मंगलवार, सितंबर 05, 2006

सतगुरु की महिमा अनत...

आज शिक्षक दिवस है। इस अवसर पर आशीष ने अपने टाटी गुरुदेव को याद करते हुये लिखा:-
टाटी गुरु , एक ऐसा व्यक्तित्व जिसे समझना मेरे लिये आज भी मुश्किल है। उनकी छोटी छोटी चमकती आंखो मे मैंने हमेशा अलग अलग भाव देखे हैं। जब मैं किसी प्रतियोगिता मे कोई पुरस्कार लेकर पाठशाला जाता था, तो उन आंखो मे प्यार का एक सागर लहराता था, उनका उस समय पीठ थपथपाना आज भी याद है। जब भी वह समाचारपत्र मे किसी भी छात्र की उल्लेखनीय सफलता के बारे कोई समाचार पढते थे, उस दिन उस समाचार को कक्षा मे आकर सुनाते थे, उस समय उनकी आंखो मे एक चुनौती भरी होती थी, कर सकते हो तुम भी ?

अपने गुरुदेव के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को याद करते हुये आशीष ने लिखा:-
टाटी गुरुदेव का व्यक्तिव कभी कभार विरोधाभाषी हो जाता था। वो काफी हद तक चंद्रमा की कलाओं की तरह था। उनके व्यक्तित्व कभी पुर्णिमा के चांद की तरह उज्ज्वल होता था, कभी कभार अमावस की काली रात की तरह स्याह। जब उनके व्यक्तित्व मे का अमावस का पक्ष प्रबल होता तो वे शराब पीना शुरू कर देते थे, इस हद तक पीते की वे सारी दुनिया को भूल जाते थे। कभी कभी शराब के नशे मे धुत वे पाठशाला के सामने वाली सडक पर भी पडे रहते थे। जब पास में शराब पीने के लिये पैसे ना हो, तो वे किसी के भी सामने हाथ फैलाने के लिये हिचकिचाते नही थे। मैं इन दिनो उनसे दूर रहता था, हिम्मत नही होती थी उनके पास जाने की।

इसी क्रम में बिहारी बाबू ने गुरूजी कोभंवर में फंसाते हुये लिखा:-

दरअसल, पूरे परिदृश्य को देखें, तो लगता है जैसे गुरु को इसके लिए जितना गुनहगार माना जाता है, उतना वे हैं नहीं। गुरु अगर आज 'टीचर' बन गए हैं, तो इसके पीछे कई वजहें हैं और बिना उन वजहों की पड़ताल के उन्हें गुनहगार ठहराना जायज नहीं। हम गौर करें, तो पाएंगे कि टीचर का यह बाना गुरुओं ने मजबूरी में भी धारण किया है! और इसके लिए उन्हें जिन चीजों ने सबसे ज्यादा मजबूर किया है, वे हैं- आज का विकट भौतिकवाद, अनुशासन की छड़ी को रोकती कानून की तलवार, निरीह मानव की बनती उनकी छवि और खुद बच्चों के पैरंट्स का खराब रवैया।

वहीं फ़ुरसतिया अपने गुरुजनों को स्मरण करते हुये खड़िया- पाटी-बुदका दिनों मेंविचरने लगते हैं:-
हमें अपनी खड़िया-पाटी के दिन अभी भी बखूबी याद हैं। लकड़ी की तख्ती में मंगलसूत्र सा टंगा ‘बुदका’ ।’ बुदके’ में घुली हुई खड़िया तथा बस्ते में सरकंडे के कलम। पाटी कालिख से रंग-पोतकर तथा शीशी को घोंटते। घंटों घोंटने के बाद हमारी पाटी चमकने लगती। फिर उस पर जब हम लिखते तो पहले तो कुछ अनाकर्षक सा लगता लेकिन खड़िया सूख जाने के बाद अक्षर मोती से चमकने लगते।

रत्नाजी ने अपनी रसोई के गुर जनता को भी बताने शुरू कर दिये। शुरुआत की है फ़ीरनी से।आप भी चखें तथा बनायें।
हिमांशु अपनी पासवर्ड खो जाने मात्र की बात बखान करके अपने को मूर्खों का राजा मान बैठे।शुऐब ने सलाह देते हुये कहा है:-
अकसर चाबी गुम जाती है, खैर वोह तो नई चाबी बनाई भी जासकती है - मगर भाई साहब पासवर्ड दिमाग से गायब होजाना? आप ज़्यादा घूमा ना करें या फिर सभी पासवर्ड अपनी किसी डाइरी मे लिख रखें मगर डाइरी कहां रखी है वोह कहां लिखेंगे?

