड़ लिया
कह 'फुरसतिया' सुनो अब कष्ट मिटेंगे जल्दी शायद,
चिट्ठाचर्चा का तुत्फ उठाऒ, आयेंगे जल्दी खबरी नारद।


यह जलेबी हमने समीरलाल के बचे मसाले से बना ली काहे से कुछ लोगों को उनका यह आइटम बहुत पसंद आता है। पसंद आये तो उडनतस्तरी को वाह-वाह कर दीजियेगा और अगर न पसंद आये तो इसपर विस्तार से एक पोस्ट लिखियेगा ताकि जब कल अतुल चिट्ठाचर्चा लिखें तो उसके बारे में लिख सकें।

उत्कर्ष
उत्कर्ष


हां तो हम कह ये रहे थे कि उत्कर्ष ने अपनी दूसरी पोस्ट लिखी और अपना परिचय भी दिया। रविरतलामी को बच्चा जहां दिखा वहीं उसको अपना पाठक बनाने के लिये तुरंत बच्चे के लिये मर्फी के नियम लगा दिये अपनी ब्लाग पोस्ट पर। बताऒ भला कहीं ऐसा होता है कि नया-नया बच्चा आया ब्लाग लिखने के लिये और आप उसके लिये नियम दिखाने लगे। चलिये अच्छा देख ही लिये जायें क्या हैं नन्हें मुन्नों के लिए मरफ़ी के नियम:-

एक अभिभावक जितना जोर से चिल्लाकर, जितना ज्यादा देर तक और बारंबार समझाने की कोशिश करेगा किसी बच्चे के द्वारा उसे समझे व अपनाए जाने की संभावना उतनी ही कम होगी.
• किसी भोजन को बनने में जितना ज्यादा ऊर्जा, सामग्री व समय लगता है, किसी बच्चे के द्वारा उसे खाए जाने की संभावना उतनी ही कम होती है.


अब नीरज दीवान को भी क्या सूझी कि ब्लागरों के लिये भी मर्फी के नियम पूछने लगा। अरे भाई जो नियम फुरसतिया बता चुके हैं वो आप मर्फी से काहे पूछते हैं । ये लीजिये जमकर पढ़िये बकौल रवि रतलामी झन्नाटदार ब्लाग,ब्लागर,ब्लागिंग के फुरसतिया के नियम।

हीतेंन्द्र के बहुत मेहनत करके कथासम्राट प्रेमचंद की कहानियां आपके लिये पोस्ट की हैं। ये कालजयी कहानियां हैं- बड़े घर की बेटी, दुर्गा का मंदिर,पंच परमेश्वर, शंखनाद और नागपूजा। उधर उन्मुक्त जी हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा से वो अंश आपके लिये पेश कर रहे हैं जिसमें बच्चन जी ने जब इंदिरा गांधीजी से मित्रता का जिक्र किया है।

आप यहां पढते-पढते थक गये होंगे। अगर ऐसा है तो डा.प्रभात टंडन की होम्योपैथिक दवायें लें जोकि आपकी तकलीफ का शर्तिया इलाज हैं। अगर आपको दवा से आराम न मिले तो चिंता न करें,इलाज और भी हैं । आप ऐसा करें कि गिरिराज जोशी की ख्वाबों की रानी से मिल लीजिये। रानी का हुलिया और हरकतें कुछ यूं हैं:-

वो बला सी खूबसूरत, ख्वाबों की रानी है
थोड़ी नटखट, थोड़ी मासूम, थोड़ी सी सयानी है।
'सुमन' सा चेहरा, खुशबु सा बदन उसका
मोहब्बत की मूरत वो थोड़ी सी दिवानी है।
आँखे नशीली, होंठ रसीले और खाक करता हुश्न
नाजुक सा बदन उसका उफ् क्या मदमस्त जवानी है।
चाहत की अंगड़ाई लेती फिर पलटकर मुस्कुराती है
बाहों में है जन्नत उसके वो नजरों से शर्माती है।


