रविवार, सितंबर 10, 2006

चिटठाकारों के असम्मेलन की चेन्नई मे धमाकेदार शुरुआत

जब अमेरिका में ९/११ का डर हावी होना शुरू हुआ है और अपने नारद जी सर्वर-मीसा झेल रहे हैं तब चेन्नई में देश-भर के
ब्लागर जुटे थे सम्मेलन के नाम पर मस्ती मारने के लिये.
कल देश के सबसे तेज चैनेल ने अपनी बेवकूफियों से पूरे देश को करोड़ों घंटे के लिये ठहरा दिया कारण केवल एक कारचालक
जो चालक के बगल वाली सीट पर बैठ कर कार चला लेता है.बिना चालक वाली कार देखना है तो कचराघर देखिये.मीडिया के यही हालत सुधारने के लिये
मीडिया युग वाले साथी कहते हैं:-
भारतीय टीवी मीडिया में उत्थान का दौर केवल आंकड़ो की जुबानी गाया जा रहा है। नैतिकता और मानवता की बलि देकर। कही वीभत्स विज़ुअल है तो कही किसी के जीवन की गंदगी का बखान। कहीं एजेंडा है तो कही गुणगान। इस दौर में बदलाव की जरूरत है। आपके सहयोग की जरूरत है। हम उन सभी लेखकों को आमंत्रित करते है, जो समकालीन मीडिया का साप्ताहिक, मासिक या घटना विशेष पर विश्लेषण करें। ये समय के अनुकूल होगा कि हम जारी रहें। क्योंकि बदलाव हमें ही करना है। हमारी कोशिश होगी कि बेहतर प्रभावी लेखों को भारती अखबारों में ज्यों का त्यों प्रकाशित करवाएं। ये इनाम भी होगा और उपादेयता भी। इंतजार है आपके बदले हुए रूख का।

स्वामी वंदेमातरम पर कुछ कहने का मूड बनाने के लिये जाते हैं हाकिन्स-बनाम पेस्ट्रिज के बचपने में:-
लेकिन सांझ ढले हॉकिन्स की सीटियां बजतीं रहतीं. खाना बनते ही मां गरम-गरम रोटियां तवे से सीधी तवे से पिताजी की और हमारी प्लेटों में उतारतीं रहतीं - हमारे होमवर्क और शैतानियों की स्टेटस रिपोर्ट की कामेंन्ट्री के साथ -जिसे इग्नोर करने की एक्टिंग करते पिताजी हमें आंखों ही आंखों मे मां की शिकायत दूर करने की हिदायत देते हुए टीवी की न्यूज बांचते रहते! हम खाना खाते हुए भी कामिक्स पढते रहते फ़िर होमवर्क का नंबर आता. माता-पिता गुड कॉप बैड कॉप खेलते हमारा प्रबंधन किए जाते!

मुद्दे की बात वो आखिरी में कहते हैं:-
सचमुच किसी को कोई भी देश प्रेम का गीत गाने की कोई जरूरत नही है. देश के कानूनों के तहत जी लें वो ही बहुत है. ऐसी बातें कर के अलगाववादी नेता अपने आपको शर्मसार करने से अधिक क्या कर लेंगे? इस से अधिक क्या कर लिया उन्होंने? और इस पर इतना बवाल मचा कर बोर करने के सिवा क्या कर लिया हिंदू नेताओं ने? बेजरूरत के मुद्दों पर भिडते हैं देसी की अब तो देख के कोफ़्त होती है! क्या इन्हें कोई और काम नही है??

