मंगलवार, सितंबर 19, 2006

नीरज निर्मल घास पर...

नीरज निर्मल घास पर प
 नीरज निर्मल घास पर..



हिंदी दिवस के अवसर पर पूरे देश में पुस्तक मेले लग रहे हैं.ऐसे ही एक मेले में खुलकर मिले नीरज दीवान से जगदीश भाटिया और बोलते पाये गये:-

निर्मल हृदय नीरज निर्मल घास पर पड़ीं किताबों की तरह खुलते चले गये। बातों बातों में दो घंटे और कैसे गुजर गये पता ही नहीं चला। इस प्रकार दो ब्लागरों की पुस्तकों के साथ भेंट समाप्त हुई।


अब यह नीरज दीवान के पल्ले है कि वे जगदीश जी का खुलासा करें.

मनीष ने तो बहाने से कविता सुना दी अब यह आप पर है कि आप वाह-वाह करें या आह-आह.वैसे मौका बदला लेने का भी है.आप भी टिका दीजिये एकाध कविता.लेकिन पहले मनीष की कविता तो झेल लीजिये:-

पर तुम ही कहो ये भी कोई बात है?
स्वप्न देखा है जिसने नहीं
कल्पना की उड़ान पर जो ना उड़ा
दूसरों का दर्द समझेगा क्या भला ?
जिसके मन-मस्तिष्क से मर गई संवेदना !

सो निर्भय हो के तुम ऊँचे उड़ो
सपनों की चाँदनी को तुम चखो
पर लौटना तो ,पाँव धरातल पर हो खड़े
है करना अब हम सबको यही जतन
जीवन में कैसे हो इनका संतुलन



गपशप सुनिये जिसमे बातें वही हैं जो होती हैं.शीर्षक है- फ़ुस्स हो गए बड़बोले बहल.

सुनील दीपक बता रहे हैं इरशाद मनजी जो कि ,लेस्बियन (समलैंगिक) है, कुछ भी उल्टा पल्टा कहती रहती है, विदेशियों की एजेंट है, केवल नाम की मुसलमान है", जैसी बातें कहीं जाती हैं उसके बारे में. जान से मारने की कई धमकियाँ मिल चुकी हैं उसे और केनेडा में उनके घर की खिड़कियाँ गोली से न टूटने वाली (बुलैटप्रूफ) बनी हैं के इस्लामी आतंकवादियों के बारे में विचार. इरशाद का सवाल है:-

अगर उन्हें मुसलमानों के मारे जाने का इतना ही गुस्सा है तो दुनिया के इतने देशों में जो मुसलमान शासन दूसरे मुसलमानों को मार रहे हैं उनके विरुद्ध क्यों नहीं आतंकवाद करते? सूडान में इस्लामी शासन के नीचे अरबी मुसलमान लड़ाकू काली चमड़ी वाले मुसलमानों को लूट रहे हैं, भूखा मार रहे हैं, उनकी औरतों का ब्लात्कार कर रहे हैं, उन पर बम बरसा रहे हैं तो क्यों नहीं बाकी के मुसलमान इसके विरुद्ध बोल रहे हैं? जो पाकिस्तान में सुन्नी मुसलमान, शिया मुसलमानों को मारते हैं तो क्यों नहीं बोलते? मुसलमान दुनिया में कितनी जगह गृहयुद्ध हो रहे हैं उसकी बात क्यों नहीं करते?

मुंबई बम ब्लास्ट में मारे गये लोगों केलिये संवेदना प्रकट करते हुये साधना कंवर लिखती हैं हायकू:-
दर्दनाक था
सदमें का असर
मिटा ही नहीं।


फिल्मी दुनिया में संगीत के सफर की जानकारी दे रहे हैं जी के अवधिया.

डा. रमा द्विवेदी अपने कविता अपना कोई नहीं है में अपने भाव व्यक्त करती हैं:-

सूना है मन का अंगना ,अपना नहीं कोई है,
हर सांस डगमगाती सी बेसुध हुई हुई है।

गिरती है पर्वतों से ,सरपट वो दौडती है,
प्रिय से मिलन को देखो पागल हुई हुई है।


वंदेमातरम में लालबुझक्कड़ जी ने जो पूछा है उसके जवाब भी आ चुके हैं.आप भी कुछ बूझिये न!
रमेशचन्द्र श्रीवास्तव की गजलें पढिए रचनाकार में.एक गजल में कहा गया है:-

दूर मंजिल नहीं, हौसला चाहिए
अब रुकावट है क्या देखना चाहिए

हम हवा की तरह हैं, ठहरते नहीं
पर्वतों में भी एक रास्ता चाहिए

देश ही में जिएँ देश पर ही मिटें
जिन्दगी में हमें और क्या चाहिए


चित्र क्या-क्या सोचने के लिये मजबूर करते हैं यह आप देखिये सुनील दीपक के फोटो ब्लाग में.

रवि रतलामी जी के वचन और कर्म में हालीवुड और झुमरी तलैया का अंतर दीखता है.एक तरफ़ तो वे परिचर्चा में कहते हैं कि ब्लाग पर कुछ विज्ञापन तो पोस्ट से ज्यादा खूबसूरत दिखते हैं(ऐसा लिखते समय उनके मन में अपने ब्लाग की भी /ही छवि होगी ) .दूसरी तरफ़ वे ब्लॉगर के चिट्ठे विज्ञापन मुक्त कैसे पढ जैसी पोस्ट लिखते हैं.मतलब एक तरफ तो महाराज खूबसूरती को पहचानेंगे और दूसरी तरफ उससे दूर रहने के तरीके बतायेंगे. बलिहारी है.