इसका असर होगा क्योंकि पंकज को सोने की इच्छा हुई है तो आपको भी नींद आना चाहिये और एक बार नींद मार लिये तो फिर क्या ,सब चकाचक है। जब नींद खुले तो कुछ काम निपटाइये और विवादों की बरसी मनाइये। अरे अकेले नहीं भाई साथ में बिहारी बाबू हैं जो ये विवाद लेकर आये हैं

अल्लेव हम उधर विवाद में फंस गये इधर राजगौरव के साथ लफड़ा हुई गवा और उनको जो है सो क्या हुआ कि:-

सीली हवा छू गयी, सीला बदन छिल गया.. नीली नदी के परे, पीला सा चांद खिल गया..


इधर इनका बदन छिल गया और उधर शुऐब मौज लेते हैं:-

क्या आप भी किसी के इश्क मे फंसे हुए हैं? आपके लेख से यही लगता है वैसे याहां UAE मे वर्षा कभी नही होती मगर अचानक कभी कभी एक दिन चंद बूंदे टपक जाती हैं

राज गौरव बोले -इश्क का तो पता नहीं लेकिन बुखार में फंस गया हूं ।

अवधिया जी ने पुराने जमाने की मशहूर अभिनेत्री पद्मिनी निधन की जानकारी दी । पद्मिनीजी को हमारी भी श्रद्धांजली।

अफलातून देसाई ने परिचर्चा में हुई हिंदी चर्चा को अपने ब्लाग में पोस्ट किया । इसके अलावा अफलातून जी ने एक और काम शुरू किया जो कि अगर मीडिया वाले अंदाज में कहा जाये कि खासतौर पर चिट्ठाचर्चा में प्रकाशित खबर के कारण किया। हमने चिट्ठाचर्चा में अनुरोध किया था कि अफलातून जी बनारस और खासकर बी.एच.य. के बारे में लिखें। उन्होंने हमारे अनुरोध पर बना
यही है वह जगह
लिखना शुरू किया। शुरुआती पोस्ट में बीएचयू पर कवि राजेंद्र राजन की लिखी कविता है :-
यही है वह जगह
जहां नामालूम तरीके से नहीं आता है वसंतोत्सव
हमउमर के तरह आता है
आंखों में आंखे मिलाते हुए
मगर चला जाता है चुपचाप
जैसे बाज़ार से गुज़र जाता है बेरोजगार
एक दुकानदार की तरह
मुस्कराता रह जाता है
फूलों लदा सिंहद्वार
इस बार वसंत आए तो जरा रोकना उसे
मुझे उसे सौंपने हैं
लाल फीते का बढता कारोबार
नीले फीते का नशा
काले फीते का अम्बार
कुछ लोगों के सुभीते के लिए
डाली गई दरार
दरार में फंसी हमारी जीत - हार
किताबों की अनिश्चितकालीन बन्दियां
कलेजे पर कवायद करतीं भारी बूटों की आवाजें
भविष्य के फटे हुए पन्ने


अगली पोस्ट में काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के बारे में जानकारी है:-

यादगार और ऐतिहासिक स्थापना दिवस तो पहला ही रहा होगा.विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना मालवीय ने अंग्रेज अधिकारियों के अलावा गांधीजी ,चंद्रशेखर रमण जैसे महानुभावों को भी बुलाया था.

गांधी जी का वक्तव्य हिन्दी में हुआ .मालवीयजी को दान देने वाले कई राजे -महाराजे आभूषणों से लदे विराजमान थे .गांधी ने उन पर बेबाक टिप्पणी की .उस भाषण को सुन कर विनोबा ने कहा कि ‘इस आदमी के विचारों में हिमालय की शान्ति और बन्गाल की क्रान्ति का समन्वय है’.लोहिया ने भी उस भाषण का आगे चल कर अपनी किताब में जिक्र किया.