निधि लगता है कि अपने ब्लाग के नाम के दबाव में आ गईं और देश के बारे में चिन्तन करने लगीं.अपनी सोच को
अपने आदर्श ,राष्ट्रपति कलाम, के माध्यम से व्यक्त करते हुये बताया:-
हम अपने देश में अपनी ही क्षमताओं और उपलब्धियों को पहचानने में क्यों हिचकिचाते हैं? हम एक अत्यंत गौरवशाली राष्ट्र हैं. हमारी सफलता की कितनी ही अद्भुत कहानियाँ हैं जिन्हें हम अनदेखा कर देते हैं. क्यों? हम विश्व में गेहूँ के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक हैं. हम चावल के भी दूसरे सबसे बड़े उत्पादक हैं. दुग्ध-उत्पादन में हम प्रथम स्थान पर हैं. ‘रिमोट सेन्सिंग सैटेलाइट’ के क्षेत्र में भी हम प्रथम हैं.

वंदेमातरम के साथी भारत आते हैं लौट जाते हैं देश के विकास से खुश होकर लेकिन नाम नहीं बताते अपना.सुझाव है कि वंदेमातरम के लोग लेख में अपना नाम भी लिख दिया करें.
डा.सुनील दीपक अपनी डायरी के पन्ने पलटते हुये सोचते हैं:-
लगता था कि हिंदी का प्रेम अपनी पीढ़ी तक आ कर ही रुक जायेगा. पापा, बुआ के परिवार में हिंदी जीवन यापन का माध्यम भी थी और सृजनात्मकत्ता का प्रेम भी. यही सिलसिला हमारी पीढ़ी में बहुत लोगों ने जारी रखा था. पर पिछले कुछ महीनों में हमारे बाद की नयी पीढ़ी ने हिंदी ने लिखना प्रारम्भ किया है इससे बहुत खुशी होती है और गर्व भी

अश्लीलता के लाभदायक पहलू से शायद आप परिचित न् हों लेकिन चिंता न करें रवि रतलामीं हैं न बताने के लिये जिस पर संजय एक्सपर्ट कमेंट भी देते हैं:-
कलाकार को अपना पेट भी भरना हैं और जितना मिलता हैं वह भूख को और बढ़ा देता हैं. सारा दोष अतृप्ति का हैं. खरिददार को आँखे तृप्त करनी हैं तो कलाकार को पेट.


छात्र अध्यापक संबंध पर अध्यापक चिट्ठाकार आशीष विचार करते हैं:-
आज के ज़माने में, खासतौर पर भारत में जहां सामाजिक दबाब बहुत ज़्यादा है, एक विडम्बना है और वो ये कि आज लोग अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा मुहैया कराना चाहते हैं पर अपने बच्चों को एक अच्छा शिक्षक, वैज्ञानिक (या दार्शनिक या लेखक) बनने के लिये प्रेरित नहीं करते हैं क्योंकि शिक्षक या वैज्ञानिक का पेशा कम तनख्वाह का है। बात भी सही है, भाई कम पैसे में किसका घर चलता है? अब गुरु द्रोण या पतंजलि या पाणिणि वाले ज़माने तो लद चुके हैं तो अब सरकार या राजाओं की भी ज़िम्मेदारी नहीं है कि शिक्षकों का पेट भरे। अब या तो शिक्षक कोचिंग करके पेट भरें या फिर कुछ और करें। उस पर भी लोग बोलते हैं देखो कोचिंग पढ़ा रहा है, कॉलेज में तो पढ़ाया नहीं जाता। हालांकि मैं कालेज में न पढ़ाने को सही नहीं ठहरा रहा हूं।

जब देश में वंदेमातरम के बारे में बाते हो रही हैं तो हिमांशु नागालॆंड के हाल भी देखना जरूरी समझते है.
डा.भावना कंवर मजदूर गरीब के हाल बयान करती हैं:-
दुःखों की बस्तियों में तो, बस आँसू का बसेरा है
जिधर भी देखती हूँ मैं, मिला डूबा अँधेरा है।

वो देखो जी रहें यूँ, न रोटी है न कपडा है
उन्हें मायूसियों के फिर, घने जंगल ने घेरा है।