अनूप भार्गव को हिंदी दिवस पर उनके विदेश में हिंदी प्रचार-प्रसार के लिये किये जा रहे प्रयासों के लिये सम्मानित किया गया.इसका संक्षिप्त विवरण प्रत्यक्षा जी को जमा नहीं सो वे लिखती हैं:-

वाह ! अनूप जी को एक बार फिर ढेर सारी बधाई और शुभकामनायें कि आगे और भी सम्मान उन्हें मिलते रहें ।फुरसतिया जी इतना छोटा लेख ? नहीं चलेगा । हम तो विस्तार से अनूप द्वय की मुलाकाती कहानी पढना चाह्ते हैं ।


उन्मुक्त जी उनके समर्थन में ख़ड़े हो गये जबकि अनूप भार्गव पूछ रहे हैं नारद में सहायता कैसे करें:-
अनूप भाई:
आज ही भारत से लौटा हूँ ।
बधाई और शुभकामनाओंके लिये धन्यवाद ।
नारद को पुनर्जीवित करनें के लिये बतायें, “कहाँ , कैसे और क्या करना है ?” मेरा योगदान तो रहेगा ही लेकिन भारत में कुछ मित्रों से बातचीत हुई थी , शायद कोई बेहतर विकल्प सुझा सकूँ !!!! बतायें कि आवश्यकताएं क्या हैं ?


स्वामी जी तथा जीतेंद्र से अनुरोध है कि वे अनूप भार्गव जी से सम्पर्क कर लें.

कल की चर्चा जारी रखेंगे हमारे समीरलाल जी जिनके पास उड़न तस्तरी भी है और कुंडलिया भी सुनायेंगे

आज की टिप्पणी


Etna lallantop hindi bhi net per padhne milega,Kabhie soche hi nahi they.MAzboori hai ki hindi font mein nahi likh sakte parntoo, aabahr zaroor vyakt karna chaheinge.
एतना लल्लनटाप हिंदी भी नेट पर पढने को मिलेगा ,कभी सोचे ही नहीं थे. मजबूरी है कि हिंदी फांट में लिख नहीं सकते परन्तु आभार जरूर व्यक्त करना चाहिये.
अनजान


आज की फोटो



आज की फोटो फुरसतिया से .इसमें अनूप भार्गव को उ.प्र. के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव सम्मानित कर रहे हैं.

 अनूपभार्गव-मुलायम सिंह यादव

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2 टिप्‍पणियां:

  1. ...रवि रतलामी जी के वचन और कर्म में हालीवुड और झुमरी तलैया का अंतर दीखता है....

    फ़ुरसतिया जी, लगता है आपने परिचर्चा की 'गर्मागर्म परिचर्चा' के थ्रेड्स नहीं पढ़े, तभी आप ऐसा कह रहे हैं. ग़लती मेरी थी जो मैंने उनके लिंक जानबूझकर यहाँ नहीं दिए. समझदार को इशारा काफ़ी होता है की तर्ज पर था यह. फिर भी गुजारिश है कि आप परिचर्चा के थ्रेड्स पढ़ें फिर मेरे इस व्यंग्यात्मक चिट्ठे को पढ़ें. वैसे, मेरे कर्म और वचन में न कभी फ़र्क रहा है न रहेगा. मैंने जो कहा वह खुलेआम किया और करता रहूंगा.

    मुझे एक बात और समझ नहीं आती, एक तरफ तो हम अमित अग्रवाल जैसे सफल ब्लॉगर को बुलाकर उससे सफल ब्लॉगिंग के टिप्स पूछते हैं और उनके सान्निध्य में सम्मानित महसूस करते हैं (मद्रास चिट्ठा सम्मेलन) तो दूसरी तरफ कोई हिन्दी ब्लॉगर उनके पद चिह्नों में चलने की कोशिश करता दीखता है तो टांगें खींचते हैं, दकियानूसी बताते हैं औ र पता नहीं क्या क्या कहते हैं...

    कोई आश्चर्य नहीं कि हिन्दी भाषा में जागरण और भास्कर दोनों मिलाकर अंग्रेजी अखबारों से ज्यादा बिकते हैं, परंतु हिन्दी में कोई शोभा डे या खुशवंत सिंह नहीं बन पाया है आज तक जो एक लेख के बीस हजार रुपए कमाता हो. और शायद आगे भी न बन पाए...

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  2. अरे रविभाई,
    हमने सारे लिंक नहीं देखे लेकिन आपकी टिप्पणी जरूर देखी थी परिचर्चा में . उसी पर मेरी टिप्पणी है इस लेख में.कुछ खूबसूरत विज्ञापन पोस्ट से भी बेहतर लगते हैं आपने बताया था और कल की पोस्ट में बताया कि विज्ञापन हटाकर पोस्ट कैसे पढे़. यह खूबसूरती हटाने के तरीके काहे बता रहे हैं आप? यही बात मैंने आपकी पोस्ट में भी लिखी था और उसी के आगे यहां.बाकी सब मजे में है.

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