गांधी एक वर्ष पूर्व ही दक्षिण अफ़्रीका से लौटे थे और भारत की जमीन पर पहला सत्याग्रह एक वर्ष बाद चंपारन में होना था.’मालवीयजी महाराज’ (गांधीजी उन्हें यह कहते थे) की दूरदृष्टि थी की भविष्य के नेता को पहचान कर उन्हें बुलाया.


आशा है आगे अफलातूनजी के सौजन्य से रोचक जानकारियां मिलेंगीं बनारस और बीएचयू के बारे में ।

शरद के आगमन के पहले प्रेमलता जी बताती हैं ग्रीष्म के बारे में फिर शरद के बारे में:-
नदियाँ ग्रीष्म में महिला मजदूर की भाँति थकी सी लगती हैं तो वर्षा में प्रलय का स्वरुप लगतीं हैं पर शरद में फिरोज़ी परिधान पहने स्नेह छलकाती माँ के समान प्रतीत होती हैं।

शरद-ऋतु कोमलता और सुन्दरता अर्थात माधुर्य-गुण की परिचायक है। प्रकृति की शांत और मोहक छवियाँ अन्तःस्थल की सूक्ष्मपरत तक प्रभावित करती हैं। कहते हैं शरद-चाँदनी में ही राधा-कृष्ण और ब्रज गोपियों ने महारास (जिसे भक्ति,प्रेम और सौन्दर्य की सर्वव्यापकता की अभिव्यक्ति माना गया है) किया था।

आज अपने देश की साम्राज्ञी लताजी का जन्मदिन है उनको हमारी तरफ से जन्मदिन की शुभकामनायें।

आज की टिप्पणी:-


१.वुधवार की चिट्ठाचर्चा की जिम्मेदारी समीरलालजी कि है, यह बराबर याद रहता हैं क्योंकि शुरूआत में ही गर्मागरम जलेबी (कुण्डली शब्द का स्वादिष्ट विकल्प) खाने को मिल जाती हैं.समिक्षा की आपकी इस्टाइल के हम कायल हैं.

संजय बेंगाणी


समीरजी,
आप ही से प्रेरणा लेकर आप सब 'चिट्ठा- चर्चा'लिखने वाले लेखकों के लिये ये पन्क्तियाँ लिखी हैं-
-"रात को चिट्ठा लिखकर के, सुबह यहाँ वो आये,
ये चर्चा देखे बिना उससे रहा न जाए,
अपनी चर्चा देखकर मंद-मंद मुस्काए,
पढकर फिर चलता बने,
टीप्पणी से कतराए!!
आप सब का धन्यवाद,सुरूचिपूर्ण प्रस्तुति के लिये..

रचनाबजाज

आज की फोटो

:-

आज की फोटॊ एक बार फिर सुनील दीपक की छायाचित्रकार पोस्ट से


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2 टिप्‍पणियां:

  1. लिखने कुंडली लग गये, फ़ुरसतिया जी महारज
    उडन तश्तरी अब बांध लो, अपना बिस्तर आज
    अपना बिस्तर आज, वो तो गजब का लिख गये
    बचे मसाले से सही, किलो भर इमरती तल गये.
    कहे समीर कि भाई लगे हैं इतने खुश से दिखने
    प्रेमलता व राज की बात, फिर से लगे हैं लिखने.

    ---ये दोनो चिठ्ठे कल ही कवर कर लिये गये थे.. :)

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  2. लो जी एक और कुण्डलीकार जन्मे. खरबुजे को देख खरबुजा रंग बदलता हैं, यह बुरा भी नहीं. इसके अच्छे परिणाम आ रहे हैं. बुरा तो गिरगीट की तरह रंग बदलना होता हैं. अच्छी समिक्षा हैं, अब तो चिट्ठाचर्चा पढ़ना यानी 'कठोती में गंगा' हो गया हैं.

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