बुधवार, सितंबर 06, 2006

मुठ्ठी में है मेरा पन्ना हमारा

आज की उल्लेखनीय घटना रही मेरा पन्ना उर्फ सबका पन्ना के दो साल पूरे होने की ।जीतेंद्र चौधरी हिंदी ब्लाग जगत के सबसे लोकप्रिय चिट्ठाकारों में से हैं।खुद लिखने के अलावा लोगों को पकड़कर लिखाने में महारत रखने वाले जीतेंद्र ने ब्लाग जगत की समृद्धि के लिये तमाम तकनीकी योगदान दिये हैं। दो साल पूरा होने पर उनको बधाई तथा आगे के लिये शुभकामनायें।
शिक्षक दिवस पर गुरुजनों को स्मरण करने का सिलसिला जारी रहा। समीरलालजी,जीतेंद्र,नितिन बागला,ने अपने-अपने गुरुओं को नमन किया। नीरजदीवान का मंदिर बंद था तो जीतेंद्र की मूर्ति पर हीमत्था टेक लिया।उधर प्रत्यक्षा को एक-एक करके गुरुओं पर फूल चढ़ाना पसन्द नहीं आया तो पूरे स्कूल को ही याद कर लिया-निर्मल हृदय से:
मिशनरी स्कूल के फायदे नुकसान पर बहुत बहस हो सकती है पर मुझे लगता है कि कई ऐसी चीज़ें अपने में आत्मसात की जो सिस्टर्स की देन है । नैतिक मूल्य ,सही गलत की समझ , एक मूलभूत नैतिक आधार , ये भी उन्ही नन्स की देन है । एक और चीज़ जो ध्यान में आती है वो ये कि मदर हमेशा लंच के समय सामने वाले मैदान में चक्कर लगातीं और गिरी हुई कोई भी चीज़ उठाकर बिना हमलोगों को डाँटे कूडेदान में डालती जातीं । तब हम हँसते , खुसुर फुसुर करते । अब मजाल है कि कभी कोई चीज़ मैं सडक पर ऐसे ही फेंक दूँ । कूडेदान तलाशती हूँ । कई बार तो वापस घर तक भी लेकर आई हूँ अगर कोई सही जगह नहीं दिखाई दी है फेंकने के लिये ।

इन संस्मरण/ श्रद्धाजलियों से अलग जिया कुरैशी शिक्षा जगत में फैलती जा रही अराजकताओं पर निगाह डालते हैं तथा संजय बेंगानी शिक्षकों के भूमिका के एक अधिकारपूर्ण भविष्य निर्माता से बदलकर एक अधिकार विहीननिरीह सेवक के रूप में बदलने जाने की बात करते हैं।इसी अवसर पर अमिताभ त्रिपाठी ने प्रख्यात राष्ट्रवादी चिंतक, पत्रकार स्व.भानुप्रताप शुक्ल को याद किया ।

रविरतलामी ने रेमिंगटन के आनलाइन होने की सूचना देते हुये कुछ चुटकुले सुनाये।वहीं कचराघर में पंजाबी कंप्यूटर बरामद हुआ जिसमें कुछ चुटकुले भी भरे हुये हैं देखें तो सही।

प्रियंकर ने आज प्रख्यात कवि लीलाधर जगूडी की कविता उपलब्ध करायी

मेरा ईश्वर मुझसे नाराज़ है
क्योंकि मैंने दुखी न रहने की ठान ली

मेरे देवता नाराज़ हैं
क्योंकि जो ज़रूरी नहीं है
मैंने त्यागने की कसम खा ली है

न दुखी रहने का कारोबार करना है
न सुखी रहने का व्यसन
मेरी परेशानियां और मेरे दुख ही

ईश्वर का आधार क्यों हों ?