लक्ष्मी गुप्त जी ने पितृ पक्ष के अवसर पर हाहा महाराज के बारे में बताया है।बालेंदु शर्मा बलिहारी जा रहे हैं मीडिया की जो बालों का भी कत्ल करा देता है।रवि रतलामी वंदे मातरम विवाद के मद्देनजर प्रख्यात कथाकार अमृतराय का सत्तर के दशक मेंलिखा लेख पढ़ा रहे हैं जो कि आज भी उतना ही प्रासंगिक है:-
कैसे-कैसे रसायन तूने हमारी घुट्टी में घोलकर पिलाए हैं मां, हम कभी उबर थोड़े ही सकते हैं. बहुत बड़ा मातृऋण है तेरा क्योंकि वही तो चीज है जिसके चलते हम सब कुछ जो हम पर पड़ती है इतने मजे से हँसते-हँसते झेल जाते हैं और चूं भी नहीं करते. ओम् शांतिः शांतिः शांतिः. सब तेरी ही करामात है जो इस देश का कारखाना इतने आराम से चल रहा है, कहीं कोई रगड़ा नहीं झगड़ा नहीं. जो बंगले मोटर का आदी है वह अपने बंगले-मोटर में खुश है, जो झुग्गी में रहता है वह अपनी झुग्गी में खुश है. सेठ भी खुश, भिखमंगा भी खुश. पुलिस भी खुश और ब्लैकमार्केटियर-स्मगलर भी खुश- और उनसे सोना और घड़ी और दुनिया-भर के नायाब इम्पोर्टेड सामान खरीदने वाले हम-आप भी खुश! और जिस घूसखोरी को लेकर देश में बेकार इतनी हाय-तोबा मची है, उसकी तो खास बात यही है, लेने वाला भी खुश, देने वाला भी खुश.

सागर चंद नाहर जानकारी दे रहे हैं:-
आज की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण खबर यह है कि डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफ़िक और एनिमल प्लेनेट चैनल पर मगरमच्छों और अजगरों के साथ खेलते और उन्हें पकड़ते दिखते ऑस्ट्रेलिया के पर्यावरणविद स्टीव इरविन का एक जहरीली मछली के काटने से निधन हो गया है। स्टीव की बहादुरी के चलते उन्हें “क्रोकोडाईल हंटर” भी कहा जाता था।

सीमाकुमार अपने पलों का बंटवारा करने का प्रस्तावरखती हैं:-
एक पल
जो मेरा है,
एक पल
जो तुम्हारा है,
आओ मिल कर
बाँट लें ।
फिर हम दोनों के
दो – दो पल हो जाएँगे
साथ – साथ ।


बचपन से ही ग्राफिक का शौक रखने वाले शुऐब इंटरनेट की दुनिया में हिंदी में धमाल मजा रहे हैं अपने बनाये आइकन के जरिये।
नेताओं की फितरत बयान करते हुये गिरिराज जोशी लिखते हैं:-

पहले धर्म
अब वर्ण
और कल जातिगत बटवारा करेगा
फिर
उपजाति;गौत्रो की
धज्जियाँ उड़ाकर
एक हाथ से दुजे को कटवायेगा
लगता है
एक दिन
वोट के चक्कर में
हिन्दुस्तानी नेता
हर एक वोटर को
सौ टुकड़ो में बंटवायेगा
और
एक की जगह
सौ वोट डलवायेगा ॰॰॰

"लगे रहो मुन्नाभाई"ने गांधी को नया अर्थ दिया है यह मानना है शेखचिल्ली के वंशजों का।
रमा द्विवेदीजी अपनी भावनायें व्यक्तकरती हैं:-
त्याग की कीमत न समझी त्याग जो हमने किए,
छीन लीन्हीं धडकनें पर,लाश बन्दी है यहां।
कैसे करें उल्लास जब हर सांस बन्दी है यहां?