कट्टर पंथी ताकतों के आपसी गठजोड़ के बारे में नचिकेताजी खुलासा करते हैं
:-"हम जिस केसरिया पेडे की लोगों में आदत लगाना चाहते हैं उसकी खासियत यह है कि उसे लोग तभी मजबूरी में खाते हैं जब उनमें दूसरे व्यंजनों के प्रति भय पैदा किया जाए. हरी बर्फ़ी और इटालियन पिज्जा बेचने वाले भी यही करते हैं. सबकी दुकानदारी एक-दूसरे के माल के प्रति लोगों में आशंका उत्पन्न करने से ही चलती है. यदि बाजार में हरी बर्फ़ी और इटालियन पिज्जा न हों, तो केसरिया पेडा कोई नहीं खरीदेगा."


वंदेमातरम पर नीरज दीवान ने जनसत्ता के सम्पादक प्रभासजोशी के विचार बताये.मालेगांव में हुये विस्फोट के बारे में अपने विचार प्रकट करते हुये अमिताभ त्रिपाठी नेकहा:-
यह आतंकवाद का युद्ध किसी समुदाय का किसी समुदाय के विरूद्ध भले न हो परन्तु एक समुदाय के धार्मिक जुनून का परिणाम अवश्य है इसलिये इस युद्ध में विजय के लिये आवश्यक है कि आतंकवाद की इस विचारधारा को लेकर आरम्भ हुई बहस किसी भावुकता के आवेश में रूकनी नहीं चाहिये.

कल की कविता पर रीतेश को रेणू आहूजाजी की टिप्पणी-झप्पीमिली:-
रीतेश जी,
कविता गढ़ने का बहाना आप खोज ही लेते हैं,
गहरी बात को सरल शब्दों से जोड़ ही देते है,
मां बाप से लेकर वतन की बंदगी,
अंजाने में भूल हो जाने की गल्ती,
सच्चाई भी है यही,सरलता को कविता में भर लिजीए ना.
कुछ बात कहने में हिचकिचाहट हो,तो कविता कर लीजिए ना.
-रेणू आहूजा.

प्रसन्न होकर रीतेश ने वही किया जो एक कवि कर सकता है-एक कविता समर्पित कर डाली रेनू जी को:-
रात भर रोशनी तिमिर से लड़ी होगी ।
सुबह फ़िर गुनगुनाती सबको मिली होगी ।
कविताई उपेक्षा या तारीफ़ की गुलाम नहीं ।
फ़िर भी जिन्हें दाद रेणू मिली होगी ।
उनकी कविता खिलकर फ़िर खिली होगी ।


बधाई:- हमारी जानकारी के अनुसार आज हमारी शशि सिंह मुम्बई वाले का जन्मदिन हैं.शशि को उनके जन्मदिन पर गुलगुलाती शुभकामनायें.

आज की टिप्पणी:-



१.आप सरल शब्दो में सहजता से विचार बयान कर जाते हैं.हिन्दी की जिम्मेदारी अगली पीढ़ी की नहीं हमारी हैं, हमे हिन्दी को कमाने लायक भाषा बना कर छोड़ना होगा.फिल्म की अच्छी समिक्षा की हैं आपने.
संजय बेंगाणी

आज की फोटो:-


आज की पहली फोटो राजेश की पोस्ट से:-
चिटठाकारों के असम्मेलन की चेन्नई मे धमाकेदार शुरुआत
>चिटठाकारों के असम्मेलन की चेन्नई मे धमाकेदार शुरुआत

दूसरी फोटो पंकज के कल्पना कक्ष से
कल्पना कक्ष
> कल्पना कक्ष

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2 टिप्‍पणियां:

  1. शशि भाई को उनके जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई। भई मै आज भी किसी काम मे व्यस्त हूँ, कल यानि सोमवार को लौटता हूँ, तब मिलते है।

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  2. शशि जी को जन्मदिन की बधाई

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