पर सुख भी तो कोई नहीं है मेरे पास
सिवा इसके कि दुखी न रहने की ठान ली है ।

विजय वडनेरे ने पहले हवा में कुछ तस्वीरें दिखाईं फ़िर हंसते हुये चोर पर मोर

पलाश में आज मीठा अहसास छाया हुआ है:-

मेरे गीले बालों में रुकी बून्दों को,
चोरी से साथ ले जाती है|
पङोसियों की कनखियों का,
जब-तब आसरा बन जाती है|

तितलियों की अटखेलियों को,
नयी दिशा दे जाती है|
ताज़ा धान की पूलियों को,
भीनी-भीनी खुशबू दे जाती है|

इस मीठे अहसास के बाद भारतीय भाषाओं में गुगल एडसेंस शुरू होने की खबर सुना दी |उधर
स्वामी जी खबरे लाये हैं कि मीबों ब्लाग पर आप खाली टिप्पणी ही नहीं बातचीत भी कर सकते हैं|
प्रभाकर पांडेय अपने ईश्वर बनने की कहानीकहते हैं:-
यह थी मेरे बेटे की चाल,
बहुत ही अच्छा हो गया मेरा हाल.
बड़े-बड़े व्यापारी,खड्डर टोपीधारी,
"भीखमंगा उत्थान कमेटी"
के नाम,करने लगे लाखों का दान.
अब मैं योगी के साथ-साथ हूँ भोगी.
भीखमंगे और भक्तों का ईश्वर.
हाँ !मैं हूँ परमेश्वर.


वंदेमातरम में पुछक्कड़ ने जो कुछ पूछा था उसका जवाब बताते हुये बुझक्कड़ ने बताया:-
अभी पिछले महीने ही एक दिलचस्प घटना हुई. विश्व के हज़ारों गणितज्ञ चार वर्ष में एक बार जमा होते हैं और नयी-नयी खोजों के बारे में चर्चा करते हैं. आम तौर पर यह गोष्ठी विकसित देशों में होती है और इस बार अगस्त के अंतिम सप्ताह में यह स्पेन के मेड्रिड शहर में थी. भारत के शीर्ष गणितशास्त्रियों ने सोचा कि अगली बार, अर्थात् सन् २०१० में इस गोष्ठी का आयोजन भारत में किया जाय, सो इसके लिये भारत ने भी अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी दावेदारी रखी. भारत को कहा गया कि वे अपनी दावेदारी के पक्ष में तर्क दें. भारत ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार किया और शुरुआत की गयी गणित में भारत के योगदान से. जब भारतीय बक्ताओं ने बोलना शुरु किया तो कई विद्वान भौंचक्के रह गये. उनको तो पता ही नहीं था कि जिस प्रमेय को वे पाइथागोरस प्रमेय के नाम से पढ़ते-पढ़ाते आ रहे थे, वह तो भारत की देन है! उनको और भी ऐसे कई आश्चर्य हुए इस गोष्ठी में.


यह बात सच है कि चिट्ठाचर्चा की दुबारा शुरुआत मैंने समीरलाल जी के कहने पर की।बाद में मुझे पानी पर चढा़या देबाशीष ने तथा प्रत्यक्षाजी ने। अब जब मैं इसे नियमित लिखना शुरू कर चुका हूँ तो समीरजी को लगा कि हमारे ऊपर अनावश्यक बोझ डाल दिया। इस बारे में वे कई बार लिख चुके हैं कि इसे साप्ताहिक किया जाये। कल संजय बेंगानी का भी कुछ ऐसा ही मत था।

बता दूं कि चिट्ठाचर्चा की शुरूआत मैंने दुनिया के किसी भी भाषा के चिट्ठे के बारे में चर्चा करने के उद्धेश्य से की थी। कुछ दिन अंग्रेजी,सिंधी,मराठी ब्लागों की चर्चा भी की गयी। लेकिन बाद में वह चल नहीं सका। चिट्ठाचर्चा भी स्थगित हो गया।फिर
कुछ दिन हुये देसीपंडित पर जब विनय ने हिंदी चिट्रठों के बारे में लिखना शुरू किया तो कुछ लोगों ने कहा कि एक से अधिक चिट्ठों के बारे में चर्चा की जानी चाहिये। विनय की अपनी सोच है तथा काम की सीमायें हैं लिहाजा वे आमतौर पर सबसे अच्छी तथा समीचीन पोस्ट का जिक्र करते हैं। मैंने यहाँ दुबारा शुरुआत विनय से अनुमति लेकर ही की।