उधर राकेश जी अब मैं गीत नहीं लिखता बताते हुये गीत लिखा है:-
कभी पुकारा पनिहारी ने
कभी संभाला मनिहारी ने
चूड़ी के टुकडों जैसा मैं
पानी के भावों बिकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ

इस बीच बर्लिन में टोरनेडो के बारे में जान लीजियेक्षितिज से।
कोई गजल पढ़्ते हुये सुनने का मजा ही कुछ और होता है.यह बात डाक्टर प्रभात टंडन से बेहतर कौन बता सकता है जो गजल पढ़ते हुये गुनगुना रहे हैं:-
प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है।
नये परिदों को उडने में वक्त तो लगता है।
जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था ।
लम्बी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है।

वंदे मातरम में लालबुझक्कड़ जी अपना नया सवाल लेकर हाजिर हैं दीजिये जवाब और जब तक जवाब न सूझे तब तक
पढ़ डालिये कुमायूं का इतिहास निठल्ले भाई ने इतिहास लिखते हुये अपने ब्लाग का भूगोल भी आकर्षक कर लिया है।
सूचना: कल की चिट्ठाचर्चा के बाद रचना बजाज तथा लक्ष्मीगुप्त जी ने धूमिल की कविता मोचीरामपढ़ी तथा उनको अच्छी लगी। धूमिल की दूसरी कविता 'पटकथा' ,जो कि उनकी सबसे अच्छी कविताओं में से एक मानी जाती है,पढे।

आज की टिप्पणी:-


1.हाथ जोड़कर पत्नी के आगे करते सम्पूर्ण समर्पण
हमने हर इक गीत किया है उनके श्री चरणों में अर्पण
और अहिन्दीभाषी पत्नी, गदगद होकर ये कहती हैं
तुम मुझको अर्पण करते हो, मैं आऒ करती हूँ तर्पण

राकेश खंडेलवाल

2.बहुत सुन्दर लिखे हो।
टिप्पणी करने मे देर हुई, क्योंकि पूरा लेख किश्तों मे पढा। इस बार लेख की लम्बाई ज्यादा थी, लेकिन खली नही। सत्य वचन कहे हो फुरसतिया।

कुछ तो बहुत शानदार है:
१) बिना दहेज के मिले पति पर अधिकार भावना रखना कुछ ऐसा ही प्रयास है जैसे किसी जनरल डिब्बे में घुसकर सफलता पूर्वक कोई सीट जुगाड़ लेना।
२) यह प्रयास कुछ-कुछ ऐसा ही होता है जिस तरह महिला चिट्ठाकार अपने चिट्ठे ऊंघते हुये पतियों को घेर-घार कर पढातीं हैं।
३)भाईसाहब कितने एजेड ,डल से लग रहे थे कल पार्टी में
४)किसी भी दूसरी अनजान महिला को ऐसे वायरस की तरह समझती हैं जिसके संपर्क में आते ही उनके पति के सिस्टम का ‘कोर डम्प’ (साभार ठेलुहा)हो जायेगा।
५)खाने में कद्दू बनाया है कुछ और बना लूं क्या?
६) सारी भाभियाँ,जिनसे वे खुद इठलाकर बोलती हैं ,से उनके पति के ज्यादा बातचीत के प्रयास उनको उसी तरह नागवार लगते हैं जिस तरह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को गांगुली के समर्थन में दिये गये वीरेंद्र सहवाग के बयान लगते हैं।
फुरसतिया ने ये मुद्दा उठाकर हम अबला पतियों की, दुखती रग पर हाथ रख दिया है। अब दो काम होंगे, एक तो और अबला पति अपनी व्यथा सुनाते हुए आएंगे, दूसरी तरफ़ महिला ब्लॉगर पत्नियों की तरफ़ से मोर्चा सम्भालेंगी। लगे रहो गुरु, भिड़ा दिया सबको तुमने। अंतर्राष्ट्रीय अबला पति एकता जिन्दाबाद! (यार! इस श्रेणी वालों के लिए कोई आरक्षण नही है क्या?)

जीतेंदर चौधरी

आज की फ़ोटो:-


आज की प्रत्यक्षा के ब्लाग से .ये वे तस्वीरें हैं जो उन्होंने नहीं खींची.
ये सूरज है
सूरज है मेरा नाम

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2 टिप्‍पणियां:

  1. मै अभी भी कहे देता हूँ, शिक्षक दिवस पर गुरुदेव. यह रोज वाला मेंटन ना हो पायेगा, इसे साप्ताहिक विश्लेशण शुरु से ही कर लें, ताकि बाद की तकलीफ से बचा जा सके, आगे आप स्वंय गुरुदेव हो...नमन,,, ५ सितंबर को.

    --समीर

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  2. समीरजी ने अच्छा गुरूमंत्र दिया हैं, बाकी आप के उपर हैं.
    दिन भर का लेखा-जोखा एक अच्छी पहल हैं, मैं प्रशंसा करता हूँ. वैसे आप लिखते कब हैं? आज और भी चिट्ठे लिखे जाने हैं, उनका क्या?

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