मेरा प्रयास रहता है कि दिन में जो लिखा जाये उसे यहाँ दे सकूँ। रोज लिखने की बजाये हफ्ते में एक बार लिखने का विचार ठीक है लेकिन चिट्ठों की 'सेल्फ लाइफ' बहुत कम होती है। एक दिन में बासी हो जाता है। इसलिये मेरा विचार है कि जो मजा रोज लिखने में है वह हफ्ते में लिखने में लिखने में नहीं है। इसलिये लिखना जारी है। जिस दिन नहीं लिख पाया समझा जाये कि उस दिन के चिट्ठों का जिक्र गया शून्य में।

यदि कोई साथी इस काम में हाथ बटाना चाहे तो उसका स्वागत है। आइये है कोई बहादुर कुछ दिन बंटाने वाला!

आज की टिप्पणी:-


1.नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है,
मुठ्ठी में है मेरा पन्ना हमारा
नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है….
लेख में जो कमेंट मिले बोलो लोगे या ना लोगे
झूठी मुठी तारीफों का बोलो क्या करोगे….

जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई मेरा पन्ना को मेरा मतलब है तेरा पन्ना को
तरुण

2.आह!, अगर वही रामानुजगंज के पास वाला डालटनगंज है तो फिर हम तो रामानुजगंजवा में नौकरी किया हूँ भाई!
क्या बिहारी शहर था - तब रामानुजगंज में बिजली सातों दिन चौबीसों घंटे रहती थी और डालटनगंज में कभी कभार आ जाती थी. तब हँसते थे.
अब वही स्थिति मध्यप्रदेश की भी हो गई है.
अब समझ में आता है - हँसना बुरी बात है!
रवि रतलामी
3.मेरठ, उज्जैन जैसी घटनाओ के बारे मे जब मै पढता हूं , तो मै अपने अतीत की ओर देखता हूं। समझ नही पाता ऐसा क्या परिवर्तन आ गया है ?
प्राथमिक से लेकर १२ वी तक के मेरे जितने भी शिक्षक थे, उनके आज भी हम(ना केवल मै मेरे अधिकतर सहपाठी) चरण छुते है। जबकि ये वह शिक्षक थे, जो गलती करने पर घंटो मुर्गा बनाकर रखते थे, अधिकतर शिक्षको के पास एक रूल(लकडी का एक फुट का डंडा) होता था। सजा देने मे कोई कोताही नही बरती जाती थी।लेकिन शिक्षको के सम्मान मे कोई कमी नही होती थी।

उद्दंड से उद्दंड छात्रो को जो लडाई झगडो मे सबसे आगे रहते थे, किसी का सर फोड देना जिनके लिये आम बात होती थी, उन्हे भी मैने शिक्षको की दी सजा को सर झुका कर स्वीकार करते देखा है। मेरा ये अनुभव ज्यादा पूराना भी नही यही कोई दस साल पूराना है। मैने कालेज १९९७ मे खत्म किया है।
आशीष

आज की तस्वीर:-


आज की तस्वीर फ़िर प्रत्यक्षा के ब्लाग से ।
पानी के रंग
पानी के रंग से फ़ूल

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4 टिप्‍पणियां:

  1. "आइये है कोई बहादुर कुछ दिन बंटाने वाला!"

    -यदि मै कुछ बहादुर टाईप समझ मे आता हूँ तो बतलायें.

    -समीर लाल

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  2. अरे समीरजी,आप तो महारथी हैं। बहुत बड़े बहादुर हैं जो आपने यह चुनौती स्वीकारी।अब आप हफ्ते के दिन बतायें जिन दिनों आप चिट्ठाचर्चा में अपने जौहर दिखायेंगे। आप लिखेंगे तो हायकू,कुंडलिया भी मिलेंगी पढ़ने के लिये आपकी।पूरा मैदान खुला है आपके लिये आप जैसा मन चाहें लिखें। लोगों को भी कुछ नया अंदाज का लेखन मिलेगा।

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  3. शुक्रवार का दिन हमरे नाम कर दिजिये।

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  4. कर दिया। अब जुमे की नमाज आप पढ़ाओ। कल ही शुक्रवार। शुरू हो जाओ-शराफत के साथ।

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